Bikaner Rathore Dynasty ( बीकानेर का राठौड वंश )

राठौडों के प्रभुत्व में आने से पूर्व बीकानेर का क्षेत्र जांगल प्रदेश के नाम से जाना जाता था जो मारवड़ के उत्तर में स्थित है। महाभारत काल में यह प्रदेश कुरू प्रदेश के अन्तर्गत आता था। मारवाड़ के शासक राव जोधा के छः रानियां व 17 पुत्र थे। जिसमें दूसरे पुत्र बीका ने 1465 में जांगल प्रदेश में राठौड़ वंश की रियासत की स्थापना की तथा 1488 में बीकानेर नगर बसाया।

अतः राव बीका को बीकानेर राज्य का संस्थापक माना जाता है। राव जोधा का सबसे बड़ा पुत्र राव नीबा, राव जोधा के शासन काल में ही स्वर्गवासी हो गया था। दूसरा पुत्र राव बीका ही मारवाड़ का उत्तराधिकारी था लेकिन राव जोधा ने अपनी प्रिय पत्नी/रानी जसमादे के प्रभाव में आकर दूसरे पुत्र राव सातल को जोधपुर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

बीका नाराज हो गया। 1465-66 में करणी माता के आशीर्वाद से राव बीका ने जांगल प्रदेश पर अधिकार कर लिया। बीका के बढ़ते प्रभाव को देखकर राव जोधा घबरा गया व उसको डर था कि कही बीका जोधपुर पर आक्रमण न कर दे किन्तु बीका ने अपने पिता को वचन दिया कि मैं जोधपुर पर कभी आक्रमण नहीं करूगा व जोधपुर रियासत को अपना ज्येष्ठ मानुगा।

1.राव बीका (1465-1504):-

राव जोधा के पुत्र राव बीका ने 1465 ई. में जांगल प्रदेश जीतकर बीकानेर के राठौड़ राजवंश की स्थापना की |  एक मान्यता के अनुसार जांगल परदेश को राव बिका और जाट नेता नरा ने मिलकर जीता, दोनों के नाम पर इसका नाम बीकानेर रखा ।

इस अभियान में राव बिका को करणी देवी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ जिससे बिका ने अनेक छोटे बड़े कबीलो को जित लिया। इस प्रकार बीकानेर में राठौड़ वंश की स्थापना हुयी।

बीकानेर की स्थापना-1488 ई. में इन्होंने बीकानेर शहर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया जो द्वितीय राठौड़ सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया । उसकी मृत्यु होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र नरा बीकानेर माँ स्वामी बना।

इसके पश्चात बिका के दो पुत्र नारा और लूणकरण थे जो बीकानेर के स्वामी बने इन्होंने जैसलमेर पर भी अपना अधिकार जमा लिया

2. राव लूणकरण

नर का देहांत 13 जनवरी 1505 को हो गया। नर के निःसंतान होने से उसका छोटा भाई लूणकरण बीकानेर का शासक बना। राव लूणकरण पिता की भांति साहसी और वीर योद्धा था। उसकी शक्ति का लोहा रुद्रेवा,चायलवाडा आदी स्थानों के सरदार मानते थे, जिनका उसने निजी भुजबल से दमन किया व बड़ा दानी था।

करमचंदवशोकिर्तनम काव्य में उसकी दानशीलता कर्ण से की गई है,  बिठू सुजा ने अपने जैतसी रो छंद में कलयुग का कर्ण कहां है

1526 में धोसा नामक स्थान पर इसकी मृत्यु हो गई थी

3. राव जैतसी (1526-1542 ई.):- 

बीकानेर राज्य का प्रतापी शासक एवं राव लूणकरण का पुत्र था इनके समय कामरान ने भटनेर पर आक्रमण किया उस पर अधिकार कर लिया 1534 में राव जैतसी में मुगल सेना पर आक्रमण कर भटनेर को मुगलों से छुड़ा लिया

इस युद्ध का वर्णन बिट्ट सुजा द्वारा लिखित राव जैतसी रो छंद में मिलती है खानवा के युद्ध में राव जैतसी अपने कुंवर कल्याण को सांगा की सहायता के लिए भेजा था

पहोबा/साहेबा- बीकानेर शासक राव जैतसी में मारवाड़ के शासक मालदेव के बीच युद्ध हुआ इस युद्ध में राव जैतसी मारा गया था बीकानेर राज्य की पराजय हुई मालदेव ने बीकानेर का व्यवस्थापक कुंपा को नियुक्त किया था

4.राव कल्याणमल(1544-1574) 

1544 में कल्याणमल बीकानेर का राजा बना

राव जैतसी के पुत्र जिन्होंने गिरिसुमेल के युद्ध मे शेरशाह सूरी की सहायता की थी । इस युद्ध के बाद शेरशाह ने बीकानेर राज्य का शासन राव कल्याणमल को सौंपा।

बीकानेर के पहले शासक जिन्होंने 1570 ई. के अकबर के नागौर दरबार मे अकबर की अधीनता स्वीकार की और वैवाहिक संबंध स्थापित किए तथा अपने छोटे पुत्र पृथ्वीराज को , जो उच्च कोटि का कवि और विष्णु भक्त था, अकबर की सेवा में भेजा । इन्ही पृथ्वीराज ने ‘वेलि किसन रुक्मणी री’ की रचना की

अकबर ने 1572 में कल्याणमल के पुत्र रायसिंह को जोधपुर का शासक नियुक्त किया

5. महाराजा रायसिंह(1574-1612)

जन्म : 20 जुलाई 1541 ,  पिता : राव कल्याणमल

उपाधि – राजपूताने का कर्ण महाराजा

नागौर दरबार के बाद 1572 ई. में अकबर ने इन्हें जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया | मुगलो के साथ घनिष्ठ संबंध | हिन्दू नरेशो में जयपुर के बाद बीकानेर से ही अकबर के अच्छे संबंध कायम हुए थे ।

महाराजा रायसिंह ने 1573 में गुजरात के मिर्जा बंधुओं का दमन किया,  1574 में मारवाड़ के चंद्रसेन व देवड़ा सुरताण का दमन किया

1591 में खानेखाना की सहायता के लिए कंधार गया था, 1593 रायसिंह थट्टा अभियान के लिए दानियाल का दमन करने गए, अकबर ने 1593 में जूनागढ़ तथा 1604 में शमशाबाद तथा नूरपुर की जागीर दी, जहांगीर ने रायसिंह का मनसब 5000 जात व 5000 सवार कर दिया

1594 ई. में मंत्री कर्मचंद की देखरेख में बीकानेर किले (जूनागढ़) का निर्माण कराया जिसमे ‘रायसिंह प्रशस्ति’ उत्कीर्ण करवाई | महाराजा रायसिंह को मुंशी देवीप्रसाद द्वारा ‘राजपूताने का कर्ण’ की उपमा दी गयी

‘रायसिंह महोत्सव’ व ‘ज्योतिष रत्नमाला’ की भाषा टीका : महाराजा रायसिंह द्वारा लिखित रचनाएँ |  ‘कर्मचन्द्रों कीर्तनकम काव्यम’ इस ग्रन्थ में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है तथा लिखा है कि वह विजित शत्रुओं के साथ भी बड़े सम्मान का व्यवहार करते थे |

महाराजा रायसिंह की मृत्यु सन 1612 ई. में बुरहानपुर में हुई |

6. दाव दलपत (1612-13)

महाराजा रायसिंह की मृत्यु के बाद दलपत सिह बीकानेर का शासक बना। राव दलपत का सम्राट जहांगीर से मनमुटाव हो गया। जहांगीर ने दलपत को गद्दी से हटाकर उसके भाई सूरसिह को शासक बना दिया।

7. महाराजा कर्ण सिंह (1631-1669)

पिता सुरसिंह के देहावसान के बाद ये सन 1631 में बीकानेर के सिंहासन पर बैठे । ये  बीकानेर के प्रतापी शासक थे मुगल शासक औरंगजेब ने इन्हें जांगलधर बादशाह की उपाधि दी |

मुगल शहजादों मे उतराधिकार संघर्ष के समय कर्णसिहं तटस्थ रहे। लेकिन उन्होंने अपने दो पुत्रों- पद्मसिंह और केसरीसिंह को औरंगजेब की ओर से भेजा ।

मतीरे की राड़ – 1644 में कर्ण सिंह और अमर सिंह के बीच हुई थी जिसमें अमर सिंह विजय रहे । 17 वी शाताब्दी में बीकानेर शासक कर्ण सिंह ने बीकानेर से 25km दूर देशनोक में करणी माता का मंदिर बनाया था ।

कर्णसिंह के काल की रचनाओं मे साहित्य कल्पद्दुम व कर्णभूषण (गंगा नंद मैथिली द्वारा रचित) प्रमुख हैं।

बीकानेर के राठौड़ो की कुलदेवी- करणी माता

8. महाराजा अनूप सिंह –

  • औरंगजेब द्वारा ‘माही मरातिव’ और महाराजा की उपाधि
  •  बीकानेरी चित्रकारी का स्वर्ण युग, उस्ता कला को लाहौर से बीकानेर लाने का श्रेय
  • अनूप संग्रहालय का निर्माण
  • 33 करोड़ देवी देवताओं के मंदिर की संज्ञा वाले बीकानेर के हेरम्भ गणपति मंदिर का निर्माण का श्रेय

9. सूरत सिंह राठौड

हनुमानगढ़ को पहले भटनेर (भट्टी राजपूतों का दुर्ग) कहा जाता था। 1805 ई. में बीकानेर रियासत में शामिल किये जाने के बाद इसको ‘हनुमानगढ़’ का नाम दिया गया था। सूरत सिंह के समय 1805 ई. में 5 माह के विकट घेरे के बाद राठौड़ों ने इसे ज़ाबता ख़ाँ भट्टी से छीना

यहाँ बीकानेर राज्य का एकाधिकार हुआ। मंगलवार के दिन इस क़िले पर अधिकार होने के कारण इस क़िले में एक छोटा सा हनुमान जी का मंदिर बनवाया गया तथा उसी दिन से उसका नाम ‘हनुमानगढ़’ रखा गया।

गंगानगर के सूरतगढ़ शहर तथा बीकानेर के सूरसागर झील के निर्माण का श्रेय

सूरत सिंह ने 1818 ई. में अंग्रेज़ ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सन्धि कर ली थी।

10. महाराजा सरदार सिंह –

क्रांति के समय न केवल बीकानेर के महाराजा बल्कि अंग्रेजो की सहायता हेतु बाडलू गाँव (हिस्सार) तक जाने वाले एकमात्र राजस्थानी शासक 

11. महाराजा गंगा सिंह –

  • प. नेहरू द्वारा राजस्थान के भागीरथ की संज्ञा
  • आधुनिक बीकानेर के निर्माता
  • अंग्रेजो द्वारा ‘केसर ऐ हिन्द’ की उपाधि
  • ऊँटो की सैन्य टुकड़ी – गंगा रिसाला
  • 1899 में चीन के साथ अफीम युद्ध में तथा 1900 में दक्षिण अफ्रीका में डचों के विरुद्ध बोआर के युद्ध में अंग्रेजो के साथ
  • 26 अक्टूम्बर 1927 में राजस्थान की प्रथम गंगनहर सिंचाई परियोजना का लोकार्पण
  • लन्दन में आयोजित तीनो गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने का श्रेय
  • आधुनिक गंगानगर शहर का निर्माण
  • 1922 से 1928 तक b.h.u. के कुलपति

12. महाराजा सार्दुल सिंह

आजादी एंव एकीकरण के समय बीकानेर के महाराजा

 

दयालदास की बीकानेर राठौड़ों विख्यात में जोधपुर बीकानेर के राठौड़ वंश का वर्णन मिलता है

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ममता जी शर्मा, प्रियंका गर्ग, P K Nagauri, प्रभुदयाल मूण्ड चूरु, गजे सिंह पाली, दिनेश कुमार जांगिड़
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