न्याय को अंग्रेजी में जस्टिस(Justice) कहा जाता है। इस शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन शब्दों ‘जंगरि'(Jungere) और ‘जस'(Jus) से हुई है जिसका अर्थ है ‘जोड़ना’, ‘बांधना’, ‘एक साथ रखना’। न्याय वह तत्व है जो जोड़ता है, बांधता है, एक साथ रखता है- व्यक्तियों को व्यक्तियों के साथ, समूहों को समूहों के साथ-जिससे कि एक व्यवस्था कायम की जा सके।

न्याय की संकल्पना प्राचीन काल से ही राजनीतिक चिंतन का महत्वपूर्ण विषय रहिए है, न्याय प्रत्यय की व्याख्या अलग-अलग विचारक कौन है ,
अपने अपने ढंग से करने का प्रयास किया है पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन में न्याय के अर्थ को स्पष्ट करने का सर्वप्रथम प्रयास यूनानी दार्शनिक व राजनीतिक विचारक प्लेटो ने किया , प्लेटो ने अपने दर्शन में न्याय प्रत्येक को मनुष्य का आत्मीय गुण माना उनके अनुसार यह वह सद्गुणों जिस से प्रेरित व्यक्ति होकर मनुष्य सबकी भलाई में अपना जीवन ढूंढता है ,

प्लेटो से लेकर अब तक सभी चिंतकों ने न्याय को महत्वपूर्ण राजनीतिक व नैतिक प्रत्यय माना है , मध्यकालीन ईसाई विचारों में ऑगस्टाइन व एक्वीनाश ने न्याय की अपने ढंग से व्याख्या की है आधुनिक चिंतन के प्रारंभिक चरण में हॉब्स, कार्ल मार्क्स ,कांट ,मिल ने अपने चिंतन में न्याय को प्रमुख स्थान दिया है , समकालीन विचारको में जॉन रॉल्स न्याय को नवीन स्वरूप प्रस्तुत किया है,

प्लेटो का न्याय संबंधी विचार

प्लेटो का न्याय से तात्पर्य है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप ना करना न्याय हैं,

प्लेटो अपनी पुस्तक रिपब्लिक में न्याय को समझाने का प्रयास करता है वह सबसे पहले सामाजिक और राजनीतिक न्याय की धारणा को व्यक्तिगत न्याय से पृथक करने की चेष्टा करता है प्लेटो के न्याय के दो रूप मानता है जिसमें  एक व्यक्तिगत न्याय और दूसरा सामाजिक न्याय
प्लेटो की मान्यता थी की आत्मा के तीन तत्व पाए जाते हैं

तृष्णा ,शौर्य, बुद्धि इन तीनों तत्वों की मात्रा के अनुसार ही वह राज्य और समाज में तीन वर्ग स्थापित करता है 

  1. पहला शासक या अभिभावक वर्ग जिसमें बुद्धि का अंश सर्वाधिक पाया जाता है
  2. दूसरा सैनिक वर्ग जिसमें शौर्य व साहस तत्व की अधिक मात्रा पाई जाती है
  3. तीसरा उत्पादक वर्ग जिसमे इंद्रिय तृष्णा व इच्छा तत्व की अधिकता पाई जाती हैं,

प्लेटो न्याय को आत्मा का मानवीय सदगुण मानता है प्लेटो के अनुसार आत्मा में निहित न्याय का विचार वास्तव में राज्य में निहित न्याय का रूप है जिस प्रकार व्यक्ति की आत्मा मैं विद्यमान न्याय व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को परस्पर संतुलित करता है उसी भारती राज्य में व्याप्त न्याय समाज के तीनों वर्गों में सामंजस्य स्थापित करता है प्रत्येक व्यक्ति को वही कार्य करना चाहिए जिसके लिए वह प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक समर्थ उपयुक्त हैं दूसरों के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप को प्लेटो व्यक्तियों व राज्य दोनों के लिए अनिष्टकारी मानता है,

प्लेटो ने अपने न्याय के सिद्धांत को एक नैतिक सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया है ,ना की कानूनी सिद्धांत के रूप में

प्लेटो के अनुसार, न्याय का अर्थ था “प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपनी योग्यताओं व क्षमताओं के अनुरूप अपने कर्तव्य को पूरा करना तथा दूसरे करते हुए क्षेत्र में हस्तक्षेप ना करना।”

अरस्तू ने अपनी न्याय संबंधी धारणा को अपनी कृति ‘एथिक्स’ में व्यक्त किया है। उसने न्याय की दो भागों में परिभाषा दी है-

  1. सामान्य न्याय सार्वभौम है और आदर्श समाज में ही प्रतिबिंबित हो सकता है।
  2. विशेष न्याय इसका आशय अन्याय या अपराध के लिए दंड देने की विद्या से हैं। आंख पर पट्टी बंधी न्यायमूर्ति प्रतीक है- अंधे अर्थात निष्पक्ष न्याय की, अरस्तु के न्याय में समन्वय के लिए के विशेष स्थान है।

अरस्तु के न्याय के दो भेद-

  1. वितरणात्मक या राजनीतिक न्याय- यह वह न्याय है जिसमें राजनीतिक पदों पर नियुक्ति नागरिक की योग्यता और उनके द्वारा राज्य के प्रति की गई सेवा के अनुसार हो।
  2. सुधारक न्याय- इसका अर्थ है कि एक नागरिक के दूसरे नागरिक के साथ संबंध को निर्धारित करते हुए सामाजिक जीवन को व्यवस्थित रखा जाए। आगस्टाइन “न्याय एक व्यवस्थित और अनुशासित जीवन व्यतीत करने तथा उन कर्तव्यों का पालन करने में हैं जिनकी व्यवस्था मांग करती है।”

न्याय के आधार तत्व-

ब्रैस्ट के द्वारा अपनी पुस्तक ‘पोलिटिकल थ्योरी'(Political Theory) में आधार तत्वों का उल्लेख इस प्रकार किया गया है-

  1. सत्य
  2. मूल्यों के आधारभूत क्रम की सामान्यता
  3. कानून के समक्ष समानता या समानता का व्यवहार
  4. स्वतंत्रता
  5. प्रकृति की का अनिवार्यताओं के प्रति सम्मान

न्याय के सिद्धांत–

सामान्यतया न्याय के तीन प्रकार के सिद्धांत माने जाते हैं-

  1. अनुग्रह पर आधारित न्याय
  2. बाजारी अधिकार पर आधारित न्याय
  3. मानवाधिकारों पर आधारित न्याय का सिद्धांत

न्याय संबंधी प्रमुख विचार 

सिसरो- इन्होंने न्याय की व्याख्या करने में नैतिक दृष्टिकोण अपनाया। उनके अनुसार न्याय वह सद्गुण है जो राज्य और व्यक्ति के जीवन में शाश्वत और अपरिवर्तनशील बना रहता है।

आगस्टाइन के अनुसार- “न्याय वह सद्गुण है जो प्रत्येक को उसका सही हक प्रदान करता है।” ईश्वर की प्राप्ति प्रति व्यक्ति का अधिकार है। अतः वही राजा न्यायी है जो नागरिकों में ईश्वर के प्रति निष्ठा और प्रेम की भावना उत्पन्न करें। जिस व्यक्ति में ईश्वर के प्रति निष्ठा नहीं वह व्यक्ति अन्यायी है। न्यायी का धन शांति है।

अरस्तू के अनुसार- समानों के साथ समान किन्तु असमानों के साथ असमान व्यवहार किया जाना चाहिए। इस व्यवस्था को वितरणात्मक/ आनुपातिक न्याय का नाम दिया गया है, अरस्तू ने इसे विशेष न्याय भी कहा है। इसका साधारण अर्थ यह है कि राज्य में रहने वाला व्यक्ति जैसा अपना योगदान करें उसी अनुपात में उसे पुरस्कार मिलना चाहिए।

जी.एच.सेबाइन- “न्याय वह बंधन है जो समाज के व्यक्तियों को एक समरूप संगठन में बांधकर रखता है, जिसमें विविध तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति अपनी नैसर्गिक योग्यता तथा दीक्षा के अनुसार अपने जीवन भर का कार्य ढूंढ कर उसे जीवन यापन करते हैं।”

रोडी, एण्डरसन एवं क्राइस्ट- “राज्य एवं व्यक्ति तथा व्यक्तियों के मध्य आपसी आदर्श संबंध को ही न्याय कहा जाता है।”

समानता

समानता तथा स्वन्त्रता एक दूसरे की पूरक हैं 1789 की फ्रांस की राज्य क्रांति ने तीन नई परवर्तियों को जन्म दिया-समानता, स्वतन्त्रता, तथा भ्रातृत्व। स्वत्रंता के विचार ने लोकतंत्रवाद को जन्म दिया तथा समानता के आदर्श ने समाजवाद को।

समानता की संकल्पना आधुनिक युग की देन है। आधनिक युग मे समानता की संकल्पना को केंद्रीय बनाने का श्रेय -रुसो को दिया जाता है।

आशय- समानता ‘चाहिए’ से सम्बंधित संकल्पना है। तथ्यात्मक रूप से समानता नही होती है। समानता का अर्थ है समाज के विशेषधिकारो एवं विषमताओ को समाप्त करना है।तः समानता का अर्थ , विभेदों का अंत है। परन्तु समानता का आशय, प्रतेयक प्रकार के विभेदों की समाप्ति नहीं ,बल्कि अतार्किक विभेदों की समाप्ति है। तार्किक विभेदों का आशय लिंग,जाति एवं धर्म के आधार पर किये गए विभेद है। अतः समानता का अर्थ उन विभेदों को हटाना है, जो समाज द्वारा निर्मित है, न कि प्राकृतिक विषमताओ का अंत करना है।

सम्बंधित पुस्तकें-

  1. taking right seriously- डॉर्किन
  2. Laws emperior- डॉर्कीन
  3. soverign virtue-डॉर्कीन
  4. The new class- मिलोवन जिलोस
  5. The Managerial Revolution-जेम्स बर्नहम
  6. source of self- चार्ल्स टेलर

समानता से संबंधित कथन

  • “आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता आड्म्बर, एक धोका, एक झूठ है मजदूरों को झूठ नहीं चाहिए”- बाकुनिन
  • ” अवसर की समानता स्वतंत्रता है परंतु प्रतिफल की समानता दमन है”– फिगलर
  • “मेरा एक सपना है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे एक दिन ऐसे राष्ट्र में रहेंगे ,जहां वह अपनी त्वचा के रंग से नहीं अपितु अपने चरित्र के साथ से जाने जाएंगे ” मार्टिन लूथर किंग जूनियर
  • ” समानता स्वतंत्रता की आत्मा है वास्तव में समानता के बिना कोई स्वतंत्रता नही होती “_ राइट
  • ” समाजवाद स्वतंत्रता की अपेक्षा समानता को महत्व देता है” डेनिश प्रेगर
  • ” लोकतंत्र के लिए मात्र समानता की आवश्यकता नहीं है अपितु इस विश्वास को भी आवश्यकता है, कि प्रत्येक व्यक्ति को जो समान है, उनका भी समान महत्व है” जींन क्रीक पैट्रिक

पंथनिरपेक्षता

पंथनिरपेक्ष राज्य से तातपर्य ह की राज्य अपने कार्यो के लिए पंथ को आधार नही बनाता,तथा राज्य का अपना कोई पंथ नही होता था धर्म के नाम पर राज्य नागरिको के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नही करता।

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No of Questions – 35

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Specially thanks to Quiz Makers ( With Regards )

पूनम जी छिंपा-हनुमानगढ़, मुकेश पारीक ओसियाँ, नवीन कुमार, गोविंद प्रसाद गुर्जर कोटा, Shankar Gurjar tonk, 

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