( भारतीय राजनीतिक विचारक-डॉ भीमराव अंबेडकर )

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 “जीवन की सफलता अछूतों का स्तर मानवता के स्तर तक लाने में है।” – डॉक्टर अंबेडकर

 भारत का लिंकन, मार्टिन लूथर तथा बोधिसत्व की उपाधि से विभूषित डॉक्टर अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, सन 1891 को इंदौर के पास महू छावनी में हुआ। उनका जन्म महार जाति में हुआ जिसे महाराष्ट्र में अछूत समझा जाता था। पिता रामजी सकपाल कबीर के अनुयाई थे इस कारण उनके मस्तिष्क में जातिवाद के लिए कोई स्थान नहीं था।

अंबेडकर को बड़ौदा के महाराजा गायकवाड से छात्रवृत्ति प्राप्त होती थी इसी गायकवाड़ छात्रवृति के कारण अंबेडकर कॉम 1913 में अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला वह भारत के पहले अछूत और महार थे जो पढ़ने के लिए विदेश गए।

डॉक्टर अंबेडकर ने 2 वर्ष के लिए बड़ौदा राज्य के “मिलिट्री सचिव” पद पर कार्य किया।

अपने शोध प्रबंध “द प्रॉब्लम ऑफ द रुपी” पर उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

सन 1921 में उन्होंने मास्टर ऑफ साइंस की उपाधि प्राप्त की लंदन से।

1923 से उन्होंने वकालत प्रारंभ की तथा अछूतों के उद्धार के लिए संघर्ष प्रारंभ किया।

1923 में ही अंबेडकर ने बंबई से एक ही पाक्षिक समाचार पत्र “बहिष्कृत भारत” का प्रकाशन प्रारंभ किया।

20 जुलाई 1924 को डॉक्टर अंबेडकर ने “बहिष्कृत हितकारिणी सभा” की स्थापना की इस सभा के माध्यम से उन्होंने दलितों को संदेश दिया कि उनका उत्थान शिक्षा, संगठन और समय उनके द्वारा सक्रिय एवं प्रभावी संगठन के माध्यम से ही संभव है।

अप्रैल,1925 में डॉक्टर अंबेडकर ने बंबई प्रेसिडेंसी में “नेपानी” नामक स्थान पर “प्रांतीय दलित वर्ग सम्मेलन” की अध्यक्षता की।

1927 में उनके द्वारा “महद सत्याग्रह” शुरू किया गया।

1930 में उन्होंने अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ का अध्यक्ष पद धारण किया।

1930 और 1931 में उन्होंने लंदन में आयोजित सम्मेलन में प्रथम और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में दलितों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया उसके बाद डॉक्टर अंबेडकर ने इस बात पर बल दिया कि – “दलितों को विधान परिषद से पृथक प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाना चाहिए।”

 “उन व्यक्तियों तथा संस्थाओं को अछूतों की बात कहने का हक नहीं है जो अछूत नहीं है।” – डॉक्टर अंबेडकर

“कांग्रेस ने अछूतोद्धार के कार्य में ईमानदारी का परिचय नहीं दिया है।” – अंबेडकर

अगस्त 1936 में उन्होंने अपने साथियों की सलाह पर “इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी” की स्थापना की। बंबई प्रदेश में इस पार्टी ने सन 1937 का चुनाव लड़ा और इसने अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित 15 में से 13 स्थान से जीते और 2 सामान्य स्थानों पर विजय प्राप्त की। इस पार्टी ने किरायेदारी कानून तथा एंटी सटराइक बिल और खोटी बिल आदि की खुलकर आलोचना की।

7 अगस्त 1942 को अंबेडकर को गवर्नर जनरल की परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया।

इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी को उन्होंने अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ में बदल दिया।

डॉ आंबेडकर को संविधान निर्माण करने वाली 7 सदस्यीय प्रारूप समिति( 29 अगस्त 1947) का अध्यक्ष बनाया गया। संविधान निर्माण में उनके प्रमुख भूमिका होने के कारण ही है उन्हें “आधुनिक मनु” की संज्ञा दी गई है।

3 अगस्त 1949 को डॉक्टर अंबेडकर को भारत सरकार का कानून मंत्री बनाया गया। कानून मंत्री के रूप में उन्नत आसन से प्रमुख कार्य “हिंदू कोड बिल” था। बाद में आपसी मतभेद होने पर 27 सितंबर 1951 को अंबेडकर ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।

हिंदू धर्म डॉक्टर अंबेडकर के स्वाभिमान से मेल नहीं खा रहा था इस कारण सन 1955 में उन्होंने “भारतीय बुद्ध महासभा” की स्थापना की। तथा भारत में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार का बीड़ा उठाया। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। 6 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हुई।

डॉक्टर अंबेडकर पर प्रभाव – डॉक्टर अंबेडकर को रामायण तथा महाभारत ने प्रभावित किया। अंबेडकर के तीन आदर्श थे गौतम बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले। इनके अतिरिक्त वे अमेरिकी अध्यापक जॉन दिवे से प्रभावित थे। बुकर टी वाशिंगटन के जीवन से भी बहुत प्रभावित थे।

अंबेडकर की प्रमुख रचनाएं –

  1. द अनटचेबल्स, हु आर दे 
  2. हु वर द शुद्राज़ 
  3. वॉट कॉन्ग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स 
  4. पाकिस्तान और पार्टीशन टू इंडिया 
  5. स्टेट्स एंड इट्स माइनॉरिटीज
  6. थॉट ओन लिंगविस्टिक स्टेट्स
  7. ईमेनीसिपेशन ऑफ द अनटचेबल
  8. एनिहिलेशन ऑफ कास्ट
  9. स्पीशीज एंड राइटिंग आफ अंबेडकर
  10. दज सपोक अंबेडकर

मेरे दुख-दर्द और मेहनत को तुम नहीं जानते, जब सुनोगे, तो रो पड़ोगे – अंबेडकर

“जाति प्रथा को नष्ट करने का एक ही मार्ग है – अंतरजातीय विवाह, न की सहभोज। खून का मिलना ही अपनेपन की भावना ला सकता है।”

 अछूतों के लिए उनके सुझाव थे – संगठित रहें, शिक्षित हों, अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करें।

 

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