Madhya Pradesh Art

( मध्यप्रदेश की प्रमुख कलाए )

Rupankar Arts of Madhya Pradesh ( मध्य प्रदेश की रूपंकर कलाएं )

विभिन्न शिल्प कलाओ में परंपरागत रूप से काम आने वाले लोगों की समाज में बहुत पहले से जातिगत पहचान बन गई थी ! जैसे मिट्टी से कुंभ बनाने वाले कुंभकार, लोहे से गुजार बनाने वाले लोहार, तांबे से काम करने वाले ताम्रकार,लकडी का कार्य करने वाले सुतार, स्वर्ण का काम करने वाले सुनार, बाँस फोड़,बरगुंडा जिनगर,खटीक, पनिका, दर्जी लखेड़ा भरेव कसेरा,घडवा,छिपा,बुनकर सिलावट चितरे आदि जातियों परंपरागत रूप से प्रतिष्ठित हुई !

यह जातियां जीवन उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करने और बिक्री प्रारंभिक से करती आई हैं उपयोगी सामग्री के साथ सौंदर्य परख और अलंकरण युक्त अनुष्ठानिक अनुपूर्तियां भी इन्हीं जातियों पर आश्रित होने के कारण यह जातियां हमारी संस्कृति की धरोहर है

शिल्प विधाओं में संरक्षण विस्तार और सौंदर्य परखता में कई जातियों के पुरातात्विक प्रतीक स्मृतियों को सहज रुप से देखा जा सकता है जिससे उनकी प्राचीन कला और संस्कृति का परिचय मिलता है एक आदिवासी मिट्टी, लकड़ी, लोहे.बॉस,पति पत्तों आदि उपयोगी और कलात्मक वस्तुओं का सृजन परंपरा से करता आया है इसी कारण जनजातियों के पारंपरिक शिल्प में विविध के साथ आदिमता सहज रुप से दिखाई देती है !

Clay crafts ( मिट्टी शिल्प )

मिट्टी शिल्प आधी शिल्प है मनुष्य ने सबसे पहले मिट्टी के बर्तन बनाएं पृथ्वी का निर्माण के साथ ही मिट्टी शिल्प की आदयकाल आरंभ होती है मिट्टी के खिलौने और मूर्तियां बनाने की प्राचीन परंपरा है मिट्टी का कार्य करने वाले कुमार होते हैं लोग और आदिवासी दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुओं के साथ कुमार परंपरागत कलात्मक रूप रंगों का भी निर्माण करते हैं

भारत के विभिन्न अंचलों की मिट्टी शिल्प कला की ख्याति सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पहुंची हुई है ! मिट्टी में मध्यप्रदेश के बस्तर के शिल्पो के द्वारा सुंदर कलात्मक बारीक अलंकरण का कार्य किया जाता है इस कारण बस्तर की शिल्प सिर्फ सबसे अलग पहचान जाते हैं झाबुआ मंडला और बेतूल आदि की मिट्टी शिल्प अपने अपने निजी विशेषताओं के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं विभिन्न लोक आंचलों की पारंपरिक मिट्टी शिल्प कला का वैभव पर्व त्योहारों पर देखा जा सकता है !

Kashat Crafts ( काष्ट शिल्प )

काष्ट शिल्प की परंपरा बहुत प्राचीन और समृद्ध है लकड़ी में विभिन्न रूपांतरों को उतारने की कोशिश मनुष्य ने आदिम युग से शुरू कर दी थी जब से मानव ने मकान में रहना सीखा तक से काष्ट कला के श्रेष्ठ नमूने हैं लकड़ी के पहियो, देवी देवताओं की मूर्तियां,घरों के दरवाजे, पाटों तिपाही के मुखोटे आदि वस्तुओं में काष्ठ कला का उत्कर्ष प्राचीन समय से देखा जा सकता है !

Lathe art ( खराद कला, खैरात )

मध्यप्रदेश में खराब पर लकड़ी को सुडोल रूप देने की कला अति प्राचीन है खिलौने और सजावट की सामग्री तैयार करने की अनंत संभावनाएं होती है बारात कलाकार परंपरागत होते हैं शिवपुर कला बुधनी घाट रीवा मुरैना की खराद कला ने प्रदेश ही नहीं बल्कि प्रदेश के बाहर की प्रसिद्धि पाई है लकड़ी पर चढ़ाए जाने वाले रंगों का निर्माण इन कलाकारों द्वारा अपने डेट रूप में

आज भी मौजूद है खराद सागवान, दूधी, कदंबसलाई, गुरजेल मेंडला,खैर की लकड़ी पर की जाती है लकड़ी चपड़ी राजन,सरेश गोंद.जिंक पाउडर से रंग बनाए जाते हैं केवड़े के पत्ते से रंगों में चमक पैदा की जाती है श्योपुर कला, रीवा और बुधनी घाट खराद कला के पारंपरिक केंद्र है !

Comb Art ( कंघी कला )

कंघी कला संपूर्ण भारत के ग्रामीण समाज में आमतौर पर और आदिवासी समाज में खासतौर पर अनेक प्रकार की कंघियों का प्राचीन काल से ही प्रचलन चला रहा है

आदिवासियों मैं तो कंघियों का इतना अधिक महत्व है की कमियां अलंकरण गोदना एवं भित्ति चित्रों के मैं एक अभिप्राय के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुकी है इन पंक्तियों में घड़ाई के सुंदर काम के साथ ही रत्नों की जड़ाई मीनाकारी और अनेकों अभिप्रायों का द्वारा उनका अलंकरण किया जाता है कंघिघी बनाने का श्रेय बंजारा जाति को है मालवा में कंघी बनाने का कार्य उज्जैन रतलाम नीमच से होता है !

Arrow bow art ( तीर धनुष कला )

वन्य जातियों में मैं तीर धनुष रखने की परंपरा है तीर धनुष बाण मोरपंखी लकड़ी लोहे,रस्सी आदि से बनाए जाते हैं तीर धनुष शिकार के लिए बनाए जाते हैं भील, पहाड़ी कोरवा, कुमार आदि जनजातियां तीर धनुष चलाने में कुशल होते हैं तीर धनुष भील आदिवासियों की पहचान बन गई है प्रत्येक भील धनुष बाण अपने साथ रखता है भील तीर चलाने में निपुण और निशाना लगाने में अचूक होते हैं सबसे बड़ी बात यह है कि प्रत्येक आदिवासी तीर कमान अपने हाथ से तैयार करते हैं

Bamboo crafts ( बांस शिल्प )

बांस से बनी कलात्मक वस्तुएं सौंदर्य परखता और जीवन उपयोगी भी होती है इसलिए शिल्प की महत्ता जीवन में और बढ़ जाती है बस्तर झाबुआ मंडला आदि जिलों में जनजातियों के लोग अपने दैनिक जीवन में उपयोग के लिए बांस की बनी कलात्मक चीजों का स्वयं अपने हाथों से निर्माण करते हैं बांस का कार्य करने वाली कई जातियों में कई सिद्धहस्त कलाकार हैं झाबुआ मंडला में बांस शिल्प के अनेक परंपरागत कलाकार है

Card Carft ( पत्ता शिल्प )

पत्ता शिल्प के कलाकार मूल्यत: झाड़ू बनाने वाले होते हैं पेड़ पौधों के विभिन्न आकारों से मिलने वाले पत्तों के लिए मनुष्य का मन आदि काल से ही आकर्षित रहा है मनुष्य ने इन पत्तों में कला के आयाम ढूंढे हैं छिन्द पत्तों से कलात्मक खिलौने चटाई आसन, दूल्हा दुल्हन के मोड़ आदि बनाए जाते हैं पत्तों की कोमलता के अनुरूप उन्हें विभिन्न कला अभिप्राय को बनने में अनेक जातियों और जनजातियों के पारंपरिक कलाकार आज भी लगे हैं

Puppet ( कठपुतली )

कथा और ऐतिहासिक घटनाओं को नाटकीय अंदाज में व्यक्त करने की मनोरंजक विधा कठपुतली है इसमें मानवीय विचारों और भावों को अभिव्यक्त करने की गुंजाइश नहीं है कठपुतली के प्रसिद्ध पात्र अनारकली, बीरबल, बादशाह अकबर ,पुंगी वाला घुड़सवार ,सांप और जोगी होते हैं !

भारतवर्ष में कठपुतली का इतिहास भारतीय नाट्य से ही प्राचीन है बट पुतलियां कठिन से कठिन मानवी स्थितियों को प्रस्तुत करने में असमर्थ होती है कठपुतली की चार प्रकार की शैलियां हैं :- दस्ताना पुतली, धड़पुतली, सूत्री संबंधी पुतली और छाया पुतली ! कठपुतलियों के विभिन्न कलाकार दल अपनी शैली में भारतीय ऐतिहासिक आख्यानों को कलात्मक ढंग से गांव-गांव में प्रस्तुत करते हैं जिन्हें वे कठपुतली का खेल कहते हैं

Doll crafts ( गुड़िया शिल्प )

नई पुरानी रंगीन चिंदियों और कागजों से गुड़िया बनाने की परंपरा लोक में सब दूर देखी जा सकती है खिलौने मैं गुड़िया बनाने की प्रथा बहुत पुरानी है परंतु कुछ गुड़िया है पर्व त्योहारों से जुड़कर मांगलिक अनुष्ठान पर एक भी होती है जून का निर्माण और बिक्री उसी अवसर पर होती हैं

ग्वालियर अंचल में कपड़े लकड़ी और कागज से बनाई जाने वाली गुड़ियों की परंपरा अनुष्ठानिक है गुड्डा गुड़िया का ब्याह रचाया जाता है उनके नाम से व्रत पूजा की जाती है ग्वालियर अंचल की गुड़िया आएं अपने आकार-प्रकार सहित सजा सज्जा वेशभूषा और चेहरे की बनावट के लिए प्रसिद्ध है झाबुआ भीली गुड़ियों का केंद्र बन गया है

भीलो की शारीरिक बनावट उनकी वेशभूषा आभूषण अलंकरण तीर धनुष आदि को देखकर उनकी आकृति को कपड़े लकड़ी तारा आदी से बनाने का काम स्थानीय कलाकारो ने किया है तब से झाबुआ की भीली गुड़िया प्रदेश और प्रदेश के बाहर तक प्रसिद्धि पा गई है झाबुआ की गुड़िया राज्य स्तर पर प्रशंसा पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है ग्वालियर की गुड़िया देश तथा विदेश में विख्यात हुई है

छीपा शिल्प

कपड़े पर हाथ से बनाए जाने वाले छीपा शिल्प में विभिन्न में विचारों को उकेरा जाता है इनमें भील आदिवासियों के विभिन्न में जातीय प्रतीकों का समावेश होता है आज भी अधिकांश भील आदिवासियों द्वारा इन्हीं वस्तुओं का उपयोग किया जाता है पिछले वर्षों में छीपा शिल्प कला ने एक व्यवसायिक उद्योग का रूप ले लिया है

बाग.कुक्षी मनावर गोवावां खिराला उज्जैन छीपा शिल्प के पारंपरिक केंद्र हैं उज्जैन को शिफ़ा सेल्फी भेरूगढ़ के नाम से देश तथा विदेश में विख्यात है छिपा शिल्प में कई कलाकारों को प्रदेश स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर के सम्मान मिल चुके हैं !

Maheshwari Sarees ( महेश्वरी साड़ियां )

महेश्वरी साड़ियां अपनी बनावट सजावटी रंग और कलात्मकता के लिए भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी सराही जाती हैं महेश्वर के पारंपरिक बुनकरों द्वारा बोली गई सूती और रेशमी साड़ियां सुंदर टिकाऊ एवं पक्के रंग की होती हैं

जिन पर जरी और केले के धागों से छोटे बेल-बूटे गडे जाते हैं महेश्वरी साड़ी की प्रमुख विशेषता चोखाडा चौकड़ी कलात्मक किनारा,मनमोहक पल्लू, हल्के कैसे चमकदार चांदी और सोने में रंगों में जरी रेशम के हथकरघा की कढ़ाई है महेश्वरी साड़ियों उद्योग को स्थापित करने का श्रेय प्रसिद्ध शासक आहिल्याबाई को है महेश्वरी साड़ी पूर्णता देसी वस्तु कला की देन है यह कला महेश्वर में जन्मी पनपी और विस्तारित हुई है !

Chanderi sari ( चंदेरी साड़ी )

चंदेरी में बनने के कारण इस साड़ी का नाम चंदेरी साड़ी पड़ा चंदेरी साड़ी रेश्मी और सूती दोनों तरह की बनाई जाती है साड़ी में सूक्ति और रश्मी बड़े छोटे बूटे डाले जाते हैं चंदेरी साड़ी की विशेषता उसके हल्के और गहरे रंग कलात्मक चौड़े बॉर्डर तरह साड़ी के बीच में बड़ा जरी के जरिए रेशम और सूती बेल बुटे होते हैं चंदेरी साड़ी की बनावट पर आया शादी होती है लेकिन उसके पल्लू पर विभिन्न रंगों धागों से सुनियोजित बड़े आकार के बेल-बूटे मोर बतक आदि की आकृतियां गाड़ी जाती है चंदेरी साड़ी की लोकप्रियता प्रदेश के बाहर विदेशों तक पहुंची है

भीली चोमल, बटुआ, थैलियां,मोतीमाला:-

भील भिलाल महिलाएं दैनिक उपयोग के लिए रंगीन धागों से सुंदर कोमल बटुआ और थैलियां बनाती हैं धार झाबुआ क्षेत्र में कलात्मक कोमल बटुआ अत्यधिक लोकप्रिय है भीली महिलाएं उन्हें बनाने में पारंपरिक रूप से पारंगत होती है भील महिलाएं तरह-तरह के मोतियों की माला पहनने की अत्यधिक शौकीन होती है यह मालाएं भीली स्त्रियां स्वयं तैयार करती हैं भील लड़कियां बचपन में घर में अपने से बड़ी उम्र की महिलाओं से खाना बनाना सीख जाती है मोती माला की प्रमुख विशेषता उनकी गुथाबन है जिससे महिलाओं में सुंदर जालियां तथा फूलों का आकार बनता है माला में छोटे-छोटे रंगीन तथा सफेद मोतियों का उपयोग अधिकता से होता है

प्रस्तार शिल्प

मंदसौर और रतलाम जिला इसके केंद्र कहे जा सकते हैं जहां पत्थर को विभिन्न प्रकार प्रदान करने वाले श्रेष्ठ और परंपरागत कलाकार मौजूद हैं यह शिल्पकार गुर्जर गायरी जाट भील आदि जातियों और जनजातियों के लिए देवनारायण,बाधा, पाठ्यचर्या, नाग बावजी,भेरु बावजी ,रामदेवजी शक्ति महेश्वरीमाता,नाहर श्री माता गपल्या वीर तेजाजी गणपति दुर्गा हनुमान आदि हिंदू लोग देव लोक से जुड़ी मूर्तियों का निर्माण करते हैं इनके अलावा भी कुछ मूर्तियां तथा शिल्प ऐसे भी बनाते हैं

जिसका महत्व सौंदर्यात्मक अथवा दैनिक उपयोगी वस्तुओं का है देवड़ा घाट संगमरमर की मूर्तियां और ग्वालियर पौराणिक देवी देवताओं की मूर्तियां बनाने का केंद्र है

Lakh craft ( लाख शिल्प )

वृक्ष के गोंदिया रस से लाख बनाई जाती है लाख को गर्म करके उसमें विभिन्न रंगों को मिलाकर अलग-अलग रंगों के फूल बनाए जाते हैं लाख का काम करने वाली एक जाति का नाम ही लाख है लाख कलाकार जाति की स्त्री पुरुष दोनों पारंपरिक रुप से लखा कर्म में दक्ष होते हैं

लाख के चूड़े कलात्मक खिलौने सिंगार पटेरी डिब्बियां लाख के अलंकृत पशु पक्षी आदि कलात्मक वस्तुएं बनाई जाती है उज्जैन इंदौर रतलाम मंदसौर महेश्वर लाख सेल्फ के परंपरागत केंद्र में से हैं !

आदिवासी और लोक चित्रकला ( Tribal & Folk Painting )

आदिम जातियों में प्रागैतिहासिक काल से ही जीवन और सौंदर्य बहुत विकसित हुआ गुहा ग्रहों की दीवारों पर अलंकरण और शिकार चित्र इसके प्रमाण है घर की धारणा बनते ही घर की दीवारों को अलंकृत करने की तीव्र लालसा भीतो पर चित्र और अलंकरण के विभिन्न रूपों कार्य में सभी जातियों और जातियों के ग्रामीण स्थापत्य कला में आज भी दिखाई देते हैं

मंडला के गोंड, बेगा.परधान,बैगा, बेतूल के गोंड, कोरकु,, छिंदवाड़ा के गोन्ड़ भारिया झाबुआ के भील भिलाला रीवा शहडोल के गोंड कोल आदि में पारंपरिक चित्रकला आलेखन कला और मिट्टी से तरह-तरह की कलात्मक जालिया कोषठिया पशु-पक्षी मूर्तियां स्थानीय देवी देवताओं की मूर्ति बनाने की प्रथा दिखाई देती है

Terracotta craft ( टेराकोटा शिल्प )

मंडला जिले में निवास करने वाली कौन देगा प्रधान धीमा जेन भारत पुनिया और अरहरिया जनजातियों के पाटरी और टेराकोटा शिल्प के शिल्पी होते हैं इस शिल्प में धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं में काम आने वाली प्रतिभाओं का निर्माण होता है इसमें बड़ी देवी फुलवारी देवी की प्रतिमाए प्रसिद्ध हैं इस शिल्प में तरह तरह के खिलौने सजावटी सामान और गमलो का निर्माण भी होता है

भरेवा शिल्प:- बैतूल के आदिवासी द्वारा धातु से दैनिक उपयोग की कलात्मक वस्तुएं तथा देवी देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती है

पीतल शिल्प:- पीतल एवं तांबे से नरसिंहपुर जिले (चिंचली) में कलात्मक वस्तुएं बनाई जाती है यहां प्रमुख रूप से बर्तन बनाने का काम होता है जिसमें परात, डेचकी व गंज शामिल है

धातु शिल्प:- सतना के उचेहरा कस्बे में कासे से प्रसिद्ध बटलोही नामक पात्र बनाए जाते हैं

सुपारी शिल्प:- रीवा में सुपारी पर मूर्तियां बनाई जाती हैं

खिलौना शिल्प:- सीहोर जिले के बुधनी तहसील काष्ठ कला कृतियों के लिए प्रसिद्ध है यहां पर लकड़ी के खिलौने बनाए जाते हैं !

Music art ( संगीत कला ):-

भारत के महान संगीतकार तानसेन और बैजू बावरा ग्वालियर के थे ग्वालियर भारतीय संगीत का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है यह तानसेन की भूमि और द्रुपद की जन्मस्थली भी है राज्य का सबसे पुराना संगीत विद्यालय माधव संगीत विद्यालय यही है

राजधानी भोपाल में 1979 में स्थापित उस्ताद अलाउद्दीन खा संगीत एकेडमी ने प्रदेश और देश में संगीत के प्रोत्साहन में अपूर्व योगदान दिया है मेवाती घराने का जन्म भोपाल में ही हुआ है ! पंडित जसराज इसी घराने से संबंधित है उस्ताद अमीर खान ने अपनी शैली को इंदौर घराना नाम दिया है

प्रसिद्ध मेहर बैंड की स्थापना में घर में बाबा अलाउद्दीन खां ने की थी संगीत सम्राट रायगढ़ नरेश चक्रधर सिंह ने मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में संगीत को प्रोत्साहन दिया इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय शेरगढ़ ने पूरे प्रदेश में संगीत को शिक्षा के सुगम बनाया सुगम संगीत के क्षेत्र में प्रदेश की लता मंगेशकर,किशोर कुमार ने विश्वव्यापी ख्याति अर्जित की है !

CHOREOGRAPHY ( नृत्य कला )

कत्थक के क्षेत्र में प्रदेश के रायगढ़ का रहने का गौरवपूर्ण स्थान है जिस के संस्थापक राजा चक्रधर सिंह थे उन्होंने कत्थक को सस्ती विलासिता से बाहर कर महिमामंडित किया उनकी परंपरा में कार्तिक राम कल्याण दास फिरतू महाराज ने भी राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की ग्वालियर की संस्था रंग श्री लिटिल बैले ग्रुप तथा मध्य प्रदेश शासन के भारत हृदय वैले ग्रुप ने अच्छी ख्याति अर्जित की है

ग्वालियर के बापूराव राव शिंदे, इंदौर के प्रताप पवार उज्जैन के पूरु सुरेश नृत्यकार के रूप में प्रतिष्ठित है वही भरतनाट्यम के प्रचार-प्रसार में प्रदेश के शंकर होम बल का विशेष योगदान रहा है

Painting ( चित्रकला )

भीमबेटका में प्राप्त प्रागैतिहासिक शैल चित्र प्रदेश ही नहीं देश में प्राचीनतम में चित्रकारी की ऐतिहासिक परंपरा आज भी विद्यमान है बाघ के गुफा चित्र 13वीं शताब्दी की रीवा की बघेलखंडी कलम चित्रकला का इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है वर्तमान में :-बीडी देवलालीकार ने देश के शीर्षस्थ चित्रकारों को प्रशिक्षित कर प्रदेश को ख्याती दिलाई है !

SCULPTURE ( मूर्तिकला )

प्रदेश के प्राचीन हिंदू मंदिरों में उत्कृष्ट मूर्तिकला के नमूने मिलते हैं खजुराहो बेले ग्रुप इसलिए विश्व विख्यात है आधुनिक मूर्तिकला के क्षेत्र में अन्ना साहेब फाल्के के और नागेश्वर यावलकार का नाम उल्लेखनीय है

श्री रूद्र हाजी अलंकृत शैली के प्रतिष्ठित कलाकार हैं श्री डीजे जोशी ख्यातिलब्ध चित्रकार के साथ श्रेष्ठ मूर्तिकार भी है फड़के का कला केंद्र और स्टूडियो तथा भोपाल स्थित भारत भवन में मूर्ति कला के विकास में उल्लेखनीय काम किया है प्रदेश के अन्य श्रेष्ठ मूर्तिकार राजेश भंडारी .अशोक प्रजापति मदन भटनागर शशिकांत मुंडी आदि प्रमुख है

 

Quiz 

Question – 36

0%

Q.1 काष्ट कला का कार्य करने वाले कलाकार को क्या कहलाता है ?

Correct! Wrong!

Q.2 सबसे प्राचीन शिल्प कला कौन सी है ?

Correct! Wrong!

Q.3 खराद कला के प्रमुख पारंपरिक केंद्र हैं ?

Correct! Wrong!

Q.4 किसके पत्ते से रंगों में चमक पैदा की जाती है ?

Correct! Wrong!

Q.5 तीर धनुष रखना किस आदिवासी जनजाति की पहचान बन गई है?

Correct! Wrong!

Q.6 कलात्मक खिलौने, चटाई, आसन, दूल्हा दुल्हन मोड़ आदि शिल्प कला में बनाए जाते हैं ?

Correct! Wrong!

Q.7 निम्नलिखित में से महेश्वर नगर किसके लिए प्रसिद्ध है ?

Correct! Wrong!

Q.8 मालवा में कंघी बनाने का कार्य निम्न में से कौन से जिले /जिलो में होता है ?

Correct! Wrong!

Q.9 महेश्वर के पारंपरिक बुनकरों द्वारा बनाई गई रेशमी साड़ियां सुंदर, टिकाऊ एवं......... रंग की होती हैं?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 10) कोरकू जनजाति में प्रचलित एक लोकनाट्य जो कि अपनी नाट्य कला के लिये सर्वाधिक प्रसिध्द है, वह है ?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 11) दुल दुल घोड़ी सम्बंधित है ?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 12) निम्नलिखित में से बुंदेलखंड की लोकचित्र कला है ?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 13) संगीतकला में निपुण "तानसेन" की जन्मस्थली है ?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 14) "वंशी कौल" से सम्बंधित शब्द है ?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 15) असत्य कथन का चुनाव कीजिए -

Correct! Wrong!

Q.16 साड़ियों के लिए प्रसिद्ध नगर है ?

Correct! Wrong!

Q.17 बांस शिल्प कला के प्रमुख केंद्र कौन से जिले हैं ?

Correct! Wrong!

Q.18 महेश्वरी साड़ी उद्योग कला को स्थापित करने का श्रेय किस प्रसिद्ध शासक /शासिका को है?

Correct! Wrong!

Q.19 उज्जैन का छीपा शिल्प किस नाम से देश एवं विदेश में विख्यात है ?

Correct! Wrong!

Q.20 भरेवा शिल्प कला में बेतूल के आदिवासियों द्वारा कौन सी मूर्तियां बनाई जाती है ?

Correct! Wrong!

Q.21 सुपारी शिल्प की मूर्तियां मध्यप्रदेश के किस जिले में बनाई जाती है?

Correct! Wrong!

Q.22 सतना के उचेहरा कस्बे में प्रसिद्ध बटलोही नामक पात्र बनाए जाते हैं यह पात्र किस धातु के बनाए जाते हैं?

Correct! Wrong!

Q.23 कंघी बनाने का श्रेय किस जनजाति को है ?

Correct! Wrong!

Q.24 तीर धनुष कला किस जनजाति में विशेष प्रचलित है?

Correct! Wrong!

Q.25 भीली गुड़िया के लिए मध्य प्रदेश का कौन सा जिला?

Correct! Wrong!

Q 26.तीर धनुष कला किसलिये बनाये जाते है?

Correct! Wrong!

Q 27.कंघी बनाने का कार्य कहा किया जाता है?

Correct! Wrong!

Q 28.महेश्वरी साड़ी कहा पर बनाई जाती है?

Correct! Wrong!

Q 29.लाख से चुड़े बनाने वाली जाति है?

Correct! Wrong!

Q 30.भीली गुडिया का केंद्र बन गया है?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 31) निम्नलिखित कलाकारों और सम्बंधित स्थानों के सही जोड़े बनाइये (क) विष्णु चिंचालकर (1) उज्जैन (ख) बसन्त आगासे (2) देवास (ग) देवयानी कृष्ण (3) मुम्बई (घ) सचिदा नागदेव (4) इंदौर कूट :- (क) (ख) (ग) (घ)

Correct! Wrong!

(प्रश्न 32) फडके कला केंद्र कहाँ स्थित है ?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 33) "दादर" किस क्षेत्र का प्रसिध्द नृत्य कला है ?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 34) मदन भटनागर जो कि मध्यप्रदेश के प्रसिध्द कलाकार है, सम्बंधित है ?

Correct! Wrong!

(प्रश्न 35) निम्नलिखित में से असत्य कथन का चुनाव कीजिये -

Correct! Wrong!

(प्रश्न 36) कला के क्षेत्र में प्रसिद्व श्रीमती सुमन धर्माधिकारी, साहित्य के इस क्षेत्र से सम्बंधित है-

Correct! Wrong!

Art of Madhya Pradesh Quiz ( मध्यप्रदेश की प्रमुख कलाएं )
बहुत खराब ! आपके कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
खराब ! आप कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया ! अधिक तैयारी की जरूरत है
बहुत अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया! तैयारी की जरूरत है
शानदार ! आपका प्रश्नोत्तरी सही है! ऐसे ही आगे भी करते रहे

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

विष्णु गौर सीहोर, मध्यप्रदेश