भारतीय संविधान सभा का निर्माण- संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व एच .सी.मुखर्जी को संविधान सभा के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के रूप में 11 दिसम्बर 1946 को निर्वाचित किया गया। बी.एन. राव को संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किए गए।

भारत के विभाजन के बाद सविंधान सभा की पुनः बैठक 14 अगस्त 1947 को हुयी। संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव कैबिनेट ।मिशन के प्रस्ताव के अनुसार ही हुआ। लेकिन सदस्य संख्या मे परिवर्तन हो गया। राज्य व देशी रियासतों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटे प्रदान की गई। यह अनुपात 10 लाख लोगों पर एक सदस्य का निर्वाचन किया गया।अतः विभाजन के पश्चात संविधान सभा के सदस्य 299 हो गये।
अम्बेडकर बंगाल से चुने गए।

26 नवंबर 1949 को जब सभा ने संविधान निर्माण का कार्य पूरा किया, तब उस पर अध्यक्ष सहित 284 सदस्यों के हस्ताक्षर थे।

26 जनवरी 1950 से भारतीय संविधान लागू किया गया परन्तु उसके कुछ प्रवधान , 26 नवम्बर 1949 से लागु हो गए थे। जैसे-नागरिकता ,चुनाव, अस्थायी संसद व संक्रमणकालीन प्रवधान शामिल थे।

नवम्बर 1949 को निर्मीत संविधान में 395 अनुच्छेद व 8 अनुसूचियां थी। ऐसे पूरा करने में 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन लगे थे। संविधान निर्माण होने तक भारत मे एक अंतरिम सरकार कार्य कर रही थी व तकनीकी रूप में वे सभी सदस्य वायसराय को सलाह देने के लिए नियुक्त किये गए थे।

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज 26 नवंबर 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

संविधान का दार्शनिक आधार- प्रस्तावना

प्रस्तावना के चार तत्व हैं–

  • 1. संविधान की शक्ति का स्रोत- जनता
  • 2. संविधान की प्रकृति- संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य
  • 3. संविधान के उद्देश्य / आदर्श स्वतंत्रता समानता और बंधुता
  • 4. अंगीकृत होने की तिथि 26 नवंबर 1949

नोट –

भारतीय संविधान में न्याय के तीन प्रकार हैं – सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय (यह रूस की क्रांति 1917 की देन है।)

  •  पंथनिरपेक्ष शब्द की उत्पत्ति फ्रांस की क्रांति (1789) की देन है।
  • अर्नेस्ट बार्कर ने बंधुता को “सहकारिता का सिद्धांत” कहा है।
  • डॉ. एन. के. पालकीवाला ने संविधान की प्रस्तावना को “संविधान का परिचय पत्र” कहा है।
  • डॉ. के. एम. मुंशी ने प्रस्तावना को “भारतीय संविधान की आत्मा, आभूषण और कुंजी” कहा है।
  • अर्नेस्ट बार्कर ने प्रस्तावना को “कुंजी नोट” कहकर संबोधित किया है।
  • कृष्णास्वामी अय्यर ने प्रस्तावना के लिए कहा है कि “यह हमारे दीर्घकालीन सपनों का विचार है।”
  • एम. हिदायतुल्ला ने प्रस्तावना को ” मूल आत्मा की संज्ञा” दी है।
  •  के. एम. मुंशी ने प्रस्तावना को “संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य का भविष्यफल” कहकर संबोधित किया है।
  • केशवानंद बनाम केरल राज्य वाद 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि प्रस्तावना भारतीय संविधान का अंग है। अतः इसमें संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संविधान के मूल ढांचे में संशोधन या परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।
  • 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में एक बार संशोधन किया गया है जिसके तहत प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, और अखंडता ( 3 जनवरी 1977 को अंत स्थापित किया गया)
  • संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न – आयरलैंड से लिया गया है।
  • बेरुबाड़ी संघवाद 1960 में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना के लिए कहा है कि “यह संविधान सभा के सदस्यों की मन की आवाज है।”

प्रस्तावना का महत्व 

भारतीय संविधान का प्रस्तावना भाग भारत के संविधान की रीढ़ के रूप में माना जाता है क्योंकि इसमें इसमें मूलभूत विशेषताएं हैं भारतीय संविधान की प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू  द्वारा तैयार किए गए “उद्देश्य संकल्प” पर आधारित है और संविधान के निर्माताओं द्वारा अपनाया गया है। प्रस्तावना का महत्व उसके घटकों में है।

यह संविधान के स्रोत का प्रतीक है, अर्थात भारत के लोग। प्रस्तावना में निर्माताओं की प्रकृति का सुझाव देते हैं  न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व  के आदर्शों से संविधान के उद्देश्यों को दर्शाया गया है।  इसमें 26 नवंबर, 1949 को भारतीय संविधान को अपनाने की तारीख भी शामिल है।

भारतीय संविधान के दर्शन प्रस्तावना में परिलक्षित होता है। स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के माध्यम से अर्जित भारत की स्वतंत्रता को प्रस्तावना में ‘संप्रभु’ शब्द के उपयोग पर बल दिया जाना चाहिए।  42 वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द को शामिल करने के लिए गांधीवादी आदर्शों का लक्ष्य रखा गया है।

भारतीय समाज की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को प्रतिबिंबित करने के लिए इसी संशोधन में ‘सेक्युलर (Secular)’ शब्द शामिल किया गया है। प्रख्यात शब्द ‘गणतंत्र (Republic)’ में यह संकेत मिलता है कि भारत का निर्वाचित अध्यक्ष है, हालांकि अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए, भारतीय राष्ट्रपति भारत के लोगों का विकल्प हैं।

इन मूल्यों को प्रस्तावना में ‘लोकतांत्रिक ’ शब्द से और मजबूत किया गया है। इन मूल्यों पर जोर देने के लिए संविधान के निर्माताओं ने न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसी अवधारणाओं के उपयोग पर विचार किया है।

मूलभूत अधिकारों के प्रावधानों के जरिए सुरक्षित होने के लिए न्याय-सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पर जोर।राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत मौलिक अधिकारों के प्रावधान के माध्यम से लोगों को स्वतंत्रता की गारंटी दी जाती है, जो कि अदालत में लागू होते हैं।

प्रस्तावना सभी नागरिकों को राज्यों की समानता और नागरिक, राजनीतिक में अवसरों को सुरक्षित करता है राष्ट्र की एकता और अखंडता प्रस्तावना में ‘भाईचारे/बंधुत्व‘ शब्द के उपयोग और संविधान में मूलभूत कर्तव्यों और एकल नागरिकता के प्रावधानों द्वारा सुरक्षित करने के लिए मांगी गई है।

प्रस्तावना में इन शब्दों के प्रयोग से पता चलता है, यह बुनियादी दर्शन और मौलिक मूल्यों पर आधारित है, जिस पर संविधान आधारित है।

Political science Books and writers

  • M.oakeshott- Introduction to Hobbes 1946
  • Christopher Norris –deconstruction : Theory and practice 1982
  • Jayaprakash narayan- Towards total revolution 1978
  • B.R.Nanda- The Nehru’s:motilal and jawaharlal 1962
  • c.w.mills- The power Elite 1956
  • kate millett- sexual politics 1970
  • David Miller and Micheal walzer- pluralism, justice and equality 1995
  • David miller- the Blackwell encyclopedia of political thought 1987

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B.s.meena Alwar, लोकेश स्वामी, मुकेश पारीक ओसियाँ, पूनम जी छिंपा हनुमानगढ़,  ज्योति प्रजापति चितोड़गढ

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