( यूरोपीय कंपनियों का भारत मे आगमन )

15वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी के बीच निम्नलिखित यूरोपीय कम्पनियाँ क्रमशः भारत आयी- पुर्तगीज, डच, अंग्रेज, डेनिश, फ्रांसीसी परन्तु इन कम्पनियों के स्थापना का क्रम थोड़ा सा भिन्न था। ये निम्नलिखित क्रम में स्थापित हुई-

पुर्तगीज-अंग्रेज-डच-डेनिश-फ्रांसीसी।

पुर्तगीज सबसे पहले भारत पहुँचे, बाकी सभी कम्पनियाँ प्रारम्भ में भारत न आकर दक्षिण पूर्व एशिया की ओर गई

युरोप और भारत के बीच समुद्री मार्ग की तलाश 1498 मे पुतर्गाली नाविक वास्कोडिगामा के द्रारा की गई। वास्कोडिगामा सर्वप्रथम भारत के पश्चिमी समुद्री तट पर स्थिति कालीकट पहुँचा और वहाँ के शासक जमोरिन के द्रारा वास्कोडिगामा को सभी प्रकार की व्यापारिक सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई।

पुर्तगाली ( Portuguese )

नये रास्ते की खोज में सर्वप्रथम प्रयास पुर्तगीजों ने प्रारम्भ किये। बार्थोलोम्यूडियाज ने 1487 ई0 में केप आॅफ गुड होप (उत्तमाशा अन्तरीप, या तूफानी अन्तरीप) तक की यात्रा की। 1494 ई0 में स्पेन के कोलम्बस ने भारत खोजने के क्रम में अमेरिका की खोज कर दी। 1499 में पिन्जोन ने ब्राजील की खोज की। मैगलेन ने यूरोप के पश्चिमी देशों की यात्रा करते हुए सम्पूर्ण पृथ्वी की यात्रा की।

वास्कोडिगामा समुद्री रास्ते से भारत आने वाला प्रथम पुर्तगाली व यूरोपियन यात्री था। वह अब्दुल मनिक नामक गुजराती प्रदर्शक की सहायता से भारत आया । कालीकट के शासक जमोरिन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया। किंतु अरब व्यापारियों ने उसका विरोध किया।

जमोरिन कालीकट के हिंदू शासकों की उपाधि थी। भारत से वापस जाते समय वास्कोडिगामा जहाज में कालीमिर्च भरकर ले गया जिस पर उसे 60 गुना फायदा हुआ। इससे अन्य पुर्तगाली व्यापारियों को प्रोत्साहन मिला।

1500 ई में वास्कोडिगामा के बाद दूसरा पुर्तगाली यात्री पेट्रो अल्ब्रेज क्रेबाल कालीकट (भारत) आया।  1502 ईस्वी में वास्कोडिगामा दूसरी बार भारत आया। पुर्तगालियों ने 1503 ईसवी में कोचीन में अपनी पहली व्यापारिक कोठी स्थापित की। पुर्तगीज अपने को ’’समूद्रों का स्वामी कहते’’ थे

पुर्तगाली कंपनी का नाम एसतादे दे इंडिया था।  भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय फ्रांसिस्को डी अल्मीडा था जिसने ब्लू वाटर पॉलिसी (नीले पानी की नीति) अपनायी। वह 1505 से 09 ई. तक गवर्नर रहा

अल्बुकर्क को भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। भारत में पुर्तगालियों की संख्या बढ़ाने के लिए इसने पुर्तगालियों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रेरित किया।

अल्बुकर्क ने गोवा में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। अल्बुकर्क ने 1511 ईस्वी में दक्षिण पूर्वी एशिया की व्यापारिक मंडी मलक्का और हरमुज पर अधिकार कर लिया। पुर्तगाली वायसराय नीलू डी कुन्हा ने 1530 ईस्वी में कोचिंन की जगह गोवा को राजधानी बनाया।

पुर्तगालियों ने हिंद महासागर से होने वाले व्यापार पर एकाधिकार कर लिया उन्हें कार्टेज पद्धति द्वारा बिना परमिट के भारतीय अरबी जहाजों का अरब सागर में प्रवेश वर्जित कर दिया।

पुर्तगालियों ने भारत में तंबाकू की खेती तथा प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत की 1556 ईसवी में गोवा में प्रथम प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना हुई। व भारतीय जड़ी-बूटियों पर वनस्पति पर प्रथम पुस्तक 1563 ईस्वी में गोवा से प्रकाशित हुई।  पुर्तगालियो ने भारत में गोथिक स्थापत्य शैली की शुरुआत की।

पुर्तगीज व्यापार की विधि:-

पुर्तगीज भारतीय क्षेत्र को एस्तादो-द-इंडिया नाम से पुकारते थे। हिन्द महासागर के व्यापार को नियंत्रित करने के लिए उन्होंने परमिट व्यवस्था प्रारम्भ की। उनकी नौ सैनिक शक्ति भी उस समय श्रेष्ठ थी।

अकबर ने भी पुर्तगीजों से व्यापार के लिए परमिट ली थी। पुर्तगीज अपने को ’’सागर के स्वामी’’ कहते थे। पुर्तगीजों का पतन इसलिए हुआ क्योंकि वे अन्य यूरोपीय शक्तियों से प्रतिद्वन्दिता से पिछड़ गये। दूसरे ब्राजील का पता लग जाने पर उन्होंने वहीं उपनिवेश बसाने पर जोर दिया।

पुर्तगीज आधिपत्य का परिणाम पुर्तगीजों ने धर्म परिवर्तन पर बहुत जोर दिया। 1560 में गोवा में ईसाई धर्म न्यायालय की स्थापना की। 1542 में पुर्तगीज गर्वनर मार्टिन डिसूजा के साथ प्रसिद्ध सन्त जेवियर भारत आया। जापान के साथ व्यापार प्रारम्भ करने का श्रेय पुर्तगीजों को प्राप्त है।

पुर्तगीजों ने सर्वप्रथम प्रिटिंग प्रेस की शुरुआत की। पुर्तगीजों को भारत में आलू, तम्बाकू, अन्नानास, अमरुद, अंगूर, संतरा, पपीता, काजू, लीची, बादाम, मूंगफली, शकर कंद आदि को लाने का श्रेय दिया जाता है।

भारत में अन्तिम गर्वनर जनरल-जोआ-द-कास्त्रों था। गोथिक स्थापत्य कला पुर्तगाली लाये।

पुर्तगालियो के भारत मे आने के उद्देश्य

1. अरबो और वेनिस के व्यापारियों का भारत से प्रभाव समाप्त करना।
2. ईसाई धर्म का प्रचार करना।

पुर्तगालियो के भारत से पतन के कारण :-

1. भारतीय जनता के प्रति धार्मिक असहिष्णुता की भावना।
2. गुप्त रूप से व्यापार करना तथा डकैती और लूटमार को अपनी नीति का हिस्सा बनाना।
3. नए उपनिवेश ब्राजील की खोज।
4. अन्य यूरोपियन व्यापारिक कंपनियो से प्रतिस्परधा ।
5. अपर्याप्त व्यापारिक तकनीक
6. पुर्तगाली वायसरायों पर पुर्तगाली राजा का अधिक नियंत्रण।

अंग्रेज

इंग्लैंण्ड की महारानी एलिजाबेथ-प्रथम के समय में 1600 ई0 में एक कम्पनी की स्थापना हुई जिसका नाम The Governer of the Company of Marchents of London Trading in to the East Indiese रखा गया। इसे पूर्व के साथ 15 वर्षों के लिए व्यापार की अनुमति प्रदान की गई। इसने अपने प्रारम्भिक अभियान द0 पू0 एशिया में किये।

1688 में एक नयी कम्पनी न्यू कम्पनी को भी पूर्व के साथ व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी। 1698 ई0 में दो और कम्पनियों General Soceity तथा English Company trading in to the East को भी इसी तरह की अनुमति दी गयी।

1702 में इन कम्पनियों ने आपस में विलय का निश्चय किया। 1708 में इन कम्पनियों का विलय हो गया तब इसका नाम The United Company of Merchant of England trading in to the East Indiese रखा गया।  1833 ई0 के अधिनियम के द्वारा इसका नाम छोटा करके East India Company रख दिया गया।

भारत में फैक्ट्रियाँ:-

पूर्व के साथ व्यापार की अनुमति मिलने के बाद इंग्लैण्ड के शासक जेम्स प्रथम ने अपने एक राजदूत हॉकिन्स को अकबर के नाम का पत्र लेकर भेजा। हॉकिन्स ने मध्य-पूर्व में तुर्की और फारसी भाषा सीखी। 

1608 ई0 में हेक्टर नामक जहाज से वह सूरत पहुँचा। जहाँगीर ने उसे फैक्ट्री खोलने की अनुमति दे दी परन्तु पुर्तगीजों के दबाव से शीघ्र में अनुमति रद्द कर दी गयी। तब अंग्रेज ने दक्षिण जाकर 1611 ई0 में मसली-पट्टम में अपनी फैक्ट्री स्थापित की। इसी बीच 1611 ई0 में स्वाल्ली के प्रसिद्ध युद्ध में अंग्रेजों ने पुर्तगीजों को पराजित कर दिया तब 1612 में उन्हें पुनः सूरत में फैक्ट्री खोलने की अनुमति दी गयी।

  • 1608 – सूरत (अनुमति रद्द)। (टामस एल्डवर्थ)
  • 1611 – मसूली पट्टम।
  • 1611 – स्वाल्ली का युद्ध।
  • 1612 – सूरत (किलेबन्द फैक्ट्री)

दक्षिण में फैक्ट्रियाँ

  • 1611 – मसूली पट्टम
  • 1626 – अर्मागाँव (कर्नाटक)
  • 1632 – Golden Ferman -गोलकुण्डा के शासक के द्वारा जारी किया गया। इसके 500 पगोज सलाना कर के बदले अंग्रेजों को गोलकुण्डा राज्य के बन्दरगाहों से व्यापार करने की छूट प्राप्त हो गयी।
  • 1639 – फोर्ट सेंट जार्ज की स्थापना। फ्रांसिस-डे ने चन्द्रगिरि के राजा से मद्रास को पट्टे पर लिया और वहाँ एक किला बन्द कोठी बनवायी। इसी का नाम फोर्ट सेंट जार्ज पड़ा।

बम्बई का द्वीप

  • 1661 ई0 में इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स -द्वितीय का विवाह पुर्तगीज राजकुमारी कैथरीन मेवों के साथ हुआ। जिसके फलस्वरूप पुर्तगीजों ने बम्बई का द्वीप दहेज में चार्ल्स -द्वितीय को दे दिया।

चार्ल्स -द्वितीय ने 1668 ई0 में 10 पौंड वार्षिक किराये पर यह द्वीप ईस्ट इंडिया कम्पनी को दे दिया। 1669 ई0 में जेराल्ड औंगियार सूरत और बम्बई का गर्वनर बना।

उसने कहा ’अब समय का तकाजा है कि हम अपने हाथों में तलवार लेकर व्यापार का प्रबन्ध करें।’’ 1688 ई0 में इसी नीति का पालन करते हुए सर जॉन चाइल्ड ने कुछ मुगल बन्दरगाहों पर घेरा डाला। परन्तु औरंगजेब की सेना द्वारा उन्हें पराजित होना पड़ा तथा माफी मांगनी पड़ी एवं हर्जाने के रूप में 1.5 लाख रूपये देना स्वीकार किया।

बंगाल में अंग्रेजी शक्ति का विकास:- 1651 ई0 में बंगाल के सूबेदार शाहसुजा ने 3,000 रूपये वार्षिक कर के बदले अंग्रेजों को बंगाल बिहार और उड़ीसा से व्यापार करने की अनुमति प्रदान की। यह अनुमति इसलिए प्रदान की गयी क्योंकि ग्रेबियन बॉटन नामक चिकित्सक ने शाहसुजा की किसी बीमारी का इलाज किया।

  • 1656 – पुनः मंजूरी मिल गयी।
  • 1680 – औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि अंग्रेजों से 1.5% जजिया कर लिया जाय।
  • 1686 – अंग्रेजों ने हुगली को लूटा परन्तु बुरी तरह पराजित किये गये और एक ज्वर ग्रसित द्वीप में पहुँचे। यहीं से जॉब चार्नोंक ने समझौते की शुरुआत की। बहुत अनुनय विनय के बाद इन्हें वापस लौटने की अनुमति मिल गयी।
  • 1690 – जॉब चार्नोक ने सूतानाती में एक फैक्ट्री खोली, जो आगे चलकर कलकत्ता बना। इसी कारण चार्नोक को कलकत्ता का जन्मदाता माना जाता है।
  • 1698 – बंगाल के नवाब अजीमुशान ने जमीदार इब्राहिम खाँ से तीन क्षेत्रों की जमीदारी सूतानाती, कालीकाता और गोबिन्दपुर अंग्रेजों को प्रदान की।

यहीं पर 1700 ई0 में फोर्ट विलियम की नींव रखी गयी। चार्ल्स आयर इसका पहला प्रेसीडेन्ट बना।

मुगल दरबार में मिशन:-

मुगल दरबार में अंग्रेजों के निम्नलिखित दो मिशन प्रमुख रूप से हुए-

1. नारिश मिशन:- 1698 इंग्लैंण्ड के राजा विलियम -तृतीय ने एक अन्य कम्पनी इंग्लिश कम्पनी टेर्डिंग इन-टू-द ईस्ट की स्थापना की। इस कम्पनी ने व्यापारिक सुविधायें प्राप्त करने के लिए सर विलियम नारिश की अध्यक्षता में एक मिशन औरंगजेब के दरबार में भेजा। किन्तु इसका कोई फल न हुआ।

2. जॉन सरमन मिशन:-1715- कलकत्ता से ईस्ट-इंडिया कम्पनी ने 1715 में जॉन सरमन की अध्यक्षता में फर्रुख-सियर के दरबार में एक दूत-मण्डल भेजा। इस मण्डल में-

रोहूर्द:- आरमेनियन दुभाषिया था।

हैमिल्टन:- यह अंग्रेज चिकित्सक था जिसने फर्रुखसियर की फोडे की बीमारी का इलाज किया। इससे प्रसन्न होकर फर्रुखसियर ने 1717 ई0 में एक फरमान जारी किया जिसके द्वारा-

  • 3,000 रू0 वार्षिक कर के बदले में कम्पनी को बंगाल में मुक्त व्यापार की छूट मिल गयी।
  • 10,000 रू0 वार्षिक कर के बदले में सूरत से व्यापार करने की छूट मिल गयी।
  • बम्बई में कम्पनी द्वारा ढाले गये सिक्कों को सम्पूर्ण मुगल साम्राज्य में चलाने की छूट मिल गयी।

ब्रिटिश इतिहासकार और्म ने इसे कम्पनी का मैग्नाकार्टा कहा। वस्तुतः इस व्यापारिक छूट से कम्पनी को बंगाल में अपने पाँव जमाने में सहूलियत मिली।

PLAY QUIZ 

[wp_quiz id=”3289″]

CONTINUES…

डच ( Dutch )

पुर्तगालियों के बाद भारत मे डचो का आगमन हुआ। भारत आने वाला प्रथम डच नागरिक कार्नेलिस डी हस्तमान था। डच मूलतः नीदरलैंड ( हॉलेंड) के निवासी थे।

Holland की प्रातीय company के द्रारा मिलकर भारत के साथ व्यापार करने के लिए एक company का गठन किया। 1602 मे किया था जिसे united East india company of Neither land के नाम से जाना जाता था इसका मूल नाम – Pata index company था।

किन्तु Dutch East india Company के द्रारा भारत मे अपनी पहली Factory 1605 मे मसुलिपट्टम / मछलीपट्टम मे कंपनी के कर्मचारी Peter yask all of के द्रारा की गई। मछलीपट्टम के वाद डचो के द्रारा अपनी दूसरी Factory पेटापाॅलि मे स्थापित की जिसे निजामापटृम के नाम से भी जाना जाता हैं

निजामापटृम के बाद डचो द्रारा अपनी Factory भारत के पूर्वी समुद्री तट पुलीकट (मद्रास) तथा उसके बाद नागापटृम मे की गई थी।

1610 में डचों ने पुलिकट में अपनी व्यापारिक कोठी स्थापित की जो जल्द ही डचों की राजधानी बन गयी। डचों द्वारा ढले गए सोने के सिक्कों को पैगोडा कहा गया।

1623 अम्बायना नरसंहार हुआ। जिसमें 10 अंग्रेज 9 जापानियों का क्रूरता पूर्वक वध कर दिया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने अपना ज्यादा ध्यान भारत की ओर केन्द्रित किया।

भारत में फैक्ट्रियाँ:-

  • 1605 – मसूली पट्टनम-वादेर हेग के द्वारा।
  • 1610 – पुलीकट-इसे अपना मुख्यालय बनाया और यहीं अपने स्वर्ण सिक्के पगोड़ा ढाले
  • 1616 – सूरत– नागपट्टम में स्थापित की
  • 1641 – विमलीपट्टम में एक फैक्ट्री स्थापित की गयी।

पूर्व में:-

  • 1627 – पीपली-उड़ीसा में सर्वप्रथम डच फैक्ट्री।
  • 1653 – बंगाल में हुगली के पास चिनसुरा में। इस फैक्ट्री को इन्होंने किलेबन्द किया। इस फैक्ट्री को गुस्ताओं फोर्ट के नाम से जाना जाता है। इसके बाद कासिम बाजार बालासोर पटना में फैक्ट्रियां स्थापित की गयी।

दक्षिण में:-

  • 1660 – गोलकुण्डा में।
  • 1663 – कोचीन में। इसी समय उन्होंने क्रागेनूर में।

डचों को सर्वाधिक लाभ सूरत से प्राप्त हुआ था। डचों की व्यापारिक कोठियों के प्रमुखों को फैक्टर कहा गया। वर्ष 1759 में वेदरा/ बेदरा के युद्ध मे डच पूर्ण रूप से पराजित हुए और भारत मे डचों की शक्ति समाप्त हो गयी।

व्यापार की विधि:-

  • सभी यूरोपीय कम्पनियों में डच अपने साझेदारों को सर्वाधिक लाभांश 18% देती थी।
  • डचों ने मसालों के स्थान पर भारतीय कपड़ों को अधिक महत्व दिया। ये कपड़े कोरोमण्डल तट, बंगाल, गुजरात आदि से निर्यात किये जाते थे।
  • हलाँकि डच व्यापार के विशेषज्ञ ओम प्रकाश मानते हैं कि प्रारम्भ में डच, मूलरूप से काली मिर्च तथा मसालों के व्यापार में ही रुचि रखते थे।
  • डचों ने कासिम बाजार में रेशम की चक्री का उद्योग स्थापित किया।
  • ये लोग आगरा और मध्य भारत से नील, मध्य भारत से कच्चा रेशम, बिहार और बंगाल से शोरा एवं नमक और गंगा घाटी से अफीम का निर्यात करते थे।
  • भारत से भारतीय वस्त्र को निर्यात की वस्तु बनाने का श्रेय डचों को ही दिया जाता है।
  • 1759 ई0 में अंग्रेजों ने बेडारा के युद्ध में डचों को पराजित कर दिया। इसी के बाद डच भारतीय व्यापार से बाहर हो गये।

डेनिस (डेन)

ये डेनमार्क के निवासी थे। डेनिस ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1616 में हुई। वर्ष 1620 में ट्राकेबोर नामक स्थान पर अपनी प्रथम व्यापारिक कोठी स्थापित की। वर्ष 1745 में इन्होंने अपनी सारी फैक्टियों को अंग्रेजो को बेचकर वापस चले गए।

 

फ्रांसीसी

फ्रांसीसी कम्पनी का मूल नाम कम्पनी द इण्ड ओरिमंटल था। इसकी स्थापना 1664 ई0 में फ्रांस के शासक लुई XIV के समय उसके प्रधान मंत्री कोल्बर्ट ने की।  इसे पूर्व के साथ व्यापार करने की अनुमति दी गयी। पहले ये मेडागास्कर द्वीप पहुँचे परन्तु वहाँ असफल रहे।

इसमें फ्रांसीसी कम्पनी सरकारी थी। ये सभी कम्पनियाँ मूलतः मसाले के लिए भारत आयीं, परन्तु इन्होंने सबसे अधिक व्यापार सूती वस्त्रों का किया। लेकिन इस समय अधिकतर सोना नील के जरिए आता था

भारत में कोठियाँ:-

  • 1668 – सूरत में फ्रैंकोकैरो द्वारा।
  • 1669 – मसूली पट्टम (मरकारा)
  • 1672 – सान्थोमी (मद्रास में)
  • 1673 – पांडिचेरी-फ्रंकोमार्टिन तथा बेलांग लेस्पिने द्वारा यह पूरी तरह किलाबन्द फैक्ट्री थी। यह क्षेत्र इन्हें एक मुस्लिम सूबेदार शेर खाँ लोदी से प्राप्त हुआ। फ्रेंकोमार्टिन इसका प्रमुख बना।
  • डचों ने 1693 में अंग्रेजों की मदद से पांडिचेरी छीन लिया। 1697 में रिजविक की सन्धि द्वारा वापस लौटा दिया।
  • 1674 – चन्द्रगिरि-बंगाल के सूबेदार शाइस्ता खाँ ने 1674 ई0 में फ्रांसीसियों को एक जगह दी। यहीं पर वास्तविक रूप से 1690-92 में चन्द्र गिरि की कोठी बनायी गयी।
  • 1721 – मारीशस
  • 1725 – माहे ( केरल)
  • 1789 – कराईकल

कर्नाटक में आंग्ल फ्रांसीसी प्रतिस्पर्धा

अन्तिम दो यूरोपीय कम्पनियों अंग्रेज और फ्रांसीसियों के बीच कर्नाटक में अपने वर्चस्व के लिए संघर्ष प्रारम्भ हुए। इन संघर्षों में अन्ततः अंग्रेज विजयी हुए। कर्नाटक में कुल तीन युद्ध लड़े गये। इसमें प्रथम और तृतीय युद्ध विदेशी कारणों से प्रभावित थे जबकि द्वितीय युद्ध यहाँ के आन्तरिक कारणों से प्रभावित था।

करीब 20 वर्षों तक चले इन युद्धों से वान्डीवास में फ्रांसीसियों को पराजय से अंग्रेज सबसे शक्तिशाली बनकर उभरे।

कर्नाटक का प्रथम युद्ध (1746-48)

  • कारण:- आस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध का विस्तार मात्र।
  • युद्ध विराम:- ए-ला-शापेल की सन्धि द्वारा 1748 में।

इस युद्ध की शुरूआत अंग्रेजों ने की जब वारनैट के नेतृत्व में एक अंग्रेजी नौ सेना ने कुछ फ्रांसीसी जल पोत को पकड़ लिया।  डूप्ले ने मारीशस स्थित फ्रांसीसी गर्वनर ला-बूर्डो-ने से सहायता मांगी उसने आकर मद्रास पर अधिकार कर लिया। युद्ध बन्दियों में क्लाइव भी था।

परन्तु बाद में 40,000 पौंण्ड की रिश्वत लेकर उसने मद्रास अंग्रेजों को वापस कर दिया लेकिन डूप्ले ने पुनः मद्रास पर अधिकार कर लिया। इसी बीच यूरोप में ए-ला-शापेल की सन्धि हो गयी। जिसके द्वारा भारत में भी इन दोनों कम्पनियों के बीच में युद्ध विराम हो गया।

सेन्ट थोमे का युद्ध (1748):-

कर्नाटक का प्रथम युद्ध कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन के क्षेत्र में लड़ा जा रहा था। उसने फ्रांसीसियों को युद्ध न करने की चेतावनी दी परन्तु न मानने पर महफूज खाँ के नेतृत्व में एक सेना भेजी। इस सेना को पैराडाइज के नेतृत्व में एक छोटी से फ्रांसीसी सेना ने पराजित कर दिया।

इस युद्ध ने भारतीय सेना की कमजोरी को उजागर किया। साथ ही यह भी प्रमाणित कर दिया कि एक सुसज्जित और प्रशिक्षित छोटी सी सेना बड़ी सेना को पराजित कर सकती है।

कर्नाटक का द्वितीय युद्ध (1749-54):-

यह युद्ध हैदराबाद और कर्नाटक के प्रमुखों में आन्तरिक खींच-तान के कारण प्रारम्भ हुआ परन्तु इसमें सर्वप्रथम हस्तक्षेप फ्रांसीसियों की तरफ से डूप्ले ने किया विजय अन्ततः अंग्रेजों को मिली।

दक्षिण में हैदराबाद की रियासत जिस तरह मुगलों से स्वतंन्त्र थी उसी तरह हैदराबाद के अन्तर्गत कर्नाटक भी स्वतन्त्र रूप से व्यवहार करता था। इस समय हैदराबाद का प्रमुख नासिर जंग था। परन्तु उसकी सत्ता को उसका भांजा मुजफ्फर जंग चुनौती दे रहा था। इसी तरह कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन को उसके बहनोई चांदा साहब विरोध कर रहे थे।

डूप्ले ने मुजफ्फर जंग और चांदा साहब को समर्थन दिया। इन तीनों की सम्मिलित सेना ने 1749 ई0 में अम्बूर के युद्ध में अनवरुद्दीन को पराजित कर मार डाला और चांदा साहब को कर्नाटक का नवाब बना दिया गया। उन्होंने अर्काट को अपनी राजधानी बनाया तथा फ्रांसीसियों को पांडिचेरी के पास 80 गांव अनुदान में दिये। डूप्ले को दक्षिण का अवैतनिक गर्वनर भी बना दिया गया।

इसी बीच अनवरुद्दीन के पुत्र मु0 अली ने भागकर त्रिचनापल्ली में शरण ली। चांदा साहब ने त्रिचना पल्ली को घेर लिया। इसी समय क्लाइव (एक क्लर्क) ने यह सलाह दी कि यदि कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर आक्रमण कर दिया जाय तब चांदा साहब का दबाव मु0 अली पर से कम हो जायेगा।

उसने एक छोटी सी सेना के द्वारा अर्काट को जीत लिया। इसी बीच चांदा साहब की हत्या कर दी गयी और इस तरह से मु0 अली कर्नाटक का नवाब बन गया।

हैदराबाद के निजाम के पद को लेकर हुए झगड़े में नासिर जंग ने मुजफ्फर जंग को पराजित कर दिया। इसी बीच आन्तरिक विद्रोह के कारण नासिर जंग की हत्या हो गयी। तब मुजफ्फर जंग को गद्दी पर बैठाया गया परन्तु मुजफ्फर जंग की भी हत्या कर दी गयी। अन्ततः सलाबत जंग हैदराबाद का निजाम बना। सलाबत जंग ने फ्रांसीसियों को उत्तरी सरकार के चार जिले-मुस्तफा नगर राजमुंद्री, चिकाकौल, एल्लौर प्रदान किये।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध की समाप्ति 1755 ई0 के पांडिचेरी की सन्धि से हुई। इस सन्धि के द्वारा दोनों पक्षों में युद्ध विराम हो गया। इस सन्धि की एक प्रमुख शर्त यह भी थी कि डूप्ले को वापस बुला लिया जाय। डूप्ले की जगह गोडेहू को फ्रांसीसी प्रमुख बनाकर भेजा गया।

कर्नाटक का तृतीय युद्ध (1756-63)

  • कारण:- सप्त वर्षीय युद्ध का विस्तार
  • युद्ध विराम:– पेरिस की सन्धि 1763

यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध प्रारम्भ होने के बाद भारत में भी उसका प्रभाव हुआ और दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने आ गयी। यह प्रसिद्ध युद्ध वांडीवास के नाम से जाना जाता है।

वांडी वास का युद्ध (22 जनवरी 1760):-

अंग्रेज सेना पति आयरकूट और फ्रांसीसी सेनापति काउण्ट लाली के बीच। अन्ततः फ्रांसीसियों की पराजय हुई और भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया।

कर्नाटक के तृतीय युद्ध की समाप्ति पेरिस की सन्धि से हुई जिसके द्वारा अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों के जीते हुए क्षेत्रों को वापस कर दिया लेकिन अब उनकी किलेबन्दी नहीं की जा सकती थी। चन्द्र नगर में फ्रांसीसी स्वतन्त्रता के बाद 1954 तक रहे।

यूरोपीय कंपनियो की स्थापना

  • इस्तादो द इंडिया-पुर्तगाली- 1498
  • वेरिंगदे ओसत इंडिशे कंपनी-डच- 1602
  • ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी- 1600 (1599)
  • कंपने देस इंडस ओरियांतलेस-फ्रांसीसी- 1664
  • डेन एस्ट इंडिया कंपनी-डेनमार्क- 1616

भारत में यूरोपियों के आगमन से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य ⚜

  • भारत मे यूरोपीय शक्ति द्वारा अपना पहला किला कहां निर्मित किया गया- गोवा
  • भारत में ब्रिटेन की तुलना में फ्रांसीसी असफलता का कारण था — अल्प राजकीय सहयोग
  • ईस्ट इंडिया कंपनी एवं उसके बाद बनी कंपनी का विलय कब हुआ — 1702 ई
  • द्वितीय पुर्तगाली अभियान के नेता का क्या नाम था — अलवारेज केब्रल
  • भारत में सर्वप्रथम फ्रांसीसी कंपनी किसने स्थापित की थी — कॉल्बर्ट
  • मुगल भारत में अंग्रेजी व्यापार की सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तु क्या थी –– सूती वस्त्र
  • अंग्रेजो को सुनहरा फरमान कब प्रदान किया गया — 1632 ईस्वी
  • भारत में किस क्षेत्र में डच लोगों ने अपनी प्रारंभिक फैक्ट्रियां स्थापित की थी — गुजरात और बिहार
  • प्रारंभ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का क्या नाम था — दि गर्वनर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इंडिज
  • डचों ने प्रथम व्यापारिक कोठी कहां स्थापित की –– पुलीकट
  • ईस्ट इंडिया कंपनी किस चीज का भारत से निर्यात करती थी — सूती कपड़ा, नील, कच्चा रेशम
  • भारत में पहली फ्रेंच बस्ती कहां स्थापित की गई — सूरत
  • बंगाल के प्रमुख बंदरगाह हुगली से पुर्तगालियों को निष्कासित करने वाला मुगल बादशाह– शाहजहां
  • सूरत में किसने अपनी फैक्ट्री स्थापित की — अंग्रेजों ने
  • बंगाल का कौन सा बंदरगाह पुर्तगालियों के समय पोर्टोग्रान्डे कहा जाता था —चटगांव
  • किस अंग्रेज गवर्नर को औरंगजेब ने भारत से निष्कासित कर दिया था — सर जान चाइल्ड
  • मद्रास की स्थापना किसने की — फ्रांसिस डे
  • इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी का लोकप्रिय नाम था –जॉन कंपनी
  • अंग्रेजी कंपनी को किसने कहा था कि यह एक कुत्सित या नीच, झगदालु लोगों और बेईमान व्यापारियों की कंपनी है — बंगाल के सूबेदार शाइस्ता खां
  • वास्कोडिगामा भारत आने वाला प्रथम पुर्तगाली तथा प्रथम यूरोपियन यात्री!
  • फ्रांसिस्को- डी- अल्मीडा 1505 ई.में वायसराय बनकर भारत आने वाला प्रथम पुर्तगाली
  • अलमीरा ने ब्लू वाटर पॉलिसी( नीले पानी की नीति) अपनाई थी। 
  • इसे भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है तथा भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है ।-अल्फांसो दी अल्बुकर्क
  • भारत में सती प्रथा का निषेध करने वाला रोक लगाने वाला प्रथम व्यक्ति भी यही है।
  • डचों ने 1605 ई .मे मछलीपट्टनम में प्रथम डच कारखाने की स्थापना की।
  • अंग्रेजों ने हुबली के निकट 1759 ई.में बेदरा के युद्ध में डचों को अंतिम रूप से पराजित किया ।
  • अंग्रेजों ने1599ई. में अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की जिसे दिसंबर 1600 ई. में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने पूर्व के साथ व्यापार के लिए 15 वर्षों का अधिकार प्रदान किया ।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रारंभिक नारा – भू-भाग नहीं, व्यापार
  • जॉर्ज मिलदेंन्हाल थल मार्ग द्वारा भारत पहुंचने वाला पहला ब्रिटिश यात्री ।।
  • सबसे बाद में भारत आने वाले यूरोपीय व्यापारी फ्रांसीसी थे।
  • कॉलवर्ट भारत में फ्रांसीसी कंपनी का संस्थापक था।
  • अंग्रेज और फ्रांसीसियों के बीच लड़े गए युद्ध को कर्नाटक युद्ध के नाम से जाना जाता है
  • ?प्रथम कर्नाटक युद्ध 1746ई. से 1748ई.
  • ?द्वितीय कर्नाटक युद्ध 1749ई. से 1754ई.
  • ?तृतीय कर्नाटक युद्ध 1757ई. से 1763ई.
  • 22 जनवरी 1760 को लड़े गए वांदिवाश के युद्ध में अंग्रेजी सेना को आयरकूट व फ़्रांसिसी सेना को लाली ने नेतृत्व प्रदान किया। इस युद्ध में फ्रांसीसी पराजित हुए।

 

Play Quiz 

No of Questions-11

[wp_quiz id=”3291″]

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

कमलनयन पारीक अजमेर, प्रभुदयाल मूण्ड चूरु, RAJPAL HANUMANGARH,  कृष्णा कँवर जयपुर, चंद्र गुप्त जयपुर, Pushplata  Ajmer, जुल्फिकार जी अहमद, Rafik khan nagour, पुष्पेन्द्र कुलदीप झुन्झुनू

Leave a Reply