जातिवाद जाति के प्रति एकांकी निष्ठा है । जातिवाद द्वारा जाति के आधार पर उच्च नीच की भावना को भावना को पराश्रय दिया जाता है कुछ व्यक्ति चाहे वास्तविक योग्यता न हो फिर भी किसी जाति विशेष का होने के कारण उन्हें बहुधा लाभ प्राप्त हो जाता है ।

काका कालेकर ने कहा है कि जातिवाद एक ऐसी उच्च अंध तथा सर्वोच्च व्यक्ति है जो न्याय उचित समानता और विश्व बंधुत्व जैसे स्वस्थ सामाजिक मानकों की उपेक्षा करती है ।

श्री के एम पणिक्कर के अनुसार :-राजनीति की भाषा में उपजाति के प्रति निष्ठा का भाव ही जातिवाद है।

प्रोफेसर रजनी कोठारी ने अपनी पुस्तक कास्ट इन इंडियन पॉलिटिक्स में लिखा है:- कि जाति और राजनीति का पृथक्करण संभव नहीं है ।

राजनीति में जातिवाद का आशय है जाति का राजनीतिकरण होना राजनीति में जाति को वोट बैंक समझती प्रतिनिधित्व के अवसर बढ़ा दिया  उन्हें जाति और राजनीति में अंतर क्रिया के तीन संदर्भ प्रस्तुत किए हैं :-

  1. लौकिकीकरण
  2. एकीकृत व्यवस्था
  3. सचेतन रूप

कोठारी का अभिमत है राजनीति पर जाति हावी नहीं हो गई है बल्कि जाति का राजनीतिकरण हो गया है ।

भारत में जाति की राजनीति वही भूमिका है जो पश्चिम लोकतंत्र में हित समूह दबाव समूह की है ।

जातिवाद के उन्मूलन हेतु विभिन्न विचारको के मत :-

डॉक्टर श्रीनिवास के अनुसार :- बेशक मतदान प्रणाली पंचवर्षीय योजनाएं शिक्षा का प्रसार विषय जातियों की बराबर उन्नति रहन सहन के तरीकों पर जाते ही संस्कृति का प्रभाव जाति व्यवस्था के अवगुणों को दूर कर देगा तो प्रजातंत्र समानता के लिए रास्ता खोल देगा ।

घोरीए का मत :- जातिवाद से उत्पन्न संघर्ष को अंतरजातीय युवाओं को प्रोत्साहन देकर दूर किया जा सकता है।

डॉक्टर राव का मत :- जातिवाद को दूर करने के लिए सामूहिक प्रवृतियों को व्यक्त करने तथा अपनी क्रियाओं को संगठित करने के लिए कुछ वैकल्पिक समूह के निर्माण को प्रोत्साहन देना चाहिए ।

श्रीमती इरावती कर्वे का मत :- जातिवाद से उत्पन्न हुए संघर्ष को दूर करने के लिए विभिन्न जातियों में आर्थिक और सांस्कृतिक समानता लानी चाहिए।

भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका भारतीय राजनीति में जाति की विशेष भूमिका है । इसलिए टिंकर जैसे विद्वानों ने राज्यों की राजनीति को जाति की राजनीति की संज्ञा दी है ।

भारतीय राजनीति में जाति की नकारात्मक भूमिका इस प्रकार है :-

  • ✍दलों के निर्माण और पहचान का आधार
  • ✍चुनाव में उम्मीदवारों के चयन का आधार
  • ✍चुनाव प्रचार का आधार
  • ✍मंत्रिमंडल के निर्माण का आधार
  • ✍संसद में गुटबाजी के रूप में भूमिका
  • ✍राजनीति में क्षेत्रवाद और अपराधीकरण को बढ़ावा देती है
  • ✍सरकार पर अनुचित मांगे

रजनी कोठारी और रुडोल्फ एंड रुडोल्फ जैसे विद्वानों के अनुसार जाति ने भारतीय लोकतंत्र को गतिशीलता प्रदान की है और सामाजिक न्याय को बढ़ाकर राजनीति में सकारात्मक भूमिका अदा की है ।

वर्ग

भारतीय राजनीति में वर्ग भारतीय राजनीति में वर्क की भूमिका पर राम मनोहर लोहिया देसाई जैसे विद्वानों ने अनेक विचार व्यक्त किए हैं।

 राम मनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक wheel of story में लिखा है कि भारत में जाति और वर्ग अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े हुए हैं वह कठोर रूप से जाति में परिवर्तित हो जाते हैं ।

भारतीय राजनीति में 1925 में स्थापित भारतीय साम्यवादी पार्टी और उसके सहयोगी दल श्रमिक एवं किसानों का समर्थन करते हैं  राजगोपालचारी द्वारा स्थापित 1946 में स्वतंत्र पार्टी उच्च वर्ग का समर्थन करती है ।

दल मध्यम वर्ग का समर्थन करते हैं भारत में महंगाई जैसी समस्याओं को मध्यम वर्ग ने उठाया इसलिए विभिन्न दबाव समूह का गठन हुआ। 1991 में उदारीकरण अपनाने के बाद में भारतीय राजनीति में वर्ग की भूमिका निरंतर बढ़ रही है। वह अपने दबाव समूह के माध्यम से भारतीय राजनीति को प्रभावित कर रही है।

 

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No of Questions- 18

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

सुभिता मील, मुकेश पारीक ओसियाँ, नवीन कुमार, 

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