ग्रीक एथिक्स / पाश्चात्य नितिशात्र

एथिक्स शब्द की उत्पत्ति यूनानी / ग्रीक भाषा के एथोस शब्द से हुई ह जिसका अर्थ है परंपरा /रीति रिवाज

एथिक्स(नितिशात्र) का संबंध मानवीय आचरण से माना जाता है नीतिशास्त्र एक आदर्श मूलक विज्ञान है नीतिशास्त्र चाहिए शब्द की व्याख्या करता है नीतिशास्त्र (एथिक्स) ऐच्छिक कर्मो का मूल्यांकन करता है

कर्म दो प्रकार के होते हैं

  1. ऐच्छिक कर्म- जिन पर मनुष्यों का नियंत्रण रहता है
  2. अनैच्छिक कर्म- वे कर्म जिन पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं रहता जैस ह्रदय गति श्वास आदि

नीतिशास्त्र मानवीय कर्मों का मूल्यांकन करता है नीतिशास्त्र सामान्य मनुष्य के कर्मों का मूल्यांकन करता है पागल तथा बच्चों के कर्मों का नीतिशास्त्र मूल्यांकन नहीं करता है

नीतिशास्त्र कर्म अथवा चरित्र का मूल्यांकन करता है नीतिशास्त्र को दो भागों में विभाजित किया गया है

1. आदर्श मूलक नीतिशास्त्र – समर्थक सुकरात प्लेटो अरस्तु

इसके अनुसार नीतिशास्त्र का कार्य केवल नैतिक मापदंडों की स्थापना करना है

2. अधिनीतिशास्त्र या आधुनिक नीतिशास्त्र- 

यह आधुनिक विद्या है जिसके अनुसार नीतिशास्त्र का कार्य नैतिक शब्दों का विश्लेषण करना है

प्लेटो 427 -347 B. C.

यह ऐन्थेस का नागरिक था  इसने अफलातून कहा गया है  प्लेटो ने ऐकेडमी नामक विद्यालय की स्थापना की 

प्लेटो के तीन ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध हुए :- यूटोपिया, रिपब्लिक, व लाॅज
यूटोपिया मे प्लेटो ने आदर्श राज्य रिपब्लिक मे दार्शनिक राज्य व लाॅज मे कानून की बात कही है

प्लेटो के अनुसार राज्य को अपने नागरिको पर नियंत्रण रखना चाहिए  प्लेटो संसार को भौतिक न मानकर आध्यात्मिक बताता है किन्तु उसने जगत को मिथ्या बताया है प्लेटो स्त्रियो को अधिकार देने की बात भी करता है

प्लेटो का सद्गुण संबंधि मत प्लेटो के अनुसार जिससे आत्मा को श्रेष्ठता प्राप्त होती है वह सद्गुण माने जायेगे

प्लेटो के अनुसार प्रत्ययों का जगत:- यह सिद्धांत निति शास्त्र से सम्बंधित नहीं हे। यह तत्व मीमांषा से सम्बंधित हे ।प्लेटो ने वास्तविक ज्ञान का स्वरूप समझने के लिए प्रत्ययों का सिद्धान्त दिया।

✍ प्लेटो कहता हे की भौतिक जगत व मानसिक जगत के आलावा प्रत्ययों का जगत भी हे प्लेटो कहता हे की भौतिक जगत व मानसिक वास्तव में प्रत्ययों की छाया मात्र हे। उसके अनुसार प्रत्ययो के जगत के बारे में जान पाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं ,इस दुनिया में कुछ प्रतिभावान व्यक्ति व निरंतर परिश्रम करने वाले व्यक्ति ही प्रत्ययों के जगत के बारे में जान सकते हे।

प्लेटो मुख्यतः चार सद्गुण स्वीकार करता है

  1. विवेक
  2. साहस
  3. संयम
  4. न्याय

प्लेटो के दर्शन में सर्वोच्च सदगुण न्याय है न्याय अहस्तक्षेप की नीति है  अर्थात समाज में रहकर अपने किए नियत सद्गुणों का समुचित रुप से पालन करना और दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है

प्लेटो की उक्त अवधारणा भारतीय दर्शन में गीता के स्वधर्म से समानता रखती है न्याय की अवधारणा ब्रैडले के सिद्धांत मेरा स्थान और उसके कर्तव्य से समानता रखता है

प्लेटो न्याय के दो भागों में विभाजित करता है

  • 1. सामाजिक न्याय का सिद्धांत
  • 2. व्यक्तिगत न्याय का सिद्धांत

प्लेटो संपूर्ण समाज को प्रमुख रूप से तीन वर्गों में विभाजित करता है

प्लेटो के दर्शन में राज्य व समाज को एक ही बताया गया हे। प्लेटो राज्य व समाज में व्यक्तियो की तिन श्रेणियां बताता हे इन श्रेणियों को प्लेटो ने कृत्रिम न बताकर प्राकृतिक बताया हे-

  • 1. प्रशासक वर्ग में विवेक रूपी सदगुण होना चाहिए
  • 2. सैनिक / योद्धा वर्ग में साहस
  • 3. कृषक/ मजदूर/ सर्वहारा वर्ग में संयम

A- राज्य व समाज में प्रथम श्रेणी के वे लोग होते हे जिनकी विवेक मूलक आत्मा सर्वाधिक विकसित होती हे ऐसे लोग राजा का कार्य करते हे(प्लेटो ने राजा को दार्शनिक राजा गार्जियन कहा हे)

B- राज्य व समाज में दूसरी श्रेणी के वे लोग होते हे जिनकी भावना मूलक आत्मा सर्वाधिक विकसित होती हे , वे लोग सेनिक का कार्य करते हे।

C- राज्य व समाज में तीसरी श्रेणी के वे लोग होते हे जिनकी इच्छामुल्क आत्मा सर्वाधिक विकसित होती हे ये लोग नागरिक का जीवन व्यतीत करते हे।

✍ प्लेटो के अनुसार जिस राज्य में विवेक वान लोग शाशक हो और शाहसि लोक सेनिक हो व नागरिक संयम का जीवन व्यतीत करते हो उस राज्य को न्याय का एक अतिरिक्त सद्गुण प्राप्त हो जाता हे।

उक्त तीनों वर्ग जब अपने लिए नियत कर्तव्यों का समुचित रुप से पालन करते हैं तब समाज में स्वतः ही न्याय की उत्पत्ति होती है न्याय सर्वोपरि है क्योंकि यह अन्य सभी सद्गुणों के मध्य संतुलन तथा सामंजस्य की स्थापना बनाए रखता है

प्लेटो मानवीय आत्मा को प्रमुख रूप से तीन भागों में विभाजित करता है

(A) बौद्विक

(B) अबौद्विक

(1) भावनात्मक

(2) वासनात्मक

अर्थात मानवीय आत्मा (1) बौद्विक, (2) भावनात्मक, (3) वासनात्मक तीन भागों में विभाजित है

प्लेटो के दर्शन में न्याय विधिगत नहीं है अपितु यह नैतिक है क्योंकि विधि में न्याय बाह्य आरोपित शक्तियों से बाधित रहता है जबकि प्लेटो के दर्शन में यह है अंतरात्मा की आवाज है न्याय की अवधारणा विशेषीकरण का सिद्धांत है

प्रसिद्ध रचना – रिपब्लिक

प्लेटो की पुष्तक:-

  1. यूटोपिया
  2. रिपब्लिक
  3. लॉज

प्लेटो का सद्गुण विषयक सिद्धांत मुख्य सदगुण के नाम से जाना जाता है, 

Important Question 

Q. प्लेटो के अनुसार न्यायसिल राज्य क्या हे?
Ans:- वह राज्य जिसमे विवेक वान राजा हो साहसी सेनिक और अधिकाँश जनता संयमित व्यतीत करे वह राज्य न्यायसिल राज्य होगा।

Q. प्लेटो के अनुसार न्याय क्या हे?
Ans:- प्रत्येक व्यक्ति को उसका निश्चित कार्य मिले वही न्याय हे।

Q. प्लेटो के अनुसार संतुलित व सामन्जस्य पूर्ण जीवन क्या हे?
Ans:- प्लेटो के अनुसार बौद्धिक व भावनात्मक दोनों पक्षो के समन्वय पर आधारित जीवन को ही संतुलित जीवन माना जाता हे। प्लेटो ने मनुष्य के जीवन में शारीरिक व बौद्धिक दोनों प्रकार के सुखो को स्वीकार किया हे किन्तु प्लेटो शारीरिक दुखो की अपेक्षा बौद्धिक सुखो को ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हे।

Q. प्लेटो के अनुसार प्रधान सदगुण या कार्डिनल वर्चून कोनसे हे?
Ans:- विवेक, शाहस,संयम और न्याय।

 

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No of Questions-40

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

धर्मवीर शर्मा अलवर, सुभाष शेरावत, लाल शंकर पटेल डूंगरपुर, Rahul Jhalawad, OMPRAKASH DHAKA churu

One thought on “Greek Ethics General introduction ( ग्रीक एथिक्स सामान्य परिचय )”

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