शिल्पियों व श्रेणियों के जातियों में परिवर्तन होने से तथा प्रतिलोम विवाह के कारण गुप्तोत्तर काल में जातियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई वैजयंती ने 64 वर्ण संकर जातियों की सबसे लंबी सूची दी है। राजनीतिक व्यवस्था व आर्थिक कारणों से ब्राह्मणों ने अन्य व्यवसाय भी अपनाएं।

मेघातिथि के अनुसार विषम परिस्थितियों में ब्राह्मण शस्त्र ग्रहण कर सकता है तथा वेदज्ञ ब्राह्मण को सेनापति व राजपत ग्रहण करने की अनुमति दी। प्रतिहारों के पेहोवा अभिलेख में ब्राह्मण घोड़े व्यापारी का उल्लेख है चालुक्य कुमार पाल के लेख में ब्राह्मण खेतिहरो के नाम से मिलते हैं। मध्यप्रदेश व प्राच्य के ब्राह्मण स्वयं अपने हाथों से खेती करते थे। ह्वेनसांग ने टक्क (पंजाब) देश के ब्राह्मण को स्वयं खेती करते देखा।

ब्राह्मण को मृत्युदंड से छूट थी। ब्राह्मण के लिए सबसे कठोर दंड देश निकाला था ह्वेनसांग ने भारत को ब्राह्मणों का देश कहा है। राजपूतों का अभ्युदय इस काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी राजपूतों ने क्षत्रियों का स्थान ले लिया 12 वीं शताब्दी तक राजपूतों की 36 जातियां प्रसिद्ध हो गई।

हेनसांग ने मणिपुर व सिंध देश के राजा को शूद्र कहा है। उदयन वह तेजपाल जैसे धनी व्यापारी थे।  बिहार के 18 वीं शताब्दी के दूधपाणी अभिलेख से ज्ञात होता है कि उदयभान नामक समृद्धि व्यापारी ने 3 गांव के लोगों की ओर से राजकीय कर दिया।

व्यास, पाराशर, वैजयंती ने कुटुंबी नामक कृषक वर्ग का उल्लेख किया है कुटुम्बी स्वतंत्र किसान होते थे। त्यधसिरीन या सिरीन वे किसान थे जो बटाई पर कार्य करते थे। मेघातिथि ने सती प्रथा को आत्महत्या कहकर इसकी आलोचना की। बाणभट्ट व देवणभट्ट ने भी सती प्रथा की निंदा की है

गुप्तोत्तर कालीन आर्थिक दशा

  • कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था।
  • अग्नि पुराण के अनुसार कृषि की वृद्धि के लिए सिंचाई के साधन जुटाना राजा का प्रमुख 8 कर्तव्य में से हैं।
  • बंधुआ मजदूरी का सबसे पहला उल्लेख भागवत पुराण (8 वीं सदी) में मिलता है।
  • राजतरंगिनी में खुया नामक इंजीनियर का उल्लेख है जिसने झेलम नदी पर बांध बनाकर नहर निकलवाई।
  • चंदेल राजाओं ने राहिल्यसागर और कीरतसागर नामक जलाशय बनाये। भोज परमार ने भोज सागर बनवाया।
  • बंजर भूमि को इरिण कहा जाता था।

मालवा के शासक यशोधर्मन का एक अन्य नाम का उल्लेख जनेंद्र यशोधर्मन ( मन्दसौर प्रशस्ति मे) से मिलता है आर्यमंजु श्रीमूलकल्प में पुस्तक में शशांक का चित्रण बौद्ध द्रोही के रूप में किया गया है मगध के आदित्यसेन उत्तरगुप्त शासक के काल में चीनी राजदूत वांग-हुएन-त्से ने दो बार भारत की यात्रा की

हर्षवर्धन का समकालीन पल्लव नरेश नरसिंह वर्मन प्रथम था  मौखरी वंश के ग्रहवर्मा शासक के बारे में उल्लिखित है कि वह ” पृथ्वी पर सूर्य की भाँति सुशोभित था”  मैत्रक वशं की स्थापना भट्टार्क की थी  मौखरि वंश के इश्वरवर्मा शासक को जौनपुर लेख में ‘राजाओं में सिंह के समान’ बताया गया है

हर्ष के काल मे शिक्षण का महान केंद्र नालंदा महाविहार था हर्ष के काल मे सूती वस्त्रों के उत्पादन के लिए मथुरा प्रसिद्ध था हर्ष ने शिलादित्य एवं प्रतापशील उपाधि धारण की थी

पुष्यभूति वंश का प्रथम स्वतन्त्र शासक प्रभाकरवर्मन था मिहिरकुल हूण शासक को ग्वालियर लेख में ‘महान पराक्रमी’ और ‘पृथ्वी का स्वामी’ कहा गया है
पल्लव राजवंश में राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था,राजा के उत्तराधिकारी को युवमहाराज जाता था द्रविड़ शैली की स्थापना पल्लव नरेशों के शासनकाल मे शासनकाल में हुई खजुराहो के मंदिर का निर्माण चंदेल शासक (नागर शैली में). प्रियंका(झाँसी) करवाया

वल्लभी का मैत्रक वंश

वल्लभी के मैत्रक वंश की स्थापना भट्टार्क ने की थी भट्टार्क गुप्तों का एक सैनिक पदाधिकारी था  मैत्रक वंशी शासकों ने वल्लभी (गुजरात ) पर शासन किया मैत्रक वंश के शासक बौध्द धर्म के धर्म के अनुयायी थे प्रारम्भिक मैत्रक वंशी नरेश गुप्तों के सामन्त थे भट्टार्क व उसका लड़का धरसेन ने मैत्रक वंशी शासक स्वयं को सेनापति कहा था

मैत्रक वंश का तीसरा राजा द्रोणसिंह था राजा द्रोणसिंह के विषय में बुधगुप्त कहा गया है कि वह अपने सार्वभौम शासक (गुप्त शासक )द्वारा ‘महाराज ‘के पद पर प्रतिष्ठित किया गया, वह सार्वभौम शासक संभवत था  द्रोणसिंह के बाद शासक ध्रुवसेन प्रथम बना जो स्वयं को ‘ परमभट्टारकपिदानुध्यात ‘ कहता है 

ध्रुवसेन प्रथम के सोलह दानपत्र प्राप्त हैं  ध्रुवसेन के बाद राजा महाराज धरनपट्ट हुआ धरनपट्ट के बाद राजा गुहसेन हुए  गुहसेन के दान -पत्रों में परमभट्टारकपिदानुध्यात का प्रयोग नहीं हुआ जिससे पता चलता है गुप्तों की अधीनता से मुक्त होना ।

गुहसेन के बाद धरसेन द्वितीय राजा हुआ धरसेन के बाद राजा विक्रमादित्य प्रथम धर्मादित्य हुए अन्य शासक – शिलादित्य प्रथम, खरग्रह फिर धरसेन तृतीय शासक हुए ।इनके बाद ध्रुवसेन द्वितीय ‘बालादित्य ‘शासक हुआ । ध्रुवसेन द्वितीय के समय ह्वेनसांग चीनी यात्री भारत आया था  ह्वेनसांग के अनुसार ध्रुवसेन द्वितीय उतावले स्वभाव तथा संकुचित विचार वाला व्यक्ति था, लेकिन बौद्ध धर्म में उसकी आस्था थी । ध्रुवसेन द्वितीय का अन्य नाम ध्रुवभट्ट मिलता है 

हर्ष के प्रयाग व कन्नौज सम्मेलन में भाग लेने वाले मैत्रक वंशी ध्रुवसेन द्वितीय शासक था ध्रुवसेन द्वितीय मैत्रक वंशी शासक हर्ष का समकालीन व उसका दामाद था ध्रुवसेन द्वितीय के बाद धरसेन चतुर्थ शासक बना 

धरसेन चतुर्थ ने परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, चक्रवर्तिन, जैसी सार्वभौम उपाधि धारण करने वाला यह पहला मैत्रक वंशी शासक था । मैत्रक वंश का अन्तिम शिलादित्य सप्तम शासक था , मैत्रक स्वतंत्र रूप से शासन करते रहे आठवीं शदी के अन्त तक ।

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No of Questions-22

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कमलनयन पारीक अजमेर, Priyanka varma, ANEESH KHAN, जुल्फिकार अहमद दौसा, पुष्पेंद्र कुलदीप, भँवर सिंह जी बाड़मेर

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