Madhya Pradesh Cultural Museum

( मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक संग्रहालय )

मध्यप्रदेश पुरातत्व एवं संग्रहालय संचालनालय की स्थापना 1956 में हुई थी तथा वर्ष 1994 में राज्य अभिलेखागार का संविलियन भी इसमें किया गया। पुरातत्वीय सम्पदा के लिये मध्यप्रदेश पूरे देश में अग्रणी है। प्रदेश में बिखरी पुरातत्वीय सम्पदा का सर्वेक्षण, चिन्हांकन, संरक्षण, प्रदर्शन एवं अनुरक्षण के साथ नये संग्रहालयों की स्थापना कर जन सामान्य एवं शोधकर्ताओं में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागृति पैदा करना विभाग का उद्देश्य है।

इस कार्य में संग्रहालय एवं स्मारक महत्वपूर्ण योगदान देते हैं !पुरातात्विक अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए निर्मित भवनों को संग्रहालय कहा जाता है राज्य के विभिन्न जिलों में भिन्न-भिन्न राजवंशो के समय बनाए गए एक मूर्ति व अन्य अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए संग्रहालय बनाए गए राज्य के कुछ विश्वविद्यालय ने भी संग्रहालय की स्थापना की है इनमें, सागर, जबलपुर, उज्जैन, इंदौर विश्वविद्यालय के संग्रहालय उल्लेखनीय है !

Government Museum Bhopal ( शासकीय संग्रहालय भोपाल )

इस संग्रहालय की स्थापना ब्रिटिश काल में 1887 में हुई इससे पहले ऐड वर्ल्ड म्यूजियम कहते थे मध्यप्रदेश शासन ने 1964 में अधिग्रहित कर लिया अब यही स्टेट म्यूजियम के नाम से जाना जाता है !​

पुरातात्विक संग्रहालय मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल शहर में स्थित एक ऐसा संग्रहालय है जिसकी सीमाएँ किसी एक भवन के दायरे में सीमित नहीं हैं। पुरातात्विक धरोहर को संरक्षित करने के लिए यह संग्रहालय स्थापित किया गया है। यहाँ मध्‍य प्रदेश के विभिन्‍न हिस्‍सों से कला के ख़ूबसूरत नमूने और मूर्तियों को एकत्रित करके रखा गया है।

इस संग्रहालय के परिसर में विश्व धरोहर भीमबेटका के समान प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्र अपने मूल रूप में विद्यमान हैं। विभिन्‍न स्‍कूलों से एकत्रित की गई पेंटिग्‍स (चित्रकारियाँ), बाघ गुफाओं की चित्रकारियों की प्रतिलिपियाँ, लक्ष्मी और बुद्ध की प्रतिमाएँ इस संग्रहालय में सहेजकर रखी गई हैं।

पुरातात्विक संग्रहालय की दुकानों से पत्‍थरों की मूर्तियों ख़रीदी जा सकती हैं। प्राचीन संस्कृति से अवगत होने में पुरातात्विक संग्रहालय मददगार साबित है क्योंकि इस संग्रहालय में शोधार्थियों और इतिहासकारों को जानकारी प्रदान करने के लिए काफ़ी वस्तुएँ मौजूद है !

Indira Gandhi National Human Museum Bhopal ( इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल )

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की स्थापना 1985 में भोपाल के श्यामला हिल्स में 235 एकड़ में की गई या मानव सभ्यता के विकास की कहानी को प्रदर्शित करने वाला देश का सबसे बड़ा संग्रहालय है यहां पर जनजातीय विकास एवं उनकी लोक कलाओ की विशेषताओं प्रदर्शनी एवं नमुनारथ कर रखे गए हैं !​इस संग्रहालय में 32 पारंपरिक एवं प्रागैतिहासिक चित्रित शैलाश्रय भी हैं।

संग्रहालय परिसर में वन-प्रान्तों, पर्वतीय, समुद्र-तटीय तथा अन्य क्षेत्रों के मूल निवासियों द्वारा निर्मित या उन क्षेत्रों से प्रतिस्थापित तथा देश की विविध मौलिक समाजों की जीवन पद्धतियों को प्रतिबिम्बित करती सामग्रियों और मूर्त वस्तुओं से युक्त जनजातियों के आवासों के प्रकारों की मुक्ताकाश प्रदर्शनी मानव विकास की अविरल परंपरा से अवगत कराती है।

प्रमुख आदिवासी प्रजातियों में टोडा, बाराली, बाडो, कछरी, कोटा, सोवरा, गदेव, कुटियाक, अगरिया, राजवद, करवी, भील की झोपड़ियाँ, बस्तर का रथ, मारिया लोगों का घोटुल, 110 फीट लकड़ी की बनी लकड़ी की नाव, शैलचित्र आदि अनेक प्रदर्शन है।

मानव संग्रहालय द्वारा विभिन्न क्षेत्रों के मानव समूहों द्वारा संजोयी हुई धरोहरों, लोकगीतों आदि को जन-सामान्य का परिचय कराने हेतु समय-समय पर विविध समारोहों का आयोजन भी किया जाता है। मार्च 1985 में इस संग्रहालय का पुनः नामकरण किया गया और इसको राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के नाम से जाना गया।

फिर सन 1993 में एक कैबिनेट के फैसले के माध्यम से इस संग्रहालय का नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नाम पर ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय’ कर दिया गया।

Archaeological Museum Khajuraho ( पुरातत्व संग्रहालय खजुराहो ) :-

मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले में स्थित है। इसकी स्थापना 1957 मे कि गयी थी यह महोबा के 54 कि.मी. दक्षिण, छतरपुर के 45 कि.मी. पूर्व और सतना जिले के 105 कि.मी. पश्‍चिम में स्‍थित है तथा निकटतम रेलवे स्‍टेशनों अर्थात् महोबा, सतना और झांसी से पक्‍की सड़कों से अच्‍छी तरह जुड़ा है।

1910 में, बुंदेलखंड में ब्रिटिश शासन के तत्‍कालीन स्‍थानीय अधिकारी श्री डब्‍ल्‍यू. ए. जार्डिन की पहल पर खजुराहो के क्षतिग्रस्‍त मन्‍दिरों की अलग हो गई प्रतिमाओं तथा वास्‍तुकला के अवशेषों को पश्‍चिमी मन्‍दिर समूह के मातंगेश्‍वर मन्‍दिर से जुड़े एक अहाते में संग्रहित और परिरक्षित किया गया।

1952 में, भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण द्वारा अधिग्रहण किए जाने तक इस ऊपर से खुले संग्रह को जार्डिन संग्रहालय के रूप में जाना जाता रहा। किन्‍तु 1952 में इसका नाम बदलकर पुरातत्‍वीय संग्रहालय कर दिया गया। अब इस ऊपर से खुले संग्रहालय का उपयोग आरक्षित संग्रह के लिए किया जा रहा है और इस अहाते के अन्‍दर आम जनता का प्रवेश प्रतिबंधित है।

वर्तमान संग्रहालय 1957 में स्‍थापित किया गया था, जिसमें ऊपर से खुले संग्रहालय से लिए गए खजुराहो प्रतिमाओं के प्रतिनिधि संग्रह का उपयोग किया गया था। इस संग्रहालय की सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण मूर्तियाँ ब्राह्मण, जैन और बौद्ध मतों से संबंधित हैं और इन्‍हें मुख्‍य कक्ष समेत पाँच दीर्घाओं में प्रदर्शित किया गया है।

Central Archaeological Museum, Gwalior ( केन्द्रीय पुरातत्व संग्रहालय, ग्वालियर )

मध्य प्रदेश के ग्वालियर ज़िले में स्थित है। ग्वालियर का नाम एक सन्‍त ‘ग्‍वालिप’ के नाम पर पड़ा है। इसकी स्थापना 1948 मे हुई थी ! ग्वालियर में ब्रिटिश शासनकाल के अस्‍पताल और जेल की इमारत में 1984 में स्‍थल संग्रहालय स्‍थापित किया गया।

ग्वालियर के क़िले के हाथी स्‍तंभ द्वार के सामने स्‍थित इस संग्रहालय में एक विशाल आयताकार कक्ष, इससे जुड़ा एक कक्ष और दो बरामदें, जिनमें से एक आगे तथा दूसरा पीछे के भाग में है, तथा विभिन्‍न प्रकार की प्रदर्शनीय वस्‍तुएं मौजूद हैं। यह संग्रहालय ग्वालियर और इसके आसपास के क्षेत्रों से संग्रहित पुरावस्‍तुओं के विशाल और विविध संग्रह से भरा-पूरा है।

इनमें से ग्वालियर ज़िले में स्‍थित अमरोल मोरेना जिले में नरेसर, बटेस्‍वर, पदावलि, मितावली, सिहीनिया, भिंड जिले में खीरत और अतेर, शिवपुरी जिले में तेराही, रनौद और सुरवाया प्रमुख स्‍थान हैं। संग्रहालय में मौजूद प्रतिमाओं को शैव, वैष्णव, जैन और विविध समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

वे पहली शताब्‍दी ई.पू. से 17वीं शताब्‍दी ईसवी में, जिससे वे संबंधित हैं, भारत में मूर्तिकला और शैली के विकास को दर्शाती है। मितावलि से प्राप्‍त मूर्तियां संग्रहालय का सबसे प्राचीन संग्रह है। वे शुंग और कुषाण काल से संबंधित हैं। ये भारी भरकम परिधानों और आभूषणों से सज्‍जित मानव आकार वाली तथा विशालकाय प्रतिमाएं हैं। बलराम, कार्तिकेय और लकुलिस की प्रतिमाएं इस अवधि की उल्‍लेखनीय प्रतिमाएं हैं।

नरेश्‍वर, बटेस्‍वर, खीरत, अतेर, रनौद, सुरवाया और पदावलि से प्राप्‍त मूर्ति संग्रह प्रतिहार काल (8वीं शताब्‍दी ई. से 10वीं शताब्‍दी ई.) से सम्‍बंधित है। इस अवधि की मूर्तियों में गुप्त काल की समृद्ध कला परम्‍पराएं और सुघट्यता विद्यमान है।

वे पतली, छरहरी, सौन्‍दर्यपूर्ण और दैविक प्रतीत होती हैं। इनमें से नटराज, एकमुखा शिवलिंग, महापशुपतिनाथ शिव, सप्‍तमात्रिका, आदिनाथ, पार्श्‍वनाथ इत्‍यादि कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो संग्रहालय की प्रदर्शन-मंजूषा को समृद्ध बनाते हैं।

Archaeological museum, chanderi ( पुरातत्व संग्रहालय, चन्देरी )

मध्य प्रदेश के चंदेरी नगर में स्थित है। दिल्ली-भोपाल रेल लाइन पर ललितपुर से 40 कि.मी. की दूरी पर स्‍थित चंदेरी विशाल स्‍मारकों से घिरा एक प्रसिद्ध मध्‍यकालीन शहर है जिसमें चारों ओर दूर-दूर तक सांस्‍कृतिक धरोहरें छितरी पड़ी हैं।

ऐतिहासिक आंकड़ें और पुरात्‍वीय साक्ष्‍य दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र एक के बाद एक अनेक वंशों के शासनाधीन रहा जैसे मौर्य, शुंग, नागर, गुप्त, पुष्यभूति और प्रतिहार। यह संग्रहालय 3 अप्रैल, 1999 को जनता के लिए खोला गया था।

चंदेरी के स्‍थल संग्रहालय में संग्रह के मुख्‍य स्रोत 10वीं से 12वीं सदी ईसवी के बुधी चंदेरी के क्षतिग्रस्‍त मंदिरों से अलग हुए पुरातत्‍वीय और प्रतिमाओं के भाग हैं। उपरोक्‍त स्रोत के अलावा स्‍थानीय लोगों, पुलिस के अभिरक्षण और यत्र-तत्र खोज-बीनों से अनेक वस्‍तुएं संग्रहित की गई हैं।

Queen Durgavati Museum ( रानी दुर्गावती संग्रहालय )

जबलपुर में स्थित है। मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध संग्रहालयों में से यह एक है। यह प्रसिद्ध संग्रहालय महान् गोंड रानी दुर्गावती को समर्पित है। इस संग्रहालय में कई मूर्तियाँ, शिलालेख और ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक महत्व की अन्य कलाकृतियों का एक विशाल संग्रह संरक्षित है।

जबलपुर का ‘रानी दुर्गावती संग्रहालय’ यहाँ की प्रसिद्ध वीरांगना रानी दुर्गावती की शहादत और आत्म बलिदान के प्रतीक के रूप में गिना जाता है। रानी दुर्गावती की स्मृति में यह स्मारक वर्ष 1964 में निर्मित किया गया था। इस संग्रहालय के अंदर स्त्री शक्ति का प्रतीक मानी जाने वाली देवी दुर्गा की एक बलुआ पत्थर से बनी हुई प्रतिकृति है, जो रानी दुर्गावती एवं उनके साहसिक कर्मों के प्रदर्शन के साथ उनकी वीरता और गौरव को दर्शाती है।

संग्रहालय में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से संबंधित कुछ कलाकृतियों और तस्वीरें भी हैं। जबलपुर के ‘रानी दुर्गावती संग्रहालय’ में प्राचीन सांस्कृतिक अवशेष, आदिम अभिलेख और सिक्के आदि देखकर हर कोई अचम्भित रह जाता है। संग्रहालय में और भी कई अधिक दिलचस्प शिलालेख आदि मौजूद हैं।

Birla Museum Bhopal ( बिड़ला संग्रहालय भोपाल )

मध्य प्रदेश में स्थित है। इस संग्रहालय की स्थापना मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा, परिरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से की गई है। संग्रहालय एक ऊंची पहाड़ी पर लक्ष्मीनारायण मंदिर के पीछे वल्लभ भवन मार्ग पर अवस्थित है !

इस संग्रहालय में शैव, वैष्णव एवं देवी की मूर्तियों का अद्भुत संग्रह प्रशंसनीय है। बिड़ला संग्रहालय में अच्छी संख्या में उत्कृष्ट जैन मूर्तियाँ का भी संग्रह है। संग्रहालय में पाषाण उपकरण आदि भी प्रदर्शित किये गये हैं।

इसमें कुछ मृणमूर्तियां प्राचीन नगर कौशाम्बी से एकत्रित की गई हैं। गिलोलीखेड़ा, ज़िला मुरैना; कोटरा, ज़िला देवास ओर नांदनेर, ज़िला सीहोर में किए गए उत्खननों से प्राप्त पुरावशेष इस संग्रहालय में संग्रहीत हैं।

Telecommunication Museum, Bhopal ( दूरसंचार संग्रहालय, भोपाल )  

दूरसंचार संग्रहालय, भोपाल स्थित है इसे वर्ष 1995 में प्रारम्भ किया गया था , भारत में तथा विश्व में टेलीफोन के इतिहास को प्रदर्शित करता है दूर संचार संग्रहालय मुख्यत देश में दूरसंचार के उद्भव, इतिहास एवं विकास को दिखाता है ! जिसमें 1850 से आज तक बने सभी टेलीफोन उपकरणों को प्रदशिज़्त किया है। आर्श्चय की बात कि यह सभी उपकरण चालू स्थिति में हैं।

यह संग्रहालय इस क्षेत्र में शोध कार्य, विस्तृत अध्ययन के साथ मनोरंजन के लिए शुरू किया गया था। संग्रहालय में विभिन्न प्रकार के टेलीफोन उपकरणों को यहां प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय में सुबह 10 से शाम 5 बजे तक संग्रहालय में भ्रमण किया जा सकता है।

Archaeology Museum Sanchi ( पुरातत्व संग्रहालय सांची )

साँची का पुरातात्विक स्थल के पास एक संग्रहालय है। इसमें विभिन्न अवशेष हैं जो पास के बौद्ध परिसर में पाए गए थे। एक महत्वपूर्ण पर्यटक आकर्षण के रूप में सांची संग्रहालय भारतीय समृद्ध धार्मिक और स्थापत्य विरासत का साक्षी है।

कई दुर्लभ और प्राचीन वस्तुओं का प्रदर्शन इस संग्रहालय का दौरा करने योग्य बनाता है वर्ष 1919 में सर जॉन मार्शल द्वारा एक पुरातात्विक संग्रहालय रूप में विकसित किया गया था जिसे बाद में सांची संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण वर्तमान में इस संग्रहालय का मालिक है। सुबह 9 बजे से शाम को 5 बजे तक सार्वजनिक देखने के लिए इसे खुला रहता है। पर्यटननों को प्रवेश के लिए शुल्क देना होता है। भारतीय नागरिकों के लिए 30 रूपये तथा विदेशी पर्यटकों के लिए 500 रूपये का शुल्क है।भारत में तीसरी, दूसरी और पहली शताब्दी ईसा पूर्व काल की सबसे पुरानी पत्थर की मूर्तियों की एक बड़ी संख्या साँची संग्रहालय में संग्रहित है !

Scindia Museum, Gwalior ( सिंधिया संग्रहालय, ग्वालियर )

सिंधिया संग्रहालय जिसे जीवाजी राव सिंधिया संग्रहालय भी कहा जाता है, जय विलास महल के अंदर स्थित है। इसका नाम जीवाजी राव सिंधिया के नाम पर पड़ा जो इस राजवंश के प्रगतिशील शासक थे। यह संग्रहालय एक ट्रस्ट द्वारा 1964 में प्रारंभ किया गया जहाँ सिंधिया वंश के बचे हुए दस्तावेज़ और उनके उत्तराधिकारियों के लिए उनकी संपत्ति का प्रदर्शन किया गया है।

पेंटिंग्स, कांसा, हथियार, मूर्तियाँ, पांडुलिपियाँ, सिक्के, संगीत के वाद्य यंत्र, पर्शियन कारपेट्स, मालाबार लकड़ी का काम, आदि प्रदर्शन के लिए रखे गए हैं। दो बड़े बेल्जियन झूमर संग्रहालय के मुख्य आकर्षण हैं। औरंगज़ेब की तलवार भी यहाँ प्रदर्शन के लिए रखी गई है।

Central Archaeology Museum Indore ( केंद्रीय पुरातत्व संग्रहालय इन्दौर )

केंद्रीय संग्रहालय, इंदौर एक राज्य स्तरीय संग्रहालय है, जहाँ मालवा से प्राप्त पुरावशेषों को एकत्रित कर शोधाथिर्यों एवं पर्यटकों एवं जनसामान्य को जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। केंद्रीय संग्रहालय भवन में मूर्तियाँ, जो अधिकांश परमार कालीन विशेषता लिए हुए हैं, के अतिरिक्त अभिलेख, मुद्राएँ, इटैलियन कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं।

केंद्रीय संग्रहालय इंदौर की स्थापना 29 नवंबर, 1923 में हुई थी। यह तत्कालीन आयुक्त डॉ. अरुण्डले के निर्देशन में नररत्न मंदिर से प्रारम्भ हुआ। इसमें सबसे पहले 60 छायाचित्र तथा इस्लामी पुस्तक तथा 100 ग्रंथ रखे गए। एक अक्टूबर 1929 को इस संस्था को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया और कृष्णपुरा स्थित भवन, जहाँ वर्तमान में देवलालीकर कला वीथिका है, में दर्शकों के लिए प्रारंभ किया गया।

सन् 1930 में दसवीं शती की प्रतिमाएँ और प्रस्तर अभिलेख, उनके छापे, कुछ ताम्रपत्र संग्रहीत किए गए। सन् 1931 में यह संग्रहालय, जो शिक्षा विभाग के अधीन था, पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया।

स्थानीय लोगों के रुझान को देखते हुए आगरा-बाम्बे मार्ग पर नवीन संग्रहालय भवन की स्थापना कर यहाँ पर संग्रहालय विधा के अनुरूप पुरावशेषों को प्रदर्शित किया गया। इस संग्रहालय का कुल क्षेत्रफल 10804 वर्गफुट है तथा यह दोमंजिला है।

इस संग्रहालय में पुरावशेषों के प्रदर्शन के लिए छः वीथिकाएँ बनाई गई हैं। स्थानीय संग्रहों के साथ-साथ मध्यप्रदेश में हुए उत्खननों से प्राप्त पुरावशेष, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों के प्रदर्शन के साथ-साथ हिंगलाजगढ़ की परमारकालीन विशिष्ट प्रतिमाओं का संग्रह इस संग्रहालय के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

प्रस्तर अभिलेखों व उनके छापों के साथ-साथ ताम्र पत्रों को भी प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन मुद्रा प्रणाली को जानने के लिए मुद्रा प्रचलन से लेकर मुगलकालीन सिक्कों तक को प्रदर्शित किया गया है।

पुरावस्तु वीथी यहाँ से संग्रहालय का वास्तविक प्रदर्शन प्रारंभ होता है। सबसे पहले पुरावस्तु वीथिका है, जिसमें मानव का विकास तथा उसकी संस्कृतियों के विस्तार को क्रमबद्ध रूप में प्रदर्शित किया गया है। इनमें प्रदेश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त मानव एवं पशुओं के जीवाश्म तथा पाषाण कालीन उपकरण प्रदर्शित हैं।

बताया गया है कि इसी दीर्घा में सिंधु-घाटी की सभ्यता से संबंधित मोहन-जोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त अश्मोपकरण, ताम्र उपकरण आदि प्रदर्शित हैं। इसमे ईसा से 5000 पूर्व वर्ष के हस्त,कुठार, लीवर, स्क्रैप भाला,हसिया उपकरण सुरक्षित है इस संग्रहालय में 2500 से अधिक सिक्कों का संग्रह है !

मालव मूर्तिकला वीथी इस संग्रहालय की मूर्तिकला वीथिकाएँ देश में अपना अलग स्थान रखती हैं। मूर्तिकला की दृष्टि से पाषाण कलाकृतियाँ विभिन्न शैलियों और उनके क्रमिक विकास की परिचायक हैं। इस वीथिका में प्रारंभिक गुप्तकाल से उत्तर परमारकाल की कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है।

यहाँ के कलाकार ने सहज, सरल और स्वाभाविक अभिव्यक्ति को सुघटित देह यष्टि और मांसल सौंदर्य के साथ जिस नजाकत, नफासत और बारीकी से तराशा है वह अद्वितीय है। इस काल में सम्पूर्ण मालवा इस प्रकार की कलाकृतियों से परिपूर्ण रहा है। 

Madhavrao Sapre Journalism Museum Bhopal ( माधवराव सप्रे पत्रकारिता संग्रहालय भोपाल )

भोपाल के माधवराव सप्रे स्मृति समाचार-पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान में संग्रहित अलग-अलग कालखंडों के समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं की इबारत पढ़ते हुए ऐसा ही एहसास होता है, मानों इतिहास के रूबरू खड़े हो गए हों। 

इस म्यूजियम की स्थापना सन 1984 में की गई। म्यूजियम दुर्लभ धरोहर को सहेजने वाला अपने ढंग का अनूठा रिसर्च संस्थान है। लगभग पन्द्रह लाख पृष्ठों की इस ज्ञान-सम्पदा में हिन्दी, उर्दू, मराठी, अंग्रेजी, गुजराती, संस्कृत आदि भाषाओं के एक शताब्दी से अधिक पुराने न्यूज़ पेपर, मैगज़ीन हैं।

Rewa Maharaja Museum Wacant Building ( रीवा महाराज संग्रहालय वेकेंट भवन )

राजसी राज्य मध्य प्रदेश में पूरे रीवा जिले के पारंपरिक संग्रहालयों में से एक है। यह सच है कि इस संग्रहालय में एंटीक वस्तुओं का सबसे बड़ा संग्रह है और यह रीवा के महाराज की याद में बनवाया गया था। रीवा क्षेत्र से बहुत सारा इतिहास जुड़ा है और सिटी संग्रहालय आने वालों को एक ही छत के नीचे सभी ऐतिहासिक तथ्यों की झलक देखने को मिल जाती है।

इस संग्रहालय में एक आर्ट गैलरी भी है जिसकी देखभाल मध्य प्रदेश की सरकार करती है। एक बार इस शहरी क्षेत्र में चोरी हो जाने के कारण संग्रहालय के अंदर सुरक्षा के बहुत सख्त इंतज़ाम किए गए है। इस संग्रहालय में रखी हुई एंटीक वस्तुएँ सन् 2000 में हिंदी फिल्म अशोका में इस्तेमाल की गई थी और उसी दिन से यह संग्रहालय पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया था।

Sunawwar Shafi – Remembrance Museum ( सनव्वर शफी- रिमेम्बर संग्रहालय )

भोपाल मे स्थित यह एक ऐसा संग्रहालय है, जिसमें भोपाल की ‘काली रात’ के दर्द को दिखाने का प्रयास किया है। यह संग्रहालय हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी बैरसिया रोड पर स्थित है संग्रहालय में प्रभावितों की कृतियां, फोटोग्राफ्स, परिवारजनों की संवेदनाओं को लेख, प्रोटेस्ट पोस्टर, सॉग्स छवियों के जरिए दिखाया है। इस संग्रहालय की शुरुआत 2 दिसंबर 2014 को, आपदा की 30वीं वर्षगांठ पर की गई थी। 2 दिसंबर 1984 को हुए गैस कांड की विभिषिका को फोटो के जरिए देखा और महसूस किया जा सकता है। संग्रहालय में भ्रमण सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक किया जा सकता है।

शिववपुरी जिला संग्रहालय, शिवपुरी के इतिहास को संग्रहित करने में सक्षम स्‍थल है जहां इतिहास के कई अवशेषों को संरक्षित किया गया है। शिवपुरी का ऐतिहासिक महत्‍व यहां स्थित कई स्‍मारकों, मंदिरों और खंडहरों के कारण है वहीं इस संग्रहालय में इन सभी स्‍थलों के बारे में और उनसे जुड़ी कई सामग्रियों को सहेज कर रखा गया है।&

शिवपुरी का उल्‍लेख हिंदू धर्म के पुराणों में मिलता है और यह शहर धार्मिक और ऐतिहा‍सिक कारणों से काफी महत्‍वपूर्ण रहा है। यहां स्थित तात्‍या टोपे स्‍मारक, 6 वीं और 7 वीं सदी में बने मंदिर आदि इस शहर की ऐतिहासिक और सांस्‍कृतिक छवि को बरकरार रखते है और इसके महत्‍व की गवाही देते है।

शिवपुरी जिला संग्रहालय एक बड़ा पुरातात्विक संग्रहालय है जो हजारों साल पुराना नहीं है लेकिन कई वर्षो की शिवपुरी की सम्‍पत्ति को सहेज कर रखे हुए है। यहां एक पुस्‍तकालय भी है जहां पर्यटक अपनी पसंद के हिसाब से पुस्‍तक का चयन करके पढ़ सकते है।संग्रहालय का यह भाग शैक्षिक पहलू के उद्देश्‍य से बनाया गया है। इस संग्रहालय में पेंटिग्‍स, मूर्तियां और सिक्‍कों का काफी बड़ा कलेक्‍शन रखा हुआ है जहां मुगल और राजपूत काल के कई सामान भी रखे हुए है। यहां रखे सामान पूर्व काल यानि इतिहास के पन्‍नों से लोगों को मनोरंजन करते है।

Tulsi Museum ( तुलसी संग्रहालय )

तुलसी संग्रहालय एक पुरातत्‍व संग्रहालय है और सतना पर्यटन में इस स्‍थल का काफी महत्‍व है। यह सतना से 16 किमी. की दूरी पर स्थित है जिसे रामवन के नाम से जाना जाता है। इस संग्रहालय को 1977 में स्‍थापित किया गया था।

इस संग्रहालय को तुलसी संग्रहालय के अलावा, तुलसी म्‍यूजियम के नाम से भी जाना जाता है। इस संग्रहालय में टेरीकोटा, ब्रिच आर्क, पॉम लीफ यानि ताड़ के पत्‍तों से बनी विभिन्‍न चीजें, सुंदर मूर्तियां रखी हुई हैं। इस संग्रहालय में दुर्लभ सिक्‍के, तांबे की प्‍लेट, सोने और चांदी की मूर्तियां भी रखी हुई हैं। यह संग्रहालय सोमवार के अलावा सप्‍ताह के हर दिन सुबह 10:00 बजे से शाम 7:00 तक खुला रहता है !

Ramayana Art Museum ( रामायण कला संग्रहालय )

मध्य प्रदेश के ओरछा में बृहद रामायण काला सा तिल संग्रहालय की स्थापना की गई रामायण से संबंधित पारंपरिक कलाओं का यह भारत ही नहीं बल्कि दुनिया का संभवता पहला अनूठा केंद्र है मध्य प्रदेश शासन की संस्कृति विभाग के अंतर्गत आदिवासी लोक कला एकेडमी द्वारा स्थापित किए गए रामायण कला संग्रहालय का लोर्कापण रामनवमी 17 फरवरी 2005 को किया गया था !

Gujari Mahal Museum ( गुजरी महल संग्रहालय )

ग्वालियर में स्थित गुजरी महल भारत के प्रसिद्ध पुरातात्विक संग्रहालयों में से एक है। यह इमारत वास्तविक रूप से एक महल थी जिसका निर्माण राजा मान सिंह ने अपनी पत्नी मृगनयनी के लिए करवाया था जो एक गूजर थी। अत: इस महल का नाम गुजरी महल पड़ा। वर्ष 1922 में पुरातात्विक विभाग द्वारा इसे एक संग्रहालय में बदल दिया गया।

इस संग्रहालय में 28 गैलरियां और 9000 कलाकृतियाँ हैं। यहाँ 1 ली शताब्दी के समय की कलाकृतियाँ भी हैं। इसके अलावा यहाँ मूल्यवान पत्थर, रत्न, टेराकोटा की वस्तुएं, हथियार, मूर्तियाँ, पेंटिंग्स, शिलालेख, मिट्टी के बर्तन आदि का प्रदर्शन भी किया गया है।

गुजरी महल संग्रहालय की मूर्तियों में प्रसिद्ध शालाभंजिक यक्षी, त्रिमूर्ति नटराज अर्धनारेश्वर और यमराज शामिल हैं। यहाँ शहर के मधु और धार क्षेत्र के फोटोग्राफ भी हैं जो 75 वर्ष पुराने हैं। यहाँ 15 वीं शताब्दी के महान संगीतकार तानसेन के जीवन से संबंधित प्रमाण भी हैं।

Devi Ahilyabai Museum ( देवी अहिल्याबाई संग्रहालय )

मध्य-प्रदेश के खरगोन जिले के महेश्वर में देवी अहिल्ल्याबाई संग्रहालय स्थित है इसकी स्थापना 1974 में की गई थी ! महेश्वर संग्रहालय अपने नये भवन में अगस्त 98 में लोकापिर्त हुआ। निमाड़ क्षेत्र का यह महत्वपूर्ण संग्रहालय है। इस संग्रहालय के संग्रह में शैव, वैष्णव, जैन प्रतिमाओं के अतिरिक्त उत्खनित सामग्रियों व क्षेत्र के प्रमुख स्मारकों तथा देवी अहिल्या से जुड़े स्थलों के छायाचित्रों को प्रदशिर्त करते हुये होलकर शासकों के अस्त्र-शस्त्रों को भी प्रदर्शित  किया गया है।

Local Museum, Bhanpura ( स्थानीय संग्रहालय, भानपुरा (मंदसौर)

वर्ष 1958-59 में स्थापित पश्चिमी मालवा में स्थित भानपुरा संग्रहालय यशवंत राव होलकर प्रथम की छतरी परिसर में है। यहाँ भानपुरा व आसपास के क्षेत्र यथा गांधी सागर के डूब क्षेत्र एवं हिंगलाजगढ़ की कलाकृतियों का अनूठा संग्रह है जो परमार कालीन मूतिर्यों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

District Archeology Museum, Vidisha ( जिला पुरातत्व संग्रहालय, विदिशा )

वर्ष 1940 में स्थापित इस संग्रहालय में पाषाण प्रतिमाओं का संग्रह प्रमुख है। वैष्णव, शैव, शाक्त सम्प्रदायों की प्रतिमाओं के अतिरिक्त जैन प्रतिमाएँ भी उल्लेखनीय हैं। इनमें गुप्त शासक रामगुप्त के अभिलेख-युक्त उत्कीर्ण प्रतिमाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जिससे गुप्त राजवंश के शासक रामगुप्त की ऐतिहासिकता सिद्ध होती है। पुरावस्तु वीथी में मोहनजोदड़ो एवं बेसनगर की उत्खनन सामग्री मुख्य आकर्षण है। दूसरी शती ईप़ू की यक्ष एवं यक्षी की प्रतिमाएँ भी अत्यंत महत्व की हैं।

Maharaja Chhatrasal Museum Dhubelah ( महाराजा छत्रसाल संग्रहालय धुबेला (छतरपुर)

पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा वर्ष 1955 में लोकार्पित धुबेला संग्रहालय पाषाण प्रतिमाओं में योगिनी प्रतिमाओं का अनूठा संग्रह लिये हुये हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ पेंटिंग्स, अस्त्र-शस्त्र, शिलालेख एवं जैन प्रतिमाओं का संकलन एवं प्रदर्शन हुआ है। विविध प्रकार के दर्पणों को भी एक वीथी में प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय के संग्रह में करीब 2 हजार सिक्के भी सम्मिलित हैं।

District Archeology Museum, Rajgarh ( जिला पुरातत्व संग्रहालय, राजगढ़ )

वर्ष 1976 में स्थापित राजगढ़ संग्रहालय जिले में विशिष्ट कलाकृतियों को एकत्रित कर प्रदर्शित  किया गया है। संग्रह में अधिकांश प्रतिमाएँ हिन्दू व जैन धर्म की हैं। इनमें शैव व शाक्त प्रतिमाओं का बाहुल्य है। यहाँ की कलाकृतियां इस क्षेत्र में विकसित कला को व्यक्त करने में सक्षम हैं। यहाँ कुछ तांबे के सिक्कों का संकलन भी है।

Tulsi Museum, Ramvan Satna ( तुलसी संग्रहालय, रामवन (सतना) 

वर्ष 1978 में स्थापित रामवन संग्रहालय भरहुत के पुरावशेषों के संकलन में देश में तीसरा स्थान रखता है। गुप्तकालीन प्रतिमाओं का अनूठा संकलन व प्रदर्शन यहाँ हुआ है। यहाँ की प्रतिमाएँ मौर्य युग से 18-19वीं शती के मध्य की हैं। भरहुत के कुछ शिलापट्टों पर जातक कथाओं का अंकन है। जैन, वैष्णव, शैव एवं शाक्त प्रतिमाओं का अच्छा संकलन यहाँ है। लगभग 2500 हस्त लिखित ग्रन्थों का भण्डार जिसमें 6-7 सचित्र हस्तलिखित ग्रन्थ भी हैं। इसके अतिरिक्त देशी-विदेशी डाक टिकिटों एवं देश के विद्वानों, महापुरुषों, विचारकों के हस्ताक्षरों का अनूठा संकलन भी है।

District Archeology Museum, Mandla ( जिला पुरातत्व संग्रहालय, मण्डला )

वर्ष 1979 में स्थापित मण्डला संग्रहालय में मुख्यत: पाषाण प्रतिमाओं के संकलन के अतिरिक्त जीवाश्मों का सुंदर संग्रह है। यहाँ लगभग 175 जीवाश्म प्रदशिर्त हैं। हस्तलिखित ग्रन्थ, सिक्के व मृण्मय प्रतिमाएँ भी संग्रहालय में संग्रहित हैं।

District Archaeological Museum, Shahdol ( जिला पुरातत्व संग्रहालय, शहडोल )

वर्ष 1983 में स्थापित शहडोल संग्रहालय में पाषाण प्रतिमाओं का संकलन है। इनमें वैष्णव, शैव एवं देवी प्रतिमाओं की प्रमुखता है।

District Archeology Museum, Hoshangabad ( जिला पुरातत्व संग्रहालय, होशंगाबाद )

वर्ष 1984 में स्थापित होशंगाबाद संग्रहालय में मुख्यत: परमार कालीन वैष्णव, शैव, जैन प्रतिमाएँ संग्रहित हैं। इसके अतिरिक्त होशंगाबाद जिले के खेड़ीनेमा में वर्ष 1994 में हुये उत्खनन की पुरावस्तुएँ भी संग्रहित हैं। इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण सामग्री हाथी दाँत के जीवाश्म हैं।

District Archeology Museum, Panna ( जिला पुरातत्व संग्रहालय, पन्ना )

वर्ष 1988 में स्थापित पन्ना संग्रहालय में गुप्त, चंदेल एवं कलचुरी काल की पाषाण प्रतिमाएँ प्रदर्शित  हैं। इसके अतिरिक्त कुछ चांदी एवं तांबे के सिक्कों का भी संकलन है।

जिला पुरातत्व संग्रहालय, देवास:-

वर्ष 1988 में स्थापित देवास संग्रहालय में शैव, शाक्त, वैष्णव एवं जैन प्रतिमाएं प्रमुख हैं। स्थानीय मराठा हवेलियों की कुछ काष्ठ कलाकृतियों को भी यहां प्रदर्शित  किया गया है।

जिला पुरातत्व संग्रहालय, रीवा:-

वर्ष 1988 में स्थापित रीवा संग्रहालय में कलचुरी शासकों के महत्वपूर्ण कला केन्द्र गुगीर् एवं आस-पास की प्रतिमाएँ प्रमुखता से हैं। शेष विन्ध्य क्षेत्र की प्रतिमाओं को यहाँ प्रदर्शित  किया गया है।

जहाँगीर महल संग्रहालय, ओरछा (टीकमगढ़):-

वर्ष 1990 में स्थापित ओरछा संग्रहालय में स्थानीय एवं आसपास की पाषाण प्रतिमाओं, सती स्तंभों, शिलालेखों आदि के संग्रह को सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रदर्शित  किया गया है।

यशोधर्मन संग्रहालय, मंदसौर:

वर्ष 1982-83 में स्थापित हुये इस संग्रहालय का वर्ष 1997 में नये भवन में लोकार्पण हुआ। इस संग्रहालय में मंदसौर जिले के विविध स्थलों से प्राप्त शैव, वैष्णव, देवी, जैन सम्प्रदायों से संबंधित प्रतिमाओं को प्रदर्शित  किया गया है। इन प्रतिमाओं में सप्तमातृका, अम्बिका, चामुण्डा, हारीति आदि अद्वितीय हैं। ये प्रतिमाएँ 6वीं शती ई. से 14वीं शती ई. तक की हैं।*

स्थानीय संग्रहालय, गंधर्वपुरी (देवास):-

वर्ष 1964 में स्थापित गंधर्वपुरी संग्रहालय में पाषाण प्रतिमाओं का संकलन है जो परमार कालीन शैव, वैष्णव, देवी एवं जैन धर्म से संबंधित हैं।

स्थानीय संग्रहालय, आशापुरी (रायसेन) :-

वर्ष 1965-66 में स्थापित आशापुरी संग्रहालय में आशापुरी ग्राम के विविध स्थलों से संग्रहित प्रतिमाओं का सुन्दर संग्रह है। ये प्रतिमाएं अपनी कला एवं सम्पूर्णता के लिये परमार कला की अनूठी उपलब्धि है।

स्थानीय संग्रहालय, पिछोर (ग्वालियर) :-

वर्ष 1977 में स्थापित पिछोर संग्रहालय में क्षेत्र की पाषाण प्रतिमाओं का सुंदर संग्रह है जो क्षेत्रीय कला का दिग्दर्शन कराती है।

 

Quiz 

Question -10

0%

Q.1 निम्न में से कौन सा संग्रहालय स्टेट म्यूजियम के नाम से जाना जाता है ?

Correct! Wrong!

Q.2 दूरसंचार संग्रहालय मध्यप्रदेश के किस जिले में स्थित है ?

Correct! Wrong!

Q.3 मध्यप्रदेश में बिरला म्यूजियम किस शहर में स्थित है ?

Correct! Wrong!

Q.4 ब्रिटिश काल में (1887) में किस संग्रहालय का नाम एडवर्ड म्यूजियम था ?

Correct! Wrong!

Q.5 सांची( रायसेन) में कौन सा संग्रहालय स्थित है ?

Correct! Wrong!

Q.6 इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की स्थापना भोपाल के श्यामला हिल्स में किस वर्ष की गई ?

Correct! Wrong!

Q.7 माधवराव सप्रे पत्रकारिता संग्रहालय किस जिले में स्थित है ?

Correct! Wrong!

Q.8 जिला संग्रहालय कहां पर स्थित है जिसकी स्थापना 1930 में हुई थी तथा 1962 में मध्यप्रदेश शासन ने अपने अधिग्रहण में ले लिया था ?

Correct! Wrong!

Q.9 मानव सभ्यता के विकास की कहानी को प्रदर्शित करने वाला देश का सबसे बड़ा संग्रहालय कौन सा है ?

Correct! Wrong!

Q.10 मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में कौनसा संग्रहालय स्थित है ?

Correct! Wrong!

Cultural Museum of Madhya Pradesh Quiz ( मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक संग्रहालय )
खराब ! आप कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया ! अधिक तैयारी की जरूरत है
बहुत अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया! तैयारी की जरूरत है
शानदार ! आपका प्रश्नोत्तरी सही है! ऐसे ही आगे भी करते रहे

Share your Results:

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

विष्णु गौर जिला- सीहोर, मध्यप्रदेश