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Guhil-Sisodia Dynasty Part 3 ( मेवाड़ के गुहिल-सिसोदिया वंश )

बणवीर (1536-1537)

बणवीर सांगा के भाई पृथ्वीराज की दासी (अनोरस ) का पुत्र था। बणवीर ने विक्रमादित्य की हत्या की थी पन्नधाय ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान देकर राजकुमार उदयसिंह की रक्षा की थी।

पन्ना धाय

पन्ना धाय चित्तौड़गढ़ के पास स्थित माताजी की पांडोली गांव के निवासी हरचंद हकला की पुत्री थी और सूरजमल चौहान की पत्नी थी। मेवाड़ की स्वामी भक्त पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर महाराणा उदयसिंह को दासी पुत्र बनवीर से बचाया।

पन्ना धाय उदय सिंह को लेकर कुंभलनेर पहुंची वहां के किलेदार आशा देवपुरा ने उन्हें अपने पास रखा। स्वामी भक्ति के लिए अपने पुत्र के बलिदान का यह अनुपम उदाहरण है।

राणा उदयसिंह द्वितीय (1537-1572)

उदयसिंह द्वितीय सन 1537 में मालदेव (मारवाड) की सहायता से मेवाड़ के शासक बना। सन 1568 में अकबर ने चितोड़ पर कब्जा कर लिया। इस युद्ध मे जयमल व फता शहीद हुए। फूलकंवर के नेतृत्व में जौहर हुआ। यह चितोड़ का तीसरा साका कहलाता है

प्रशिद्ध लोकदेवता कल्लाजी राठौड़ भी इसी युद्ध मे शहीद हुए थे। गोगुन्दा में 1572 ई उदयसिंह की मृत्यु हुई एवं वन्ही इनकी छतरी बनी हुई है।

महाराणा प्रताप ( 1572-1597 )

उदय सिंह व जयवंता बाई के पुत्र प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 ईस्वी कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ। इनको 26 फरवरी, 1572 ईस्वी को गोगुंदा में सिंहासन पर बिठाया गया।

प्रताप का राज्याभिषेक समारोह कुंभलगढ़ में किया गया।  प्रताप को मेवाड़ केसरी, हल्दीघाटी का शेर, राणा कीका (छोटा बच्चा) व पाथल के नाम से भी जाना जाता है।

महाराणा प्रताप को अकबर की अधीनता स्वीकार कराने के लिए अनेक मुगल दूत आए। उनमें जलाल खान कोरची (1572), मानसिंह (1572), भगवानदास (1573), टोडरमल (1573) प्रमुख थे।

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को महाराणा प्रताप एवं अकबर की सेना के बीच लड़ा गया जिसमें महाराणा प्रताप की पराजय हुई हल्दीघाटी युद्ध को कर्नल टॉड ने “मेवाड़ की थर्मोपली” कहा।

अबुल फजल ने हल्दीघाटी के युद्ध को “खमनोर का युद्ध कहा”।  बन्दायूनी ने हल्दीघाटी के युद्ध को “गोगुंदा का युद्ध” कहा। हल्दीघाटी के युद्ध में विख्यात मुगल लेखक बदायूनी भी उपस्थित था। उसने अपनी पुस्तक “मुतखाब-उत-तवारीख़” में युद्ध का वर्णन किया।

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात अकबर ने मेवाड़ में चार प्रमुख थाने स्थापित करवाए जो मेवाड़ के चारों ओर स्थित थे। वे डूंगरपुर की घाटियों में, देवल उदयपुर में, देबारी पाली में, देसूरी व अजमेर में दिवेर थे। हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप के हरावल दस्ते में अफगान हकीम खान सूर, राणा पूंजा भील, राम सिंह तंवर, (ग्वालियर) शामिल थे।

महाराणा प्रताप का मुस्लिम सेनापति “हकीम खान सूर” था। हकीम खान सूर का मकबरा खमनोर (राजसमंद) में स्थित है। प्रताप के अश्व का नाम चेतक था। हल्दीघाटी के पास चेतक स्मारक बना हुआ है।

प्रताप के हाथी का नाम रामप्रसाद था। हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात मान सिंह कछवा ने इसे अकबर को भेंट किया। अकबर ने इस हाथी का नाम पीर प्रसाद रखा।

कुंभलगढ़ का युद्ध(1578)-स युद्ध में मुगल सेनापति शाहबाज खान ने महाराणा प्रताप को हराया। प्रताप ने अपनी राजधानी गोगुंदा से केलवाड़ा बनाई फिर चावंड में स्थानांतरित की।

दिवेर के युद्ध (1582)-  प्रताप ने अकबर के चाचा व मुगल सेनापति सुल्तान खान को हराया यहां उनके पुत्र अमर सिंह ने अद्भुत वीरता प्रदर्शित की। दिवेर युद्ध के बाद में ही प्रताप की विजयों का पुनः श्री गणेश माना जाता है। दिवेर के युद्ध को कर्नल टॉड ने “मेवाड़ का मैराथन” कहा।

Note- वास्तविक मैराथन का युद्ध (490 ईस्वी) में हुआ जिसमें एथेस वासियों ने ईरानियों (दाराअथवा डेरियस )को हराया।

सन 1585 से 1615 ईसवी तक मेवाड़ की राजधानी रही। 19 जनवरी 1597 को प्रताप का 57 वर्ष की आयु में देहांत हो गया।

चावंड मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रही थी। बांडोंली गांव में प्रताप की 8 खंभों वाली छतरी बनी हुई है जिसका निर्माण अमर सिंह ने करवाया।

महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597-1620ई.)

अमरसिंह प्रथम महाराणा प्रताप के पुत्र थे। प्रताप के देहांत के बाद चावंड में उनका राज्याभिषेक हुआ। सन 1615 ई. में जहांगीर की खुर्रम व अमरसिंह के बीच संधि हुई जिसे मुगल-मेवाड़ संधि के नाम से जाना जाता है। इसके द्वारा मेवाड़ ने भी मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। संधि से मुगल-मेवाड़ संघर्ष का अंत हुआ।

कला व साहित्य में प्रगति के कारण अमरसिंह का काल “राजपूत काल का अभ्युदय” कहा जाता है। 26 जनवरी,1620 ई. को उदयपुर में अमरसिंह का देहांत हो गया। उनका अंतिम संस्कार आहड़ के निकट गंगोदभव के पास किया गया।

महाराणा अमरसिंह प्रथम के बाद सभी महाराणाओं की छतरिया गंगो गांव में बनाई गई।

हरिदास झाला-  महाराणा अमरसिंह के प्रधान सेनापति हरिदास झाला को मेवाड़ की सैन्य व्यवस्था का प्रभारी बनाया गया इनके निर्देशन में ही मेवाड़ की सेना का पुनर्गठन किया गया।

महाराणा कर्णसिंह (1620-28) 

अमरसिंह प्रथम के पुत्र। जहांगीर के विरुद्ध विद्रोह करने वाला इसका पुत्र खुर्रम इनके पास भी आया था। वह देलवाड़ा की हवेली व जगमन्दिर में रहा। कर्णसिंह ने ही पिछोला झील में जगमन्दिर महलों को बनवाना शुरू किया, जिसे उसके पुत्र जगतसिंह प्रथम ने पूरा करवाया ।

महाराणा कर्णसिंह द्वारा उदयपुर में दिलकुश महल एवं कर्णविलास महलों का भी निर्माण कराया

महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628-52 ई.) 

 

कर्णसिंह के पश्चात शासक बने जो बहुत दानी था। इन्होंने जगन्नाथ राय (जगदीश), का भव्य विष्णु मंदिर बनवाया। यह पंचायतन मन्दिर शैली में बनवाया गया है। इसे ” सपनो से बना मन्दिर” भी कहते है।

यह मंदिर अर्जुन की देख रेख में शिल्पी भाणा सुथार व उसके पुत्र मुकुंद द्वारा बनाया गया। जगदीश मन्दिर के पास धाय का मंदिर महाराणा की धाय नोजूबाई ( नोजूबाई मेवाड़ की प्रसिद्ध महिला सन्त थी )द्वारा बनवाया गया। जगन्नाथ राय प्रशस्ति के रचयिता कृष्ण भट्ट थे।

महाराणा राजसिंह (1652-1680 ई.)

जगत सिंह प्रथम के पश्चात राज सिंह मेवाड़ के शासक बना। मेवाड़ के महाराणाओं में राज सिंह को ‘विजयकटकातु’ के नाम से जाना जाता है,। राज सिंह ने राजसमंद झील (नींव 1662 ई.) का निर्माण करवाया ( गोमती नदी पर )

राजसिंह ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती (रूपसिंह की बहन ) से विवाह किया जिससे औरंगजेब स्वयं विवाह करना चाहता था औरंगजेब की राजसिंह के प्रति नाराजगी का कारण चारुमती प्रकरण था।

राजसिंह ने औरंगजेब द्वारा लगाये गए “जजिया कर” (एक धार्मिक कर 1679 ई.) को देने से मना कर दिया। राजसिंह ने उदयपुर में अम्बामाता का तथा कांकरोली में द्वारिकाधीश का मंदिर बनवाया।

राजसिंह ने राजसमंद के पास राजनगर कस्बा बसाया। महाराणा राजसिंह की पत्नी “रामरसदे” ने त्रिमुखी की प्रसिद्ध बावड़ी का निर्माण कराया था। ये बावड़ी राजनगर(राजसमन्द) में देखी जाती है

महाराणा राजसिंह, कुम्भा, सांगा, व प्रताप के आदर्शो पर चलने वाला शासक था।

राज प्रशस्ति- राजसमन्द झील के उत्तरी भाग पर जिसे नोचौकी के नाम से जाना जाता है वँहा 25 शिलाओ पर संस्कृत में एक शिलालेख खुदवाया गया. इस शिलालेख को रणछोड़ भट्ट ने लिखा था। ये शिलालेख भारत का ही, बल्कि विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख है,.।

इस शिलालेख को राजसिंह के उत्तराधिकारी महाराणा जयसिंह ने एक निश्चित स्थान पर लगवाया था. इस शिलालेख में गुहिल वंश के संस्थापक बप्पा से लेकर राजसिंह तक कि समस्त घटनाओं का वर्णन किया गया तथा इस प्रशस्ति में 1615 ई. की मुगल-मेवाड़ सन्धि का भी वर्णन किया गया है।

महाराणा जयसिंह (1680-1698 ई.)

जयसिंह ने गोमती, झामरी, रूपारेल, बगार नदियों के पानी को रोककर ढेबर नामक पर संगमरमर की झील बनवायी (1691 ई.) जिसे ढेबर या जयसमन्द झील कहते हैं।

जयसिंह ने कुछ समय तक औरंगजेब से युद्ध किया, किन्तु अंत मे शहजामे आजम से संधि कर ली।

महाराणा अमर सिंह द्वितीय (1698-1710)

जय सिंह के पश्चात उनके पुत्र अमर सिंह द्वितीय शासक बने जोधपुर के अजीत सिंह व आमेर के सवाई जयसिंह की सहायता। उन्होंने मेवाड़, मारवाड़, एवं आमेर में एकता स्थापित करवाई। मारवाड़ के दुर्गादास राठौड़ ने इनके यहां सामंत के रूप में सेवाएं दी

देबारी समझौता-  महाराणा अमर सिंह द्वितीय ने देबारी समझौते के तहत आमेर राज्य से वैवाहिक सम्बन्द्ध स्थापित किए, अमर सिंह ने अपनी पुत्री ‘चंद्र कुंवरी’ का विवाह आमेर के शासक जय सिंह द्वितीय के साथ किया .इस शासक ने सिटी पैलेश के अंदर चन्द्रमहल का निर्माण करवाया। सवाई जयसिंह ने इस रानी के लिए जयपुर में ‘सिसौदिया रानी का महल व सिसोदिया बाग का निर्माण भी करवाया।⚫

महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (1710-34 ई.)

अमर सिंह द्वितीय के बाद संग्राम सिंह द्वितीय शासक बने। उन्होंने ही मराठों के विरुद्ध राजस्थान के राजपूत नरेशों को संगठित करने के लिए हुरडा सम्मेलन की योजना बनाई. परंतु सम्मेलन के पूर्व ही उनका देहांत हो गया।

संग्राम सिंह द्वितीय ने ही सहेलियों की बाड़ी( उदयपुर) सीसरमा गांव में वैद्यनाथ का विशाल मंदिर बनवाया.

महाराणा जगत सिंह द्वितीय (1734-41 ई.)

संग्राम सिंह द्वितीय के बाद उनके पुत्र जगत सिंह द्वितीय शासक बने। इन्होंने हुरडा सम्मेलन 1734 ईस्वी की अध्यक्षता की। इन्होंने पिछोला झील में जगत निवास महल बनवाया मराठों ने सर्वप्रथम इन्हीं के काल में मेवाड़ में प्रवेश कर उनसे कर वसूला।

महाराणा जगत सिंह द्वितीय के बाद क्रमशः महाराणा प्रताप सिंह द्वितीय (1741-54 ई.) महाराणा राजसिंह द्वितीय (1754-61 ई.) महाराणा अरि सिंह(1761) मेवाड़ के शासक बने.

महाराणा भीम सिंह

इनकी लड़की कृष्णा कुमारी के विवाह को लेकर जयपुर एवं जोधपुर में संघर्ष हुआ। महाराणा भीमसिंह ने ही 1818 ईसवी में ईस्ट कंपनी से संधि कर विदेशी दास्तां स्वीकार की।

कृष्णा कुमारी विवाद

कृष्णा कुमारी मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री थी। कृष्णा कुमारी का विवाह जोधपुर के महाराजा भीमसिह से तय हुआ था लेकिन भीमसिह की मृत्यु हो गई और बाद में जयपुर के जगतसिह से विवाह होना तय हुआ।  लेकिन जोधपुर के नया शासक मानसिह बीच में आ गया ,जोधपुर के मानसिह ने राजकुमारी का विवाह जोधपुर में ही किए जाने पर जोर दिया। इस प्रकार जयपुर व जोधपुर में विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई।

गिंगोली का युद्ध (1807)- गिंगोली वर्तमान में नागौर जिले में स्थित हैं, अमीर खां पिंडारी के सहयोग से जयपुर के महाराणा जगतसिंह ने जोधपुर के मानसिह को पराजित किया।इस युद्ध मे जयपुर की सेना का साथ मेवाड़ की सेना ने दिया विवाद बढता देखकर अजीतसिंह चुडावत तथा अमीर खान पिंडारी के सहयोग से 1810 ई में कृष्णा कुमारी को जहर दे दिया गया जो मेवाड़ ही नहीं बल्कि राजपूताने के इतिहास का कलंक है। कृष्णा कुमारी विवाद का मुख्य कारण इसका विवाह आयोजन था

महाराणा स्वरूप सिंह

यह सन 1857 की क्रांति के समय मेवाड़ के राजा थे। क्रांति के समय इन्होंने अंग्रेजों की बढ़-चढ़कर सहायता की

महाराणा शंभू सिंह

इनको सन 1871 ईसवी में अंग्रेजों द्वारा ‘ग्रांड कमांडर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया’ उपाधि प्रदान की गई ।

महाराणा सज्जन सिंह

इनके काल में ‘स्वामी दयानंद सरस्वती’ उदयपुर आए थे राज्य का प्रथम समाचार पत्र “सज्जन कीर्ति सुधाकर” प्रकाशित (1876 ई.) किया गया

महाराणा फतेह सिंह

इन्होंने 1903 की कर्जन के दिल्ली दरबार में भाग लेने से इंकार किया, (कारण- चेतावनी चुगटिया, का प्रभाव- केसरी सिंह बारहट द्वारा रचित)
इन्होने फतेहसागर झील का निर्माण करवाया।

महाराणा भोपाल सिंह (1921-47 ई.)

यह स्वतंत्रता के समय मेवाड़ के शासक थे, तथा राजस्थान के प्रथम महाराज प्रमुख बनाए गए

हाडी रानी

हाड़ी रानी राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि बूंदी के जागीरदार संग्राम सिंह की रूपवती पुत्री सलह कँवर वीर हाड़ी रानी के नाम से विख्यात हुई सलह कँवर का विवाह सलूंबर के चूड़ावत सरदार राव रतनसिंह से हुआ।

नववधू के कंगन ,डोरे व मोड भी नहीं खुले थे विवाह के दो दिन पश्चात राव रतनसिंह को मेवाड़ महाराणा राजसिह की तरफ से औरंगजेब की सेना को परास्त करने हेतु रणक्षेत्र में जाने का आदेश मिला।  इस आकस्मिक आदेश और नववधू के रूप लावण्य ने राव रतन सिह को दिग्भ्रमित कर दिया। युद्ध क्षेत्र में जाने से पहले रतन सिंह ने कोई एक सेनाणी मांगी।

रतन सिंह का मन कमजोर होते हुए देख नई नवेली हाड़ी रानी ने सोचा कि हो सकता है कि मेरी याद इन्हें युद्ध भूमि में असहाय बना दे यह सोचकर रानी ने अपने पति के मन की कमजोरी को खत्म करने के लिए अपना सिर तलवार से काट कर निशानी के रुप में राव रतनसिंह को दे दिया

रावरतन सिह इस निशानी को देखकर स्तब्ध रह गया और मुगल सेना पर टूट पड़ा। अंत में मुगल सेना की हार हुई।  प्रसिद्ध कवि मेघराज मुकुल ने इन्ही वीर हाड़ी रानी पर सेनानी कविता लिखी जिसमें “चुंडावत मांगी सैनाणी सिर काट दे दियो क्षत्राणी” लिखा, वो प्रसिद्ध है।

गुहिल वंश पर विशेष तथ्य

  • 1857 ई. की क्रांति के समय मेवाड़ के “महाराणा स्वरूप सिंह” थे जिन्होंने स्वरूपशाही सिक्कों का प्रचलन किया था.
  • भारत की आजादी तथा राजस्थान के एकीकरण के समय मेवाड़ के “महाराणा भूपाल सिंह” थे. भूपाल सिंह ने राजस्थान में एक चीनी मिल को स्थापित किया जिसे भूपाल सागर चीनी मील का जाता है। यह मिल चित्तौड़गढ़ में स्थित है, यह राजपूताने की सबसे प्राचीन चीनी मिल थी, जिसे मेवाड़ शुगर मिल कहा जाता था। वर्तमान में यह मिल बंद है। 
  • 1903 ई. के दिल्ली दरबार में जाने के लिए नामित होने वाले “महाराणा फतेह सिंह” थे लेकिन कवि केसरी सिंह की कविता के कारण (चेतावनी रा चुंगटिया) इन्होंने दिल्ली दरबार में जाने से मना कर दिया. 
  • राजपूताने में स्वामी दयानंद सरस्वती के आगमन के समय ^मेवाड़ के महारणा सज्जनसिंह^ थे .। इन्हीं के शासन काल में स्वामी जी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को पूर्ण किया था। उदयपुर में ही स्वामी जी ने (1883) परोपकारिणी सभा का गठन भी किया था
  • नैंसी के अनुसार– गुहिल वंश की 24 शाखाएं थी जिनमें एक शाखा नेपाल में भी थी जिसकी स्थापना कुंभकरण द्वारा की गई थी
  • गुहिल वंश की सबसे महत्वपूर्ण शाखा मेवाड़ थी जिसे मेवाड़ का गुहिल वंश कहा जाता है
  • जेम्स टॉड ने गुहिल वंश का संबंध गुजरात के शासक शिलादित्य से जोड़ा है
  • मेवाड़ का गुहिल वंश एकमात्र ऐसा राजवंश था जिसने एक ही क्षेत्र पर लगातार सबसे अधिक लगभग 1300 वर्षों तक शासन किया
  • बप्पा रावल का मूल नाम कालभोज था
  • बप्पा रावल ने मेवाड़ में सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्कों का प्रचलन प्रारंभ किया था जिसका वजन 115 ग्रेन था
  • बप्पा रावल ने नागदा को मेवाड़ की पहली राजधानी बनाया था
  • श्यामलदास के अनुसार बप्पा एक नाम नहीं उपाधि थी
  • बप्पा रावल की समाधि को बप्पा रावल का मंदिर कहा जाता है यह नागदा में स्थित है
  • मेवाड़ के अल्लट या आलू रावत ने आहड़ को मेवाड़ की नई राजधानी बनाई
  • आलू राव/ अल्लट के काल में ही मेवाड़ में सर्वप्रथम नोकरशाही व्यवस्था प्रारंभ की थी
  • शक्ति कुमार के समय मालवा के परमार शासक मुंज ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर आहड़ को नष्ट कर दिया था
  • भोज परमार ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर का निर्माण कराया जिसे बाद में मोकल मंदिर के नाम से जाना गया
  • मेवाड़ के रण सिंह के पुत्र राहप ने प्रसिद्ध सिसोदा ठिकाने की स्थापना की थी रण सिंह के काल से राणा शाखा की शुरुआत मानी जाती है
  • 1192 के तराइन के द्वितीय युद्ध में सामंत सिंह ने पृथ्वीराज चौहान का साथ दिया
  • सामंत सिंह के मृत्यु के बाद मेवाड़ में शासन संचालन का कार्य रानी कर्म देवी द्वारा किया गया
  • जेत्रसिंह ने परमारो को पराजित कर चित्तौड़ पर पुनः अधिकार कर लिया और चित्तौड़ को मेवाड़ की नई राजधानी बना दिया
  • इतिहासकार दशरथ शर्मा ने जेत्र सिंह के काल को मेवाड़ का स्वर्ण युग कहा है
  • जैत्रसिंह ने 1227 में भूताला के युद्ध में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश की सेना को पराजित किया था
  • भूताला के युद्ध का वर्णन जयसिंह सूरी ने अपने ग्रंथ हम्मीर मद मर्दन में किया है हम्मीर मद मर्दन में इल्तुतमिश को हम्मीर कहा गया है
  • जैत्रसिंह ने आहड़ को चालुक्यों के प्रभाव से मुक्त करवाया था
  • तेजसिंह ने उभापतिवरलब्ध प्रौढप्रताप परमेश्वर परम भट्टारक व महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी
  • मेवाड़ चित्रकला शैली का प्रथम चित्रित ग्रंथ श्रावण प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी का चित्रांकन आहड़ में 1261 में कमलचंद्र द्वारा किया गया था
  • समर सिंह के समय रणथंबोर के हम्मीर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था
  • अचलगच्छ के आचार्य अमित सिंह सूरी के प्रभाव में समर सिंह ने अपने राज्य में जीव हत्या पर रोक लगा दी थी
  • 1299 में समर सिंह ने अलाउद्दीन के सेनापति उलूग खां और नुसरत खां को मडो़सा के युद्ध में पराजित किया था
  • इसी समरसिंह के पुत्र कुंभकर्ण ने नेपाल में गुहिल शाखा की स्थापना की थी
  • कुंभलगढ़ प्रशस्ति में समरसिंह को शत्रु की शक्ति का अपहर्ता कहा गया है
  • समर सिह को आबू प्रशस्ति में गुजरात से तुर्कों का उद्धारक कहा गया है
  • रतन सिंह गुहिल वंश की रावल शाखा का अंतिम शासक था
  • साहित्य के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर 8 महीने तक घेरा रखा था, जबकि ऐतिहासिक दृष्टिकोण के अनुसार अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर छह माह तक घेरा रखा था
  • अलाउद्दीन के चित्तौड़ आक्रमण के दौरान रतन सिंह के साथ सिसोदा का जागीरदार लक्ष्मण सिंह अपने सात पुत्रों सहित लड़ता हुआ मारा गया था

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कुम्भा राम हरपालिया, P K Nagauri,  Jyoti Prajapati, दया राम जाट भेरुन्दा, प्रकाश कुमावत, भवानी शंकर बठिंडा,

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