( सल्तनत काल- प्रशासनिक & सांस्कृतिक )

सामाजिक जीवन ( Social life )

समाज का सबसे सम्मानित वर्ग विदेशी मुसलमानों का था, जो हिन्दू से मुस्लमान बने थे उनका बाद में था। स्त्रियों का अपने पतियों अथवा अंत सम्बन्धियों पर निर्भर रहना हिन्दुओं या मुसलमानों दोनों के सामाजिक जीवन की विशेषता थी।

पर्दा प्रथा का प्रचलन बढ़ गया था। विवाह कम उम्र में होता था। उच्च वर्ग की स्त्रियों को शिक्षा का अवसर मिलता था।। राजपूतों की स्त्रियों में जौहर प्रथा का प्रचलन था।

इस काल में हिन्दू स्मृतिकारों ने ब्राह्मणों का समाज में ऊंचा स्थान जारी रखा। शूद्रों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। इस काल में शूद्रों का परम कर्तव्य था दूसरी जातियों की सेवा करना।

इस काल में दास प्रथा थी। अलाउद्दीन के पास पचास हजार दास थे जबकि फिरोज तुगलक के समय दासों की संख्या दो लाख तक पहुँच गयी।सल्तनत काल में मुस्लिम समाज नस्ल और जातिगत वर्गों में विभाजित रहा।

सास्कृतिक विकास ( Cultural development )

भारत में सांस्कृतिक विकास (13वीं से 15वीं शताब्दी) :- तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में दिल्ली सल्तनत का उदय देश के ‘सांस्कृतिक विकास’ के नये काल का सूत्रकाल माना जा सकता है। तुर्क आक्रमण कारियों को बर्बर नहीं कहा जा सकता है। वे लोग नवीं और दसवीं शताब्दी में मध्य एशिया से पश्चिम एशिया में गए थे।

उन्होंने वहाँ पहुँचकर उसी प्रकार इस्लाम स्वीकार कर लिया जिस प्रकार उस से पहले मध्य एशिया से आक्रमण करने वालों ने बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। वे भी उस क्षेत्र की संस्कृति में एकाकार हो गए।

अरबी-फ़ारसी संस्कृति-  उस समय मोरक्को और स्पेन से लेकर ईरान तक की मुस्लिम दुनिया में छाई अरबी-फ़ारसी संस्कृति अपने उत्कर्ष पर थी। इस क्षेत्र के निवासियों ने विज्ञान, साहित्य और स्थापत्य कला के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। जब तुर्कियों ने भारत पर आक्रमण किया, तब तक वे इस्लाम को पूरी तरह अपना चुके थे

स्थापत्य कला ( Architecture )

नये शासको की पहली ज़रूरत रहने के लिए मकानों और अपने अनुयायियों के लिए पूजा के स्थानों की थी। पूजा के स्थान उपलब्ध करने के लिए उन्होंने पहले से विद्यमान मन्दिरों और इमारतों को मस्जिदों में परिवर्तित किया

नई निर्माण-  शैली दिल्ली में इमारत के क्षेत्र में नया निर्माण ‘एक उपासना गृह’ (गर्भ-गृह) के सामने महीन और विस्तृत खुदाई से पूर्ण तीन महराबें थी। गर्भ-गृह को गिरा दिया गया। इसकी सजावट की शैली बहुत ही रुचिपूर्ण है

महराब तथा गुम्बद का प्रयोग:- महराब और गुम्बदों के इस्तेमाल के कई लाभ थे। गुम्बद भव्य आकाश-रेखाओं का निर्माण करते थे। फिर जैसे-जैसे स्थापत्य शिल्पी अनुभव प्राप्त करके आर्थिक आत्म-विश्वास प्राप्त करते गए वैसे-वैसे गुम्बदों की ऊँचाई बढ़ती गई।

प्रशासन व्यवस्था ( Administration system )

दिल्ली सल्तनत एक धर्म प्रधान राज्य था, जिसमें पुरे में मुस्लिम जगत सर्वोच्च था। सल्तनत शासन में उत्तराधिकार को कोई निश्चित सिद्धांत नहीं था। केन्द्रीय शासन का प्रधान सुल्तान था।

नाह राज्य का सर्वोच्च न्यायधीश, कानून का सूत्रधार और सेवाओं का प्रधान सेनापति था। सुल्तान के कार्यों में सहायता प्रदान करने के लिए मंत्रियों की व्यवस्था की, जो अपने-अपने विभागों के प्रभारी होते थे, किन्तु उनकी नीति सदैव सुल्तान द्वारा निर्धारित व शासित होती थी।

राजकीय शक्ति का व्यवहारिक नियंत्रण रखने हेतु केवन दो ही कारक थे- अमीर तथा उलेमा। अमीर वर्ग में विदेशी मूल के लोग थे, जो दो समूहों में बनते थे- तुर्कीदास और गैर तुर्की, जिन्हें ‘ताजिक’ कहा जाता था। इस्लामी धर्माचार्यों तथा शरीयत कानून के रुढ़िवादी व्याख्याकारों को उलेमा कहा जाता था।

बरनी के अनुसार सल्तनत के 4 स्तंभ दीवान-ए-विजारत, दीवान-ए-आरिज या अर्ज, दीवान-ए-मंशा और दीवान-ए-रसालत थे। सल्तनत का प्रधानमंत्री वजीर कहलाता था, उसके कार्यकाल को दीवान-ए-विजारत (राजस्व विभाग) कहा जाता था।

दीवान-ए-इंशा पत्र व्यवहार का शाही कार्यालय था, जिसका संचालन दबीर द्वारा किया जाता था। दीवान-ए-रसालत का प्रधान विदेश मंत्री था। इसका कार्य विदेशी वार्ता और कूटनीतिक संबंधों की देखभाल करना था। व प्रान्तों के गवर्नर या इकता के प्रधान को वाली, नाजिम, नायब, मुक्ति या इक्तादार कहा जाता था।

14वीं सदी में सल्तनत के विस्तार के कारण प्रान्तों को जिलों में बांट दिया गया था, जिन्हें ‘शिक’ कहा जाता था। शिक का प्रधान ‘शिकदार’ कहा जाता था। शिकों को परगने में बांटा गया था। प्रत्येक में आमिल एवं मुंसिफ नामक अधिकारी होते थे। आमिल मुख्य प्रशासनिक अधिकारी तथा मुंसिफ राजस्व विभाग का प्रधान होता था।

प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम के मुख्य अधिकारी थे- खुत, चौधरी, मुकद्दम और पटवारी।

न्याय और दण्ड व्यवस्था ( Justice and punishments )

सल्तनत काल में सुल्तान राज्य का सर्वोच्च न्यायधीश होता था। जिसका निर्णय अंतिम होता था। वह धार्मिक मामलों में सद-उस-सुदूर से सलाह लेता था।

इस समय न्याय इस्लामी क़ानून शरीयत, क़ुरान एवं हदीस पर आधारित था। मुस्लिम क़ानून के चार महत्त्वपूर्ण स्रोत थे-

  1. क़ुरान – मुसलमानोंका पवित्र ग्रन्थ एवं मुस्लिम क़ानून का मुख्य स्रोत।
  2. हदीस – पैगम्बर के कार्यों एवं कथनों का उल्लेख, क़ुरान द्वारा समस्या का समाधान न होने पर ‘हदीस’ का सहारा लिया जाता था।
  3. इजमा – ‘मुजतहिद’ व मुस्लिम विधि शास्त्रियों को मुस्लिम क़ानून की व्याख्या का अधिकार प्राप्त था।  इसके द्वारा व्याख्यायित क़ानून, जो अल्लाह की इच्छा माना जाता था, को‘इजमा’ कहा जाता था।
  4. कयास – तर्क के आधार पर विश्लेषित क़ानून को ‘कयास’ कहा जाता था।

सुल्तान काजियों और मुफ्तियों की सहायता से न्याय का कार्य देखता था। काजी एवं मुफ़्ती का पद वंशानुगत होता था। इस्लामी कानूनों की व्यवस्था करने वाले विधिवेत्ता ‘मुजतहिन्द’ कहे जाते थे।

फौजदारी कानून हिन्दू एवं मुसलमानों दोनों के लिए बराबर था। प्रान्तों के इक्तादार न्याय का कार्य संभालते थे।

क़ानून ( Law )

सुल्तान ‘सद्र-उस-सुदूर’, ‘क़ाज़ी-उल-कुजात’ आदि न्याय से संबंधित सर्वोच्च अधिकारी होता था। सुल्तान ‘दीवान-ए-कजा’ तथा ‘दीवान-ए-मजलिस’ भी न्याय का कार्य पूरा करता था

सल्तनत काल में मुख्यतः 4 प्रकार के क़ानून का प्रचलन था: –

  • सामान्य क़ानून :- व्यापार आदि से सम्बन्धित ये क़ानून मुस्लिम एवं ग़ैर मुस्लिम दोनों पर लागू होते थे। परन्तु सामान्यतः यह क़ानून केवल मुसलमान जनता पर लागू होता था।
  • देश का क़ानून :- मुस्लिम शासकों द्वारा शासित देश में प्रचलित स्थानीय नियम क़ानून।
  • फ़ौजदारी क़ानून: – यह क़ानून मुस्लिम एवं ग़ैर मुस्लिम दोनों पर समान रूप से लागू होता था।
  • ग़ैर मुस्लिमों का धार्मिक एवं व्यक्तिगत क़ानून :- हिन्दू जनता के सामाजिक मामलों में दिल्ली सल्तनतका अति सूक्ष्म हस्तक्षेप होता था।उनके मुक़दमों की सुनवाई पंचायतों में विद्वान,पुरोहित एवं ब्राह्मण किया करते थे।

मुस्लिम दण्ड विधि को ‘फ़िक़ह’ (इस्लामी धर्मशास्त्र) में बताये गये नियमों के अनुसार कठोरता से लागू किया जाता था।

वित्त विभाग ( Finance department )

सल्तनत कालीन वित्त व्यवस्था सुन्नीविधि-विशेषज्ञों की हनीफ़ी शाखा के वित्त सिद्धान्तों पर आधारित थी। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने ग़ज़नवी के पूर्वाधिकारियों से यह परम्परा ग्रहण की थी।

सल्तनत काल में भूमि चार भागों में विभक्त थी:-

  1. मदद-ए-माश- दान में दी गयी भूमि। इससे कोई राजस्व नहीं लिया जाता था।
  2. मुक्तियों या इक्तादारों को दी गयी भूमि- इसमें प्रत्येक इक्तादार अपना ख़र्च निकालकर अधिशेष शाही ख़ज़ाने में भेज देता था।
  3. अधीनस्थ हिन्दू राजाओं की अधीन भूमि- यहाँ से एक निश्चत धनराशि केन्द्र को भेजी जाती थी।
  4. खालसा भूमि- इसकी समस्त आय शाही कोष में सीधे जाती थी।

मुस्लिम विधिविज्ञों ने सल्तनत काल में वसूल किए जाने वाले करों को धार्मिक एवं धर्मनिरपेक्ष भागों में विभक्त किया। धार्मिक कर में ‘ज़कात’ एवं धर्मनिरपेक्ष कर में ‘जज़िया’, ‘ख़राज’ एवं ‘खुम्स’ आदि आते थे।

आर्थिक व्यवस्था ( Financial system )

आर्थिक दृष्टि से सल्तनत राज्य समृद्ध था। कृषि और व्यापार दोनों उन्नत अवस्था में थे। इस काल का मुख्य व्यवसाय बुनाई, रंगाई, धातु कार्य, चीनी व्यवसाय, कागज व्यवसाय आदि था।

विदेशों से वस्तुएँ मँगाई एवं भेजी जाती थीं। व्यापार जल एवं स्थल दोनों मार्गों से होता था।  इस समय भारत से विदेशों में भेजी जाने वाली महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ लोहा, हथियार, अनाज, सूतीवस्त्र, जड़ी-बूटी, मसाले, फल, शक्कर एवं नील आदि थीं। बाहर से आयात की जाने वाली महत्त्वपूर्ण वस्तुओं में घोड़े (अरब, तुर्किस्तान, रूस, ईरानी), अस्त्र-शास्त्र, दास, मेवे फल आदि शामिल थे

सल्तनत काल में पांच मुख्य कर थे-

  • 1. उश्र
  • 2. खराज
  • 3. खम्स
  • 4. जकात और
  • 5. जजिया।

उश्र मुसलमानों से लिया जाने वाला भूमि कर था, जो 5 से 10 प्रतिशत होता था। लूट, खानों अथवा भूमि में गड़े हुए खजानों से प्राप्त धन, जिसके 1/5 भाग पर राज्य का अधिकार होता था, खम्स कहा जाता था। जकात मुसलमानों से लिया जाने वाला धार्मिक कर था। यह 2 से 2½ प्रतिशत तक होता था।

जजिया गैर मुसलमानों से लिया जाने वाला धार्मिक कर था। स्त्रियाँ, बच्चे, भिखारी, पुजारी, साधु, आदि इस कर मुक्त थे।

सल्तनतकालीन साहित्य ( Sultanate literature)

              पुस्तक                        लेखक

  • किताब-उल-हिन्द           अलबरूनी
  • तारीख-ए-यामिनी            उतबी
  • ताज-उल-मासिर             हसन निजामी
  • तबेकात नासिरी              मिन्हाज उज सिराज
  • किरान उस सादेन          अमीर खुसरो
  • खजाइनुल फतुह            अमीर खुसरो
  • तुगलक नामा                अमीर खुसरो
  • तारीख-ए-फिरोजशाही जियाउद्दीन बरनी
  • तारीख-ए-मुबारकशाही यहियाबिन अहमद सरहिन्दी
  • शम्से सिराज तारीखे       फिरोजशाही
  • फुतुहाते फिरोजशाही    फिरोज तुगलक में
  • रेहला                            इब्नबतूता
  • पृथ्वीराज रासो              चंद बरदाई
  • राज-तरंगिणी                कल्हण

 

Play Quiz 

No of Questions-23

[wp_quiz id=”3426″]

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, प्रभुदयाल मूण्ड चूरु,

Leave a Reply

Your email address will not be published.