Guhil-Sisodia Dynasty Part 2 ( मेवाड़ के गुहिल-सिसोदिया वंश )

रणसिंह:-

रणसिंह विक्रम सिंह का पुत्र था। रणसिंह 1158 ईस्वी में मेवाड़ का शासक बनते ही आहोर के पर्वत पर एक किला बनवाया। ईसी के शासनकाल में गुहिल वंश दो शाखाओं में बट गया।

  • प्रथम (रावल शाखा):-रणसिंह के पुत्र क्षेमसिंह “रावल शाखा”का निर्माण कर मेवाड़ शासन किया।
  • द्वितीय (राणा शाखा):- रणसिंह के दूसरे पुत्र राहप ने सिसोदा ठिकाने की स्थापना कर “राणा शाखा” की शुरुआत की। ये राणा सिसोदा ठिकाने में रहने के कारण आगे चलकर “सिसोदिया” कहलाए।

क्षेमसिंह ( 1168-1172 ई ) :-

क्षेमसिंह रावल शाखा की शुरुआत कर मेवाड़ का शासक बना इसके सामंतसिंह और कुमार सिंह नाम के दो पुत्र हुए।

सामंतसिंह ( 1172-1192 ई ):-

क्षेमसिंह का पुत्र सामंतसिंह 1172 ईस्वी में मेवाड़ का शासक बना। सामंतसिंह का विवाह अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय की बहन से हुआ। नाडोल के चौहान शासक कीर्ति पाल व पृथ्वीराज द्वितीय के मध्य अनुबंध हो गई इसी कारण कीर्ति पालने मेवाड़ पर आक्रमण कर सामान सिंह को पराजित कर मेवाड राज्य छीन ली छीन लिया।

सामंतसिंह ने 1178 इसी के लगभग वागड़ में जाकर अपना नया राज्य बनाया जिस की नई राजधानी वटपद्रक (बड़ौदा-डूंगरपुर मे) थी।क्षेमसिंह के छोटे पुत्र कुमार सिंह ने 1179 ईस्वी में कीर्तिपाल को पराजित कर मेवाड़ का शासक बना।

राजमाता कर्मदेवी:-

कर्मदेवी मेवाड़ के शासक राजा सामंतसिंह की पटरानी थी। सामंतसिंह पृथ्वीराज चौहान तृतीय की तरफ से 1192 ईस्वी में मोहम्मद गौरी के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया। सामंतसिंह के बाद उसका अल्पवयस्क पुत्र ‘कुमार सिंह/कर्णसिंह’ मेवाड़ का शासक बना।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने मेवाड़ को जीतने के लिए मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। राजमाता कर्म देवी ने मेवाड़ की सेना का नेतृत्व करते हुए आमेर के निकट तुर्क सेना को पराजित किया।

जैत्रसिंह (1213 – 1261ई )

13 वीं शताब्दी के प्रारंभ में मेवाड़ का शासक जैत्रसिंह बना। इसके शासन काल से पूर्व नाडोल के चौहान वंश वंशीय कीतू/ कीर्ति पाल ने मेवाड़ पर अधिकार स्थापित किया था। इस बैर के बदले में जैत्रसिंह ने समकालीन चौहान वंश के शासक उदय सिंह के विरुद्ध नाडोल पर चढ़ाई कर दी। नाडोल को बचाने के लिए उदयसिंह ने अपनी पुत्री रूपा देवी (चचिक देवी) का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह के साथ कर मेवाड़ और नाडोल के बैर को समाप्त किया।

जैत्रसिंह के समय दिल्ली सल्तनत का गुलाम वंश के बादशाह इल्तुतमिश का शासन था।इल्तुतमिश ने जैत्रसिंह के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए मेवाड़ की राजधानी नागदा पर 1222-29 ईस्वी में आक्रमण किया और इसे तहस-नहस कर दिया। इसी कारण जैत्रसिंह ने पहली बार अपने राज्य की राजधानी चित्तौड़ को बनाई।

उसके बाद जैत्रसिंह व इल्तुतमिश के मध्य 1227 ईस्वी में “भुताला का युद्ध” हुआ, जिसमें जैत्रसिंह इल्तुतमिश को बुरी तरह पराजित किया। जिसके बारे में जयसिंह सूरी कृत “हम्मीर हद मर्दन” नामक पुस्तक से जानकारी मिलती है।

जैत्रसिंह के वंशज कुम्भकर्ण ने नेपाल में इस वंश की नींव डाली। इसी की शासनकाल में मंगोल आक्रमणकारी चंगेज खान का आक्रमण हुआ।

 Note:- कर्नल जेम्स टॉड ने 1201 ईस्वी में इल्तुतमिश की सेना को नागौर के पास युद्ध में परास्त करना बताया है।

जैत्रसिंह के प्रसिद्ध सेनापति बालक और मदन थे। जैत्रसिंह का गुजरात के शासक त्रिभुवन पाल के साथ युद्ध हुआ जिसमें वीरधवल के मंत्रियों वस्तुपाल और तेजपाल ने संधि करने का जैत्रसिंह को भेजा।जैत्रसिंह ने यह संधि करने से मना कर दिया।

Note:-जैत्रसिंह के अंतिम समय में 1248 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद ने मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया।

डॉ.ओझा ने जैत्रसिंह की प्रशंसा में लिखा है कि “दिल्ली के गुलाम सुल्तानों के समय में मेवाड़ के राजाओं में सबसे प्रतापी और बलवान राजा जैत्रसिंह हुआ। जिसकी विरता की प्रशंसा उसके विपक्षियों ने भी की है।”
डॉ दशरथ शर्मा जैत्रसिंह के काल को “मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल” मानते हुए जैत्रसिंह को “मेवाड़ की नवशक्ति का संचारक” कहा है।

तेजसिंह(1250-1273):-

जैत्रसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र तेज सिंह मेवाड़ का शासक बना।तेज सिंह एक प्रतिभा संपन्न शक्तिशाली शासक था। तेजसिंह ने ” परम भट्टारक/ महाराजाधिराज/ परमेश्वर तथा चालुक्यों के समान उभापति/वरलब्ध प्रौढ़ प्रताप” का विरुद्ध धारण किया था। तेजसिंह के शासनकाल में 1253-54 ईस्वी में दिल्ली के शासक गयासुद्दीन बलबन ने मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया।

तेज सिंह की रानी जयतल्लदेवी ने चित्तौड़ में श्याम पार्श्वनाथ के मंदिर का निर्माण करवाया। तेजसिंह के शासनकाल में 1267 ईस्वी में आहड़ नामक स्थान पर मेवाड़ चित्रकला शैली का प्रथम चित्रित ग्रंथ “श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णी” का चित्रण किया गया था।

समर सिंह (1273-1301):-

तेजसिंह के बाद उसका पुत्र समरसिंह 1273 ईस्वी में मेवाड़ का शासक बना। समरसिंह को कुंभलगढ़ प्रशस्ति में “शत्रुओं की शक्ति का अपहर्ता”लिखा गया है जबकि आबू शिलालेख में उसे “तुर्कों से गुजरात का उद्धारक’ लिखा गया है।

चिरवे के लेख में उसे “शत्रुओं का संहार करने में सिंह के सदृश्य और सुर” कहा गया है।

Note:-

  • अचंलच्छ की पट्टावली से स्पष्ट होता है कि आचार्य अमितसिंह सूरि के प्रभाव में समरसिंह ने अपने राज्य में जीव हिंसा पर रोक लगा दी थी। समर सिंह के दो पुत्र रतन सिंह व कुंभकरण हुए।
  •  संन1299 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति उलूग खाँ गुजरात अभियान के लिए जा रहा था तब समरसिंह ने उस शाही सेना से दंड लेकर उसे आगे बढ़ने दिया। यह जानकारी हमें जैन आचार्य जिन प्रभसूरि के “तीर्थकल्प” से मिलती है।
  • कुंभकरण अपने पिता से आज्ञा प्राप्त कर नेपाल चला गया और वहां अपने नए गुहिल वंश की स्थापना की। समरसिंह का दूसरा पुत्र रतनसिंह चित्तौड़ का शासक बना।इसकी जानकारी हमें कुंभलगढ़ प्रशस्ति तथा एकलिंग महात्म्य ग्रंथ से मिलती है।

रावल रतन सिंह (1302 -1303ई )

जैत्र सिंह के वंशज समर सिंह के दो पुत्र रतन सिंह व कुंभकरण । कुंभकरण नेपाल चला गया वह वहां इस राजवंस की निव डाली 1302 ई. में समरसिंह का पुत्र रतन सिंह चितोड़ का शासक बना रावल रतन सिंह के शासनकाल की प्रमुख चित्तौड़ घटना में प्रथम साका था

दिल्ली के सुल्तान अलाहुद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर 28 जनवरी 1303 इसमें आक्रमण किया था वह 26 अगस्त 1303 चित्तौड़ का किला जीत लिया था मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत अनुसार युद्ध रावण रतन सिंह की पत्नी रुपवती महारानी पद्मिनी के लिए हुआ था इस युद्ध में रावण रतन सिंह मारे गए रानी पद्मिनी ने 1600 दासियों के साथ मिलकर जौहर किया यह जौहर मेवाड का प्रथम शाका कहलाया है।

इस युद्ध में गोरा वे बादल दो वीरो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई मैं वीरगति को प्राप्त हुए खिलजी ने चित्तौड़ का किला अपने पुत्र खिज्र खा को सौपकर उसका नाम खिज्राबाद रखा चित्तौड़ के प्रथम साके के इतिहासकार वे कवि अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के साथ है

खिलजी का चित्तौड़ पर आक्रमण करने के मुख्य कारण

  • अलाउद्दीन का महत्वाकांक्षी और सामराज्य वादी हो ना
  • चित्तौड़ दुर्ग का सामरिक महत्व
  • रावल रतन सिंह सुंदर रानी को प्राप्त करने के लालसा

रतन सिंह की मृत्यु के साथ रावल शाखा समाप्त हो गई,  चितोड़ के शासक रतन सिंह के पश्चात गुहिल शाखा का अंत हुआ तथा गुहिलवंश को सिसोदिया वंश के रूप में जाना गया . इस शाखा का उद्भव “सिसिद्द” गाँव को माना जाता है

राणा हम्मीर (1326-64 ई.)

राणा हम्मीर लक्ष्मण सिंह का पोता व  सिसोदा गांव का जागीरदार राणा आरीसिंह का पुत्र था। गुहिल वंश को एक शासक रणसिंह के पुत्र राहूप ने सिसोदा में राणा शाखा की नींव रखी। हम्मीर सिसोदिया वंश का संस्थापक तथा मेवाड़ के उद्घारक माना जाता है

मेवाड़ राज्य के इस शासक को “विषम घाटी पंचानन” के नाम से जाना जाता है राणा हम्मीर को विषम घाटी पंचानन की संज्ञा राणा कुम्भा ने कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में दी हम्मीर ने चितोड़ में बरवड़ी माता का भव्य मंदिर बनाया जो आज अन्नपूर्णा मन्दिर के नाम से जाना जाता है।

सिंगोली का युद्ध- राणा हम्मीर व दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के बीच मे सिंगोली नामक स्थान पर युद्ध हुआ वर्तमान में सिंगोली नामक स्थान उदयपुर में स्थित है

1364 ई. में इनकी मृत्यु हो गई

क्षेत्र सिंह (1364- 1382 ई. )

हम्मीर के पश्चात उसका पुत्र खेता उर्फ क्षेत्र सिंह मेवाड़ के शासक बना।

राणा लाखा (1382-1397 ई.)

क्षेत्र सिंह के पश्चात उसका पुत्र लाखा मेवाड़ के शासक बना। इनके काल में जावर में चांदी की खानों का पता चला। इनके काल मे एक बंजारे ने पिछोला झील का निर्माण करवाया। लाखा ने मारवाड़ के शासक राव चूंडा की पुत्री हंसाबाई से विवाह किया था।

राणा लाखा एक विद्वान शासक होने के साथ-साथ एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ भी थे इनके दरबार मे दो प्रशिद्ध संगीतज्ञ मेवाड़ दरबार की शोभा बढ़ाते थे जिन्हें धनेश्वर भट्ट व झोटिंगभट्ट के नाम से जाना जाता था।

हंसाबाई- हंसाबई मारवाड़ के राठौड़ राव चुडा की पुत्री व राठौड रणमल की बहन थी जिनका विवाह मेवाड़ महाराणा लाखा सिहं से इस शर्त पर हुआ था की उनसे उत्पन्न पुत्र ही मेवाड का राजा होगा।

इस शर्त के आधार पर मेवाड़ के राजा महाराणा लाखा के बाद हंसा बाई से उत्पन्न पुत्र मोकल महाराणा बने। मोकल के पक्ष में राजपाट त्यागने की भीष्म प्रतिज्ञा महाराणा लाखा के बड़े पुत्र चूडा ने की व अपना राज्याधिकार छोड़ा।

इस विवाह के बाद हंसा बाई और राठौडों के षड्यंत्र से मेवाड़ की आंतरिक स्थिति शोचनीय हो गई। भीष्म प्रतिज्ञा के कारण चूड़ा को राजस्थान का भीष्म पितामह भी कहा गया

कुंवर चुंडा- चुंडा राणा लाखा का बड़ा पुत्र था। जिसे राजपुताने का भीष्म कहा जाता है

मोकल (1397 -1433 ई.)

राणा लाखा का हंसाबाई से उत्पन्न पुत्र था। छोटी अवस्था होने के कारण मेवाड़ के राज काज इनके मामा रणमल (मारवाड़) के सहयोग से चला गया। मोकल ने समिधेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

मोकल की हत्या चाचा, मेरा तथा महपा पंवार द्वारा की गई। राणा मोकल के शासनकाल में संगीत का भी विकास हुआ इसके शासनकाल में दो प्रशिद्ध संगीतज्ञ योगेश्वर भट्ट व विश्नुभट्ट दरबार की शोभा बढ़ाते थे।

राणा मोकल को स्थापत्य कला से प्रेम था इसके दरबार मे फना, मना, विशल नामक वास्तुकार शोभा बढ़ाते थे, एकलिंग जी के मंदिर के परकोटे का निर्माण।

महाराणा कुंभा (1433-66) 

  • जन्म- 1403ई. में देवगढ़ के समीप
  • पिता –मोकल ( ज्येष्ठ पुत्र )
  • माता- सौभाग्य देवी

उपाधियाँ-

‘महाराजाधिराज, रावराय, राणेराय, राजगुरू, हिंदू सुरताण अभिनवभरताचार्य, रणेरासो, हालगुरू (शासन कला का सर्वोच्च शासक), राजगुरू, दानगुरू, परमगुरू, नरपति, अखपति, गैनपति व छापगुरू (छापामार युद्ध पद्धति में निपुण) प्रमुख उपाधियाँ थी। मुस्लिम शासकों ने हिंदूसुरताण की उपाधि दी थी।

  • महाराजाधिराज :- राजाओ का राजा होने के कारण
  • महाराणा:- अनेक राज्यो को अपने अधिकार में रखने के कारण।
  • राणो-रासो:- विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण ।।
  • राजगुरु:- राजनीतिक सिद्धान्तों में दक्ष होने तथा विभिन्न सामन्तो व जागीरदारों का हितेषी होने के कारण ।।
  • दानगुरु:– विद्वानों कलाकारों व निर्धनों को दान देने के कारण ।
  • हालगुरु:- गिरि दुर्गों का स्वामी होने के कारण/पर्वतीय दुर्गों पर विजय हाशिल करने के कारण ।
  • परमगुरु:- विभिन्न विधाओं का ज्ञाता तथा अपने समय का सर्वोच्च शासक होने के कारण ।।

प्रसिद्ध गीत गोविंद नामक पुस्तक पर लिखी टीका “रसिक प्रिया” में भी कुम्भा की निम्न उपाधियों का वर्णन मिलता है :-

  • नरपति:- सामान्य मानव से श्रेष्ठ होने के कारण।।
  • अश्वपति:- खुशल घुड़सवार होने के कारण।।
  • गणपति:- राज्यो का राजा होने के कारण ।।
  • छापगुरु:- छापामार युद्ध पद्वति में निपुण होने के कारण।।
  • हिन्दू सुरताण:- समकालीन मुस्लिम शासकों द्वारा (हिन्दुओ की रक्षा करने वाला) विभूषित किया गया ।।
  • नाटकराज कर्ता :- नृत्य शास्त्र का ज्ञाता होने के कारण।।
  • शैलगुरु:- युद्व में निपुण होने के कारण ।।
  • चापगुरु:- धनुर्विद्या का ज्ञाता होने के कारण
  • अभिनव भरताचार्य :- श्रेष्ठ विणा वादक एंव संगीत के क्षेत्र में विपुल ज्ञान के कारण (संगीत प्रेम के कारण) ।।
  • प्रजापालक :- जनता का हितैषी होने के कारण ।।

कुंभा के द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध

अर्बली का युद्ध:- कुंभा व जोधा के मध्य लड़ा गया जिसमें जोधा पराजित हुआ।

सारंगपुर का युद्ध(1437) :- कुंभा व मालवा के शासक महमूद खिलजी व के मध्य लड़ा गया जिसमें महमूद खिलजी की हार हुई इस विजय के उपलक्ष में विजय स्तम्भ (चितोड़ 122 फुट, 9 मंजिले) का निर्माण करवाया।

चम्पानेर की संधि (1453ई.) :- यह संधि मालवा के महमुद खिलजी प्रथम तथा गुजरात के कुतुबुद्दीन के बीच हुई। जिसके अनुसार कुम्भा को हराकर उसके राज्य को आपस मे बाँट लेना था। किन्तु दोनो कुम्भा को हरा नही पाए थे

कुंभा की स्थापत्य कला को विशेष देन है कविराज श्यामलदास के अनुसार कुंभा ने मेवाड़ राज्य में 84 में से 32 दुर्गो का निर्माण करवाया।कुंभा ने अपनी पत्नी कुंभलदेवी की स्मृति में कुंभलगढ़ का निर्माण किया इसे मछिन्दरपुर के नाम से भी जाना जाता है। इसमें बने कुंभा के महल को कटारगढ़ कहते है।

रणकपुर मंदिर का निर्माण पोरवाल जैन श्रावक धारणशाह था। इसका प्रधान शिल्पी दैपाक था

कीर्ति स्तभ (विजयस्तंभ)-

  • कीर्ति-स्तंभ के सूत्रधार जेता थे जिसकी सहायता इनके पुत्र नापा व पूंजा ने की थी। यह स्तंभ 120 फुट ऊँचा तथा 30 फुट चौड़ा है।  इसमें 157 सिढ़ियाँ है। यह नौ मंजिला है अतः इसे नौ खण्डा महल भी कहते है।  इसे हिन्दू मूर्तिकला काविश्वकोष भी कहा जाता है।
  • डॉ.उपेन्द्रनाथ डेने इसे विष्णु-स्तंभ कहा है। क्योंकि इस स्तभ के मुख्य द्वारा पर भगवान विष्णु की मूर्ति है।
  • फर्ग्यूसनने लिखा है कि “ये रोम के टार्जन के समान है। लेकिन इसकी कला उसकी अपेक्षा अधिक उन्नत है। यह रोमन कला कृतियों से कहीं अधिक’ उत्कृष्ठ कलाकृति है।”
  • कीर्ति सतंभ की तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में नौ बारअल्लाह लिखा हुआ है जो कृम्भा की धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है। इसे, हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर भी कहते है।

कुंभा में चित्तौड़ में कुंभश्याम व वराहमंदिर का निर्माण करवाया तथा एकलिंग जी में मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया। कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति की रचना अत्रि, कवि और महेश ने की थी। अत्रि की मृत्यु हो जाने पर महेश ने इसे पूर्ण किया।

मण्डन कुंभा का मुख्य वास्तुकार था जिसने कुंभलगढ़ दुर्ग ही रचना की। वास्तुकार मण्डन गुजरात निवासी था, इसकी छतरी शिक्षा नदी के किनारे उन्जैन में बनी हुई है। इसी स्थान पर दुर्गादास राठौड की छतरी भी है। मण्डन ने राजवल्लभ, प्रसादमण्डन, वास्तु मण्डल, रूप मण्डल, व देवमूर्ति प्रकरण नामक ग्रंथ की रचना की। मण्ड़न के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी लिखी तथा उसके पुत्र गोविदं ने उद्धार धोरिणी, कलानिधि व द्वारदीपिका नामक ग्रंथ की रचना की।

कुंभा ने संगीतराज, संगीत मीमांसा व सूडप्रबंध नामक संगीत ग्रंथों की रचना की। चण्डीशतक की व्याख्या तथा गीत गोविंद पर रसिकप्रिया नाम की टीका लिखी। संगीत रत्नाकर की टीका तथा कामराजरतिसार लिखा।

कुंभा को नाट्यशास्त्र का अच्छा ज्ञान था तथा वे वीणा बजाने में भी अति निपुण थे। कान्हव्यास एकलिंग महात्म्य का लेखक था तथा कुंभा का वैतनिक कवि था। जेनाचन्द हीरानंद कुम्भा के गुरु थे तथा श्रीसारंगव्यास कुंभा के संगीत गुरू थे। रमाबाई कुंभा की पुत्री, जो संगीतशास्त्र की ज्ञाता थी।

जावर में जोगिनीपुर मंदिर का निर्माण करवाया। राणा कुम्भा ने बदनोर(भीलवाड़ा) में कुशलामाता के मंदिर का निर्माण करवाया। कान्ह, व्यास, द्वारा रचित एकलिंग-महात्म्य पुस्तक का प्रथम भाग “राजवरर्ण” स्वय कुम्भा द्वारा लिखा है

वृद्धा अवस्था में कुम्भा को उन्माद रोग हो गया था। कुम्भलगढ़ दुर्ग में कुम्भा की हत्या उसके पुत्र उदा ने 1468 में कर दी थी।

जैन कीर्ति स्तंभ- 11वीं सदी में निर्मित यह इमारत खवासन स्तंभ के नाम से जानी जाती है। इसका निर्माण बघेर वंशीय शाह जीजा के द्वारा करवाया गया था। इसमें प्रमुख रूप से आदिनाथ की मूर्ति स्थापित है। यह इमारत 7 मंजिल है, इसकी ऊँचाई 75 फुट है। यह इमारत चित्तौड़ में ठीक विजय स्तंभ के सामनेस्थित है।

भारमली – भारमली, सोभाग्य देवी (महाराणा कुंभा की माता) की दासी और मारवाड़ के राठौड़ रणमल की प्रेमिका थी। महाराणा कुंभा के समय जब मेवाड़ के प्रशासन में रणमल का अत्याधिक हस्तक्षेप था तो मेवाड़ के सामंतों ने रणमल की प्रेमिका को अपनी और मिला कर षणयंत्र के द्वारा रणमल की हत्या करवा दी

इसी ने भेद खोला की मेवाड़ पर राठौडो का अधिकार हो जाएगा इस भेद का पता चलने पर महाराणा कुंभा ने 1438 ई.में राठौर रणमल की महपा पवार से हत्या करवा दी थी उसके बाद चूडा ने मंडोर पर अपना अधिकार कर लिया था

रमाबाई- महाराणा कुंभा की पुत्री थी। एक प्रख्यात संगीतज्ञ थी। रमाबाई को साहित्य में “वागेश्वरी” नाम से संबोधित किया गया जो इनकी संगीत पटुता का परिचायक है। रमा बाई का विवाह जूनागढ़ के यादव राजा मंडलिक के साथ हुआ था। राजा मंडलिक मुग़ल शाह बेगड़ा से युद्ध में हारा था। युद्ध के बाद इसने मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया था।

जावर प्रशस्ति से स्पष्ट है कि रमाबाई संगीत शास्त्र में सिद्धहस्त थी। रमाबाई ने जावर में रामकुंड तथा राम मंदिर का निर्माण करवाया। जावर को उस समय योगिनी पट्टन के नाम से जाना जाता था

राणा संग्राम सिंह/राणा सांगा(1509-1528)

राणा सांगा रायसिंह या रायमल सिंह का पुत्र था। इनकी माता का नाम रतन कुँवरी था। सांगा मेवाड़ का सबसे प्रतापी शासक था, जो हिंदुपत कहलाता था।

राणा सांगा को सैनिको का भग्नावशेष कहते है। सन 1519 में गागरोन (झालावाड़) युद्ध मे मालवा के शासक महमूद खिलजी द्वितीय को हराकर बन्दी बनाया फिर रिहा किया। राणा सांगा ने खातोली(बूंदी) के युद्ध (1517) व बाड़ी(धौलपुर) के युद्ध(1518 ई) में दिल्ली के अफगाना शासक इब्राहिम लोदी को हराया.

17 मार्च,1527 ई को बाबर तथा राणा सांगा के बीच खानवा का युद्ध लड़ा गया जिसमें सांगा पराजित हुए

30 जनवरी, 1528 को कालपी में सरदारों द्वारा विष दिये जाने के कारण सांगा की मृत्यु हुई, मांडलगढ़ में राणा सांगा का अंतिम संस्कार किया गया। सांगा वह अंतिम हिन्दू राजा था, जिसके सेनापतित्व में सब राजपूत जातियां विदेशियों को भारत से बाहर निकालने के लिए सम्मिलित हुई थी।

विक्रमादित्य (1531- 1536)

राणा सांगा का अल्पवयस्क पुत्र था माता का नाम हाडा रानी कर्णावती अथवा कमलावती। माता कमलावती ने संरक्षिका के रूप में काम किया । कर्णावती ने बहादुरशाह (गुजरात) के आक्रमण के समय (1533 ई.) में हुमायू को सहायता हेतु राखी भेजी लेकिन हुमायू ने सहायता नही की।

सन 1534 में बहादुरशाह ने पुनः चितोड़ पर आक्रमण किया । इस युद्ध मे चितोड़ की सेना का नेतृत्व देवलिया के रावत बाघ सिंह ने किया। रानी कर्णावती ने जौहर किया। ये चितोड़ का दूसरा शाका है।

रानी कर्मावती

रानी कर्मावती राणा राव नरबद की पुत्री व महाराणा सांगा की प्रीति पात्र महारानी जिनके विशेष आग्रह पर राणा सांगा ने रणथंम्भौर का इलाका अपने बड़े पुत्र रत्नसिह के स्थान पर विक्रमादित्य और उदयसिह को दिया तथा बूंदी हाड़ा सूरजमल को उन का संरक्षक नियुक्त किया।

कर्मावती ने बाबर से इस बात के लिए संपर्क किया था कि अगर बाबर उसके पुत्र विक्रमादित्य को चित्तौड़ का शासक बनाने में सहायता करेगा तो उसे रणथंम्भौर का किला दे दिया जाएगा लेकिन इसके पूर्व भी 1530 में बाबर की मृत्यु हो गई।

महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद विक्रमादित्य के समय गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने 1533 में चित्तोड़ पर आक्रमण किया तब रानी कर्मावती ने हुमायूं को राखी बंद भाई बना कर सहायता मांगी लेकिन सहायता ना मिलने पर उसने सुल्तान से संधि कर ली लेकिन 1534- 35 में सुल्तान ने पुन: चित्तौड़ पर आक्रमण किया इस युद्ध मे कर्मावती में वीरता से सामना किया और रावत बाघसिह और राणा सज्जा, सीहा के वीरगति प्राप्त करने पर जौहर किया इस जौहर को चित्तौड़ का दूसरा जौहर कहा जाता है।

इस युद्ध के समय विक्रमादित्य और उदय सिह को बूंदी भेज दिया गया। वहां देवलिया के रावत बाघ सिहको महाराणा का प्रतिनिधि बनाया गया।

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No of Questions-30

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

श्रवण कुमार सहारण, दयाराम जाट भेरुन्दा, दिनेश मीना-झालरा टोंक, P K Nagauri, कुम्भा राम हरपालिया, मंगेज कुमार चूरू

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