कोशिका की संरचना एवं कार्य | Biology : Cell Structure

कोशिका की संरचना एवं कार्य | Biology : Cell Structure

जीवो के शरीर की सबसे छोटी इकाई कोशिका होती है, इसके अध्ययन को सायटोलॉजी (Cytology) कहा जाता है, कोशिका (Call) किसी जीव की संरचनात्मक एवं ‘कार्यात्मक इकाई (Structural and Functional Unit) होती है, जो विशिष्ट पारगम्य कला से घिरी होती है और जिसमें प्राय: स्वजनन की क्षमता होती है. कोशिका कहलाती है। कोशिका शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Cellula शब्द से हुई है, जिसका अर्थ एक कोष्ठ या छोटा कमरा है। । वर्तमान में इसे कोशिका विज्ञान भी कहा जाता है। सभी जीव-जन्तु, वनस्पतियाँ कोशिका के बने हैं।

एक कोशिकीय और बहुकोशिकीय जीव

एक कोशिका स्वयं में ही एक सम्पूर्ण जीव हो सकता है जैसे अमीबा, पैरामीशियम, क्लैमाइमिडोमोनास व बैक्टीरिया, इन्हें एक कोशिकीय जीव कहते है। एक कोशिकीय जीव जैसे कि अमीबा अपने भोजन को अंतर्ग्रहण, पाचन व श्वसन, उत्सर्जन, वृद्धि व प्रजनन भी करता है।

बहुकोशिकीय जीवों में यह सभी कार्य विशिष्ट कोशिकाओं के समूह द्वारा सम्पादित किये जाते है। कोशिकाओं का समूह मिलकर ऊतकों का निर्माण करते हैं तथा विभिन्न ऊतक अंगो का निर्माण करते है । बहुकोशिकीय जीवों में अनेक कोशिकाएँ होती है जो एक साथ मिलकर विभिन्न अंगो ‘निर्माण करती है, जैसे जन्तु, पादप, कवक आदि।

कोशिका की खोज

ब्रिटिश वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक ने 1665 ई. में कोशिका की खोज की। हुक ने बोतल की कॉक की एक पतली परत के अध्ययन के आधार पर मधुमक्खी के छत्ते, जैसे कोष्ठ देखे और इन्हें कोशा नाम दिया। यह तथ्य उनकी पुस्तक Micrographia में छपा। रॉबर्ट हुक ने कोशा भित्तियों के आधार पर कोशा शब्द प्रयोग किया। 1674 ई. में एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक ने जीवित कोशा का सर्वप्रथम अध्ययन किया। 1831 ई. में रॉबर्ट ब्राउन ने कोशिका में केन्द्रक व केंन्द्रिका का पता लगाया। 1831 ई. में केन्द्रक की खोज की।

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कोशिका सिद्धान्त (Cell theory)

वनस्पति विज्ञानशास्त्री श्लाइडेन एवं जन्तु विज्ञानशास्त्री श्वान ने 1839 में प्रसिद्ध कोशावाद को प्रस्तुत किया।

  • प्रत्येक जीव की उत्पत्ति एक कोशिका से
  • जीव का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं से
  • कोशिका का निर्माण जिस क्रिया से होता है, उसमें केन्द्रक मुख्य अभिकर्त्ता होता है।
  • मनुष्य की उत्पत्ति जाइगोट नामक एक कोशिका से हुआ

डुजार्डिन (Félix Dujardin) ने जीवद्रव्य की खोज की जबकि पुरकिन्जे (Jan Evangelista Purkyně) ने 1839 ई. में कोशिका के अंदर पाए जाने वाले अर्द्धतरल, दानेदार, सजीव पदार्थ को प्रोटोप्लाज्म या जीवद्रव्य नाम दिया। कैमिली गॉल्जी (Camillo Golgi) ने 1898 ई. में बताया गाल्जी उपकरण या गॉल्जीकाय की खोज की। 

फ्लेमिंग ने 1880 ई. में क्रोमेटिन का पता लगाया और कोशिका विभाजन के बारे में बताया। वाल्डेयर ने 1888 ई में गुणसूत्र का नामकरण किया। वीजमैन ने 1892 ई. में सोमेटोप्लाज्म एवं जर्मप्लाज्म के बीच अंतर स्पष्ट किया। जी. ई. पैलेड ने 1955 ई. में राइबोसोम की खोज की। क्रिश्चन रेने डे डुवे ने 1958 ई. में लाइसोसोम की खोज की। रिचर्ड अल्टमान ने सर्वप्रथम 1890 ई. में माइटोकान्ड्रिया की खोज की ओर इसे बायो- ब्लास्ट का नाम दिया। बेन्डा ने 1897-98 में माइटोकॉण्ड्रिया नाम दिया।

जीवों में कोशिकाओं के प्रकार

जीवों में दो प्रकार की कोशिकाए पाई जाती है 

(i) प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ – ऐसी कोशिकायें जिनमें केन्द्रक पदार्थ केन्द्रक झिल्ली के बिना होता है, जिनमें केन्द्रक-कला, केन्द्रक तथा सुविकसित कोशिकाओं का अभाव होता है। इनमें 70s प्रकार के राइबोसोम पाये जाते है। रचना के आधार पर कोशिकाएँ आद्य होती है। इनमें केन्द्रक पदार्थ स्वतंत्र रूप से कोशिका दव्य में बिखरे रहते है अर्थात केन्द्रक पदार्थ, जैसे- प्रोटीन, DNA तथा RNA कोशिकाद्रव्य के सीधे सम्पर्क में रहते है। इनके गुणसूत्रों में हिस्टोन प्रोटीन का अभाव होता है। उदाहरण- जीवाणु, विषाणु, बैक्टीरियोफेज, रिकेसिया तथा नीले हरे शैवाल की कोशिकाएँ आदि

(ii) यूकैरियोटिक कोशिकाएँ- ऐसी कोशिकाओं में दोहरी झिल्ली के आवरण यानि केन्द्रक आवरण से घिरा सुस्पष्ट केन्द्रक पाया जाता है,   जिनमें केन्द्रक कला, केन्द्रक तथा पूर्ण विकसित कोशिकांग पाये जाते है। इनमें 80S प्रकार के राइबोसोम पाये जाते है। इस प्रकार की कोशिकाएँ विषाणु, जीवाणु तथा नील हरित शैवाल को छोड़कर सभी पौधें विकसित कोशिका होते है। इनका आकार बड़ा होता है। इस प्रकार की कोशिका में पूर्ण विकसित केन्द्रक होता है जो चारों ओर से दोहरी झिल्ली से घिरा होता है। कोशिका द्रव्य में झिल्ली युक्त कोशिकांग उपस्थित होते है। इनमें गुणसूत्र की संख्या एक से अधिक होती है।

कोशिका के भाग (Parts of Cell)

इसका निर्माण विभिन्न घटकों से होता है, जिन्हें कोशिकांग कहते है। कोशिका के मुख्य 2 भाग है –  1. कोशिका भित्ति (Cell Wall) & 2. जीवद्रव्य (Protoplasm) ।

1. कोशिका भित्ति (Cell Wall) –

रॉबर्ट हुक ने कोशिका भित्ति की खोज की जो मुख्यतया सेल्यूलोज की बनी, कैल्सियम व मैग्नीशियम पेक्टेट की बनी मध्य पटलिका कोशिकाओं के बीच सीमेंट का कार्य करती है। यह केवल पादपों में पायी जाती है और सबसे बाहर की पर्त होती है। जीवद्रव्य के स्त्रावित पदार्थ द्वारा इसका निर्माण होता है। यह मोटी, मजबूत और छिद्रयुक्त होती है। कोशिका भित्ति मुख्यत सेलुलोज की बनी होती है। कवक व यीस्ट में काइटिन की बनी होती है । यह पारगम्य होती है 

प्राथमिक कोशिका भित्ति के ठीक नीचे अपेक्षाकृत मोटी, परिपक्व व स्थायी रूप से द्वितीयक कोशिका भित्ति होती है। यह सेल्यूलोज, पेक्टिन एवं लिग्निन आदि पदार्थों की बनी होती है। प्लाज्मा झिल्ली (जीव कला) कोशिका द्रव्य की वह बाहरी सीमा है जो विभिन्न प्रकार के अणुओं तथा आयनों के अन्दर आने-जाने पर नियंत्रण रखती है तथा कोशिका द्रव्य में आयनों की सान्द्रता के अंतर को बनाये रखने में मदद करती है। प्लाज्मा झिल्ली को जीव कला तथा प्लाज्मालेमा आदि भी कहते है। प्लाज्मा झिल्ली जन्तु कोशिकाओं की सबसे बाहरी पर्त होती है जबकि वनस्पति कोशिकाओं में यह दूसरी पर्त होती है। यह वसा और प्रोटीन की बनी होती है।

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2. जीवद्रव्य (Protoplasm) –

कोशिका के अंदर सम्पूर्ण पदार्थ को जीवद्रव्य कहते है। जीवों में होने वाली समस्त जैविक क्रियाएँ जीवद्रव्य में सम्पन्न होती है इसलिए जीवद्रव्य को जीवन का भौतिक आधार (Physical Basis of Life) कहा जाता है। आधुनिक जीव वैज्ञानिकों ने जीवद्रव्य का रासायनिक विश्लेषण करके यह पता लगाया कि उसका निर्माण किन-किन घटको द्वारा हुआ है, किन्तु आज तक किसी भी वैज्ञानिक को जीवद्रव्य में प्राण का संचार करने में सफलता प्राप्त नहीं हुई। यह प्रकृति का रहस्यमय पदार्थ है। जोहन्स पुरकिन्जे ने सर्वप्रथम 1840 ई में प्रोटोप्लाज्म या जीवद्रव्य नाम दिया। जीवद्रव्य के संघटन में लगभग 80 प्रतिशत जल होता है तथा इसमें अनेक कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ घुले रहते है। कार्बनिक पदार्थो में कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल तथा एन्जाइम मुख्य है।

अकार्बनिक पदार्थों में कुछ लवण, जैसे – सोडियम, पोटैशियम, कैल्सियम तथा आयरन के फॉस्फेट, सल्फेट क्लोराइड तथा कार्बोनेट पाये जाते हैं ऑक्सीजन तथा कार्बन डाई ऑक्साइड गैसे भी जल में घुली अवस्था में पायी जाती हैं। जीवद्रव्य के संघटन में 15% प्रोटीन, 3% वसा, 1% कार्बोहाइड्रेट और 1% अकार्बनिक लवण होते है।

जीव द्रव्य (Protoplasm) को 2 भागों में विभाजित किया गया है- (1) कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) तथा (2) केन्द्रक (Nucleus)

(1) कोशिका द्रव्य (Cytoplasm)

केन्द्रक और प्लाज्मा मेम्ब्रेन (Plasma Membrane यह जन्तु कोशिकाओं का वाह्य आवरण है) के बीच का भाग कोशाद्रव्य या कोशिकाद्रव्य कहलाता है। कोशिका के सभी आवश्यक अंग इसी भाग में पाये जाते हैं, जो कि कोशिका अंगक’ (Cell orgenelles) कहलाते हैं। ‘कोशिका अंगक’ निम्न है – 

A. कोशिका झिल्ली (Cell Membrane) –  कोशिका के सभी अवयव एक झिल्ली के द्वारा घिरे रहते हैं, इस झिल्ली को कोशिका झिल्ली कहते हैं। यह अर्द्धपारगम्य झिल्ली होती है। इसका मुख्य कार्य कोशिका के अन्दर जाने वाले एवं अंदर से बाहर आने वाले पदार्थों का निर्धारिण करना है। 

B. तारककाय (Centrosome) – इसकी खोज टी. बोवेरी ने की थी, यह केवल जन्तु कोशिकाओं में पाया जाता है। तारककाय के अंदर एक या दो कण जैसी रचना होती है जिन्हें ‘सेन्द्रियोल’ कहते हैं। समसूत्री विभाजन होता है। इसका मुख्य कार्य कोशिका विभाजन में सहायता करना है।

C. अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum)  –

यह कोशिका का कंकाल तन्त्र’ कहलाता है अर्थात् इसका मुख्य कार्य है कोशिका को ढाँचा तथा मजबूती प्रदान करना। यह एक ओर यह केन्द्रक झिल्ली से व दूसरी ओर कोशिका झिल्ली से सम्बद्ध होता है।  इस जालिका के कुछ भागों पर किनारे किनारे छोटी छोटी कणिकायें लगी रहती है, जिन्हे राइबोसोम कहते हैं।  यह दो प्रकार की होती है चिकनी अंतर्द्रव्य जालिका – इनमें राइबोसोम नहीं होते हैं। ग्लाइकोजन का संग्रह होता है। ये प्रोटीन संश्लेषण में भाग नही लेती। लिपिड के संश्लेषण में भाग लेती हैं। खुरदरी अन्तः प्रवृत्यी जालिका – इसकी बाहरी सतह पर सइबोसोम लगे रहते हैं।ये प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेती है।  इसका मुख्य कार्य उन सभी बसाओ व प्रोटीनो का संश्लेषण करना है जो विभिन्न झिल्लियों जैसे कोशिका झिल्ली, केन्द्रक झिल्ली आदि का निर्माण करते हैं।

Important Notes and Test – 

D. राइबोसोम (Ribosome) – 

ये अतिसूक्ष्म कोशिकांग हैं जो केवल इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी के द्वारा देखे जा सकते हैं । इसकी खोज व नामकरण ई० सी० पोलार्ड (George E. Palade) ने 1955 में की थी। यह राइबो-यूक्लिक एसिड नामक अम्ल व प्रोटीन की बनी होती है। इसे प्रोटीन की फैक्ट्री भी कहा जाता है।  इसलिए इसे प्रोटीन संश्लेषण का प्लेटफार्म (Platform of Protein Synthesis) कहते हैं। राइबो न्यूक्लियो प्रोटीन कण भी कहते हैं ये दो प्रकार के होते हैं. 1. 70S : आकार में छोटे eg : माइट्रोकाण्ड्रिया, क्लोरोफ्लास्ट, वैक्टीरिया 2. 80S : आकार में बड़े eg : विकसित पौधे व जन्तुओ में

E. माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) – 

ये कोशिकाद्रव्य में पायी जाने वाली अनेक गोलाकार व सूनाकार रचनाये होती हैं । कॉलीकर ने माइटोकॉण्ड्रिया की सबसे पहले खोज 1857 में की जो कोशिकीय श्वसन द्वारा ATP का निर्माण, इसके द्वारा कोशिका में ऊर्जा का संश्लेषण होता है। इसे ऊर्जा गृह’ (Power House) या कोशिका का पावर प्लांट कहते हैं। क्योंकि इसमें भोजन (सिर्फ कार्बोहाइड्रेट) का आक्सीकरण होता है। भोजन के ऑक्सीकरण को कोशिकीय स्वशन या अन्त स्वशन (Internal Respiration) कहते है, भोजन के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ही ऊर्जा ATP के रूप में बनती तथा संगृहीत होती है। इसकी खोज के 47 year बाद 1898 मे इसका नामकरण अल्टमैन व सी बेडा ने किया था। इसमें DNA, m – RNA एवं राइबोसोम पाये जाते हैं। जिनकी सहायता से ये प्रोटीन संश्लेषण में सक्षम हैं।

C6H13O6 +O2 → CO2 + H2O + A.T.P (रासायनिक ऊर्जा )

कार्बोहाइड्रेट का आक्सीकरण माइड्रोकाण्ड्रिया में होता है। कॉलीकर ने माइटोकॉण्ड्रिया की खोज की जो काशिकीय श्वसन द्वारा ATP का निर्माण इसके द्वारा कोशिका में ऊर्जा का संश्लेषण होता है। अत इसे कोशिका का पावर प्लांट कहते है।

F. गॉल्जीकाय (Galgi body)

कैनिलो गॉल्जी ने गॉल्जीकाय की खोज 1898 में की जो शुक्राणु के एक्रोसोम का निर्माण, हॉर्मोन स्रावण, पदार्थों का संचय एवं स्थानांतरण का कार्य करते है यह जालिकानुमा नलिकाओ या पुटिकाओं से बना जटिल संगठन होता है जो छोटी गोल पुटिकाओं से घिरा होता है। यदि कोई पदार्थ कोशिका से बाहर स्रावित होता है तो उस पदार्थ वाली पुटिकाएँ उसे कोशिका झिल्ली के माध्यम से बाहर निकलवा देती है इसलिए इसे कोशिका Traffic Police कहा जाता है। इसका मुख्य कार्य वसा (Fat) का संचय करना है और स्रावण करना है।  

G. लाइसोसोम (Lysosome) 

क्रिस्टियन डी डुबे ने 1955 में इसकी खोज की, ये एकल झिल्लीयुक्त गोल पेटी थैलीनुमा संरचना होती है। जो बाह्य कोशिका पदार्थों तथा आंतरिक कोशिका पदार्थों का पाचन होता है, इसमे विभिनन हाइड्रोलिटिक एन्जाइम्स भरे होते हैं इनका मुख्य कार्य भोजन पाचन (Food Digestion) होता है। जब यह फट जाती है तो कोशिका को नष्ट कर देती है, जिसके कारण इसे कोशिका की आत्म हत्या की थैली (Suicidal Bag of the Cell) कहते हैं।  इसमें लगभग 40 प्रकार के जल अपघटनीय एन्जाइम पायें जाते हैं। यह मुख्यतया जन्तु कोशिका में पायी जाती है। यह कोशिका के अवशिष्ट पदार्थों (Waste Material) का अवशोषणा (Absorb) कर लेता है।

H. लवक (Plastid)

लवक plant cell में पाये जाते हैं। लवक 3 प्रकार के होते हैं –

  1. Chloroplast (हरितलवक) – इसे पादप कोशिका का रसाई घर (Kitchen room) कहा जाता है, इसके अंदर एक हरे रंग का पर्णहरित पाया जाता है, हरित लवक का मुख्य अवयय (Component) क्लोरोफिल (Chlorophyll) है, जिसमें मैग्नीशियम धातु पायी जाती है। इसी की सहायता से पौधा प्रकाश संश्लेषण करता है। इसका मुख्य कार्य सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति तथा वायु मण्डल के कार्बन डाईऑक्साइड की उपस्थिति में भोजन का निर्माण करना है।
  2. Leucoplast (अवर्णी लवक) – ये पौधे के रंगहीन भागों में पाये जाते है और इनका मुख्य कार्य भोजन का संचय करना है । यह पौधों उन भागों में पाया जाता है जहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता है। eg : जड़े, भूमिगत तने, आलू, शकरकंद, गन्ना आदि, ये भोज्य पदार्थी को संग्रह करने वाला लवक है। 
  3. Chromoplast (वर्णी लवक) – ये पौधों के रंगीन भागों में पाये जाते हैं, ये रंगीन लवक होते हैं। जो प्राय: लाल, पीले, नारंगी आदि रंग के होते हैं। जैसे फलों एवं पुष्पों के रंगीन भाग में टमाटर का लाल रंग लाइकोपीन के कारण होता है। इसी प्रकार गाजर व मिर्च का रंग कैरोरीन के कारण, चुकन्दर का बिटानीन ओर बैगन का रंग ‘जैन्थोसाइनीन के कारण होता है अर्थात् लाइकोपीन, कैरोटीन, बिटानीन, जैन्थोसाइनीन आदि एक प्रकार (Chromoplast) है।

Exams Wise Test Series – 

I. रिक्तिकाएँ (Vacuoles)

यह निर्जीव रचना है इसमें तरल पदार्थ भरा होता है । जन्तु कोशिकाओं मे अनेक व बहुत छोटी होती है परन्तु पादप कोशिकाओं मे प्रायः बहुत बड़ी व केन्द्र में स्थित होती है तथा पादप कोशिकाओं में व्यापक रूप से पायी जाती है। इसे कोशिका का भण्डार कहते है क्योंकि इसमें विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट पदार्थ घुले रहते हैं। विभाज्योतक कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ अधिक संख्या में पायी जाती है जबकि परिपक्व कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ बडी और कम होती है। प्रत्येक रिक्तिका चारों ओर एक झिल्ली से घिरी होती है जिसे रिक्तिका कला या टोनोप्लास्ट कहते है। रिक्तिका के अंदर एक तरल पदार्थ भरा रहता है, जिसे रिक्तिका रस कहते है। खनिज लवण जैसे, नाइट्रेट्स, क्लोराइड्स, फॉस्फेट आदि कार्बोहाइड्रेटस, एमाइड्स अमीनों अम्ल, प्रोटीन, कार्बनिक अम्ल, विभिन्न रंग, द्रव्य एवं अवशिष्ट उत्पाद आदि पाये जाते है।  

(2). केन्द्रक (Nucleus)

इसे कोशिका का Director and Controller कहा जाता है। इसकी खोज राबर्ट ब्राउन (Robert Brown) ने 1831 में की थी। यह कोशिका के मध्य में एक रचना होती है जिसे केन्द्रक कहते हैं। यह कोशिका का सबसे प्रमुख अंग है क्योकि यह एक कोशिका के प्रबन्धक के रूप में कार्य करता है। केन्द्रक छिद्रयुक्त झिल्ली से घिरा होता है, जिसे केन्द्रक झिल्ली (Nuclear Membrane) कहते हैं केन्द्रक के 2 भाग होते है  (1) केन्द्रिका (Nucleolus) तथा  (ii) केन्द्रिक द्रव्य (Nucleoplasm) | DNA और RNA केन्द्रिक द्रव्य में पाये जाते हैं

  1. सबसे छोटी कोशिका प्लूरोनियोनिया (P.P.LU.)
  2. सबसे बड़ी कोशिका – शुतुरमुर्ग का अंडा (170 x 155 mm)
  3. सबसे लम्बी कोशिका तन्त्रिका कोशिका (न्यूरान )

 कोशिका में पाये जाने वाले विभिन्न अवयव

सर्वाधिक जल 75-85%, प्रोटीन 9-12%, कार्बोहाईड्रेट 2%, वसा 2-3%, DNA 0.4%, RNA 0.7%, कार्बनिक पदार्थ 0.4%, अकार्बनिक पदार्थ 1.5%. यह आनुवंशिकता का वाहक होता है क्योकि इसमें जनन के लिए, उपापचय परिवर्तन के लिए तथा जीवधारियों के व्यवहार के लिए आनुवंशिक सूचनाएँ उपस्थित होती है।

ऑक्सी तथा अनॉक्सी श्वसन में अंतर

ऑक्सी श्वसन – इस क्रिया में ऑक्सीजन गैस आवश्यक है, इसमें ग्लूकोज के अणुओं का सम्पूर्ण विखंडन हो जाता है। इसमें एक अणु ग्लूकोज से अत्यधिक ऊर्जा (686 कैलोरी ) ऊर्जा प्राप्त होती है। इस क्रिया में कार्बन डाई ऑक्साइड अधिक मात्रा में निकलती है। इसके अंत में कार्बन डाइऑक्साइड व जल ही प्राप्त होते है। ये क्रियाएँ माइटोकॉण्ड्रिया में एक चक्र के रूप में घटित होती है। इसे क्रेब्स चक्र कहते है।

समीकरण –  C6H12O6 6C02 + 6H2O + 686 kcal

अनॉक्सी श्वसन – इस क्रिया में ऑक्सीजन गैस की आवश्यकता नहीं होती है। इसमें ग्लूकोज के अणुओं का पूर्ण रूप से विखंडन नहीं हो पाता है। इसमें एक अणु ग्लूकोज से केवल 56 किलो कैलोरी प्राप्त होती है। इस क्रिया में कार्बन डाई ऑक्साइड कम मात्रा में निकलती है। इस क्रिया में क्रिया के अंत में एथिल ऐल्कोहाल बनता है। ये क्रियाएँ कोशिका द्रव्य में ही घटित होती है।

समीकरण – C6H12O6 2C2H5OH + 2CO2 + 56 kcal

पादप एवं जन्तु कोशिका में अंतर

पादप कोशिका जन्तु कोशिका
1. कोशिका भित्ति पाई जाती है 1. कोशिका भित्ति नहीं पाई जाती है
2. हरितलवक पाए जाते हैं 2. हरितलवक नहीं पाए जाते
3. सेन्ट्रोसोम अनुपस्थित होते हैं 3. सेन्ट्रोसोम उपस्थित होते हैं
4. रिक्तिकाएँ बड़ी तथा संख्या में कम होती हैं 4. रिक्तिकाएँ छोटी तथा संख्या में अधिक होती हैं
5. केन्द्रक परिधि की ओर हो सकता है 5. जबकि अधिकांश जन्तु कोशिकाओं में केन्द्रक मध्य में होता है

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