1857 Revolution Nature ( 1857 के प्रकोप-प्रकृति, घटनाओं, महत्व और परिणाम )

विद्रोह के समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री-पार्मस्टन
भारत का गवर्नर जनरल- लॉर्ड कैनिंग
विद्रोह के समय कंपनी का मुख्य सेनापति- जार्ज ऐेनीसन
विद्रोह प्रारंभ के बाद नियुक्त सेनापति-कॉलिन कैंपबेल
विद्रोह के समय भारत का सम्राट-बहादुर शाह जफर

1857 के विद्रोह को निम्नलिखित शीर्षकों के तहत सरलता से समझा जा सकता है

1-स्वरूप
2-कारण
3-प्रारंभ
4-विद्रोह का प्रसार और पतन
5-असफलता के कारण
6-महत्व
7-परिणाम

1. 1857 की क्रांति का स्वरूप

भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने की पूर्व संध्या पर भारतीय सैनिकों द्वारा जो विद्रोह किया गया उसकी प्रकृति को लेकर विद्वानों में मतभेद है अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे सिपाही विद्रोह ,सामंतवादी, प्रतिक्रिया ,हिंदू-मुस्लिम की संज्ञा दी है जबकि अधिकांश भारतीय इतिहासकार इसे राष्ट्रीय आंदोलन स्वीकार करते हैं जो भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया

लॉरेंस,सीले ,ट्रेवेलियन,मालसन,टी.आर.होम्स इतिहासकारों ने इसे सैनिक विद्रोह कहा कुछ भारतीयों ने भी उनकी हां में हां मिलाई जिसमें दुर्गादास बंदोपाध्याय और सर सैयद अहमद खां प्रमुख थे

सर सैयद अहमद ख़ां जो विद्रोह के समय बिजनौर के अमीन पद पर थे ने अपनी पुस्तक “An Essay on the Cause of the Indian revolt (1860)मैं इसे सैनिक विद्रोह माना लेकिन यह व्याख्या ठीक नहीं यद्यपि यह विद्रोह सैनिक विद्रोह के रूप में प्रारंभ हुआ लेकिन बाद में अधिकांश स्थानों पर जनता ने भी इस में भाग लिया 1858-59 में हजारों असैनिकों को भी दंडित किया गया था

ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भी इस विद्रोह को सिपाही विद्रोह घोषित किया गया लेकिन ब्रिटेन के प्रसिद्ध नेता बेंजामिन डिजराइली जो रुढ़िवादी दल के नेता थे ने 27 जुलाई 1857 को हाउस ऑफ कॉमंस में बोलते हुए सरकार के इस मत का खंडन किया और कहा कि यह आंदोलन एक राष्ट्रीय विद्रोह था ना कि सिपाही विद्रोह

भारतीय इतिहासकार अशोक मेहता ने अपनी पुस्तक द ग्रेट रेबिलिएशन में इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहा, वी.डी.सावरकर ने 1909 में लिखित अपनी पुस्तक “द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857″” में एक सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी

भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कहीं भारतीय इतिहासकारों में इसकी प्रकृति की चर्चा कि इनमें सुरेंद्र नाथ सिंह, रमेश चंद्र मजूमदार ,शशि भूषण चौधरी और पूरन चंद्र जोशी महत्वपूर्ण है

एस एन सेन ने भारत सरकार के कहने पर “1857 नामक पुस्तक” लिखी इस पुस्तक में वह तर्क देते हैं कि यद्यपि इसे राष्ट्रीय संग्राम नहीं कहा जा सकता लेकिन इसे सैनिक विद्रोह की संज्ञा देना भी गलत होगा क्योंकि यह कहीं भी केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहा अवध में एक जन आंदोलन बन गया था जहां के देशभक्तों ने अपने राज्य और राज्य के लिए संघर्ष किया

इसके बावजूद एस. एन. सेन अवध के विद्रोहियों को स्वतंत्रता का अग्रणी नहीं मानते क्योंकि वे राष्ट्रीय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना से अनभिज्ञ थे भारत सरकार ने आर. सी. मजूमदार को 1857 के विद्रोह का इतिहास लिखने के लिए किया था लेकिन सरकारी समिति से अनबन होने के कारण उन्होंने इस कार्य को करने से इंकार कर दिया और स्वतंत्र रूप से अपनी पुस्तक “The Sepoy Mutiny and Rebellion of 1857″1957 में प्रकाशित की

तदंतर उन्होंने अपने तर्कों को उन अध्याय जो उन्होंने भारतीय विद्या भवन की पुस्तक “British Paramountcy and Indian Renaissance Part-1” के लिए लिखे लेख में और अधिक विस्तार पूर्वक स्पष्ट किया उन्होंने इस पुस्तक में निष्कर्ष निकाला है कि यह तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न तो यह प्रथम राष्ट्रीय तथा न हीं स्वतंत्रता संग्राम था

मजूमदार ने इस विद्रोह का क्रमबद्ध इतिहास नहीं लिखा है इस विषय में कुछ भ्रांतियां दूर करने के उद्देश्य से कुछ तथ्य सामने रखे हैं उनके विचार से इसे राष्ट्रीय आंदोलन नहीं कहा जा सकता इसमें देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग रूप धारण किए उनकी मुख्य देन इस विद्रोह के गंभीर प्रवाह के प्रति आगे आने वाली पीढ़ियों का ध्यान आकर्षित करना है

शशि भूषण चौधरी 1957 में अपनी प्रकाशित पुस्तक “Civil Rebellion in Indian Mutinies,1857-1859 में 1857-58 की घटनाओं को सैनिक व असैनिक विद्रोह के सम्मिश्रण के रूप में देखते हैं उनका कहना है कि इस विद्रोह का पहले के किसान विद्रोह से संबंध देखा जा सकता है उन्होंने इस ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि मूल रूप से लोग अपनी संस्कृति और तौर-तरीकों की रक्षा करने का प्रयत्न कर रहे थे

1957 में पूर्ण चंद्र जोशी द्वारा संपादित पुस्तक “Rebellion,1857:A Symposium मार्क्सवादी दृष्टिकोण से 1857 की घटनाओं का विश्लेषण किया गया है

शशि भूषण चौधरी ने अपनी एक पुस्तक “Theories of the Indian Mutiny” में 1857 के संघर्ष को स्वतंत्रता संग्राम माना है

बहादुर शाह के मुकदमे के जज मेजर हैरीयट ने मुकदमे में पेश किए गए सारे कागजातों का अध्ययन करने के बाद यह नतीजा निकाला आरंभ से ही षड्यंत्र सिपाहियों तक सीमित नहीं था और ना उनसे यह शुरू ही हुआ था बल्कि इसकी शाखाएं राजमहल और शहरों में फैली हुई थी

बहादुर शाह ने 25 अगस्त 1857 को प्रकाशित इस इस्तहार में कहा था यह सब को विदित है कि इस युग में हिंदुस्तान के लोग चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान सभी विधर्मी और विश्वास घातक अंग्रेजों के जुल्म से बर्बाद हो रहे हैं

नाना साहब ने फ्रांस के सम्राट को चार पत्र लिखिए जिनमें बहादुर शाह द्वारा लगाए गए सभी अभियोगो का समर्थन किया गया था अवध की गद्दी पर बैठे नये नवाब बिरजिस कादिर ने भी एक घोषणा पत्र विद्रोह का समर्थन करते हुए अंग्रेजों के विरुद्ध जारी किया था

इस आंदोलन की तीन प्रमुख नेताओं के 3 लेखों से यह स्पष्ट हो जाता है कि केवल सेना की शिकायतें ही 1857 की घटनाओं के लिए उत्तरदाई नहीं थी बल्कि उच्च वर्ग में भी एक आम असंतोष था कुल मिलाकर 1857 का विद्रोह मध्ययुगीन व्यवस्था से अपने को बचाने और अपनी खोई हुई मर्यादा प्राप्त करने का अंतिम प्रयास था, राजा और जमीदार इस जमात के नेता थे यह मोटे तौर पर एक राजनीतिक आंदोलन था जिसका उद्देश्य भारत से विदेशी शासन को दूर करना था

1857 की क्रांति के विद्रोह के कारण

1857 के विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक ,आर्थिक धार्मिक और सैनिक कारण विद्यमान थे लेकिन सीधे तौर पर इसका मुख्य कारण अंग्रेजों द्वारा भारतीय जनता का अमान्य शोषण था

प्रमुख कारणों का विश्लेषण निम्नलिखित है-

राजनीतिक कारण- यद्यपि मुगल सम्राट 1803 से ब्रिटिश संरक्षण में रहने लगा था लेकिन मान मर्यादा संबंधित उनके दावे स्वीकृत थे वह गवर्नर जनरल को प्रिय पुत्र और वफादार नौकर संबोधित करते थे

ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने बादशाह को यह समझा दिया था कि आपकी बादशाहत नाम मात्र की है और दरबार के ब्रिटिश रेजिडेंट नजर देते समय खड़े होने से इनकार किया इसके बाद के एक ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने बादशाह को अपने दावे और अधिकार छोड़ने को कहा, इसने बादशाह को नजर लेने,खिल्लत देने और दरबार करने से रोक दिया

दीवाने आम और दीवाने खास भी बंद कर दिया गया डलहौजी ने सम्राट को लाल किले से हटने के लिए कहा ,बादशाह को उपाधि छोड़ देने और अपने उत्तराधिकारी नामजद करने का अधिकार भी छोड़ देने को कहा इन घटनाओं से सभी लोग मुगल बादशाह के अपमान से नाराज हुए और उनकी बादशाहत मिटते हुए नहीं देखना चाहते थे

अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्त कर कुशासन के आधार पर फरवरी 1856 में अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया जबकि अवध से अधिक अंग्रेजों का समर्थक और आज्ञाकारी राज्य कोई भी नहीं था अवध को एक चीफ कमिश्नर का क्षेत्र बना दिया गया और हेनरी लॉरेंस पहला चीफ कमिश्नर नियुक्त हुआ था

डलहौजी ने उचित और अनुचित तरीकों से देशी राज्यों का अपहरण किया गोद लेने का निषेध कर उसे उसने संतारा जैतपुर संभलपुर घाट उदपुर झांसी और नागपुर को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया अंग्रेजों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब की पेंशन भी बंद कर दी कर्नाटक सूरत और तंजौर की राजाओं के उपाधियों का अंत कर दिया गया

1854 डलहौजी ने जमीदारों और जागीरदारों की जांच के लिए मुंबई में इनाम कमीशन बैठाया इस कमीशन ने 35000 जागीरों की जांच की और लगभग 20000 जागीरे जप्त कर ली कंपनी की सेवा में भारतीयों को उच्च पदों पर नहीं रखा गया 1860 में सर सैयद अहमद ने घोषणा की कि विद्रोह का सबसे महत्वपूर्ण कारण भारतीयों को प्रशासकीय तंत्र में प्रविष्ट ना होने देना है अंग्रेजों के प्रशासकीय परिवर्तनों ने यहां की प्रचलित व्यवस्था को जकझोर दिया था

आर्थिक कारण :- अंग्रेजों की नीति की वजह से उद्योग धंधे भी बंद हो गये इससे बहुत लोग बेरोजगार व निर्धन हो गये उनकी कृषक योजनाएं भी सफल नहीं हो पायी

सामाजिक कारण:- सामाजिक वजह जाति थी वे जातियों की अवहेलना करते थे सती प्रथा पर भी प्रतिबंध लगा दिया डाक तार चलाया रेल चलाई ये सब कार्य किया तो लोगों को लगा कि अंग्रेज इन सब के माध्यम से ईसाई धर्म का प्रचार करना चाहते है

धार्मिक कारण:- वे हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मो की आलोचना करते थे उन्होंने ने गोद प्रथा को भी बंद करा दिया

तत्कालिक कारण:- सूअर की चर्बी का बना कारतूस को मुँह से चबाना पडता था और हिंदू और मुस्लिम दोनो सैनिकों ने ही उसे मुँह से चबाने को मना कर दिया था चर्बी लगे कारतूसों के प्रयोग से चारों तरफ से असंतोष ने विद्रोह के लिए निर्धारित तिथि से पूर्व ही विस्फोट को जन्म दे दिया।

29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में दो अंग्रेज अफसरों को गोली से उड़ाया , 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी दी गई

क्रांति के प्रतीक के रुप में कमल का फूल और रोटी को चुना गया। कमल के फूल को उन सभी सैन्य टुकड़ियों तक पहुंचाया गया, जिन्हें विद्रोह में शामिल होना था। रोटी को एक गांव का चौकीदार दूसरे गांव तक पहुंचा था।

विद्रोह के प्रमुख केंद्र

  1. दिल्ली – बहादुर शाह जफर और वख्तखा- निकसन और हडसन
  2. झांसी -रानी लक्ष्मीबाई -जनरल हाउ्रोज
  3. ग्वालियर -तात्या टोपे -जनरल हाउ्रोज
  4. लखनऊ -बेगम हजरत महल- कॉलिंन कैंपबेल
  5. कानपुर- नाना साहब-कॉलिंन कैंपबेल
  6. जगदीशपुर /आरा -कुंवर सिंह विलियम टेलर
  7. इलाहाबाद- लियाकत अली- कर्नल नील
  8. फैजाबाद -मौलवी अहमदुल्ला- जनरल रेनार्ड
  9. बरेली -खान बहादुर – विंसेट आयर

संगठन

1857 की क्रांति के संबंध में यह कहा जाता है कि इसमें संगठन का अभाव था। इस क्रांति के लिए उद्देश्य, निश्चित समय, प्रचार, तैयारी, एकता, नेतृत्व से लेकर गांवों तक सम्प्रेषित किया गया था। संवाद प्रेषण के लिए कमल आदि प्रतीकों का प्रयोग किया गया था।

उद्देश्य

1857 की क्रांति का उद्देश्य निश्चित और स्पष्ट था। अंग्रेजों को देश से निकालना और भारत को स्वाधीन कराना क्रांतिकारियों का अंतिम लक्ष्य था । यह कहना कि इस क्रांति में भाग लेने वाले सैनिकों, जमींदारों या छोटे-मोटे शासकों के निजी हित थे, क्रांति के महत्त्व को कम करने की कोशिश है। वस्तुतः यह विद्रोह एकता पर आधारित और अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध था।

समय

सम्पूर्ण देश में क्रांति की शुरूआत का एक ही समय निर्धारित किया गया था और वह था 31 मई 1857 का दिन । जे.सी. विल्सन ने इस तथ्य को स्वीकार किया था और कहा था कि प्राप्य प्रमाणों से मुझे पूर्ण विश्वास हो चुका है कि एक साथ विद्रोह करने के लिए 31 मई, 1857 का दिन चुना गया था।

यह संभव है कि कुछ क्षेत्रों में विद्रोह का सूत्रपात निश्चित समय के बाद हुआ हो । किन्तु, इस आधार पर यह आक्षेप नहीं किया जा सकता कि 1857 की क्रांति के सूत्रपात के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं किया गया था।

अंग्रेजों ने 20 सितंबर 1857 को दिल्ली पर कब्जा कर लिया तात्या टोपे का वास्तविक नाम रामचंद्र पांडुरंग था जो मान सिंह के विश्वासघात के कारण पकड़े गए, रंगून में बहादुर शाह जफर की मृत्यु हो गई

विद्रोह की असफलता के अन्य कारण:

क्रांतिकारियों ने जिस उद्देश्य से 1857 की क्रांति का सूत्रपात किया था, उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्होंने सोचा था कि अंग्रेजों को बाहर खदेड़ कर भारत की स्वाधीन कर देंगे। परन्तु, क्रांति के दमन के बाद अंग्रेजों ने ऐसी नीति अपनायी कि 90 और वर्षों तक भारतीयों को गुलाम बनाए रखने में सफल रहे। इस महान् क्रांति की असफलता के अनेक कारण थे, जिनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं-

1⃣ निश्चित समय की प्रतीक्षा न करना

⚜1857 की क्रांति की देशव्यापी शुरूआत के लिए 31 मई 1857 का दिन निर्धारित किया गया था। एक ही दिन क्रांति शुरू होने पर उसका व्यापक प्रभाव होता। परन्तु, सैनिकों ने आक्रोश में आकर निश्चित समय के पूर्व 10 मई, 1857 को ही विद्रोह कर दिया। सैनिकों की इस कार्यवाही के कारण क्रांति की योजना अधूरी रह गयी। निश्चित समय का पालन नहीं होने के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों में क्रांति की शुरूआत अलग-अलग दिनों में हुई। इससे अंग्रेजों को क्रांतिकारियों का दमन करने में काफी सहायता हुई। अनेक स्थानों पर तो 31 मई की प्रतीक्षा कर रहे सैनिकों के हथियार छीन लिए गए। यदि सभी क्षेत्रों में क्रांति का सूत्रपात एक साथ हुआ होता, तो तस्वीर कुछ और ही होती।

2⃣ देशी राजाओं का देशद्रोही रूख

⚜1857 की क्रांति का दमन करने में अनेक देशी राजाओं ने अंग्रेजों की खुलकर सहायता की। पटियाला, नाभा, जीद, अफगानिस्तान और नेपाल के राजाओं ने अंग्रेजों को सैनिक सहायता के साथ-साथ आर्थिक सहायता भी की। देशी राजाओं की इस देशद्रोहितापूर्ण भूमिका ने क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ा और क्रांति के लिए अंग्रेजी सरकार को प्रोत्साहित किया।

3⃣ साम्प्रदायिकता का खेल

⚜1857 ई. की क्रांति के दौरान अंग्रेजी सरकार हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाने में तो सफलता प्राप्त नहीं कर सकी, परन्तु आंशिक रूप से ही सही साम्प्रदायिकता का खेल खेलने में सफल रही। साम्प्रदायिक भावनाओं को उभर कर ही अंग्रेजी सरकार ने सिक्ख रेजिमेंट और मद्रास के सैनिकों को अपने पक्ष में कर लिया। मराठों, सिक्खों और गोरखों को बहादुरशाह के खिलाफ खड़ा कर दिया गया। उन्हें यह महसूस कराया गया कि बहादुरशाह के हाथों में फिर से सत्ता आ जाने पर हिन्दुओं और सिक्खों के अत्याचार होगा। इसका मूल कारण था कि सम्पूर्ण पंजाब में बादशाह के नाम झूठा फरमान अंग्रेजों की ओर से जारी किया गया, जिसमें कहा गया था कि लड़ाई में जीत मिलते ही प्रत्येक सिक्ख का वध कर दिया जाएगा। सैनिकों के साथ-साथ जनसाधारण को ही गुमराह किया गया। इस स्थिति में क्रांति का असफल हो जाना निश्चित हो गया। जब देश के भीतर देशवासी ही पूर्ण सहयोग न दें, तो कोई भी क्रांति सफलता प्राप्त नहीं कर सकती।

4⃣ सम्पूर्ण देश में प्रसारित न होना

⚜1857 ई. की क्रांति का प्रसार सम्पूर्ण भारत में नहीं हो सका था। सम्पूर्ण दक्षिण भारत और पंजाब का अधिकांश हिस्सा इस क्रांति से अछूता रहा। यदि इन क्षेत्रों में क्रांति का विस्तार हुआ होता, तो अंग्रेजों को अपनी शक्ति को इधर भी फैलाना पड़ता और वे पंजाब रेजिमेण्ट तथा मद्रास के सैनिकों को अपने पक्ष में करने में असफल रहते।

5⃣ शस्त्रास्त्रों का अभाव

⚜क्रांति का सूत्रपात तो कर दिया गया, किन्तु आर्थिक दृष्टि से कमजोर होने के कारण क्रांतिकारी आधुनिक शस्त्रास्त्रों का प्रबंध करने में असफल रहे। अंग्रेजी सेना ने तोपों और लम्बी दूरी तक मार करने वाली बंदूकों का प्रयोग किया, जबकि क्रांतिकारियों को तलवारों और भालों का सहारा लेना पड़ा। इसलिए, क्रांति को कुचलने में अंग्रेजों को सफलता प्राप्त हुई।

6⃣ सहायक साधनों का अभाव

⚜सत्ताधारी होने के कारण रेल, डाक, तार एवं परिवहन तथा संचार के अन्य सभी साधन अंग्रेजों के अधीन थे। इसलिए, इन साधनों का उन्होंने पूरा उपयोग किया। दूसरी ओर, भारतीय क्रांतिकारियों के पास इन साधनों का पूर्ण अभाव था। क्रांतिकारी अपना संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक शीघ्र भेजने में असफल रहे। सूचना के अभाव के कारण क्रांतिकारी संगठित होकर अभियान बनाने में असफल रहे। इसका पूरा-पूरा फायदा अंग्रेजों को मिला और अलग-अलग क्षेत्रों में क्रांति को क्रमशः कुचल दिया गया।

7⃣ सैनिक संख्या में अंतर

⚜एक तो विद्रोह करने वाले भारतीय सैनिकों की संख्या वैसे ही कम थी, दूसरे अंग्रेजी सरकार द्वारा बाहर से भी अतिरिक्त सैनिक मंगवा लिया गया था। उस समय कम्पनी के पास वैसे 96,000 सैनिक थे। इसके अतिरिक्त देशी रियासतों के सैनिकों से भी अंग्रेजों को सहयोग मिला। अंग्रेज सैनिकों को अच्छी सैनिक शिक्षा मिली थी और उनके पास अधुनातन शस्त्रास्त्र थे, परन्तु अपने परंपरागत हथियारों के साथ ही भारतीय क्रांतिकारियों ने जिस संघर्ष क्षमता का परिचय दिया, उससे कई स्थलों पर अंग्रेजों के दांत खट्टे हो गए। फिर भी, अंततः सफलता अंग्रेजों के हाथों ही लगी।

8 सीमित क्षेत्र एवं सीमित जनाधार।

9 योग्य नेतृत्व एवं सामंजस्य का अभाव।

एकीकृत विचारधारा एवं राजनीतिक चेतना की कमी।

विद्रोह के परिणाम:-

1857 ई. की क्रांति अपने तत्कालीन लक्ष्य की दृष्टि से असफल रही, परन्तु इस क्रांति ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए मार्ग प्रशस्त किया। इस क्रांति के परिणाम अच्छे और बुरे दोनों हुए। क्रांति का परिणाम अंग्रेजों और भारतीयों के लिए अलग-अलग हुआ। 1857 ई. की क्रांति के जो परिणाम अंग्रेजों के पक्ष में गए, उनमें प्रमुख हैं-

सत्ता का हस्तांतरणः

क्रांति के बाद भारत में सत्ता ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकलकर ब्रिटिश सरकार के हाथों में चली गयी। इसके लिए भारत शासन अधिनियम, 1858 पारित हुआ । अब भारत का शासन प्रत्यक्षतः ब्रिटिश नीति से होने लगा। ऐसा करने से कम्पनी द्वारा शासन-व्यवस्था के लिए संगठित बोर्ड ऑफ कंट्रोल, द कोर्ट ऑफ प्रोपराइट्स तथा द कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का विघटन हो गया। इनके स्थान पर द सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इण्डिया (भारत सचिव) के रूप में नए पद का सृजन किया गया। इस सचिव की सहायता के लिए इंग्लैंड में एक परिषद का भी गठन किया गया। अब भारत का गवर्नर जनरल ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधि बन गया और इसे वायसराय कहा जाने लगा। ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया ने भारत में अच्छे शासन-प्रबंध की स्थापना के लिए कदम उठाए जाने की घोषणा की। महारानी की इस घोषणा से भारतीयों का रोष एवं असंतोष कुछ समयों के लिए ठंढा पड़ गया।

सतर्कता में वृद्धि

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने सेना और सैन्य सामग्रियों पर एकाधिकार कर लिया, जिससे भविष्य में भारतीय सैनिकों की ओर से उनके लिए कोई खतरा न उत्पन्न हो । इस समय से यह भी निश्चय किया गया कि किसी भी भारतीय को उच्च सैनिक पद प्रदान नहीं किया जाएगा। अंग्रेजों को इस नीति को क्रियान्वित करने से काफी समय तक सुरक्षित रहने का अवसर प्राप्त हुआ।

शस्त्रास्त्र पर प्रतिबंध

अंग्रेजी सरकार ने भारत की साधारण जनता के बीच अस्त्र-शस्त्र रखने की मनाही कर दी। इससे भारतीयों की आक्रामक शक्ति को पूर्ण रूप से पंगु बना दिया गया। दुर्भाग्यवश भारत के धन से अंग्रेजी सरकार की सेना अधुनातन शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित हो गई और भारत का जनसाधारण अपनी आत्मसुरक्षा के लिए पारम्परिक शस्त्रास्त्रों को रखने से भी वंचित हो गया।

देशी राजाओं से मित्रता

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजी सरकार ने देशी राजाओं के साथ फिर से मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित किए। देशी राजाओं के साथ विरोध की नीति अपनाने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। आगे फिर कोई करने और इसका लाभ उठाने का मार्ग अपनाया। इसी नीति को ध्यान में रखकर ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया ने 1 नवम्बर, 1858 को देशी राजाओं का पूर्ण सम्मान किए जाने की घोषणा की।

पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में वृद्धि

?1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजी सरकार ने ऐसी शिक्षा-पद्धति को लागू किए जाने को प्रोत्साहित किया, जिससे भारतीय अपने धर्म और संस्कृति को भूल जाएं तथा पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकृष्ट हों। पाश्चात्य देशों के वैचारिक आंदोलन से भारत के लोगों को नयी प्रेरणा मिली तथा वे लाभान्वित भी हुए, पर उन देशों की आडम्बरपूर्ण जीवन-पद्धति से भारतीयों का चरित्र-बल भी समाप्त होने लगा। भारत के लोगों के साथ ऐसा होना अंग्रेजों के लिए सुखदायक था।

भारतीयों से दूरी में वृद्धि

अंग्रेजों ने भारत में आरम्भ से गोरे और काले के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता की भावना फैला रखी थी। 1857 की क्रांति के बाद तो प्रत्येक अंग्रेज भारतीयों से सावधान और अलग-थलग रहने लगा। अंग्रेजों को ऐसा महसूस होने लगा कि भारतीयों से दूरी बनाए रखना ही उनके हित में है, क्योंकि नजदीक आने से भारतीय अंग्रेजों के भेदों को जान लेंगें और उन्हें परेशान करने लगेंगे। क्रांति के दौरान अंग्रेज सतर्क हो गए और उस सतर्कता को उन्होंने लगभग हमेशा बनाए रखा।

सरकार की नीति में परिवर्तन

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के अंतिम दौर में भारत में कठोर एवं दमनात्मक नीति को अपनाया गया था। 1857 की क्रांति को देखकर अंग्रेजी सरकार भारतीयों के विचार पर भी ध्यान देने लगी। सरकार ऐसा अनुभव किया कि भारतीयों की पूर्णरूपेण उपेक्षा से परेशानियां बढ़ेगी। भारतीयों के हित में तो सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया, पर अनेक प्रकार के आश्वासन अवश्य दिए जाने लगे।

1857 की क्रांति के कुछ परिणाम भारतीयों के पक्ष में भी रहे। भारतीयों के पक्ष में जो सकारात्मक परिणाम सामने आए, वे हैं-

आत्मबल में वृद्धि

1857 की क्रांति अपने लक्ष्य को तत्काल प्राप्त करने में असमर्थ रही। परन्तु, इस क्रांति ने भारतीयों के आत्मबल में वृद्धि की और उनकी सुसुप्त चेतना को स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए जागृत किया। अब भारतीयों में जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया। इस समय से एक जागृत भारत का अभ्युदय हुआ।

राजनीतिक जागृति

लंबी पराधीनता और शासकों को अपराजेय मानने की धारणा ने भारतीयों में आलस्य भर दिया था। पराधीनता को भारतीयों ने अपनी नियति मान ली थी। परन्तु, 1857 की क्रांति ने भारतीयों के शीतित रक्त को फिर से खौला दिया। क्रांति के बाद भारतीयों को ऐसा महसूस हुआ कि जोर लगाने पर स्वशासन की प्राप्ति आसानी से हो सकती है।

संगठन की प्रेरणा

यद्यपि 1857 की क्रांति को संगठित स्वरूप प्रदान की पूर्ण कारण मनोवांछित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी थी। व्यापक संगठन के अभाव के कारण ही क्रांति को कुचल दिया गया था। इसलिए, इस क्रांति से आगे के क्रांतिकारियों को व्यापक संगठन की प्रेरणा प्राप्त हुई। 1857 ई. की क्रांति से प्रेरणा पाकर ही आगे के वर्षों में अनेक क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन संभव हो सका।

एकता की प्रेरणा

1857 की असफलता का कारण सम्पूर्ण भारतवासियों में एकता का अभाव भी था। सिक्ख और दक्षिण भारतीय क्रांति के विरुद्ध थे तथा अनेक देशी रियासतों के शासकों ने अंग्रेजों की सहायता की थी। जिन क्षेत्रों में क्रांति का सूत्रपात हुआ, वहां भी सभी वर्गों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध नहीं किया। एकता ही राष्ट्रीयता का मूल मंत्र है- इस तथ्य की ओर भारतीयों का ध्यान क्रांति के असफल हो जाने के बाद गया। अब उन्होंने ऐसा महसूस किया कि एक साथ चलकर ही आगे बढ़ा जा सकता है और लक्ष्य की प्राप्ति में सफलता प्राप्त की जा सकती है।

स्वतंत्रता आंदोलन की नयी दृष्टि

?1857 की क्रांति का जिस निर्ममता के साथ अंग्रेजी सरकार ने दमन किया था, उससे उसका असली चेहरा भारतीयों के सामने उजागर हुआ। अंग्रेजों के क्रूरतापूर्ण व्यवहार को देखने के बाद भारतवासियों ने अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का संकल्प लिया। इस क्रांति से स्वतंत्रता आंदोलन को भविष्य में एक नयी दृष्टि मिली। विद्रोह के बदले असहयोग का मार्ग होता। शासन और शस्त्रास्त्र का नियंत्रण अंग्रेजी सरकार के हाथों में था और किसी भी प्रकार के विद्रोह का गला घोंट देने की क्षमता उसमें थी, इसलिए क्रांति के बाद विद्रोह का रास्ता छोड़ने की प्रेरणा मिली।

1857 की क्रांति के संबंध में प्रमुख उक्तियां

  • ‘वर्ष सत्तावन का विद्रोह सिपाही विद्रोह मात्र था’- झेड राबर्ट्स
  • 1857 की घटना सिर्फ गाय की चर्बी से उत्पन्न सैनिक उत्पात थी’- सर जॉन लॉरेंस
  • 1857 का महान आंदोलन भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था – पट्टाभि सीतारमैया
  • रानी लक्ष्मीबाई को विद्रोह में सर्वोत्तम और सबसे वीर नेता के रूप में उल्लेख किया- सर हाउ्रोज 
  • ‘1857 के विद्रो को या तो सिपाही विद्रोह या अनधिकृत राजाओं तथा जमींदारों का अनियोजित प्रयत्न अथवा सीमित किसान-युद्ध कहा जा सकता है’- एडवर्ड टॉम्पसन तथा जी.टी. गैरेट
  • ‘1857 का विद्रोह स्वतंत्र, संघर्ष नहीं धार्मिक युद्ध था‘ -विलियम हॉवर्ड रसेल
  • ‘1857 के विद्रोह में राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था और यह सैनिक विद्रोह से बढ़कर और कुछ भी नहीं था -आर.सी. मजुमदार
  • भारतीय जनता का संगठित संग्राम था’ -जवाहरलाल नेहरू
  • ‘1857 का विद्रोह केवल सैनिक विद्रोह नहीं था, अपितु यह भारतवासियों का अंग्रेजों के विरुद्ध धार्मिक, सैनिक शक्तियों के साथ राष्ट्रीय अरिमता की रक्षा के लिए लड़ा गया युद्ध था’ -जस्टिस मेकाकी
  • ‘1857 का विद्रोह स्वधर्म और राजस्व के लिए लड़ा गया राष्ट्रीय संघर्ष था’ -विनायक दामोदर सावरकर
  • ‘1857 का विद्रोह मुसलमानों के षड्यंत्र का परिणाम था’ -सर जेम्स आउट्रम
  • ‘1857 ई. की क्रांति भारत की पवित्र भूमि से विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने का प्रयास थी’ -डॉ.सैय्यद आतहर अब्बास रिज़वी
  • “1857 का विद्रोह विदेशी शासन से राष्ट्र को मुदत कराने का देशभक्तिपूर्ण प्रयास था” -विपिन चन्द्र
  • “1857 का विद्रोह सचेत संयोग से उपजा राष्ट्रीय विद्रोह था” -बेंजामिन डिजरैली
  • “1857 का विद्रोह सैनिक विद्रोह न होकर नागरिक विद्रोह था” -जान ब्रूस नार्टन (  टॉपिक्स फॉर इंडियन स्टेटसमेंन )
  • ‘1857 के विद्रोह का आरंभिक स्वरूप सैनिक विद्रोह का ही था, किन्तु बाद में इसने राजनीतिकस्वरूप ग्रहण कर लिया’ -एस.एस. सेन
  •  इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहां उनकी बुक द ग्रेट रिबेलियन – अशोक मेहता 
  • 1857 के विद्रोह को सभ्यता और बर्बरता के बीच संघर्ष कहा – टीआर होम्स  
  • एक राष्ट्रीय विद्रोह कहा- बेंजामिन डिजरेली  

1857 Revolution-Nature Important facts-

  • ▶ 18 57 के विद्रोह के समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री कौन था – विसकान्त पामस्टर्न
  • ▶ 1857 के विद्रोह यह समय के समय भारत का गवर्नर जनरल कौन था –लॉर्ड कैनिंग।
  • भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सरकारी इतिहासकार कौन था – Dr एस एन सेन
  • ▶ किसने कहा था गर्मी की आंधी की भांति मेरठ का विद्रोह अप्रत्याशित और अल्पकालिक था – एस एन सेन।
  • ▶ तथाकथित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम न प्रथम न राष्ट्रीय न स्वतंत्रता संग्राम था यह कथन किसका है आर सी मजूमदार।
  • ▶ द ग्रेट रिबेलियन पुस्तक किसकी है- अशोक मेहता
  • ▶ वी डी सावरकर के कथन की 1857 का विद्रोह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था को और कौन स्वीकार करता है जो कांग्रेस का अध्यक्ष जी बना- पट्टाभि सीतारमैया।
  • ▶ किस प्रमुख इतिहासकार ने 1857 के विद्रोह को सामंती क्षोभ कहा था – dr एस बी चौधरी।
  • ▶ भारतीय भाषा में 1857 के विद्रोह के कारणों पर लिखने वाला प्रथम भारतीय कौन था सैयद अहमद खां ( असबाब – ए बगावत – ए हिंद))
  • ▶ दिल्ली संघर्ष की भयंकरता को नादिरशाह से भी अधिक भयंकर किसने बताया – बंबई के गवर्नर एलफिंस्टन।
  • ▶ hd सन ने इसकी मदद से बहादुर शाह द्वितीय को बंदी बना लिया- मिर्जा ए इलाही बख्श।
  • ▶ दिल्ली के विद्रोह को दबाने के लिए किस से मदद ली गई- कश्मीर पटियाला नाभा और जिंद के राजाओं से
  • ▶ कुंवर सिंह की मृत्यु के पश्चात बिहार के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया –भाई अमरसिंह।
  • ▶ झांसी में विद्रोह का प्रारंभिक नेतृत्व किसने किया – काले खान
  • ▶ सत्ती चौरा एवं बीबीगढ़ कांड का संबंध किससे है- 1857 के विद्रोह।

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No of Questions-29

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प्रश्न=1- सती चोरा घटना का संबंध है

Correct! Wrong!

प्रश्न=2- 1857 की क्रांति के दौरान रेजिडेंट हेनरी लॉरेंस की मृत्यु कहां पर हुई थी

Correct! Wrong!

प्रश्न=3- जनरल हेविट 1857 की क्रांति के दौरान कहां का कमांडिंग ऑफिसर था,

Correct! Wrong!

प्रश्न=4- लॉर्ड डलहौजी द्वारा विलय की गई रियासतों को क्रमवार कीजिए 1 सातारा 2 जैतपुर 3 भगत 4 उदयपुर

Correct! Wrong!

प्रश्न=5- आंगल भारतीय इतिहासकारों ने 1857 के महान विद्रोह का सबसे प्रमुख कारण बताया है

Correct! Wrong!

प्रश्न=6- 1857 में भारत केवल एक भौगोलिक कथन के रूप में विद्यमान था यह कथन किसका है

Correct! Wrong!

प्रश्न=7- 1857 का विद्रोह धर्मांध ईसाइयों के विरुद्ध युद्ध था यह कथन किसका है

Correct! Wrong!

प्रश्न=8- कौन सा कथन असंगत है

Correct! Wrong!

प्रश्न=9- 1857 विद्रोह के संबंध में यह कथन किसका है यदि सिंधिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाए तो मुझे कल ही भारत छोड़ना पड़ेगा

Correct! Wrong!

प्रश्न=10- थ्योरी ऑफ द इंडियन म्यूटिनी 1857 पुस्तक किसकी है

Correct! Wrong!

प्रश्न=11- दिल्ली में 857 की क्रांति का नेतृत्व किसने किया था

Correct! Wrong!

प्रश्न=12- 1857 का विद्रोह देसी शासन से राष्ट्र को मुक्त कराने का देश भक्ति पूर्ण प्रयास था यह कथन किसका है

Correct! Wrong!

प्रश्न=13- 1857 की क्रांति के दौरान कोटा महारावल राम सिंह को विद्रोहियों द्वारा बंदी बनाने पर किसने मुक्त करवाया था

Correct! Wrong!

प्रश्न=14- तात्या टोपे ने 14 अगस्त 857 को को जनरल जनरल रॉबर्ट की सेना से रूपनगढ़ में हारने के बाद किस रियासत की सेना से मिलकर वहां के शासन पर अधिकार किया था

Correct! Wrong!

प्रश्न=15- राजस्थान में ए जी जी का कार्यालय कब स्थापित हुआ था

Correct! Wrong!

16.1857 की क्रांति के समय बरेली से नेतृत्व कौन कर रहा था?

Correct! Wrong!

17. निम्न में से कोन सा सेनानायक 1857 के विद्रोहीयों के दमन में शामिल नहीं था ?

Correct! Wrong!

18."भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष 1857" पुस्तक किसने लिखी-

Correct! Wrong!

19.1857 के विद्रोह के बाद कौन नेपाल भाग गया था-

Correct! Wrong!

20.विद्रोह के किस नेता ने स्वयं को बहादुर शाह का गवर्नर घोषित किया?

Correct! Wrong!

21.नाना साहब को गिरफ्तार करके नेपाल कब भेजा गया

Correct! Wrong!

22.तात्या टोपे राजस्थान के किस जिले में नहीं आए

Correct! Wrong!

23.किसे बंगाल आर्मी की पौधशाला कहां जाता था

Correct! Wrong!

24.किस अधिनियम द्वारा भारत में शिक्षा पर पहली बार ₹100000 प्रति वर्ष खर्च करने की अनुमति दी गई

Correct! Wrong!

25.1857 के विद्रोह की शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण तत्व कौन सा था?

Correct! Wrong!

26.गडकरी विद्रोह (1844) का केंद्र था?

Correct! Wrong!

27 बेगम हजरत महल ने 1857 के विद्रोह का नेतृत्व निम्नलिखित मे किस शहर से किया था?

Correct! Wrong!

28 क्यूकिस मराठा पेशवा को `मैकियावेली` कहा जाता हैं?

Correct! Wrong!

29 अल्बुकर्क ने बीजापुर के किस सुल्तान से गोवा को छिना था?

Correct! Wrong!

1857 Revolution Quiz ( 1857 के प्रकोप-प्रकृति, घटनाओं, महत्व और परिणाम )
बहुत खराब ! आपके कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
खराब ! आप कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया ! अधिक तैयारी की जरूरत है
बहुत अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया! तैयारी की जरूरत है
शानदार ! आपका प्रश्नोत्तरी सही है! ऐसे ही आगे भी करते रहे

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

DHARMA RAM, प्रभुदयाल मूण्ड चूरु, SOMLATA BHARDWAJ AJMER, डॉ भंवर सिंह भाटी बाड़मेर, पुष्पेन्द्र कुलदीप झुन्झुनू, जुल्फिकार जी अहमद दौसा, रोहित साहू मध्यप्रदेश, रविकान्त दिवाकर

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