Balanced Diet 

संतुलित आहार 

भोजन वह पोषक पदार्थ है जो किसी जीव द्वारा वृद्धि कार्य मरम्मत और जीवन क्रियाओं के संचालन हेतु ग्रहण किया जाता है ऐसे आहार जिसमें शरीर की वृद्धि एवं स्वस्थ रहने हेतु आवश्यक सभी पोषक पदार्थ निश्चित अनुपात में उपस्थित हों, संतुलित आहार कहलाते हैं पोषक तत्व के अध्ययन को ट्रोपोलॉजी कहा जाता है! मानव शरीर के लिए 7 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जबकि पेड़ -पौधों के लिए 17 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है!  हमारे शरीर में मुख्य रूप से ऊर्जा का स्रोत कार्बोहाइड्रेट्स माना जाता है कार्बोहाइड्रेट वसा और प्रोटीन ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं

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पोषक तत्त्व = 1.कार्बोहाइड्रेट 2.वसा 3. प्रोटीन 4. विटामिन 5. खनिज – लवण 6. जल 7. नयकिलिक अम्ल।  ( D.N.A& R.N.A)

1 ग्राम प्रोटीन, 1 ग्राम वसा और 1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट से क्रमशः 4 , 9, 4 किलो कैलोरी ऊर्जा बनती है

संतुलित आहार के अंग ( Part of Balanced diet )

संतुलित आहार के 6 मुख्य अंग होते हैं।

  1. कार्बोहाइड्रेट- (ऊर्जा देने वाला, 450 ग्राम प्रतिदिन)
  2. प्रोटीन- (वृद्धि में व निर्माण में सहायक, 60 ग्राम प्रतिदिन)
  3. वसा-  (ऊर्जा देने वाला, 40 ग्राम प्रतिदिन )
  4. विटामिन- (उपापचयी नियंत्रण )
  5. खनिज लवण- (उपापचयी नियंत्रण)
  6. जल- (4-5 लीटर)

1. कार्बोहाइड्रेट ( Carbohydrate )

कार्बन,हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के एक निश्चित अनुपात(1:2:1) से मिलकर कार्बोहाइड्रेट का निर्माण होता है। कार्बोहाइड्रेट हमारी ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। एक स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन अपने भोजन के साथ लगभग 450 ग्राम कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है।  1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट के ऑक्सीकरण से या दहन से “4•2 किलो कैलोरी ” ऊर्जा प्राप्त होती हैं। कार्बोहाइड्रेट चावल,आलू, चीनी, भूमिगत सब्जियों इत्यादि से प्राप्त होता है।

कार्बोहाइड्रेट को तीन भागों में विभाजित किया गया है।

  1. मोनोसेकैराइड
  2. डाइसैकेराइड
  3. पाॅली सैकेराइड

1. मोनोसेकेराइड ( Monosaccharide )

  • कार्बन के 6 अणु, हाइड्रोजन के 12 अणु तथा ऑक्सीजन के 6 मिलकर सरल शर्करा का निर्माण करते हैं।जैसे- ग्लूकोज , फ्रक्टोज और ग्लैक्टोज
  • ग्लूकोज को कार्बोहाइड्रेड कि इकाई कहा जाता है। क्योंकि अंतिम रूप से यही हमारी कोशिकाओं में पहुंचकर ऊर्जा में परिवर्तित होता है। इसीलिए इसे कोशिकीय ईंधन कहा जाता है।
  • पके हुए अंगूर में ग्लूकोज की अधिकता होती हैं इसीलिए ग्लूकोज को अंगूर की शर्करा भी कहा जाता है।
  • कठिन परिश्रम करने वाले खिलाड़ियों को तत्काल ऊर्जा के लिए ग्लूकोज को दिया जाता है।
  • फ्रक्टोज में भी सरल शर्करा रहा होती है। यह पके हुई फलों में पाया जाता है। अतः फल शर्करा कहा जाता है यह शहद में भी पाया जाता है।

नोट- प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली शर्करा में यह सबसे मीठी शर्करा होती है।

2. डाइसैकराइड्स ( Disaccharides )

  • समान या भिन्न भिन्न शर्करा के दो अणुओं के संयोग से इसका निर्माण होता है। जैसे- माल्टोज सुक्रोज लैक्टोज
  • सुक्रोज शर्करा का निर्माण ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज के एक एक अणु के मिलने से होता है। ग्लूकोज + फ्रक्टोज=सुक्रोज
  • यह द्विशर्करा हैं। गन्ने के रस तथा चुकंदर में सुक्रोज शर्करा पाया जाता है। इसीलिए इस को शर्करा इच्छु शर्करा (Cane Suger) कहा जाता है।
  • यदि गन्ने का रस को कुछ समय तक छोड़ दिया जाए तो जीवाणुओं द्वारा इस शर्करा का किण्वन करके इथाइल एल्कोहल में परिवर्तित कर दिया जाता है। जिसके परिणामस्वरुप सिरका या शराब बनाया जाता है।
  • लेक्टोज शर्करा का निर्माण ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज के मिलने से होता है। ग्लूकोज + ग्लैक्टोज=लैक्टोज
  • यह द्विशर्करा है। दूध में पाई जाने वाली मिठास इसी शर्करा के कारण होता है। लैक्टोज को दुग्ध शर्करा भी कहा जाता है।
  • यदि दूध को कुछ समय खुला छोड़ दिया जाए तो जीवाणुओं द्वारा ही शर्करा का किण्वन कर इसे लैक्टिक एसिड में परिवर्तित कर दिया जाता है। जिसके कारण दूध खट्टा होकर खराब हो जाता है। अर्थात दूध के खराब हो जाने का कारण लैक्टिक एसिड का निर्माण है।।
  • दूध को खराब होने से बचाने के लिए अर्थात जीवाणुओं से सुरक्षित रखने के लिए लुई पाश्चर (सूक्ष्म जीव विज्ञान का पिता कहा जाता है।) पाश्चुरायजेशन विधि की जानकारी दी।
  • इस विधि में दूध को 62•8 सेंटीग्रेड तापमान पर 30 मिनट तक गर्म किया जाता है। जिससे यह जीवाणु मुक्त हो जाता है यदि इस दूध को 8 सेंटीग्रेड से कम तापमान पर रखा जाए तो लगभग 2 दिनों तक प्रयोग में लाया जा सकता है।

नोट

  • दूध एक पारस हैं।अर्थात् तरल का तरल में विलय हैं। उसका सफेद रंग इसमें उपस्थित केसीन प्रोटीन के कारण होता है। जबकि गाय के दूध का पीला रंग कैरोटीन के कारण होता है।
  • माल्टोज का निर्माण ग्लूकोज के दो अणुओं के मिलने से होता है। ग्लूकोज + ग्लूकोज=माल्टोज
  • यह भी द्विशर्करा हैं। यह शर्करा अनाज में पाया जाता है। जौ में इस शर्करा की प्रचुरता होती है। इसे माल्ट शर्करा या जौ शर्करा भी कहा जाता है।

3. पाली सैकराइड ( Poly saikeride )

  • ग्लूकोज में बहुत से अणु मिलकर जटिल शर्करा का निर्माण करते हैं। यह जल में घुलनशील नहीं होते है। जैसे-सेलुलोज, ग्लाइकोजिन, स्टार्च
  • सेलुलोज एक जटिल कार्बोहाइड्रेड है। पौधों की कोशिकाओं की दीवारें सेलूलोज की बनी होती है। जिसे कोशिका भित्ति कहा जाता है।
  • ग्लाइकोजिन भी जटिल शर्करा है। जंतुओं में (मनुष्य में) अतिरिक्त ग्लूकोज का संचय ग्लाइकोजेन के रूप में होता है। जो आवश्यकता अनुसार पुनः ग्लूकोज के रूप में परिवर्तित होकर ऊर्जा और ऊष्मा प्रदान करता है।

नोट

  • ग्लूकोज का संचय यकृत एवं हृदय में होता है ।
  • स्टार्च भी शर्करा है। पौधों में अतिरिक्त ग्लूकोज का संचय स्टार्च के रूप में होता है।

3. प्रोटीन ( Protein )

प्रोटीन शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग बर्जेलियस ने किया था। प्रोटीन में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन के साथ-साथ आयोडीन, आयरन तथा सल्फर जैसे सूक्ष्म तत्व उपस्थित होते हैं प्रोटीन की इकाई अमीनो एसिड कहलाती है। लगभग 20 अमीनो एसिड की श्रंखला प्रोटीन का निर्माण करती है।

हमारे शरीर को प्रोटीन निर्माण के लिए लगभग 20 प्रकार के अमीनो एसिड की आवश्यकता होती हैं। 20 अमीनो एसिड में से 10 अमीनो एसिड का निर्माण स्वयं शरीर में हो जाता है। जिसे अनावश्यक एसिड कहा जाता है। जबकि 10 अमीनो एसिड का निर्माण हम अपने भोजन जैसे सोयाबीन, दाल, मांस, मछली, अंडा से प्राप्त करते हैं।

प्रोटीन हमारी ऊर्जा का अच्छा स्रोत नहीं है। फिर भी हमें 1 Gm से 4 k.cal ऊर्जा प्राप्त होती है। एक स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 60 से 70 Gm प्रोटीन की आवश्यकता होती है। जबकि किशोरावस्था के दौरान जिसमें शरीर का तेजी से विकास होता है। यह आवश्यकता प्रतिदिन लगभग 90 से 100 Gm होती है।

प्रोटीन में नाइट्रोजन उपस्थित होता है। जो अंतिम रूप से पचने के बाद यकृत द्वारा इसे नाइट्रोजनी अवशिष्ट पदार्थ को मुख्य रूप से यूरिया में परिवर्तित कर दिया जाता है। अर्थात यूरिया का निर्माण यकृत में होता है जो जल में घुलनशील होने के कारण रुधिर में घुल जाती है। इसकी अधिक मात्रा हानिकारक है इसीलिए इसे शरीर से निकालने के लिए वृक्क जैसी जटिल संरचना की आवश्यकता होती है।

वृक्क का निमार्ण नेफ्रॉन नामक कोशिकाओं से मिलकर होता है..अर्थात यह वृक्क कोशिकाओं की इकाई है। यह छानने वाली कोशिकाएं होती है। जो जल में घुलनशील नहीं होने के कारण जोड़ो में संचित होने लगती है। जिससे व्यक्ति गठिया या अर्थराइटिस का शिकार हो जाता है। वृक्क के खराब हो जाने पर कृत्रिम वृक्क भी प्रयोग में लाया जाता है। जिसे डायलिसिस कहते हैं।

प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग ( Protein deficiency diseases )

क्वाशियोर्कर- इसमें बच्चों का विकास रुक जाता है। प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाता है। बालों का रंग हल्का हो जाता है। पेट बाहर की ओर निकल जाता है।

मरास्मस- इसका सबसे अधिक प्रभाव हड्डियों पर पड़ता है। कंधे की हड्डियां भीतर की ओर धस जाती है। सीना पिजड़े का आकार ले लेता हैं।

प्रोटीन की कार्य ( Protein work )

  • प्रोटीन का मुख्य कार्य नये उत्तकों का निर्माण करना।
  • शरीर की वृद्धि एवं विकास में सहायता करना, टूटे फूटे भागों की मरम्मत करना। इसे बॉडी बिल्डिंग भी कहा जाता है।
  • एंजाइम का निमार्ण करना।
  • सभी एंजाइम प्रोटीन होते हैं लेकिन सभी प्रोटीन एंजाइम नहीं होते।

3. वसा ( Fat )

वसा का निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के अणुओं के मिलने से होता है। इसकी इकाई Fatty acid & Glycerol कहलाती है।Fatty acid के तीन अणु तथा glycerol के एक अणु मिलकर Triglyceroil नामक सरल वसा का निर्माण करते हैं। हमारे शरीर में अधिकतर वसा का संचय इसी रूप में होता है। आवश्यकता अनुसार हमें ऊर्जा तथा ऊष्मा प्रदान करता है। इसका संचय एडीपोस ऊत्तकों में होता है।

सरल वसा के जल अपघटन से व्युत्पन्न वसा का निर्माण होता है। जिसके परिणामस्वरुप कोलेस्ट्रोल का निर्माण बढ़ जाता है। जो रुधिर वाहिनियों में एकत्रित होकर उनमें कड़ापन उत्पन्न कर देते हैं। जिससे रूधिर परिसंचरण तंत्र प्रभावित होता हैं। इसे Athrecoselerosis रोग या धमनियों की कठोरता कहते हैं।

4. विटामिन ( Vitamins )

1881 में लूनिन ने इसकी खोज की तथा 1911 में फंक इसका नामकरण किया। हॉपकिंस ने इसकी संरचना एवं गुणों का वर्णन किया विटामिन जटिल कार्बनिक यौगिक है इसकी अल्प मात्रा ही विभिन्न उपापचय क्रियाओं को सामान्य रुप से चलाने के लिए काफी है। विटामिन ऊर्जा प्रदान नहीं करता, बल्कि सभी ऊर्जा संबंधी रासायनिक क्रियाओं का नियंत्रण करता है।  विटामिन प्राप्ति का एकमात्र स्रोत भोजन ही है। इसे वृद्धि तत्व कहते हैं।

इसका निर्माण शरीर नहीं करता है। लेकिन विटामिन डी अकेला ऐसा विटामिन है। जिसका निर्माण सूर्य के प्रकाश में उपस्थित अल्ट्रावॉयलेट की सहायता से शरीर स्वयं कर लेता है। विटामिन डी खनिज लवण (कैल्शियम एवं फाॅस्फोरस) के अवशोषण के लिए आँतों को अवशोषित करता है। जिससे हड्डियां एवं दांतों को मजबूती प्राप्त होती हैं। अतः विटामिन डी को हार्मोन भी कहा जाता है।

घुलनशीलता के आधार पर विटामिन दो प्रकार के होते हैं।

1.. जल में घुलनशील विटामिन ( विटामिन B, C )- जल में घुलनशील विटामिन शरीर में संचित नहीं होते। यह घुलने से नष्ट हो जाते हैं। इसका उत्सर्जन मूत्र के साथ भी होता है।

2.. वसा में घुलनशील विटामिन ( विटामिन A, D, E, K )- वसा में घुलनशील विटामिन का संचय शरीर में होता है यह आसानी से नष्ट नहीं होते हैं।

विटामिन A ( Vitamin A )

  • रासायनिक नाम: रेटिनाॅल
    कमी से रोग: रतौंधी,जीरोप्थैलमिया
  • स्रोत (Source): गाजर, दूध, फल।

विटामिन B1 ( Vitamin B1 )

  • रासायनिक नाम: थायमिन
  • कमी से रोग: बेरी-बेरी
  • स्त्रोत: मुंगफली, आलू, सब्जीयाँ

विटामिन B2 ( Vitamin B2 )

  • रासायनिक नाम: राइबोफ्लेबिन
  • कमी से रोग: त्वचा फटना, आँख का रोग
  • स्रोत (Source): दूध, हरी सब्जियाँ

विटामिन B3 ( Vitamin B3 )

  • रासायनिक नाम: पैण्टोथेनिक अम्ल
  • कमी से रोग: पेलाग्रा रोग,पैरों में जलन, बाल सफेद
  • स्रोत (Source): दूध, टमाटर, मूंगफली

विटामिन B5 ( Vitamin B5 )

  • रासायनिक नाम: निकोटिनैमाइड (नियासिन)
  • कमी से रोग: स्थेरसिया
  • स्रोत (Source): मूंगफली, आलू

विटामिन B6 ( Vitamin B6 )

  • रासायनिक नाम: पाइरीडाॅक्सिन
  • कमी से रोग: एनीमिया, त्वचा रोग
  • स्रोत (Source): दूध, सब्जी

विटामिन B7 ( Vitamin B7 )

  • रासायनिक नाम: बायोटिन
  • कमी से रोग: लकवा,शरीर में दर्द, बालों का गिरना , चर्म रोग
  • स्रोत (Source): गेहूँ,

विटामिन B12 ( Vitamin B12 )

  • रासायनिक नाम: सायनोकाबालामिन
  • कमी से रोग: एनीमिया, पाण्डू रोग
  • स्रोत (Source): कजेली, दूध

विटामिन C ( Vitamin c )

  • रासायनिक नाम: एस्कार्बिक एसिड
  • कमी से रोग: स्कर्वी, मसूड़ों का फूलना
  • स्रोत (Source): आँवला, नींबू, संतरा, नारंगी

विटामिन D ( Vitamin D )

  • रासायनिक नाम: कैल्सिफेराॅल
  • कमी से रोग: रिकेट्स,आॅस्टियोमलेशिया
  • स्रोत (Source): सूर्य का प्रकाश, दूध,

विटामिन E ( Vitamin E )

  • रासायनिक नाम: टेकोफेराॅल
  • कमी से रोग: जनन शक्ति का कम होना
  • स्रोत (Source): गेहूँ, हरी सब्जी, मक्खन, दूध

विटामिन K ( Vitamin K )

  • रासायनिक नाम: फिलोक्वीनाॅन
  • कमी से रोग: रक्त का थक्का न बनना
  • स्रोत (Source): टमाटर, हरी सब्जियाँ, दूध

5. खनिज लवण ( Mineral salts )

धातु, अधातु एवं उनके लवण खनिज लवण कहलाते हैं हमारे शरीर का लगभग 6.1% भाग बनाते हैं यह दो प्रकार के होते हैं

1.वृहत पोषक ( Big nutritious )- इन तत्वों की शरीर को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, गंधक सोडियम, क्लोरीन, मैग्नीशियम
2. सूक्ष्म मात्रिक- इन तत्वों के शरीर को बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है आयोडीन, लोहा, कोबाल्ट, फ्लोरीन मोलिब्डेनम, सोलीनियम
लौह तत्व की कमी से एनीमिया हो जाता है

कैल्शियम और फास्फोरस की कमी से टिटेनी रिकेट्स रोग हो जाते हैं आयोडीन की कमी से घेंघा रोग हो जाता है यह भोजन के अकार्बनिक घटक होते हैं। जो शरीर की उपापचयिय क्रियाओं का नियंत्रण करते हैं। यह शरीर में तत्वों के रुप में न ग्रहण कर यौगिक के रूप में गोहण किए जाते है ।

1. कैल्शियम ( Calcium )

इसका कार्य शरीर का कंकाल बनाना, रक्त का थक्का जमाना, तंत्रिकाओं को उत्तेजित करना आदि है। हड्डियां एवं दांत मुख्यतया कैल्शियम और फास्फेट (कैल्शियम फास्फेट) के बने होते हैं। दूध, अंडा, संतरा और गाजर में कैल्शियम पाया जाता हैं। इसकी कमी से कंकाल का विकास ठीक से नहीं हो पाता है। कैल्शियम की कमी से Osteoporosis रोग हड्डियों में हो जाता है। हड्डियां छिद्रित हो जाती हैं। इसकी कमी से टिटेनी व रिकेट्स रोग हो जाते हैं

2. फाॅस्फोरस ( Phosphorus )

औषधि एवं दांत निर्माण हेतु आवश्यक होता है यह फो्स्पोलिपिड, न्यूक्लिक अम्ल डीएनए एवं RNA और ATP आदि का अवयव है इसका कार्य कंकाल को बनाने ,रक्त एवं दांतों के निर्माण में भाग लेना है। यह वसा उपापचय का नियंत्रण करते हैं। यह न्यूक्लिक अम्ल और प्रोटीन के निर्माण में भाग लेता है। यह दूध, अंडा, मछली, सब्जी और अनाज आदि में पाया जाता है। इसकी कमी से दांत के मसूड़े कमजोर हो जाते हैं। तथा हड्डियां लचीली हो जाती है।

3. पौटेशियम ( Potassium )

पोटेशियम क्लोराइड के रूप में पाया जाता है यह शरीर में आयनों एवं जल के स्तर को नियंत्रित करता है यह पेशी संकुचन एवं तंत्रिका संवेदनाओं के परिवहन में मुख्य भूमिका अदा करता है शरीर में परासरण दाब को नियंत्रित करता है। यह सभी प्रकार की सब्जियों में पाया जाता है। इसकी कमी से मस्तिष्क का संतुलन खराब हो जाता है। और हृदय भी ठीक से काम नहीं कर पाता है। पोटेशियम की कमी से “हाइपोकैलेमिया” रोग हो जाता है। यह हृदय धड़कन को नियंत्रित करता है।

4. लोहा ( Iron )

यह रक्त में हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है। हिमोग्लोबिन लाल रंग का रुधिर में पाया जाने वाला श्वसनी वर्णक है  इसकी कमी से एनीमिया रोग हो जाता है। यह यकृत, वृक्क, अंडा और दूध, बाजरा, रागी,  पालक, केला आदि में मुख्यतया पाया जाता है। लोहा मुख्यतया आरबीसी कणिकाओं का निर्माण करता है। रक्त का लाल रंग हीमोग्लोबिन अथवा आयरन/लोहा के कारण होता है।

5. सोडियम ( Sodium )

Nacl के रूप में पाया जाता है शरीर के परासरण दाब को नियंत्रित करता है ये आमाशय में HCL निर्माण में सहायक है यह पेशी संकुचन से संबंधित है यह शरीर में जल नियंत्रण का कार्य करता है। इसकी कमी से शरीर में जल की कमी हो जाती है। यह नमक में पर्याप्त मात्रा में मिलता है। इसकी कमी से जल निर्जलीकरण (Dehydration) हो जाता है। सोडियम की कमी से हाइपोनेट्रेमिया रोग हो जाता है।

6. ताँबा ( Copper )

यह “हीमोसाइनीन” मनुष्य में पाया जाने वाला एक प्रकार का रक्त) का घटक होता है। यह रक्त निर्माण एवं एंजाइम निर्माण में भाग लेता है।इसकी कमी से शरीर का संतुलन खराब हो जाता है।

7. क्लोरीन ( Chlorine )

यह शरीर में अम्ल,क्षार तथा जल के संतुलन को नियंत्रित करता है। इसका प्रमुख स्रोत नमक है।

8. कोबाल्ट ( Cobalt )

यह विटामिन बी 12 का प्रमुख घटक हैं। यह रक्त के निमार्ण में भाग लेता हैं। इसकी कमी से एनीमिया रोग हो जाता है।

9. आयोडीन ( Iodine )

थायरोक्सिन निर्माण हेतु आवश्यक है थायरोक्सिन शारीरिक मानसिक एवं लैंगिक विकास को नियंत्रित करता है हमारे शरीर हेतु आयोजन के स्त्रोत पानी, प्याज, समुद्री मछली, समुद्री भोजन, आदि है  आयोडीन युक्त नमक में पोटेशियम आयोडाइड होता है आयोडीन की कमी से घेंघा नामक रोग हो जाता है 

जल ( Water )

यह जीवद्रव्य का प्रमुख घटक है। मानव शरीर के भार का 65-75% भाग जल होता है। सामान्यतः वयस्क व्यक्ति को औसतन 4-5 Lit/day पानी पीना चाहिए जब शरीर में भोज्य पदार्थों एवं खनिज लवणों के संहवन के लिए माध्यम प्रदान करता है। यह शरीर के ताप का नियंत्रण करता है। यह उत्सर्जी पदार्थों को उनके निर्माण स्थल से उत्सर्जी अंगों में पहुंचाने का कार्य करता है।

जल की मात्रा मूत्र में 95%,रक्त प्लाज्मा में 12% रक्त 83% प्रतिशत वृक्क में 80%, मांसपेशियों में 76% हड्डियों में 22% होती हैं। यदि हमारे शरीर में लगभग 12% निर्जलीकरण हो जाए तो घातक सीमा प्रारंभ होती है। जिसकी अधिकतम सीमा 15% होती है।

कार्य के आधार पर इन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया गया है

  1. शरीर निर्माणकारी उदाहरण ~ प्रोटीन
  2. ऊर्जा-उत्पादक उदाहरण ~ कार्बोहाइड्रेट तथा वसा
  3. शरीर-नियंत्रक (उपापचयी नियंत्रक) ~ उदाहरण खनिज लवण तथा विटामिन

आवश्यकता के आधार पर पोषक तत्व

  1. वह्र्द पोषक तत्व
  2. सूक्ष्म पोषक तत्व

टीटनी – इस रोग मैं मासपेशियों के अन्दर खिंचाव आ जाता है विटामिन – डी सर्वाधिक मात्रा में सूर्य के प्रकाश से प्राप्त होता हैं
सूर्य का विटामिन या धूप का विटामिन (RP- 2012) भी कहा जाता हैं!

 

Quiz 

Questions- 22

There is no question

Specially thanks to Quiz and Post makers ( With Regards )

दिनेश कुमार मीना टोंक, निर्मला कुमारी, चित्रकूट त्रिपाठी, शाहीन कोटा, P k nagauri, जेठाराम लोहिया जोधपुर