Accounting – Use in Concepts, Tools and Administration

( लेखांकन- अवधारणा, उपकरण एवं प्रशासन में उपयोग )

आधुनिक व्यवसाय का आकार इतना विस्तृत हो गया है कि इसमें सैकड़ों, सहस्त्रों व अरबों व्यावसायिक लेनदेन होते रहते हैं। इन लेन देनों के ब्यौरे को याद रखकर व्यावसायिक उपक्रम का संचालन करना असम्भव है। अतः इन लेनदेनों का क्रमबद्ध अभिलेख (records) रखे जाते हैं उनके क्रमबद्ध ज्ञान व प्रयोग-कला को ही लेखाशास्त्र कहते हैं।

लेखांकन के इतिहास में दोहरा लेखांकन प्रणाली के जन्मदाता लुकास पेसियोली थे जो इटली के वेनिस नगर के रहने वाले थे उन्होंने अपनी पुस्तक de compaset of scripturis1494 में दोहर्क़ लेखा प्रणाली का वर्णन किया।m  Debit शब्द debito Credit शब्द credito से बना है।

Huge old castle ने 1543 में दोहरा लेखा प्रणाली की पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद किया 1795 edward jones ने पुस्तपालन की अंग्रेजी प्रणाली की पुस्तक लिखी। उसे अंग्रेजी प्रणाली की प्रथम पुस्तक कहा जाता है।

लेखाशास्त्र के व्यावहारिक रूप को लेखांकन कह सकते हैं। अमेरिकन इन्स्ट्टीयूट ऑफ सर्टिफाइड पब्लिक अकाउन्टैन्ट्स (AICPA) की लेखांकन शब्दावली, बुलेटिन के अनुसार ‘‘लेखांकन उन व्यवहारों और घटनाओं को, जो कि कम से कम अंशतः वित्तीय प्रकृति के है, मुद्रा के रूप में प्रभावपूर्ण तरीके से लिखने, वर्गीकृत करने तथा सारांश निकालने एवं उनके परिणामों की व्याख्या करने की कला है।’’

इस परिभाषा के अनुसार लेखांकन एक कला है, विज्ञान नहीं। इस कला का उपयोग वित्तीय प्रकृति के मुद्रा में मापनीय व्यवहारों और घटनाओं के अभिलेखन, वर्गीकरण, संक्षेपण और निर्वचन के लिए किया जाता है।

लेख एवं अंकन दो शब्दों के मेल से बने लेखांकन में लेख से मतलब लिखने से होता है तथा अंकन से मतलब अंकों से होता है । किसी घटना क्रम को अंकों में लिखे जाने को लेखांकन (Accounting) कहा जाता है  किसी खास उदेश्य को हासिल करने के लिए घटित घटनाओं को अंकों में लिखे जाने के क्रिया को लेखांकन कहा जाता है ।

यहाँ घटनाओं से मतलब उस समस्त क्रियाओं से होता है जिसमे रुपये का आदान-प्रदान होता है ।

उदाहरण

किसी व्यवसाय में बहुत बार वस्तु खरीदी जाती है, बहुत बार बिक्री होती है । खर्च भी होता रहता है आमदनी भी होती रहती है, कुल मिलाकर कितना खर्च हुआ कितनी आमदनी हुई, किन-किन लोगों पर कितना बकाया है तथा लाभ या हानि कितना हुआ, इन समस्त जानकारियों को हासिल करने के लिए व्यवसायी अपने बही में घटित घटनाओं को लिखता रहता है । यही लिखने के क्रिया को लेखांकन कहा जाता है ।

अतः व्यवसाय के वित्तीय लेन-देनों को लिखा जाना ही लेखांकन है । लेखांकन के प्रारंभिक क्रियाओं में निम्नलिखित तीन को शामिल किया जाता है :

1. अभिलेखन (Recording) :

  • लेन-देन को पहली बार बही में लिखे जाने के क्रिया को अभिलेखन कहा जाता है ।
  • अभिलेखन को रोजनामचा कहते हैं अर्थात Journal भी काहा जाता है ।

2. वर्गीकरण (Classification) :

  • अभिलेखित मदों को अलग-अलग भागो में विभाजित कर लिखे जाने के क्रिया को वर्गीकरण कहा जाता है ।
  • वर्गीकरण को खाता (Ledger) भी कहते हैं ।

3. संक्षेपण (Summarising) :

  • वर्गीकृत मदो को एक जगह लिखे जाने के क्रिया को संक्षेपण कहा जाता है ।
  • संक्षेपण को परीक्षा सूची (Trial balance) भी कहते हैं ।

आधुनिक युग में व्यवसाय के आकर में वृद्धि के साथ-साथ व्यवसाय की जटिलताओं में भी वृद्धि हुई है। व्यवसाय का संबंध अनेक ग्राहकों, आपूर्तिकर्ताओं तथा कर्मचारियों से रहता है और इसलिए व्यावसायिक जगत में सैकड़ों, हजारों या लाखों लेन-देन हुआ करते हैं। सभी लेन-देन हुआ करते हैं। सभी लेन-देनों को मैखिक रूप से याद रखना कठिन व असम्भव है।

हम व्यवसाय का लाभ जानना चाहते हैं और यह भी जानना चाहते हैं कि उसकी सम्पत्तियाँ कितनी हैं, उसकी देनदारियाँ या देयताएँ कितनी हैं, उसकी पूँजी कितनी है आदि। इन समस्त बातों की जानकारी के लिए लेखांकन की आवश्यकता पड़ती है।

परिभाषाएं 

स्मिथ एवं एशबर्न ने उपर्युक्त परिभाषा को कुछ सुधार के साथ प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार ‘लेखांकन मुख्यतः वित्तीय प्रकृति के व्यावसायिक लेनदेनों और घटनाओं के अभिलेखन तथा वर्गीकरण का विज्ञान है और उन लेनदेनें और घटनाओं का महत्वपूर्ण सारांश बनाने, विश्लेषण तथा व्याख्या करने और परिणामों को उन व्यक्तियों को सम्प्रेषित करने की कला है, जिन्हें निर्णय लेने हैं।’ इस परिभाषा के अनुसार लेखांकन विज्ञान और कला दोनों ही है। किन्तु यह एक पूर्ण निश्चित विज्ञान न होकर लगभग पूर्ण विज्ञान है।

अमेरिकन एकाउन्टिग प्रिन्सिपल्स बोर्ड ने लेखांकन को एक सेवा क्रिया के रूप में परिभाषित किया है। उसके अनुसार, ‘लेखांकन एक सेवा क्रिया है। इसका कार्य आर्थिक इकाइयों के बारे में मुख्यतः वित्तीय प्रकृति की परिणामात्मक सूचना देना है जो कि वैकल्पिक व्यवहार क्रियाओं (alternative course of action) में तर्कयुक्त चयन द्वारा आर्थिक निर्णय लेने में उपयोगी हो।’

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर लेखांकन को व्यवसाय के वित्तीय प्रकृति के लेन-देनों को सुनिश्चित, सुगठित एवं सुनियोजित तरीके से लिखने, प्रस्तुत करने, निर्वचन करने और सूचित करने की कला कहा जा सकता है।

सर्वप्रथम प्रारंभिक लेखांकन के रिकॉर्ड प्राचीन बेबीलॉन, असीरिया और सुमेरिया के खंडहरों में पाए गए, जो 7000 वर्षों से भी पहले की तारीख के हैं। तत्कालीन लोग फसलों और मवेशियों की वृद्धि को रिकॉर्ड करने के लिए प्राचीन लेखांकन की पद्धतियों पर भरोसा करते थे। क्योंकि कृषि और पशु पालन के लिए प्राकृतिक ऋतु होती है, अतः अगर फसलों की पैदावार हो चुकी हो या पशुओं ने नए बच्चे पैदा किए हों तो हिसाब-किताब कर अधिशेष को निर्धारित करना आसान हो जाता है।

लेखांकन की अवधारणा ( Concept of accounting )

1 – पृथक अस्तित्व की संकल्पना entity concept ~ इस संकलपना के अंदर व्यवसाय व्यवसाय के स्वामी का अस्तित्व प्रथक प्रथक माना गया है । म कर राशि का स्वामी व्यवसाय में पूंजी लगाता है और जो व्यवसाय के लिए एक दायित्व होता है।

2 – मुद्रा मापन की संकल्पना money measurement concept ~ इस संकल्पना के अंदर लेखांकन में ऐसे व्यवहारों को लिखा जाता है जिन का मापन मुद्रा में किया जा सकता है अर्थात ऐसे व्यवहार या लेन-देन जिनको मुद्रा में मापा नहीं जा सकता है उनको लेखा पुस्तको में दर्द नहीं किया जाता है चाय व्यवसाय के लिए महत्वपूर्ण हो या नहीं ।

3 – निरंतरता की संकल्पना going concern concept ~ इस संकल्पना के अंतर्गत व्यवसाय की स्थापना यह मानकर की जाती है कि व्यवसाय अनंत वर्षों तक चले अर्थात निरंतर चलता रहे व्यवसाय की स्थापना को एक निश्चित वर्षों में मानकर नहीं की जानी चाहिए।

4 – लेखांकन अवधि संकल्पना accounting peroid concept ~ संकलपना के अंदर लेखांकन आरती 1 वर्ष की होनी चाहिए जो 1 अप्रैल से 31 मार्च तक की होती है जिसे वित्तीय वर्ष कहा जाता है ।

5 – लागत संकल्पना cost concept~ कि संकलपना के अंदर सभी संपत्तियों का लेखा उनके लागत मूल्य पर किया जाता है।

6 – द्विपक्षीय संकल्पना dual aspect concept ~ इस संकलपना के अंदर प्रत्येक व्यवहार का प्रभाव दो खातों पर पड़ता है एक नाम पक्ष दूसरा जमा पक्ष व्यवहार का प्रभाव दो खातों पर होने से दोनों हाथों पर राशि का सामान प्रभाव होता है इसी को द्विपक्षीय संकलपना कहा जाता है ।

7 – आगम मान्यता तो संकल्पना revenue recognition concept ~ इस संकलपना के अंदर आ गम अथवा आए को पुस्तकों में सभी दर्ज किया जाएगा जब वह वास्तविक रुप में प्राप्त हो जाए ।

8 – आगम व्यय मिलान संकल्पना matching concept ~ इस संकलपना के अंदर एक वित्तीय वर्ष की अवधि में प्राप्त होने वाली आयोग का मिलान उसी अवधि में भुगतान किए जाने वाले व्यय किया जाना चाहिए ।

9 – उपार्जन संकल्पना accrual concept ~ संकल्पना के अंदर प्रत्येक व्यवहारों का लेखा उनके अधिकृत होने के समय से उपस्थित होने के समय पुस्तकों में दर्ज किया जाता है ।

10 – पूर्ण प्रस्तुतीकरण संकल्पना full disclosure concept ~ इस संकलपना के अंदर सभी सूचनाओं का प्रस्तुतीकरण किया जाना चाहिए एवं जो महत्वपूर्ण सूचनाएं हैं उनको एक अलग शीर्षक बनाकर दर्शाया जाना चाहिए ।

11 – सम अनुरूपता एवं संगतता की संकल्पना consistency concept ~ संकल्पना के अंदर व्यवसाय द्वारा अपनाए जाने वाली लेखांकन नीतियों सिद्धांतों को निरंतर वर्षों तक उपयोग करते रहना चाहिए ।

12 – रुढ़िवादिता की संकल्पना conservation concept ~ इस संकलपना के अंदर व्यवसाय में होने वाले लाभों को अनावश्यक रुप से बढ़ा चढ़ाकर नहीं दिखाना चाहिए जैसे – स्टॉक का मूल्यांकन , डूबत ओर संदिग्ध ऋणों पर आयोजन, मूल्य हास आदि का लेखा इस संकल्पना के अंदर किया जाता है।

13 – सारता की संकल्पना materiality concept ~ इस संकल्पना के अंदर लेखांकन में उन्ही सूचनाओं ओर तथ्यों पर ध्यान दिया जाना चाहिए जो व्यवसाय के लिए महत्वपूर्ण हो।

14 – वस्तुनिष्ठता की संकल्पना objectivity concept ~ इस संकलपना के अंदर व्यवसाय में लिखे जाने वाले प्रत्येक व्यवहार को उसके प्रमाणको के आधार पर लिखा जाना चाहिए एवं प्रमाणक , रसीद , बीजक आदि हो सकते है

लेखांकन की विशेषताएँ ( Accounting Features ) :

  • लेखांकन व्यवसायिक सौदों के लिखने और वर्गीकृत करने की कला है ।
  • विश्लेषण एवं निर्वचन की सूचना उन व्यक्तियों को सम्प्रेषित की जानी चाहिए जिन्हें इनके आधार पर निष्कर्ष या परिणाम निकालने हैं या निर्णय लेने हैं
  • यह सारांश लिखने, विश्लेषण और निर्वचन करने की कला है। सौदे मुद्रा में व्यक्त किये जाते हैं।
  • ये लेन-देन पूर्ण या आंशिक रूप से वित्तीय प्रकृति के होते हैं ।

लेखांकन के लाभ ( Benefits of accounting ) :

  • कोई भी व्यक्ति कितना भी योग्य क्यों न हो, सभी बातों को स्मरण नहीं रख सकता है।
  • व्यापार में प्रतिदिन सैकड़ों लेन-देन होते हैं, वस्तुओं का क्रय-विक्रय होता है। ये नकद और उधार दोनों हो सकते हैं। मजदूरी, वेतन, कमीशन, आदि के रूप में भुगतान होते हैं। इन सभी को याद रखना कठिन है।
  • लेखांकन इस अभाव को दूर कर देता है।
  • लेखांकन से व्यवसाय से संबंधित कई महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं जैसे :
    लाभ-हानि की जानकारी होना
  •  सम्पत्ति तथा दायित्व की जानकारी होना ।
  •  कितना रुपया लेना है और कितना रुपया देना है । व्यवसाय की आर्थिक स्थिति कैसी है, आदि।
  • अन्य व्यापारियों से झगड़ें होने की स्थिति में लेखांकन अभिलेखों को न्यायालय में प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • न्यायालय प्रस्तुत किये लेखांकन को मान्यता प्रदान करता है।
  • वित्तीय लेखा से कर्मचारियों के वेतन, बोनस, भत्ते, आदि से संबंधित समस्याओं के निर्धारण में मदद मिलती है।

लेखांकन के प्रमुख उद्देश्य (The main objectives of accounting )

1⃣ क्रय-विक्रय तथा शेष माल की जानकारी –

समय-समय पर व्यापार में कुल क्रय, विक्रय तथा न बिके माल की जानकारी प्राप्त करना स्वामी के लिए आवश्यक होता हैं । लेखांकन द्धारा इस आवश्यकता की पूर्ति सरलता से कर दी जाती हैं ।

2⃣ लेनदारों तथा देनदारों की स्थिति से अवगत करना –

आज का व्यापार साख पर आधारित है । अत: प्रत्येक व्यापारी साहूकारों को भुगतान करने व ग्राहकों से रकम वसूल करने के लिए व्यापार में इनकी स्थिति की जानकारी से सदैव अवगत रहना चाहता है । लेखांकन द्धारा इस उद्देश्य की पूर्ति सम्भव होती हैं ।

3⃣ छल-कपट पर नियंत्रण करना –

व्यवहारों का उचित लेखांकन व उनकी नियमित जाँच करने पर कर्मचारियों तथा ग्राहकों द्धारा की जाने वाली छल-कपट की आशंकाओं को नियंत्रित किया जा सकता हैं

4⃣ व्ययों पर नियंत्रण करना

अनेक छोटे-छोटे व्यय यद्यपि इनकी राशि कम होती हैं, अधिक होने पर व्यापार की बचत घट जाती हैं । प्रत्येक व्यय का लेखा करने पर अनावश्यक व्ययों को नियंत्रित किया जा सकता हैं ।

5⃣ करो का अनुमान लगाना –

विभिन्न प्रकार के करों का निर्धारण व उनकी सम्भावित राशि का अनुमान लगाना व्यवहारों के लेखांकन से ही सम्भव हैं । अत: बहुत से ऐसे व्यापारी हैं, जो करों की भुगतान राशि का अनुमान लगाने के लिए व्यवहारों को लेखा करते हैं ।

7⃣ लाभ-हानि के कारणों को ज्ञात करना –

लेखांकन का उद्देश्य केवल व्यापार के लाभ या हानि को ज्ञात करना ही नहीं हैं, अपितु उन कारणों को भी ज्ञात करना होता हैं, जिनसे व्यापार की लाभ-हानि प्रभावित होती हैं ।

8⃣ व्यापार का सही-सही मूल्यांकन करना –

व्यापार के क्रय-विक्रय के लिए व्यापार की सम्पत्तियों एवं दायित्वों का सही-सही मूल्यांकन आवश्यक होता हैं । अत: इस आवश्यकता को लेखांकन के माध्यम से पूरा किया जा सकता है ।

वितीय लेखों की प्रणालियां ( Systems of financial articles )

लेखांकन की अनेक प्रणलियाँ हैं जिनमें से निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं-

  1. नकद लेन-देन
  2. इकहरा लेखा प्रणाली
  3. दोहरा लेखा प्रणाली
  4. भारतीय बहीखाता प्रणाली

1. नकद लेन-देन (रोकड़) प्रणाली ( Cash Transaction (Cash) System )

  • इस प्रणाली का प्रयोग अधिकतर गैर व्यापारिक संस्थाओं जैसे क्लब, अनाथालय, पुस्तकालय तथा अन्य समाज सेवी संस्थाओं द्वारा किया जाता है।
  • इन संस्थाओं का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता और ये पुस्तपालन से केवल यह जानना चाहती है कि उनके पास कितनी रोकड़ आयी तथा कितनी गयी और कितनी शेष है।
  • रोकड़ प्रणाली के अन्तर्गत केवल रोकड़ बही (कैश बुक) बनायी जाती है। इस पुस्तक में सारे नकद लेनदेनों को लिखा जाता है। वर्ष के अन्त में कोई अन्तिम खाता या लाभ-हानि खाता आदि नहीं बनाया जाता।
  • आय-व्यय की स्थिति को समझने के लिए एक आय-व्यय खाता (Income & Expenditure Account) बनाया जाता है।

2. इकहरा लेखा प्रणाली ( Single accounting system )

  • इस पद्धति में नकद लेन-देनों को रोकड पुस्तक में तथा उधार लेन देनों को खाता बही में लिखा जाता है।
  • यह प्रणाली मुख्यतः छोटे फुटकर व्यापारियों द्वारा प्रयोग की जाती है। इस प्रकार पुस्तकें रखने से केवल यह जानकारी होती है कि व्यापारी की रोकड़ की स्थिति कैसी है, अर्थात् कितनी रोकड़ आयी तथा कितनी गयी तथा कितनी शेष है।
  • किसको कितना देना है तथा किससे कितना लेना है, इसकी जानकारी खाता बही से हो जाती है।
  • इस पद्धति से लाभ-हानि खाता व आर्थिक चिट्ठा बनाना संभव नहीं होता जब तक कि इस प्रणाली को दोहरा लेखा प्रणाली में बदल न दिया जाय। इसलिए इस प्रणाली को अपूर्ण प्रणाली माना जाता है।

3. दोहरा लेखा प्रणाली ( Double accounting system )

  • यह पुस्तपालन की सबसे अच्छी प्रणाली मानी जाती है। इस पद्धति में प्रत्येक व्यवहार के दोनों रूपों (डेबिट व क्रेडिट या ऋण व धनी) का लेखा किया जाता है।
  • यह कुछ निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित होती है। वर्ष के अन्त में अन्तिम खाते बनाकर व्यवसाय की वास्तविक स्थिति की जानकारी करना इस पद्धति के माध्यम से आसान होता है।

4. भारतीय बहीखाता प्रणाली ( Indian bookkeeping system )

  • यह भारत में अत्यन्त प्राचीनकाल से प्रचलित पद्धति है।
  • अधिकांश भारतीय व्यापारी इस प्रणाली के अनुसार ही अपना हिसाब-किताब रखते हैं। यह भी निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित पूर्णतया वैज्ञानिक प्रणाली है।
  • इस प्रणाली के आधार पर भी वर्ष के अन्त में लाभ-हानि खाता तथा आर्थिक चिट्ठा बनाया जाता है।

लेखांकन के कार्य व सीमाएं ( Accounting Functions & Limits )

1. लेखांकन के कार्य ( Accounting Functions )

लेखांकन का कार्य आर्थिक इकाइयों की सूचना उपलब्ध करना है जो मूलत: वित्तीय प्रकृति की होती हैं तथा जिसे आर्थिक निर्णय लेने में उपयोगी माना जाता हैं । वित्तीय लेखांकन निम्नलिखित कार्यों को करता हैं

1⃣ विधिपूर्वक अभिलेखन करना- वित्तीय लेखांकन में व्यावसायिक लेन-देनों का विधिपूर्वक अभिलेखन किया जाता है, उनका वर्गीकरण किया जाता है तथा विभिन्न वित्तीय विवरणों के रूप में संक्षिप्तकरण किया जाता हैं

2⃣ वित्तीय परिणामों को सम्प्रेषण- इसके माध्यम से शुद्ध लाभ (अथवा शुद्ध हानि) परिसम्पत्तियाँ उपयोगकर्ताओं देयताएँ आदि वित्तीय सूचनाओं का इच्छुक को सम्प्रेषण किया जाता हैं ।

3⃣ वैधानिक दायित्वों की पूर्ति करना- विभिन्न अधिनियम जैसेकि कम्पनी अधिनियम, 1956, आयकर एवं विक्रय कर /वैट कर का अधिनियम में प्रावधान है जिनके अनुसार विभिन्न विवरणें को जमा करना आवश्यक है जैसे कि वार्षिक खाते, आयकर विवरणी, वैट आदि की विवरणी ।

4⃣ दायित्व का निर्धारण- यह संगठन के विभिन्न विभागों के लाभ का निर्धारण करने में सहायक होता है । इससे विभागीय अध्यक्ष का दायित्व निश्चित किया जा सकता है ।

5⃣ निर्णय लेना- यह उपयोगकर्ताओं को प्रासंगिक आँकड़े उपलब्ध कराता है जिनकी सहायता से वह व्यवसाय में पूँजी के निवेश तथा माल की उधार आपूर्ति करने अथवा ऋण देने के सम्बन्ध में उपयुक्त निर्णय ले सकते हैं ।

लेखांकन की सीमाएँ ( Limitations of accounting )

1⃣ लेखांकन सूचनाओं को मुद्रा में व्यक्त किया जा सकता हैं: गैर मौद्रिक घटनाओं अथवा लेन-देनों को पूरी तरह से छोड़ दिया जाता हैं ।2⃣ स्थायी परिसम्पतियों का अभिलेखन मूल लागत पर किया जा सकता हैं :  भवन, मशीन आदि परिसम्पत्तियों पर वास्तविक व्यय तथा उस पर आनुसंगिक व्यय का अभिलेखन किया जाता है। अत: मूल्य वृद्धि के लिए कोर्इ पा्रवधान नहीं होता। परिणामस्वरूप स्थिति विवरण व्यवसाय की सही स्थिति को नहीं बताता।

3⃣ लेखांकन सूचना कभी-कभी अनुमुमानों पर आधारित होती है : अनुमान कभी-कभी गलत भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अवक्षरण निर्धारण के लिए सम्पत्ति के वास्तविक जीवन का अनुमान नहीं लगाया जा सकता

4⃣ लेखांकन सूचना को केवल लाभ के आधार पर प्रबन्धन निष्पादन को एकमात्र परीक्षण के रूप में प्रयुक्त नहीं की जा सकती :  एक वर्ष के लाभ को कुछ व्यय जैसे कि विज्ञापन, अनुसंधान , विकास अवक्षयण आदि व्ययों को दिखाकर सरलता से हेर-फेर किया जा सकता है अर्थात् दिखाने की संभावना होती हैं।

5⃣ लेखांकन सूचनाएं निष्पक्ष नहीं होती : लेखाकार आय का निर्धारण व्यय पर आगम के आधिक्य के रूप में करते हैं । लेकिन वह व्यवसाय के लाभ को ज्ञात करने के लिए आगम आय एवं व्यय की चुनी हुर्इ मदों को ध्यान में रखते है । वह इसमें सामाजिक लागत जैसे कि जल, ध्वनि एवं वायु प्रदूषण को सम्माहित नही करते । वह स्टाक अथवा अवक्षयण के मूल्याँकन की विभिन्न पद्धतियों को अपनाते है ।

लेखांकन की शाखाएं ( Branches of accounting )

1⃣ वित्तिय लेखांकन financial accounting ~ इसमे वितीय लेनदेनों का लेखा होता है ।एक वर्ष में लाभ हानि की जानकारी व्यापार खाता (trading acnt) ओर लाभ हानि खाता (profit & loss acnt )से प्राप्त होती है

2⃣ लागत लेखांकन cost accounting~ इसमे उत्पादों की लागत का निर्धारण करते है । जिससे उस वस्तु का मूल्य निर्धारित किया जा सके।

3⃣ प्रबंध लेखांकन managment accounting ~ इसमे प्रस्तुत सूचनाऍ प्रबंधक वर्ग को दी जाती है ताकि वे संस्था के हित मे निर्णय ले सके ।

व्यय ~

व्यवसाय में लाभ कमाने हेतु जो लागत लगती है उसे व्यय कहते है प्रकार

1⃣ पूंजीगत व्यय ~ एक वर्ष से अधिक लाभ कमाने हेतु जो खर्च किये जाते है जैसे-मशीनरी,फर्नीचर,बिल्डिंग आदि

2⃣ आयगत व्यय ~ एक वर्ष से कम अवधि में लाभ कमाने हेतु जो खर्च किये जाते है जैसे-सैलरी , कमीशन आदि

छूट Discount )

1⃣ व्यापारिक छूट ( trade discount ) ~ विक्रेता द्वारा क्रेता को वस्तुओ के मूल्य में जो कटौती की जाती है।

2⃣ नकद छूट (cash discount ) ~ भुगतान को जल्दी प्राप्त करने के लिए फि गयी छूट ।

 

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No of Questions-10

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01 किसी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद में शेष विश्व में नियुक्त उत्पादन के घरेलू कारकों द्वारा अर्जित कारक आय को जोड़कर उसमें से घरेलू अर्थव्यवस्था में नियोजित शेष विश्व के उत्पादन के कारकों द्वारा अर्जित आय को घटाकर प्राप्त होगा:

Correct! Wrong!

02. किसी भी देश में पिछले वर्ष कि तुलना में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें दोगुनी हो जाएँ जबकि उत्पादन स्थिर रहे तो उस देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

Correct! Wrong!

03. उपभोक्ता कीमत सूचकांक (CPI) का प्रयोग किया जाता है:

Correct! Wrong!

04. जी.डी.पी. के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं? 1. किसी भी देश की जी.डी.पी. में वृद्धि उस देश के सभी लोगों के कल्याण का सूचकांक होता है। 2. अपने घरों में घरेलू कार्य का संपादन करने वाली महिलाओं का पारिश्रमिक जी.डी.पी. के अंतर्गत नहीं आता है। कूट

Correct! Wrong!

05. भारत सरकार द्वारा प्रत्येक वर्ष में प्रस्तुत किये जाने वाले ‘बजट’ का प्रावधान किस अनुच्छेद में है?

Correct! Wrong!

व्याख्या: भारत सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्ययों का विवरण संसद के समक्ष प्रस्तुत करना अनुच्छेद 112 के तहत एक संवैधानिक अनिवार्यता है। बजट को “डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमी अफेयर” द्वारा तैयार किया जाता है।

06. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: 1.सरकार की वे प्राप्तियाँ जिनके लिये सार्वजनिक संपत्तियों को कम करना पड़ता है, राजस्व प्राप्तियाँ कहलाती हैं।  2.सरकार की वे सभी प्राप्तियाँ जिसमें न तो दायित्वों (Liabilties) का सृजन होता है और न हि वित्तीय परिसंपत्तियाँ कम होती हैं, पूँजीगत प्राप्तियाँ कहलाती हैं। उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

Correct! Wrong!

व्याख्या: उपरोक्त दोनों कथन असत्य हैं। भारत सरकार की ऐसी प्राप्तियाँ जो न तो सार्वजनिक देयताओं (Liabilities) को बढ़ाती हैं और न ही सार्वजनिक संपत्तियों (Assets) को कम करती हैं, राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts) कहलाती हैं। सरकार की वे सभी प्राप्तियाँ जो दायित्वों का सृजन या वित्तीय परिसंपत्तियों को कम करती हैं, पूँजीगत प्राप्तियाँ (Capital Revenue) कहलाती हैं।

07. पूंजीगत प्राप्तियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: 1.इन प्राप्तियों के अंतर्गत सरकार की वित्तीय परिसंपत्तियाँ कम हो जाती हैं। 2.पूंजीगत प्राप्तियों की मुख्य मदें सार्वजनिक कर्ज़ हैं। उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

Correct! Wrong!

व्याख्या: उपरोक्त दोनों कथन सत्य हैं। सरकार की वे सभी प्राप्तियाँ जो दायित्वों का सृजन या वित्तीय परिसंपत्तियों को कम करती हैं, पूंजीगत प्राप्तियाँ कहलाती हैं। पूँजीगत प्राप्तियों की मुख्य मदें सार्वजनिक कर्ज़ हैं जिसे सरकार द्वारा जनता से लिया जाता है, इसे बाज़ार ऋण-ग्रहण भी कहते हैं।

08. केंद्रीय बजट में निम्नलिखित में से कौन-सी मदें पूँजीगत प्राप्तियों के अंतर्गत आती हैं? 1.अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से प्राप्त कर्ज़। 2.सावर्जनिक उपक्रम के शेयरों की बिक्री से प्राप्त धन। 3.वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात से प्राप्त धन। 4.तंबाकू और पेट्रोलियम पदार्थों पर उच्च कर लगाकर प्राप्त धनराशि। नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

Correct! Wrong!

व्याख्या: पूंजीगत प्राप्तियों में ट्रेजरी बिल की बिक्री के द्वारा रिज़र्व बैंक और व्यावसायिक बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं से सरकार द्वारा ऋण ग्रहण, विदेशी सरकारों तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से प्राप्त कर्ज़ और केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त ऋणों की वसूली आदि शामिल हैं। अन्य मदों में लघु बचतें (डाकघर बचत खाता, राष्ट्रीय बचत प्रमाण-पत्र इत्यादि), भविष्य निधि और सार्वजनिक उपक्रम (पी.एस-ण्यू.) के शेयरों की बिक्री से प्राप्त निवल प्राप्तियाँ हैं। इसे सार्वजनिक क्षेत्रक उपक्रम का विनिवेश कहा जाता है।

09. केंद्र सरकार को प्राप्त होने वाली गैर-कर राजस्व में कौन-सी प्रमुख मदें शामिल की जाती हैं? 1.केंद्र सरकार द्वारा जारी ऋण से ब्याज। 2.सरकार के निवेश से प्राप्त लाभांश। 3.अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा प्रदान किये जाने वाले नगद सहायता अनुदान। कूट:

Correct! Wrong!

व्याख्या: केन्द्र सरकार के गैर-कर राजस्व में मुख्य रूप से, केंद्र सरकार द्वारा जारी ऋण से ब्याज प्राप्तियाँ, सरकार के निवेश से प्राप्त लाभांश और लाभ तथा सरकार द्वारा प्रदान की गई सेवाओं से प्राप्त शुल्क और अन्य प्राप्तियाँ शामिल हैं। इसके अंतर्गत विदेशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा प्रदान किये जाने वाले नगद सहायता अनुदान भी शामिल किये जाते हैं।

10. केंद्र सरकार द्वारा किया जाने वाला ब्याज भुगतान किसके अंतर्गत आता है?

Correct! Wrong!

व्याख्या: राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) केंद्र सरकार का भौतिक या वित्तीय परिसंपत्तियों के सृजन के अतिरिक्त अन्य उद्देश्यों के लिये किया गया व्यय है। राजस्व व्यय के अंतर्गत सरकारी विभागों के सामान्य कार्यों तथा विधिक सेवाओं, सरकार द्वारा उपागत ऋण ब्याज अदायगी, प्रतिरक्षा सेवाएँ, उपदान (subsidy), वेतन और पेंशन आते हैं।

Accounting Quiz ( लेखांकन )
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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, मंगेज कुमार जी ,चूरू, ज्योति प्रजापति

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