राजस्थान की अर्थव्यवस्था- संवृद्धि, विकास और आयोजना (Growth, development and planning )

समृद्धि (Growth)

आर्थिक समृद्धि से तात्पर्य है–यह लिया जाता है कि देश के उत्पादन में (या अधिक सही रूप में प्रति व्यक्ति उत्पादन में) समय के साथ-साथ क्या वृद्धि हुई है आर्थिक समृद्धि की जांच के लिए राष्ट्रीय आय के आंकड़ों पर गौर करना होता है

केवल परिमाणात्मक परिवर्तन राष्ट्रीय उत्पाद के आकार में परिवर्तन

आर्थिक समृद्धि से अभिप्राय किसी समय अवधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय की वृद्धि से है- सामान्यता यदि सकल राष्ट्रीय उत्पाद ,सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो रही हो तो हम कहते हैं की आर्थिक समृद्धि हो रही है

आर्थिक समृद्धी आर्थिक विकास के एक भाग के रूप में देखा गया !आर्थिक विकास की धारणा आर्थिक समृद्धि की धारणा से अधिक व्यापक है आर्थिक समृद्धि उत्पादन की वृद्धि से संबंधित है जबकि आर्थिक विकास सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक गुणात्मक और परिमाणात्मक सभी परिवर्तनों से संबंधित है

आर्थिक समृद्धि का अर्थ– आर्थिक समृद्धि का अर्थ अपने आप में स्पष्ट है और आर्थिक समृद्धि को आसानी से राष्ट्रीय आय संबंधी समग्र राशियों के रूप में मापा जा सकता है

आर्थिक समृद्धि से अभिप्राय– निश्चित समय अवधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय वृद्धि से है

आर्थिक संवृद्धि दर–शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में परिवर्तन की दर आर्थिक संवृद्धि दर कहलाती है इसको राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर भी कहा जाता है

आर्थिक समृद्धि- किसी व्यक्ति समूह क्षेत्र या देश में होने वाली मात्रात्मक प्रगति है ,समृद्धि का प्रयोग हमेशा तुलनात्मक रूप से ही होता है

उदाहरण के तौर पर- किसी देश की आय सड़क कृषि उत्पादन की मात्रा को पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष बढ़ जाना

आर्थिक समृद्धि की अवधारणा–
1- सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि
2- प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि
3- प्रति व्यक्ति निवल घरेलू उत्पाद में वृद्धि
4- सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि
5- प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि
6- प्रति व्यक्ति निवल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि

आर्थिक समृद्धि के मापक– वास्तविक राज्य आय, मुद्रित आय को जब मूल्य स्तर में भाग देते हैं तो वास्तविक आय प्राप्त होती है साधन लागत पर व्यक्त वास्तविक घरेलू उत्पादन राज्य उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय को हम सामान्यता आर्थिक समृद्धि के माप के रूप में स्वीकार करते हैं प्रति व्यक्ति आय की गणना करते समय हम जनसंख्या को भी ध्यान में रखते हैं इसीलिए हम प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि को ही आर्थिक समृद्धि की माप के लिए अधिक स्वीकार करते हैं

आयोजना ( Planning ) 

आयोजना से अभिप्राय- राज्य के अभिकरणों द्वारा देश की आर्थिक संपदा और सेवाओं की एक निश्चित अवधि हेतु आवष्यकताओं का पूर्वानुमान लगाना

भारत में नियोजित आर्थिक विकास के सूत्रधार– पंडित जवाहरलाल नेहरु थे जिन्होंने सोवियत संघ से इस मॉडल की प्रेरणा ली

  • 1930वर्ष- एम विश्वेश्वराय ने अपनी पुस्तक प्लांट इकोनॉमी ऑफ इंडिया में नियोजन के संदर्भ में पहली व्याख्या कि
  • 1944 में- ए. दलाल की अध्यक्षता में योजना और विकास विभाग गठित किया गया
  • 1946 में- अंतरिम सरकार ने योजना सलाहकार बोर्ड का गठन किया
  • 1947 में- पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कार्यक्रम समिति गठित की गई
  • समवर्ती सूची- केंद्र और राज्य दोनों को विधि बनाने का अधिकार है
  • मुंबई योजना- 1946 में मुंबई में आठ प्रमुख उद्योगपतियों द्वारा भारत के आर्थिक विकास के संदर्भ में प्रस्तुत की गई योजना
  • गांधीवादी योजना- 1944 में आचार्य श्रीमन्नारायण अग्रवाल द्वारा देश के आर्थिक विकास के लिए योजना प्रस्तुत की गई
  • जन योजना- अप्रैल 1945 से इंडियन फेडरेशन ऑफ लेबर की ओर से एम. एन. राय द्वारा प्रकाशित योजना
  • सर्वोदय योजना- 1950 में जे पी नारायण द्वारा प्रस्तुत की गई इस योजना के आधार पर 15 मार्च 1950 को योजना आयोग का गठन किया गया

नीति आयोग- योजना आयोग का गठन भारत सरकार के कार्यकाल के तहत सन 1950 में किया गया,योजना आयोग को 1 जनवरी 2015 से समाप्त कर दिया गया इस स्थान पर नीति आयोग का गठन किया गया है इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया है

राष्ट्रीय विकास परिषद– सांविधिक निकाय है नियोगी समिति की सिफारिश पर 6 अगस्त 1952 को राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन किया गया राष्ट्रीय विकास परिषद के अध्यक्ष प्रधान मंत्री होते हैं योजना आयोग राष्ट्रीय विकास परिषद के निर्देशन में कार्य करता है पंचवर्षीय योजना को अंतिम रूप से राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा अनुमोदित किया जाता है

?भारत में आर्थिक नियोजन के क्षेत्र में 3 बार योजना अंतराल उत्पन्न हो चुका है इसके अंतर्गत 7, 1 वर्षीय योजनाएं बनाई जा चुकी है

भारत में योजना अंतराल

  1. पहली योजना अंतराल- 1966-69 तक इस अंतराल को योजनावकाश कहा जाता है
  2. दूसरा योजना अंतराल- 1978 से 80
  3. तीसरी योजना अंतराल- 1990 से 92

राज्य नियोजन बोर्ड– 1999 में स्थापित किया गया यह राजस्थान की नियोजन तंत्र की शीर्ष संस्था है

राजस्थान की अर्थव्यवस्था ( Rajasthan Economy )

मुख्य रूप से कृषि कार्यों एव पशुपालन पर ही निर्भर करती है तथा कृषि के उपरान्त पशुपालन को ही जीविका का प्रमुख साधन माना जा सकता है राजस्थान मुख्यत: एक कृषि व पशुपालन प्रधान राज्य है और अनाज व सब्जियों का निर्यात करता है।

अल्प व अनियमित वर्षा के बावजूद,यहाँ लगभग सभी प्रकार की फ़सलें उगाई जाती हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में बाजरा, कोटा में ज्वार व उदयपुर में मुख्यत: मक्का उगाई जाती हैं राज्य में गेहूँ व जौ का विस्तार अच्छा-ख़ासा (रेगिस्तानी क्षेत्रों को छोड़कर) है।

ऐसा ही दलहन (मटर, सेम व मसूर जैसी खाद्य फलियाँ), गन्ना व तिलहन के साथ भी है  चावल की उन्नत किस्मों को भी यहाँ उगाया जाने लगा है। ‘चंबल घाटी’ और ‘इंदिरा गांधी नहर परियोजनाओं’ के क्षेत्रों में इस फ़सल के कुल क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है।

कपास व तंबाकू महत्त्वपूर्ण नक़दी फ़सलें हैं। हाँलाकि यहाँ का अधिकांश क्षेत्र शुष्क या अर्द्ध शुष्क है, फिर भी राजस्थान में बड़ी संख्या में पालतू पशू हैं व राजस्थान सर्वाधिक ऊन का उत्पादन करने वाला राज्य है।

ऊँटों व शुष्क इलाकों के पशुओं की विभिन्न नस्लों पर राजस्थान का एकाधिकार है।

सिंचाई की व्यवस्था अत्यधिक शुष्क भूमि के कारण राजस्थान को बड़े पैमाने पर सिंचाई की आवश्यकता है।  जल की आपूर्ति पंजाब की नदियों, पश्चिमी यमुना (हरियाणा) और आगरा नहर (उत्तर प्रदेश) तथा दक्षिण में साबरमती व ‘नर्मदा सागर परियोजना’ से होती है।

यहाँ हज़ारों की संख्या में जलाशय (ग्रामीण तालाब व झील) हैं, लेकिन वे सूखे व गाद से प्रभावित हैं। राजस्थान भांखड़ा परियोजना’ में पंजाब और ‘चंबल घाटी परियोजना’ में मध्य प्रदेश का साझेदार राज्य है।

दोनों परियोजनाओं से प्राप्त जल का उपयोग सिंचाई व पेयजल आपूर्ति के लिए किया जाता है  1980 के दशक के मध्य में स्वर्गीय प्रधानमंत्री की स्मृतिमें ‘राजस्थान नहर’ का नाम बदलकर ‘इंदिरा गांधी नहर’रखा गया, जो पंजाब की सतलुज और व्यास नदियों के पानी को लगभग 644 किलोमीटर की दूरी तक ले जाती है और पश्चिमोत्तर व पश्चिमी राजस्थान की मरुभूमि की सिंचाई करती है।

पशु धन राजस्थान में पशु-सम्पदा का विषेश रूप से आर्थिक महत्व माना गया है। राज्य के कुल क्षेत्रफल का 61 प्रतिशत मरुस्थलीय प्रदेश है,जहाँ जीविकोपार्जन का मुख्य साधन पशुपालन ही है। इससे राज्य की शुद्ध घरेलू उत्पत्ति का महत्त्वपूर्ण अंश प्राप्त होता है।

 राजस्थान में देश के पशुधन का 7 प्रतिशत था, जिसमें भेड़ों का 25 प्रतिशत अंश पाया जाता है।  भारतीय संदर्भ में पशुधन के महत्त्व को दर्शाने के लिए नीचे कुछ आँकड़े दिए गए है,

जो इस प्रकार हैं:-

  • राजस्थान में देश के कुल दुग्ध उत्पादन का अंश लगभग 10 प्रतिशत होता है।
  • राज्य के पशुओं द्वारा भार-वहन शक्ति 35 प्रतिशत है।
  • भेड़ के माँस में राजस्थान का भारत में अंश 30 प्रतिशत है।
  • ऊन में राजस्थान का भारत में अंश 40% है।
  • राज्य में भेंड़ों की संख्या समस्त भारत की संख्या का लगभग 25 प्रतिशत है।

महत्त्व राजस्थान की अर्थव्यवस्था के बारे में यह कहा जाता है कि यह पूर्णत कृषि पर निर्भर करती है तथा कृषि मानसून का जुआ मानी जाती है।इस स्थिति में पशुपालन का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

राजस्थान में पशुधन का महत्व ( Importance of livestock in Rajasthan )

राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान – राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में पशुधन का योगदान लगभग 9 प्रतिशत है।

निर्धनता उन्मूलन – निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम में भी पशु-पालन की महत्ता स्वीकार की गई है। समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम में गरीब परिवारों को दुधारु पशु देकर उनकी आमदनी बढ़ाने का प्रयास किया गया था।  लेकिन इसके लिए चारे व पानी की उचित व्यवस्था करनी होती है तथा लाभान्वित परिवारों को बिक्री की सुविधाएं भी प्रदान करनी होती हैं।

रोज़गार-सृजन – पशुपालन में ऊँची आमदनी व रोज़गार की संभावनाएँ निहित हैं। पशुओं की उत्पादकता को बढ़ाकर आमदनी में वृद्धि की जा सकती है। राज्य के शुष्क व अर्द्ध-शुष्क भागों में कुछ परिवार काफ़ी संख्या में पशुपालन करते है और इनका यह कार्य वंश-परम्परागत चलता आया है।इन क्षेत्रों में शुद्ध घरेलू उत्पत्ति का ऊँचा अंश पशुपालन से सृजित होता है।

 इसलिए मरु अर्थव्यवस्था मूलतः पशु-आधारित है।डेयरी विकास – पशुधन की सहायता से ग्रामीण दुग्ध उत्पादन को शहरी उपभोक्ताओं के साथ जोड़कर शहरी क्षेत्र की दुग्ध आवश्यकता की आपूर्ति तथा ग्रामीण क्षेत्र की आजीविका की व्यवस्था होती है।

राजस्थान देश के कुल दुग्ध उत्पादन का 10 प्रतिशत उत्पादन करता है। राज्य में 1989-1990 में 42 लाख टन दूध का उत्पादन हुआ, जो बढ़कर 2003-2004 में 80.5 लाख टन हो गया।

परिवहन का साधन – राजस्थान में पशुधन में भार वहन करने की अपार क्षमता है। बैल, भैंसे, ऊँट, गधे, खच्चर आदि कृषि व कई परियोजनाओं में बोझा ढोने व भार खींचने का काम करते हैं। देश की कुल भार वहन क्षमता का 35 प्रतिशत भाग राजस्थान के पशु वहन करते है।

देश में रेल व ट्रकों द्वारा कुल 30 करोड़ टन माल की ढुलाई होती है, जबकि बैलगाडियों से आज भी 70 करोड़ टन माल ढोया जाता है।

खाद की प्राप्ति – पशुपालन के द्वारा कृषि के लिए खाद की प्राप्ति भी होती है। इस समय जानवरों के गोबर से निर्मित “वर्मी कम्पोस्ट” खाद्य अत्यधिक प्रचलन में है। पशुधन की संरचना राजस्थान राज्य में विभिन्न प्रकार के पशु पाए जाते हैं,

जिनकी संख्या को निम्न तालिका में प्रदर्शित किया गया है:-

2003 में विभिन्न प्रकार के पशुओं की संख्या:-

  • गौवंश अथवा गाय-बैल – 1.09 करोड़
  • भैंस जाति – 1.04 लाख
  • भेड़ जाति – 1.00 करोड़
  • बकरी जाति – 1.68 करोड़
  • शेष ऊँट, घोडै़, गधे, सूअर आदि – 10 लाख इस प्रकार संख्या की दृष्टि से पशुओं में गाय-बैल तथा भेड़-बकरी प्रमुख हैं।

राजस्थान में उपलब्ध विभिन्न जानवरों, जैसे- गाय, बकरी, भेंड आदि का वर्णन निम्नलिखित है:-

1. गाय –

राजस्थान में गाय पशुपालन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। कुल पशु-सम्पदा में गौवंश का 22.8 प्रतिशत है  इसकी निम्नलिखित नस्लें राजस्थान में पाई जाती हैं-:?

  • नागौरी
  • कांकरेज
  • थारपारकर
  • राठी

भेंड़ –

देश की कुल भेंडों की लगभग 25 प्रतिशत राजस्थान में पाई जाती हैं। राज्य के लगभग 2 लाख परिवार पशुपालन कार्यों में संलग्न हैं।  यहाँ पाई जाने वाली भेड़ों की प्रमुख नस्लें इस प्रकार हैं-:?

  • जैसलमेरी भेड
  • नाली भेड़
  • मालपुरी भेड़
  • मगरा भेड़
  • पूगल भेड़़
  • मारवाड़ी भेड़
  • शेखावाटी भेड़ या चोकला
  • सोनाडी भेड़

पशुधन विकास की समस्याएँ मानसून की अनिश्चिता – राजस्थान में प्राय: सूखे की समस्या रहती है। इसी वजह से पशुओं को पर्याप्त मात्रा में चारा उपलब्ध नहीं हो पाता।

योजना एवं समन्वय का अभाव- सरकार अभी तक इस क्षेत्र के विकासके लिए एक सम्पूर्ण योजना का खाका तैयार नहीं कर पायी है, तथा समन्वय का अभाव देखा गया है। पशु स्वास्थ्य योजना – अक्सर देखा जाता है कि किसी एक बीमारी के कारण सभी पशु उसकी चपेट में आ जाते हैं। इस स्थिति को समाप्त करने के लिए योजना एवं सुविधाओं का अभाव देखा गया है।

पशु आधारित उद्योगों की कमी – राजस्थान में ऊन, दूध तथा चमड़ा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, परन्तु इन पर आधारित उद्योगों की राजस्थान में कमी होने से दूध,चमड़ा दूसरे राज्यों में निर्यात कर देने से राज्य को पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता है।

उद्योग एवं खनिज ( Industry and Minerals ) :-

राजस्थान में औद्योगिक विकास की वृहद सम्भावनाएँ हैं। इस क्षेत्र में राज्य निरंतर प्रगति कर रहा है। 1949 में पंजीकृत उद्योगों की संख्या जहाँ 207 थी  वहाँ 1988 के अन्त में 10,509 हो गई है। राज्य के कृषि प्रधान होते हुए भी, कृषि आधारित उद्योगों का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है।

साथ ही खनिजों में राज्य, 8 धात्विक और 25 अधात्विक खनिजों के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत के कुल जिप्सम का 94 प्रतिशत, एस्बेस्टोस का 83 प्रतिशत फेल्सपार का 68 प्रतिशत और चाँदी का 76 प्रतिशत यहीं से प्राप्त होता है।

प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि के बावजूद कुछ बाधाओं के कारण पर्याप्त वृद्धि नहीं हो पाई है। राजस्थान में घाटारू नामक स्थान पर प्राकृतिक गैसों के भंडार मिले हैं।

इसका प्रयोग शक्तिगृह स्थापित करने, लघु उद्योगों के लिये व खाना पकाने की गैस के लिये हो सकता है राजस्थान की औद्योगिक नीति, राजस्थान के औद्योगीकरण के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है।

मशीन तथा संयंत्र पर 60 से 75 लाख रुपये तक के विनियोग के निर्यात सम्बन्धी उद्योगों को प्रोत्साहन, रोजगारोन्मुखी उद्योगों, खादीग्रामोद्योग, हस्तशिल्प, हथकरघा तथा चर्म उद्योग जैसे लघुतम उद्योगों को प्राथमिकता दी गई है।

पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया गया है। नई औद्योगिक इकाइयों को 300 के.बी.ए. तक बिजली की कटौती से मुक्त रखा गया है। लघु एवं वृहद उद्योगों को 15 से20 प्रतिशत तक अनुदान तथा इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को बिक्रीकर में 100 प्रतिशत छूट का प्रावधान है।

राज्य सरकार ने बीमार उद्योगों को फिर चालू करने के निर्णय के साथ ही, ऐसे उद्योगों को विद्युत कटौती से मुक्त एवं न्यूनतम विद्युत शुल्क वसूल करने का निर्णय किया है। रेगिस्तानी क्षेत्र होने के कारण परिवहन के साधनों का विकास भी राज्य में अपेक्षानुरूप नहीं हो पाया।

सड़क और रेल लाइनों का मिट्टी में दब जाना या उखड़ जाना जैसे कारण प्रमुख रहे हैं। परिवहन पर प्रथम पंचवर्षीय योजना में 5.55 करोड़ रुपये खर्च किए गए। वहीं सातवीं योजना के अंत में 142.48 करोड़ रुपये इस पर खर्च हुए।

राज्य सरकार ने ग्रामों को सड़क से जोड़ने के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हाथ में लिये हैं। आठवीं योजना में यातायात के लिये 783.97 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। राजस्थान में सड़कों की लम्बाई 5,51,231 किलोमीटर है, 2,521 किलोमीटर लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग है।

रेल परिवहन के क्षेत्र में भारत सरकार ने राज्य की 1,071 किलोमीटर गेज लाइन को ब्राड गेज लाइन में बदलने की महत्त्वपूर्ण घोषणा की, जो राजस्थान की अर्थव्यवस्था के विकास को नए आयाम प्रदान करने में सहायक होगी।

राज्य में शिक्षाराजस्थान में शिक्षा का प्रतिशत 38.81 है, जो राष्ट्रीय औसत 52.11 से कम है।  साथ ही स्त्री साक्षरता में राजस्थान का स्थान सबसे नीचे है जो 20.84 प्रतिशत है। 1981-91 के दशक में शिक्षा में 8.72 प्रतिशत की वृद्धि रही है।

1991-92 में1,315 प्राथमितक विद्यालय ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए। वर्ष 1992-93 में 1,000 प्राथमिक विद्यालय खोले गए। उच्च शिक्षा पर भी पर्याप्त ध्यान दिया गया।

शिक्षा के विकास के लिये भाभा शाहयोजना, ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, सीमा क्षेत्र शैक्षिक विकास कार्यक्रम, लोक जुम्बिश जैसे कार्यक्रम राज्य में चलाए जा रहे हैं।

 

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No of Question-05

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प्रश्न. 1 केंद्रीय क्षेत्र योजना के तहत आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय द्वारा कृषि समकों की सामयिक सूचना योजना किस वर्ष से प्रारंभ की गई

Correct! Wrong!

प्रश्न.2 निम्न कथनों पर विचार कीजिए 1.चर्म प्रशिक्षण योजना 1990 में प्रारंभ की गई थी 2.ग्रामीण हाट योजना का उद्देश्य नए उद्यमियों विशेषताएं कमजोर वर्ग के हस्तशिल्पियों व दस्तकारों को विपणन सुविधा उपलब्ध कराना है 3. राज्य क्लस्टर विकास कार्यक्रम 2010 में आरंभ हुआ था उपयुक्त तथ्यों में से सही हैं

Correct! Wrong!

प्रश्न. 3 सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम 2006 के अंतर्गत पूर्व में प्रचलित उद्यमिता ज्ञापन अभिस्वीकृति प्रथम व द्वितीय स्थान पर उद्योग आधार पर मेमोरेंडम कब से प्रारंभ किया गया

Correct! Wrong!

प्रश्न. 4 राजस्थान में तेल एवं प्राकृतिक गैस के कुओं की खोज के लिए खोज के संबंध में निम्न में से सत्य कथन का चयन कीजिए

Correct! Wrong!

प्रश्न.5 निम्न में से असत्य कथन का चयन कीजिए

Correct! Wrong!

Specially thanks to ( With Regards )

ममता शर्मा, राजवीर प्रजापत

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