( फ्रेंच क्रांति और नेपोलियन बोनापार्ट )

फ्रांस की क्रांति यूरोप और मानव इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण घटना है जिसने मानवता को स्वतंत्रता समानता और भ्रातत्व के नवीन विचार किए जिसका विश्व के सभी भागों में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ

लेकिन एक सच यह भी है कि क्रांति से पूर्व फ्रांस यूरोप का सर्वाधिक प्रगतिशील राष्ट्र था। जनसंख्या कृषि, औद्योगिक उत्पादन और विदेशी व्यापार में फ्रांस के अग्रणी स्थान था। सांस्कृतिक दृष्टि से भी पेरिस यूरोप की राजधानी थी फिर भी साधारण जनता को अनेक कष्ट सहने पड़ते थे शासक निरंकुश और फिजूलखर्ची था, जहां अभिजात्य वर्ग और पादरी वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त थे वही भूमिहीन कृषको और मजदूरों की स्थिति दयनीय थी। कराधान में समानता थी।

कहने को तो फ्रांसीसी राजतंत्र अत्यंत शक्तिशाली था लेकिन वह बहुत बड़े गम्भीर आर्थिक संकट की स्थिति से गुजर रहा था। इस प्रकार क्रांति का कारण पुरातन व्यवस्था में निहित था।

फ्रांस का राजा लुई 16 वां 1774 ई में गद्दी पर बैठा। 14 जुलाई 1789 को फ्रांस में खूनी क्रांति हुई। लुई 16 वे को फांसी दे दी गई राज्यप्रथा का अंत में लोकतंत्र की स्थापना की गई। 14 जुलाई फ्रांस का राष्ट्रीय दिवस बन गया।

फ्रांस की क्रांति का आदर्श वाक्य था स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व। 27 अगस्त 1789 को फ्रांस में जन्मजात मौलिक नागरिक अधिकारों के घोषणा हुई। 21 सितंबर 1792 को फ्रांस में गणतंत्र की स्थापना हुई।

फ्रांस की क्रांति पर मांटैस्क्यू, वाल्तेयर, रूसो का प्रभाव था। मॉन्टेस्क्यू राजा के देवी सिद्धांत का आलोचक और गणतांत्रिक लोकतंत्र का समर्थक था। मॉन्टेस्क्यू ने शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत दिया। रूसो की पुस्तक सोशल कॉन्टेक्ट है।

लुई 14 ने कहा था मैं ही राज्य हूं मेरे शब्द ही कानून है। 1799 में डायरेकटरी का अंत कर नेपोलियन प्रथम काउंसल बना। नेपोलियन को आधुनिक फ्रांस का निर्माता व लिटिल कॉर्पोरल कहा जाता है। 1804 में नेपोलियन फ़्रांस का सम्राट बना। वह इतिहास के सबसे महान विजेताओं में से एक था।  उसके सामने कोई रुक नहीं पा रहा था। 

इतालवी अभियान तथा अन्य सैनिक अभियान इटली का अभियान नैपोलियन की सैनिक तथा प्रशासकीय क्षमता का ज्वलंत उदाहरण था। इस बात की घोषणा पूर्व ही कर दी गई थी कि फ्रेंच सेना इटली को ऑस्ट्रिया की दासता से मुक्त कराने आ गयी है।

उसने पहले तीन स्थानों पर शत्रु को परास्त कर ऑस्ट्रिया का (Piedmont) से संबंध तोड़ दिया। तब सारडीनिया को युद्धविराम करने के लिए विवश कर दिया। फिर लोडी के स्थान में उसे मीलान प्राप्त हुआ। रिवोली के युद्ध में मैंटुआ को समर्पण करना पड़ा।

आर्कड्यूक चार्ल्स को भी संधिपत्र प्रस्तुत करना पड़ा और ल्यूबन (Leoben) का समझौता हुआ। इन सारे युद्धों और वार्ताओं में नैपोलियन ने पेरिस से किसी प्रकार का आदेश नहीं लिया।

पोप को भी संधि करनी पड़ी। लोंबार्डी को सिसाल पाइन तथा जिनोआ को लाइग्यूरियन गणतंत्र में परिवर्तित कर फ्रेंच नमूने पर एक विधान दिया।

इन सफलताओं से ऑस्ट्रिया के पैर उखड़ गए और उसे कैंपोफौर्मियों (Campo Formio) की संधि के लिए नैपोलियन के संमुख नत होना पड़ा तथा इस जटिल परिस्थिति में ऑस्ट्रिया को अपने बेललियम प्रदेशों से और राइन के सीमांत क्षेत्रों तथा लोंबार्डी से अपना हाथ खींच लेना पड़ा।

 नैपोलियन के इन युद्धों से तथा छोटे राज्यों को समाप्त कर वृहत् इकाई में परिवर्तित करने के कार्यों से, इटली में एक राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा हुआ जो इतिहास में रीसॉर्जीमेंटो (Risorgimento) के नाम से प्रसिद्ध है।

जब तक कि उसने 1812 में रूस पर आक्रमण नहीं किया, जहां सर्दी और वातावरण से उसकी सेना को बहुत क्षति पहुँची।

1815 में वाटर लू के युद्ध में नेपोलियन की पराजय हुई पश्चात अंग्रज़ों ने उसे अन्ध महासागर के दूर द्वीप सेंट हेलेना में बन्दी बना दिया 1821 में सेंट हेलेना द्वीप पर निर्वासन में नेपोलियन की मृत्यु हुई। इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेज़ों ने उसे संखिया (आर्सीनिक) का विष देकर मार डाला।

इतिहास में नेपोलियन विश्व के सबसे महान सेनापतियों में गिना जाता है। उसने एक फ्रांस में एक नयी विधि संहिता लागू की जिसे नेपोलियन की संहिता कहा जाता है। नेपोलियन ने कानून का संहिताकरण किया जिसे नेपोलियन कोड कहा जाता है।

 

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प्रभुदयाल मूण्ड चूरु, कमलनयन पारीक अजमेर, डॉ भंवर सिंह भाटी, जुल्फिकार अहमद दौसा

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