राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्र का 49.53% कृषि के उपयोग में आता है राजस्थान में लगभग 75% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है यहां कुल कामगारों में 62% कामगार जीवन यापन के लिए कृषि एवं उससे संबंधित क्षेत्रों पर निर्भर है कृषि संबंधी क्षेत्र में फसल, पशुधन, मत्स्य एवं वानिकी शामिल है राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि 1 मेरुदंड की तरह है

राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है तथा इसके अंतर्गत देश का 10.41 प्रतिशत क्षेत्र आता है लेकिन इसके बावजूद राज्य में सतही जल संसाधनों की कमी है, जो कि देश के कुल जल संसाधनों का मात्र 1.16 प्रतिशत है। राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 50-60% क्षेत्र कृषि के अधीन है, जबकि प्रदेश के कुल कृषित क्षेत्रफल का लगभग 30% भाग ही सिंचित है। अतः राज्य में कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा जल पर निर्भर है।

कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा जल पर निर्भर है तथा इसके साथ ही  प्रदेश को हर वर्ष अनावृष्टि और असमान वर्षा वितरण जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इस कारण राज्य में बोये जाने वाले कृषित क्षेत्र तथा कृषि उत्पादन में प्रति वर्ष उतार चढ़ाव होते रहते हैं। इन् कारणों से राज्य में कृषि को ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है।

भू-उपयोग सांख्यिकी (वर्ष 2013-14) में राज्य का प्रतिवेदित भौगोलिक क्षेत्रफल – 342.68 लाख हैक्टेयर,

जिसमें शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल –  53.31 प्रतिशत (182.68 लाख हैक्टेयर).

राजस्थान में 2010-11 में कृषि जोत का औसत आकार 3.07 हेक्टेअर जबकि अखिल भारतीय स्तर पर कृषि जोत का औसत आकार 1.15 हेक्टेयर था। भारत में कृषि जोत के आकार के आधार पर राजस्थान का क्रमशः नागालैंड, पंजाब व अरुणाचल प्रदेश के बाद चौथा स्थान है। संपूर्ण देश में क्रियाशील जोतों का आकार घटने की प्रवृत्ति विद्यमान है।

Table of Contents

राज्य में कृषि उत्पादन ( State Agricultural Production )

खाद्यान्न के अंतर्गत अनाज और दलहन सम्मिलित हैं। वर्ष 2015-16 में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 182.25 लाख टन अनुमानित है, जो कि गत वर्ष के 196.22 लाख टन की तुलना में 7.1 प्रतिशत कम है। तिलहन का उत्पादन वर्ष 2015 16 में 58.59 लाख टन अनुमानित है जो कि पिछले वर्ष के 53.14 लाख टन की तुलना में 10.26 प्रतिशत अधिक है। कृषि उत्पादन सूचकांक : वर्ष 2014-15 के लिए कृषि उत्पादन सूचकांक 224.39 है।

उर्वरक उपभोग : राजस्थान में उर्वरकों के कुल उपभोग का आधे से अधिक भाग केवल दो फसलों – चावल व गेहूं में प्रयुक्त होता है।

1. Kharif ( खरीफ )

यह फसल इन जून-जुलाई में बोई जाती है वह सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती है मुख्य फसलें चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का,उड़द, मूंग, चावल, मोठ, मूंगफली, अरंडी, सोयाबीन है इन में सर्वाधिक क्षेत्र खाद्यान्न फसलों का होता है राज्य में लगभग 90% खरीफ की फसलें बारानी क्षेत्र में पैदा की जाती हैं जो पूर्णता है वर्षा पर निर्भर होती हैं खाद्यान्नों में बाजरे का कृषि क्षेत्रफल सर्वाधिक एवं दलहनी मोठ का है  खरीफ फसलों को स्यालु या सावणु कहते हैं

बाजरा- देश में बाजरे के उत्पादन का लगभग 35 से 40% उत्पादन राजस्थान में होता है और प्रदेश का देश में उत्पादन व क्षेत्रफल दोनों में प्रथम स्थान है। राज्य के सर्वाधिक कृषि क्षेत्रफल में बाजरा बोया जाता है। सर्वाधिक कृषि क्षेत्रफल बाड़मेर, जोधपुर, नागौर आदि पश्चिमी जिला में पाया जाता है पर सर्वाधिक उत्पादकता पूर्व में स्थित धौलपुर जिले की है। वहीं सर्वाधिक उत्पादन उत्तर – मध्यवर्ती जिलों (अलवर, जयपुर, सीकर, झुंझुनू ) में होता है।

मक्का :- राजस्थान में मक्का का अधिकांश उत्पादन व उत्पादक क्षेत्रफल राज्य के दक्षिणी जिलों (भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, बांसवाड़ा और राजसमंद) में पाया जाता है। इनमें से उदयपुर सर्वाधिक क्षेत्रफल, भीलवाड़ा सर्वाधिक उत्पादन  और चित्तौड़गढ़ सर्वाधिक उत्पादकता के साथ अग्रणी है।

ज्वार : ज्वार का सर्वाधिक उत्पादन मध्यवर्ती जिलों अजमेर, पाली और नागौर में पाया जाता है, वही सर्वाधिक उत्पादकता राजसमंद जिले की है।

चावल : हनुमानगढ़, बूंदी, बाँरा और कोटा चावल के सर्वाधिक उत्पादन वाले जिले हैं, जिनमें से बाँरा की उत्पादकता सर्वाधिक है।

2. Rabbi ( रबी ) 

रबी की फसलें अक्टूबर-नवंबर में बोकर मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है राज्य में लगभग 70 से 95 लाख हेक्टर क्षेत्र रबी फसलों का उत्पादन होता है जिसमें लगभग 60 से 65 लाख हेक्टर सिंचित है रबी की फसलों में सर्वाधिक क्षेत्र गेहूं का है रबी तिलहनों में मुख्यता है राई और सरसों की खेती होती है

मुख्य फसलें गेहूं, जो, चना, मटर, मसूर, सरसों, अलसी, तारामीरा, सूरजमुखी है जायद फसलें राज्य के पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में एक तीसरी फसल मार्च से मध्य जून तक ले जाती है जिसे जायद कहते हैं इसमें तरबूज, खरबूजा व सब्जियां पैदा की जाती हैं

गेहूं – गेहूं राज्य में सर्वाधिक मात्रा में उत्पादित होने वाली फसल है। श्री गंगानगर, हनुमानगढ़, अलवर, बाँरा, बूंदी और भरतपुर प्रमुख उत्पादक और क्षेत्रफल वाले जिले हैं परंतु सर्वाधिक उत्पादकता झुंझुनू जिले की है।

कपास : कपास भारत की आदि फसल है जिसे सफेद सोना भी कहते हैं। राज्य में कपास का अधिकांश उत्पादन नहरी सिंचाई की सुविधा वाले जिलों हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर में होता है। इसके अतिरिक्त नागौर, भीलवाड़ा और जोधपुर प्रमुख उत्पादक जिले हैं। राज्य में कपास की सर्वाधिक उत्पादकता चित्तौड़गढ़ जिले की है।

3. Zayed ( जायद )

पानी की उपलब्धता वाले कुछ क्षेत्रों में एक तीसरी फसल भी मार्च से जून के मध्य की जाती है जिसे जायद की फसल कहते हैं। इसमें तरबूज, खरबूजा, ककड़ी व सब्जियां पैदा की जाती हैं।

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :

  • चने की फसल अधिकतर बारानी क्षेत्रों में की जाती है। बीकानेर, जयपुर, झुंझुनू, चूरू और हनुमानगढ़ प्रमुख उत्पादक जिले हैं।
  • राज्य में दलहनी फसलों के अंतर्गत सर्वाधिक (40%) क्षेत्र मोठ का है।
  • कुल अनाज के उत्पादन में अलवर का प्रथम एवं उसके उपरांत श्रीगंगानगर व जयपुर जिले का स्थान है।
  • मोटे अनाजों के उत्पादन की दृष्टि से वर्ष 2014-15 में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है। कर्नाटक द्वितीय व महाराष्ट्र तृतीय स्थान पर है।
  • दलहन के क्षेत्र और उत्पादन दोनों की दृष्टि से राजस्थान दूसरे और माध्यम मध्यप्रदेश देश में प्रथम स्थान पर है।
  • कुल तिलहन के उत्पादन की दृष्टि से मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान का द्वितीय स्थान पर है।
  • राजस्थान का कुल खाद्यान्न के उत्पादन में देश में चौथा स्थान है जबकि उत्पादकता में 15वां स्थान है।

राजस्थान में उद्यानिकी ( Horticulture in rajasthan )

उद्यानों की दृष्टि से राजस्थान की जलवायु अनुकूल दशा में नहीं है। किंतु फिर भी कई आधुनिक तकनीकों से यहां इस क्षेत्र में सराहनीय प्रयास किए जा रहे हैं।

क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य राजस्थान कृषि की दृष्टि से विविधता से परिपूर्ण है यहां उद्यानिकी फसलों, फल, सब्जी, मसाले, फूल, औषधीय पौधों आदि के विकास की विपुल संभावनाएं हैं राजस्थान में उद्यानिकी विकास के लिए 1989-90 में अलग से उद्यान निदेशालय की स्थापना की गई है वर्तमान में राजस्थान देश में बीजीय मसालों के उत्पादन में प्रथम स्थान पर है

राज्य में सब्जियों के अंतर्गत कृषि क्षेत्रफल बढ़ाने एवं प्रति हेक्टर उत्पादकता में वृद्धि के उद्देश्य से कोटा एवम जयपुर जिलों में शाक परियोजना संचालित की जा रही है मसाला उत्पादन की दृष्टि से राज्य देश में गुजरात और आंध्र प्रदेश के बाद तीसरे स्थान पर है भारत का सर्वाधिक ईसबगोल राजस्थान में उत्पादित होता है विश्व में इसबगोल का उत्पादन राजस्थान अकेले 40% उत्पादित करता है

कुछ जिले जैसे-सवाई माधोपुर में अमरुद, झालावाड़ में संतरे, श्रीगंगानगर में मौसमी आदि का उत्पादन किया जाता है। जिसका उत्पादन निर्यात स्तर पर होता है। झालावाड़ जिला हार्टीकल्चर हब के रूप में विकसित किया जाएगा। राजस्थान में फल सब्जी मसाला फूलों के क्षेत्रों में उत्पादन व गुणवत्ता में हुई, लगातार वृद्धि के फलस्वरुप राज्य के कई जिलों ने पहचान बनाई है।

मसाला उत्पादन ( Spice production )

वर्तमान में राजस्थान में धनिया उत्पादन का 50%, जीरा का 60%  और मेथी का 47 प्रतिशत उत्पादन होता है तथा इन बीजीय मसालों (धनिया, जीरा एवं मेथी) के उत्पादन में राज्य का देश में प्रथम स्थान है। यद्यपि कुल मसाला उत्पादन की दृष्टि से राज्य देश में गुजरात व आंध्र प्रदेश के बाद तीसरे स्थान पर है, तथापि मसालों के अंतर्गत कृषित क्षेत्रफल की दृष्टि से संपूर्ण देश में राज्य प्रथम स्थान पर है।

अफीम की खेती : राजस्थान में अफीम की खेती चित्तौड़गढ़, कोटा व झालावाड़ जिलों में की जाती है।

जोजोबा : एक नई उद्यानिकी फसल है जिसे राजस्थान में काजरी (जोधपुर) द्वारा 1965 में इसराइल से लाया गया था, यद्यपि इसका उत्पत्ति स्थल उत्तरी अमेरिका का सोनारन रेगिस्तान है। इससे बहुउपयोगी तेल प्राप्त होता है। राज्य में हाल ही के वर्षों में उद्यानिकी फसलों के क्षेत्रफल, उत्पादन व गुणवत्ता में वृद्धि हुई है और कुछ जिलों ने अपनी विशेष पहचान बनाई है, जिनमें झालावाड़ (संतरा); श्रीगंगानगर (किन्नू, माल्टा व मौसमी); बाड़मेर, भीलवाड़ा व सीकर (अनार); सवाई माधोपुर (अमरुद); श्री गंगानगर व भरतपुर (बेर) का प्रमुख स्थान है।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन ( National Horticulture Mission )

राज्य की चयनित 24 जिलों में फसल मसाला एवं फूलों की क्षेत्र उत्पादन व उत्पादकता को बढ़ाने के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015- 16 में 66•38 करोड़( 38•82 करोड़ केंद्रीय अंश तथा 26•55 करोड़ राज्यांश के रूप में) कि एक कार्य योजना स्वीकृत की गई।

राष्ट्रीय बंबू मिशन ( National Bamboo Mission )

इस मिशन के अंतर्गत बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य के करौली सवाई माधोपुर उदयपुर चित्तौड़ बांसवाड़ा डूंगरपुर सिरोही बारां झालावाड़ भीलवाड़ा राजसमंद एवं प्रतापगढ़ जिले को सम्मिलित किया गया।

राष्ट्रीय औषधि पादप मिशन ( National Mission on Medicinal Plants – NMMP )

राज्य में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए एवं फार्मा सेक्टर को पर्याप्त मात्रा में आसानी से कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए उद्देश्य हेतु भारत सरकार द्वारा यह कार्यक्रम वर्ष 2009-10 में प्रारंभ किया गया। यह मिशन प्रारंभ से ही राज्य के समस्त जिलों में क्रियान्वित किया जा रहा है।  2015-16 में इस मिशन में केंद्र एवं राज्य का वित्त पोषण पैटर्न 90:10 रखा गया। एवं राज्यांश में भी आयुष विभाग द्वारा ही किया गया।

उद्यानिकी विकास कार्यक्रम

राज्य में 24 जिलों में विभिन्न उद्यानिकी कार्यक्रमों का क्रियान्वयन राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत किया जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय उद्यानिकी नवाचार एवं प्रशिक्षण केंद्र

  • नीदरलैंड के सहयोग से जयपुर में स्थापना की गई
  • बांसवाड़ा एवं कुंभलगढ़ में लीची की खेती हेतु प्रोत्साहन।
  • टोंक में अमरूद का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस।

राजस्थान में वानिकी (  Forestry in Rajasthan )

भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार द्विवर्षीय सर्वेक्षण अवधि 2013-15 में राज्य के वृक्षाच्छादित क्षेत्र में 85 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई।राज्य में दूरस्थ क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करना भी वन विभाग की महत्वपूर्ण गतिविधि हैं। 6042 ग्राम वन सुरक्षा एवं प्रबंधन समितियाँ विभाग के सहयोग से साझा वन प्रबंधन का कार्य कर रही है।

अभयारण्यों के आसपास वन्यजीव प्रबंध स्थानीय लोगों की भागीदारी अर्जित करने के लिए 489 ईको डेवलपमेंट समितियां गठित की गई। गैर वन भूमि पर वृक्षारोपण का कार्य भी पंचायत राज संस्थाओं को सौंपा गया। औषधिय प्रजातियों के संरक्षण हेतु राज्य में 9 औषधीय पौध संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना की गई। वर्ष 2015-16 में बीस सूत्री कार्यक्रम के अंतर्गत 57,100 हैक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण के लक्ष्य की तुलना में। दिसंबर 2015 तक 70,357•54 हेक्टेयर वृक्षारोपण किया गया है।

केंद्र प्रवृर्तित योजनाओं के अंतर्गत विभिन्न विकास कार्य करवाए जा रहे हैं। जिनमें पारिस्थितिक विकास, मृदा संरक्षण,नम भूमि का संरक्षण एवं विकास, अभयारण्य,राष्ट्रीय उद्यान एवं चिड़ियाघर आदि की सुरक्षा का विकास सम्मिलित है। राजस्थान में वानिकी को प्रोत्साहन देने हेतु बंजर भूमि, परती भूमि, नहरों, सड़कों व रेललाइनों के दोनों ओर तथा अन्य खाली पड़ी भूमि पर वृक्षारोपण किया जाता है।

?वानिकी में सामाजिक वानिकी भी प्रमुख है। जिसमें सामाजिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर वृक्षारोपण तथा ईंधन की लकड़ियां प्राप्त करने हेतु वृक्षारोपण किया जाता हैं।

कृषि वानिकी ( Agricultural forestry )

कृषि के साथ-साथ फसल चक्र में पेड़ों की बागवानी व झाड़ियों की खेती का फसल बेचारा उत्पादित करना।

कृषि वानिकी नीति – 2012  – राष्ट्रीय सलाहकार परिषद(NCA) के परामर्श के आधार पर कृषि वानिकी नीति का निर्माण किया गया। जिसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 6 फरवरी 2014 को अनुमोदित किया। इस नीति का प्रमुख उद्देश्य भूमि उपयोग प्रणाली को बढ़ावा देना है। जो उत्पादकता बढ़ाने,लाभप्रदता, विविधता, तथा पारिस्थितिकीय प्रणाली की संधारणीय के लिए कृषि भूमि तथा ग्रामीण परिदृश्यों पर वृक्षों और झाड़ियों को समेकित करता है।

राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना ( Rajasthan Forestry and Biodiversity Project )

यह परियोजना जापान इंटरनेशनल कारपोरेशन एजेंसी वित्त मंत्रालय से पोषित है। इस योजना का प्रमुख उद्देश्य साक्षा वन प्रबंधन की प्रक्रिया से कराए गए वृक्षारोपण एवं जैव विविधता संरक्षण के कार्यों के द्वारा वनाच्छादित क्षेत्र में वृद्धि करना,जैव विविधता संरक्षित करना तथा वनों पर निर्भर जन समुदाय की आजीविका के अवसरों को बढ़ाकर राजस्थान प्रदेश के पर्यावरण संरक्षण एवं सामाजिक व आर्थिक विकास में योगदान करना है।

इस परियोजना के अंतर्गत मुख्य कार्य वनीकरण, जैव विविधता संरक्षण,मृदा और जल संरक्षण,आजीविका एवं गरीबी उन्मूलन उपयुक्त समूहों के माध्यम से किए जाएंगे।

राजस्थान कृषि परियोजना प्रतिस्पर्धात्मक विश्व बैंक- यह परियोजना विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित है  इसका योजना का मुख्य उद्देश्य कृषि प्रौद्योगिकी एवं कृषि जल प्रबंधन को समन्वित कर उत्तरोत्तर कृषि उत्पादकता एवं किसानों की आय में वृद्धि करना है।

राजस्थान के कृषि विकास हेतु प्रयासरत संस्थाएं

1. कृषि विपणन निदेशालय : स्थापना वर्ष -1980 (राष्ट्रीय कृषि आयोग की सिफारिश पर)

कार्य – यह किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के साथ ही उपभोक्ताओं को कृषि जिंसों को उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने में सामंजस्य का कार्य करता है।

2. राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड : स्थापना वर्ष – 1974 (केंद्रीय कृषि आयोग की सिफारिश पर)

कार्य – किसानों को कृषि उपज का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से कृषि उपज मंडियों की स्थापना व मंडी प्रांगणों का निर्माण तथा मंडियो को खेतों से जोडने हेतु ग्रामीण संपर्क सड़कों का निर्माण व रखरखाव।

3. राजस्थान राज्य भंडारण निगम : स्थापना वर्ष – 1957

कार्य – कृषि आदानों, कृषि उपजों एवं कृषि यंत्रों के भंडारण हेतु वैज्ञानिक पद्धति से गोदामों व भंडार ग्रहों की स्थापना एवं रखरखाव करना।

4. राजस्थान राज्य सहकारी क्रय विक्रय संघ लिमिटेडं (RAJFED राजफेड) :  स्थापना वर्ष – 1957

कार्य – प्राथमिक क्रय-विक्रय सहकारी समितियों के माध्यम से राज्य के किसानों को उचित मूल्य पर विभिन्न कृषि आदान उपलब्ध कराना एवं उनके कृषि उत्पादों की खरीद बिक्री एवं प्रोसेसिंग की समुचित व्यवस्था कर आवश्यक मार्गदर्शन करना।

पशुओं के प्रकार एंव नस्ल 

 पशुगणना 2012 के अनुसार राज्य में कुल 577•32 लाख पशुधन एवं 80•24 लाख कुक्कुट है। देश के कुल पशुधन का 11•27 % पशुधन राजस्थान में उपलब्ध है।  वर्ष 2014-15 में राष्ट्रीय उत्पादन में राज्य का योगदान दूध उत्पाद में 11% एवं ऊन में 30% था।

वर्ष 2015-16 के दौरान पशुपालन विभाग द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम 

राज्य के गो एवं भैंस वंशीय पशुओं को एफ.एम डी. (खुरपका,मुंहपका रोग) रोग से मुक्त किए जाने के लिए केंद्र सरकार के सहयोग से चलाई जा रहे राज्यव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम के अंतर्गत दिसंबर 2015 तक 94•79 लाख पशुओं में टीकाकरण किया गया। पशुधन निशुल्क आरोग्य योजना के अंतर्गत पशुधन की चिकित्सा के लिए दवाइयां एवं सर्जिकल कंज्यूमेब्लस की मांग एवं पूर्ति के प्रभावी पर्यवेक्षण हेतु सॉफ्टवेयर का लोकार्पण किया गया।

राज्य में पशुधन के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु वर्ष 2015-16 में 5•18 लाख पशु स्वास्थ्य एवं प्रजनन कार्ड पशुपालकों को उपलब्ध कराएंगे। संपूर्ण राज्य में दिनांक 29 जून से 13 जुलाई 2015 तक चलाए गए राज्यव्यापी सघन टीकाकरण अभियान के दौरान 34,717 शिविर आयोजित किए गए।

गोवंश ( cattle ):-

गोवंश अथार्त गाय-बेल का पशुधन में विशेष महत्व हैं , क्योंकि ये दूध के साथ-साथ कृषि कार्यों एंव भार -वहन हेतु भी प्रयुक्त होते हैं।

राज्य में गोवंश की प्रमुख नस्लें हैं ।

(1) नागोरी – नागौरी वंश की उत्पत्ति का क्षेत्र नागौर जिले का सोहालक गांव है। इस नस्ल की गाय दूध कम देती है, लेकिन बेल चुस्त एवं फुर्तीले होने के साथ-साथ हल में चलने के लिए भी प्रसिद्ध हैं। इस नस्ल की गाय,बैल नागौर जिले में ही अधिक पाए जाते हैं।

(2) थारपारकर – इस वंश का उत्पत्ति स्थान बाड़मेर का ‘मालाणी’ प्रदेश है। इस नस्ल की गाय दुधारू और बैल परिश्रमी होते हैं। यह बाड़मेर, जोधपुर,और जैसलमेर जिले में अधिक मिलती हैं।

(3) कॉकरेज – यह वंश बाड़मेर, पाली, और जालौर जिले के सांचौर तथा बेनाड क्षेत्र में पाया जाता है। तेज चलने और बोझा ढोने की क्षमता के कारण इस वंश के गाय एवं बैल बहुत पसंद किए जाते हैं.।

(4) मालवी –इस वंश का उत्पत्ति स्थान झालावाड़ का ^मानव^ प्रदेश हैं। यह वंश भारवाहक पशु के लिए के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस वंश की दो जातियां है- बड़ी मालवी और छोटी मालवी। बड़ी मालवी झालावाड़ जिले में तथा छोटी मालवी, कोटा और उदयपुर जिले में मिलती हैं ।

(5) गिर- गिर नस्ल की गाय दूध के लिए प्रसिद्ध हैं .। इस वंश की गाय अजमेर, भीलवाड़ा, और पाली जिलों में पाई जाती हैं। इसे रेडा, अजमेरा भी कहते हैं।

(6) मेवाती – मेवाती ( कोठी) नस्ल के गाय एवं बैल अलवर जिले के पूर्वी भाग व भरतपुर जिले में मिलते हैं। शांत एवं शक्तिशाली किस्म का यह पशु हल व बोझा खींचने के लिए अधिक उपयुक्त रहता है ।

(7) हरियाणा- इस नस्ल के गाय और बैल दूध एवं भार ढोने की दृष्टि से अच्छे माने जाते हैं। यह नस्ल गंगानगर, सीकर,झुंझुनू, अलवर-जयपुर जिलों में पाई जाती हैं

(8) राठी – यह नस्ल राज्य में गंगानगर, बीकानेर, और जैसलमेर के उत्तरी -पूर्वी भागों में मिलती हैं। इस नस्ल की गाय अधिक दूध देने वाली होती है। इस वंश में साहिवाल, लाल, सिंधी वह हरियाणा नस्ल का मिश्रण है, किंतु साहिवाल का अंश अधिक हैं।

गोवंश सुधार योजनाओं का उद्देश्य नस्ल सुधार एवं पशु पालकों की सहायता है.। राज्य में गोवंश सुधार हेतु राज्य सरकार ने कई कार्यक्रम चला रखे हैं-

(1) देशी गोवंश नस्ल सुधार कार्यक्रम
(2) गोपाल कार्यक्रम
(3) कामधेनु कार्यक्रम
(4) गाय एवं भैंस विकास परियोजना
(5) पशु प्रजनन कार्यों का पुनर्गठन

राजस्थान में डेयरी विकास ( Dairy Development in Rajasthan )

राज्य में डेयरी विकास कार्यक्रम,सहकारी समितियों के माध्यम से क्रियान्वित किए जा रहे हैं। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 13576 प्राथमिक दुग्ध सहकारी समितियों को राज्य के सभी 33 जिलों में। 21 जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ एवं राज्य स्तर पर शीर्ष संस्थान राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन लिमिटेड जयपुर से संबद्ध किया गया।

राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन द्वारा पौष्टिक पशु आहार उपलब्ध कराया जा रहा है। डेयरी फेडरेशन द्वारा घी,छाछ,पनीर,दही,चीज आदि मूल्यवर्धित उत्पादों का उत्पादन किया जा रहा है। सामाजिक बाध्यताओं को पूरा करने के उद्देश्य से राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन एवं संबंध जिला दुग्ध संघ दुग्ध उत्पादकों को बीमा उपलब्ध करवा रहे हैं।

दिसंबर 2015 तक उत्पादकों को एवं “सरस सुरक्षा कवच”(दुर्घटना) के 13वें चरण में 93,743 दूध उत्पादकों को बीमा सुरक्षा प्रदान की गई।सरस सामूहिक आरोग्य बीमा के दसवें चरण में जिला दुग्ध संघ द्वारा यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के साथ अनुबंध किया गया।

ग्रामीण एवं कृषि प्रधान किंतु आर्थिक दृष्टि से पिछड़े राजस्थानी अर्थव्यवस्था में पशुपालन एवं डेयरी व्यवसाय एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
यह निर्बल वर्ग को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने एवं उपभोक्ताओं को शुद्ध दूध एवं उससे बने पदार्थ उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण कार्य करता है।

पशुपालन एवं डेयरी व्यवसाय न केवल कृषकों एवं ग्रामीणों के फालतू समय का सदुपयोग करवाते हैं। बल्कि उन्हें वर्ष पर्यंत रोजगार उपलब्ध करवा कर उनको आर्थिक संबल प्रदान करते हैं। वर्तमान में राजस्थान में डेयरी विकास कार्यक्रम सहकारिता के आधार पर गुजरात की आनंद सहकारी डेयरी संघ (अमूल पद्धति) पर क्रियान्वित किया जा रहा है।

राजस्थान में दुग्ध विकास कार्यक्रम की आधारशिला सर्वप्रथम जयपुर शहर के उपभोक्ताओं हेतु दूध एवं दुग्ध पदार्थों की आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा जयपुर दुग्ध वितरण योजना के नाम से 1957 में एक विभाग आरंभ करके रखी गई।

1970 में राजस्थान सहित 10 राज्यों में ऑपरेशन फ्लड उद्देश्य था। दुग्ध उत्पादन बढ़ाना, दुग्ध उत्पादकों को दूध का उचित मूल्य दिलवाना तथा उपभोक्ताओं तक अच्छी किस्म के दूध का वितरण का सुनिश्चित करना।

डेयरी विकास कार्यक्रम का ढांचा 

  1. शीर्ष स्तर-राजस्थान सहकारी डेयरी
  2. जिला स्तर-जिला दुग्ध उत्पादन संघ
  3. प्राथमिक- दुग्ध उत्पादक समितियां

गहन डेयरी विकास परियोजना- को बैट ऑपरेशन फ्लड,पर्वतीय एवं पिछड़े क्षेत्रों में 100% अनुदान सहायता के आधार पर प्रारंभ किया गया। वर्तमान में दूध संकलन का कार्य 21 जिला डेयरी समूह द्वारा संचालित किया जा रहा है। डेयरी विकास कार्यक्रम से आमदनी व रोजगार में वृद्धि हुई।

Agricultural science, horticulture, forestry and animal husbandry important Question

Q. 1 ग्रीनपीस क्या है ?
उत्तर — यह पर्यावरण सुरक्षा एवं पारिस्थितिक संतुलन से जुड़े मुद्दों पर जन-जागृति हेतु कार्य करता है जो जलवायु मृदा और प्रदूषण से बचाने के लिए विभिन्न देशों की सरकार से परामर्श देता है

Q.2 ग्रीन हाउस इफेक्ट क्या है ?
उत्तर– जीवाश्म ईंधनों को जलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड’ कार्बन मोनोऑक्साइड ‘ जैसी गैस एवं कार्बन के कण उत्सर्जित होते हैं इस प्रकार की गैसों को ग्रीन हाउस गैस कहते हैं यह गैस है पृथ्वी की सतह के ऊपर एक परत के रूप में जमा हो जाती है तथा पृथ्वी से परावर्तित होकर पराबैंगनी तरंगों को वापस नहीं जाने देती है जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ जाता है जिसे ग्रीन हाउस इफेक्ट कहा जाता है!

Q.3- ग्रीन बेल्ट क्या है ?
उत्तर– अत्यधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों.औद्योगिक क्षेत्रों.और राजमार्गों के किनारे एक निश्चित क्षेत्र में अनिवार्य रूप से वृक्षारोपण किया जाता है जिसे ग्रीन बेल्ट या हरित पट्टी कहा जाता है हरित पट्टी में वृक्षों के काटने पर प्रतिबंध होता है यह हरित पट्टी वातावरण में उत्सर्जित हो रहे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है!

Q.4- ग्रीन फ्यूल (CNG) क्या है?
उत्तर– CNG कंप्रेस्ड नेचुरल गैस को ग्रीन फ्यूल कहा जाता है डीजल तथा पेट्रोल के स्थान पर कंप्रेस्ड नेचुरल गैस को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किए जाने पर कार्बन डाइऑक्साइड तथा कार्बन कणों का उत्सर्जन काफी कम हो जाता है और वातावरण प्रदूषित होने से बचा जाता है!

Q. 5 सामाजिक वानिकी ( सोशल फॉरेस्ट्री) क्या है?
उत्तर–यह 1976 में शुरू की गई महत्वकांक्षी योजना थी  पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के उद्देश्य से देश में अनेक राज्यों में वृक्षारोपण के लिए महत्वकांक्षी योजना रही सामाजिक वानिकी योजनाओं के माध्यम से वृक्षारोपण से सक्रिय रुप से जोड़ने के प्रयास किए गए !

 

Quiz 

Questions – 25

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

कुम्भा राम लीलावत हरपालिया, राजवीर प्रजापत, गजे सिंह पाली, प्रभुदयाल मूण्ड चूरू, P K Nagauri, JETHARAM LOHIYA JODHPUR, दिनेश मीना झालरा टोंक,

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