INDIAN SOILS ( भारत की मिट्टियां )

भारत में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर पाई जाने वाली मिट्टी क्रमानुसार-

  • जलोढ़ मिट्टी – 43 %
  • लाल मिट्टी – 18 %
  • काली मिट्टी – 15 %
  • लैटेराइट मिट्टी – 3.7%

भारत की सभी मिट्टियों में तीन तत्वों की कमी पाई जाती है।

  • ह्यूमस
  • नाइट्रोजन
  • फास्फोरस

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली  (Indian Council of Agricultural Research-I.C.A.R.) ने भारतीय मिट्टी को 8 भागों में बांटा है-

  1. लाल मिट्टी Red Soil
  2. काली मिट्टी Black Soil
  3. लैटेराइट मिट्टी Laterite Soil
  4. क्षारयुक्त मिट्टी Saline and Alkaline Soil
  5. हल्की काली एवं दलदली मिट्टी Peaty and Other Organic soil
  6. रेतीली मिट्टी Arid and Desert Soil
  7. कांप मिट्टी Alluvial Soil
  8. वनों वाली मिट्टी Forest Soil

1. लाल मिट्टी

भारत में दूसरा सर्वाधिक क्षेत्र 18% में पाया जाने वाला मिट्टी लाल मिट्टी है। लाल मिट्टी लोहे के ऑक्साइड के कारण लाल दिखाई देता है। लोहा का ऑक्सीकरण हो जाता है अर्थात लोहा जब खुला में रहता है तो वह ऑक्सीजन और नमी के संपर्क में आ जाता है जिसके कारण लोहा में जंग लग जाता है। यह जंग लोहा का ऑक्साइड कहलाता है।

यह मिट्टी अपक्षय के प्रभाव से चट्टानों के टूट-फुट से बनती है| यह मिट्टी प्रमुख रूप से मध्य-प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, छोटा नागपुर के पठार, आंध्र प्रदेश के दण्डकारण्य क्षेत्र, पश्चिम बंगाल और मेघालय  में पाई जाती है|

पठारी भारत का आधा पूर्वी भाग लाल मिट्टी का क्षेत्र है तथा आधा पश्चिमी भाग काली मिट्टी का क्षेत्र है। लाल मिट्टी पठारी भारत के पूर्वी भाग तथा पूरे दक्षिण भारत में पाया जाता है। इसका विस्तार मुख्य रूप से तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ उड़ीसा, पूर्वी मध्य प्रदेश तथा झारखंड में है लेकिन लाल मिट्टी का सर्वाधिक क्षेत्रफल तमिलनाडु में है।

पठार तथा पहाड़ियों पर इन मिट्टियों की उर्वराशक्ति कम होती है और ये कंकरीली तथा रूखडी होती हैं, किंतु नीचे स्थानों में अथवा नदियों की घाटियों में ये दोरस हो जाती हैं और अधिक उपजाऊ हो जाती  है और इनमें निक्षालन  भी अधिक हुआ है।

तटीय मैदानों और काली मिट्टी के क्षेत्र को छोड़कर, प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश भाग में लाल मिट्टी पाई जाती है। इस मिट्टी में मोटे अनाज पैदा होते है जैसे गेंहू, धान, अलसी आदि।  इस मिट्टी का संघटन इस प्रकार है-

  • अघुलनशील तत्व = 90.47%
  • लोहा = 3.61%
  • एल्यूमिनियम = 2.92%
  • जीवांश = 1.01%
  • मैग्निशिया = 0.70%
  • चूना = 0.56%
  • कार्बन डाई ऑक्साइड = 0.30%
  • पोटाश = 0.24%

2. काली मिट्टी

यह मिट्टी ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा से बनती है| भारत में यह लगभग 5 लाख वर्ग-किमी. में फैली है| महाराष्ट्र में इस मिट्टी का सबसे अधिक विस्तार है। इसे दक्कन ट्रॅप से बनी मिट्टी भी कहते हैं। इस मिट्टी में चुना, पोटॅश, मैग्निशियम, एल्यूमिना और लोहा पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।

काली मिट्टी का विस्तार महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा उत्तरी कर्नाटक के क्षेत्र तक है। दक्षिण पूर्वी राजस्थान काली मिट्टी में कपास की खेती अधिक होती है इसलिए इसे कपासी मिट्टी कहते हैं।

कपासी, रेगुर लावा मिट्टी, करेल मिट्टी उत्तर प्रदेश में करेल मिट्टी को काली मिट्टी कहा जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काली मिट्टी को चेरनोजम कहा गया है। चेरनोजम मिट्टी मुख्य रूप से काला सागर के उत्तर में यूक्रेन में तथा ग्रेट लेक्स के पश्चिम में संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में पाई जाती है।

काली मिट्टी को लावा मिट्टी भी कहते हैं क्योंकि यह दक्कन ट्रैप के लावा चट्टानों की अपक्षय अर्थात टूटने फूटने से निर्मित हुई मिट्टी है। दक्कन पठार के अलावा काली मिट्टी मालवा पठार की भी विशेषता है अर्थात मालवा पठार पर भी काली मिट्टी पाई जाती है।

काली मिट्टी का सर्वाधिक विस्तार महाराष्ट्र राज्य में है। काली मिट्टी की प्रमुख विशेषता यह है कि उसमें जल धारण करने की सर्वाधिक क्षमता होती है काली मिट्टी बहुत जल्दी चिपचिपी हो जाती है तथा सूखने पर इस में दरारें पड़ जाती हैं इसी गुण के कारण काली मिट्टी को स्वत जुताई वाली मिट्टी कहा जाता है।

कपास की खेती सर्वाधिक गुजरात राज्य में होती है अर्थात कपास का उत्पादन सर्वाधिक गुजरात राज्य में होता है।

शुष्क कृषि- जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है {जैसे – राजस्थान वृष्टि छाया प्रदेश का क्षेत्र} वहां खेती की एक विशेष पद्धति अपनाई जाती है जो जल बचत पर आधारित होती है। ऐसे कृषि में पानी सीधे पौधों को ही मिलती है। किसान बरसात से पहले खेतों की जुताई इसलिए करते हैं ताकि मिट्टी बरसात के समय अधिक से अधिक नमी अर्थात जल धारण कर सके।

इसका काला रंग शायद अत्यंत महीन लौह अंशों की उपस्थिति के कारण है। इस मिट्टी में गन्ना, केला, ज्वार, तंबाकू, रेंड़ी, मूँगफली और सोयाबीन की भी अच्छी पैदावार होती है।

इस मिट्टी का रासायनिक संघटन इस प्रकार है-

  • फेरिक ऑक्साइड = 11.24%
  • एल्यूमिना = 9.39%
  • जल तथा जीवांश = 5.83%
  • चूना = 1.81%
  • मैग्निशिया = 1.79%

3. लैटेराइट मिट्टी

लैटेराइट मिट्टी का निर्माण दो परिस्थितियों में होता है।

  • 1-  200 सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा
  • 2-  अधिक गर्मी

उपरोक्त दोनों परिस्थिति भारत के तीन क्षेत्रों में पाई जाती है।

  • 1- पश्चिमी घाट पर
  • 2- उड़ीसा तट पर
  • 3- शिलांग पठार पर

भारत में लैटेराइट मिट्टी का सर्वाधिक क्षेत्रफल केरल में है। भारत में लैटेराइट मिट्टी का विस्तार

  • 1- पश्चिमी घाट
  • 2- तमिलनाडु की शिवाराय पहाड़ी
  • 3- उड़ीसा का तट
  • 4- झारखंड के राजमहल पहाड़ी
  • 5- मेघालय एवं असम की पहाड़ियां अर्थात मेघालय के शिलांग पठार एवं असम के मिकीर रेंगमा पहाड़ी पर

लैटेराइट मिट्टी भारत में चौथा सर्वाधिक क्षेत्रफल पर विस्तृत मिट्टी है। ईट बनाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मिट्टी लैटेराइट मिट्टी है। लैटेराइट मिट्टी में ह्यूमस, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (k) की कमी पाई जाती है। लैटेराइट मिट्टी में लोहे और एल्यूमीनियम के ऑक्साइड की प्रचुरता होती है और लोहे के ऑक्साइड के कारण ही लैटेराइट मिट्टी का रंग लाल होता है।

इन क्षेत्रों में अधिक वर्षा के कारण तथा क्रम से भीगने एवं सूखने के कारण इन क्षेत्रों की मिट्टियों में सिलिका पदार्थ का निक्षालन हो गया है अर्थात सिलिका पदार्थ रिस कर नीचे की ओर चला गया है। लेटेराइट मिट्टी का निर्माण सिलिका के निक्षालन से हुआ है।

लैटेराइट मिट्टी एक निक्षालित मिट्टी है। लैटेराइट मिट्टी की उपजाऊ मिट्टी है इसलिए या खानदान की लैटेराइट मिट्टी की उपजाऊ मिट्टी है इसलिए या खाद्यान्न की खेती के लिए उपयुक्त नहीं है। यहां पर चाय, कॉफी, मसाला, काजू, चीनकोना की खेती होती है। यह मिट्टी अम्लीय होती है।

इस मिट्टी का रासायनिक संघटन इस प्रकार है-

  • लोहा = 18.7%
  • सिलिका = 32.62%
  • एल्यूमिना = 25.2%
  • फास्फ़ोरस = 0.7%
  • चूना = 0.42%

4. मरुस्थलीय मिट्टी

मरुस्थलीय मिट्टी का निर्माण पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में हुआ है राजस्थान तथा राजस्थान के आसपास के राज्यों में। इसका विस्तार भारत में दक्षिणी पंजाब, दक्षिणी हरियाणा, समग्र राजस्थान तथा गुजरात के कच्छ क्षेत्र में है। इसका मिट्टी में खाद्यान्नों की खेती संभव नहीं है इसलिए यहां पर ज्वार, बाजरा, सरसों एवं मोटे अनाज की खेती की जाती है।

ज्वार, बाजरा, सरसों एवं मोटे अनाज उत्पादन में राजस्थान सबसे आगे है क्योंकि मरुस्थलीय मिट्टी का सर्वाधिक क्षेत्रफल राजस्थान में है राजस्थान के गंगानगर जिला जहां से इंदिरा गांधी नहर के माध्यम से सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई गई है वहां पर खाद्यान्नों की खेती भी की जाती है।

हरित क्रांति के क्षेत्रों में राजस्थान का श्रीगंगानगर जिला भी शामिल था। {गेहूं} पंजाब में हरिके नाम के स्थान पर व्यास नदी सतलज से मिलती है इनके मिलन स्थान पर पोंग नामक बांध बनाकर इस बांध से इंदिरा गांधी नहर निकालकर राजस्थान की ओर ले जाया गया है तथा इस नहर से राजस्थान के 7 जिलों की सिंचाई की जाती है।

5. पर्वतीय मिट्टी

पर्वतीय मिट्टी भारत में हिमालय के साथ-साथ पाई जाती है इस कारण जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में पाई जाती है। हिमालय पर वनस्पतियों एवं जीवों की प्रचुरता है इसी कारण हिमालय के पर्वतीय मिट्टी में ह्यूमस की प्रचुरता पाई जाती है।

ह्यूमस की अधिकता के कारण पर्वतीय मिट्टी में अम्लीयता के गुण आ गए हैं जिसके कारण यहां सेब, नाशपाती एवं चाय की खेती होती है।पर्वतीय मिट्टी एक पूर्ण विकसित मिट्टी नहीं है बल्कि यह एक अविकसित तथा निर्माणधीन मिट्टी है। अर्थात इसका निर्माण अभी भी हो रहा है।

6. जलोढ़ मृदा

जलोढ़ मिट्टी को कॉप या  कद्दारी मिट्टी भी कहते हैं। यह भारत के सर्वाधिक क्षेत्रफल 43% पर विस्तृत है। यह भारत में मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में पाई जाती है।

  1. उत्तर भारत के मैदान में
  2. तटीय क्षेत्रों में

उत्तर भारत के मैदान में जलोढ़ मिट्टी सतलज के मैदान से लेकर पूर्व में ब्रम्हपुत्र के मैदान तक मिलता है। तटीय मैदान के अंतर्गत जलोढ़ मिट्टी महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी नदियों के डेल्टा क्षेत्र में और पश्चिमी तटीय मैदान के अंतर्गत केरला और गुजरात में पाई जाती है। जलोढ़ मिट्टी नदियों के द्वारा पहाड़ों को काटकर लाई गई है तथा मैदानों में बिछा दी गई है।

जलोढ़ मिट्टी दो प्रकार की होती है।

  • 1- खादर
  • 2- बांगर

नदी के आसपास बाढ़ क्षेत्र की जलोढ़ मिट्टी खादर मिट्टी कहलाती है। खादर मिट्टी हर साल नई हो जाती है बाढ़ के माध्यम से नदी से दूर ऊंचे क्षेत्रों के पुराने जलोढ़ को बांगर मिट्टी कहते हैं।

बांगर मिट्टी हर साल नहीं नहीं होती है अतः खादर मिट्टी अपेक्षाकृत अधिक उपजाऊ होता है। भारत के सभी मिट्टियों में सर्वाधिक उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी है तथा जलोढ़ मिट्टी में खादर मिट्टी सर्वाधिक उपजाऊ है। बांगर क्षेत्र की मिट्टी में खुदाई करने पर कैल्शियम कार्बोनेट या चूना की ग्रंथियां मिलती हैं।

यह ग्रंथियां हिमालय क्षेत्र को काटकर नदियों द्वारा लाई गई हैं तथा इन्हें नई मिट्टियों के द्वारा ढक दिया गया है। इन्हें स्थानीय भाषा में ककड़ कहा जाता है। जलोढ़ मिट्टी में भी ह्यूमस, नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी पाई जाती है। जलोढ़ मिट्टी में पोटेशियम और चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

7. कांप मिट्टी

उत्तर के विस्तृत मैदान तथा प्रायद्वीपीय भारत के तटीय मैदानों में मिलती है। यह अत्यंत ऊपजाऊ है इसे जलोढ़ या कछारीय मिट्टी भी कहा जाता है। यह भारत के लगभग 40% भाग में पाई जाती है| यह मिट्टी सतलज, गंगा, यमुना, घाघरा,गंडक, ब्रह्मपुत्र और इनकी सहायक नदियों द्वारा लाई जाती है|

इस मिट्टी में कंकड़ नही पाए जाते हैं। इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और वनस्पति अंशों की कमी पाई जाती है| खादर में ये तत्व भांभर की तुलना में अधिक मात्रा में वर्तमान हैं, इसलिए खादर अधिक उपजाऊ है।

भांभर में कम वर्षा के क्षेत्रों में, कहीं कहीं खारी मिट्टी ऊसर अथवा बंजर होती है। भांभर और तराई क्षेत्रों में पुरातन जलोढ़, डेल्टाई भागोंनवीनतम जलोढ़, मध्य घाटी में नवीन जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है। पुरातन जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र को भांभर और नवीन जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र  को खादर  कहा जाता है।

पूर्वी तटीय मैदानों में यह मिट्टी कृष्णा, गोदावरी, कावेरी और महानदी के डेल्टा में प्रमुख रूप से पाई जाती है| इस मिट्टी की प्रमुख फसलें खरीफ और रबी जैसे- दालें, कपास, तिलहन, गन्ना और गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में जूट प्रमुख से उगाया जाता है।

8. क्षारयुक्त मिट्टी

शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों, दलदली क्षेत्रों, अधिक सिंचाई वाले क्षेत्रों में यह मिट्टी पाई जाती है। इन्हे थूर , ऊसर, कल्लहड़, राकड़, रे और चोपन के नामों से भी जाना जाता है।

शुष्क भागों में अधिक सिंचाई के कारण एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल-प्रवाह दोषपूर्ण होने एवं जलरेखा उपर-नीचे होने के कारण इस मिट्टी का जन्म होता है। इस प्रकार की मिट्टी में भूमि की निचली परतों से क्षार या लवण वाष्पीकरण द्वारा उपरी परतों तक आ जाते हैं।

इस मिट्टी में सोडियम, कैल्सियम और मैग्निशियम की मात्रा अधिक पायी जाने से प्रायः यह मिट्टी अनुत्पादक हो जाती है।

9. हल्की काली एवं दलदली मिट्टी

इस मिट्टी में ज़्यादातर जैविक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। यह सामान्यतः आर्द्र -प्रदेशों में मिलती है। दलदली मिट्टी उड़ीसा के तटीय भागों, सुंदरवन के डेल्टाई क्षेत्रों, बिहार के मध्यवर्ती क्षेत्रों, उत्तराखंड के अल्मोड़ा और तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी एवं केरल के तटों पर पाई जाती है।

 

भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान➖ भोपाल में

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri, दिनेश मीना, प्रभुदयाल मूण्ड चूरु