बघेलखंड के लोक नृत्य 

1. बिरहा अथवा अहींराई नृत्य

  • बघेलखंड में बिरहा गायन के साथ नृत्य वृत्ति भी है बिरहा नृत्य का कोई समय निश्चित नहीं होता मन चाहे जब मौज में बिरहा किया जा सकता है विशेषकर शादी विवाह, दीपावली में बिरहा नृत्य होता है जब बिरहा नृत्य अहीर लोग करते हैं तब वह अहीराई कहलाता है इसी प्रकार जिस जाति में यह नृत्य किया जाता है उसी जाति के नाम से वह जाना चाहता है
  • बिरहा में पुरुष नाचते हैं और कभी-कभी स्त्रियां भी उसमें शामिल होती है जब स्त्री पुरुष नाचते हैं तब सवाल-जवाब होते हैं बिरहा की दो पंक्तियां दोहे की तरह बघेली शैली में लंबी तान लेकर प्रमुख नर्तक उठता है और दोहे के अंत में नृत्य तीव्र गति से चलता है गीत में सवाल-जवाब होते हैं यह क्रम पुरुष और महिलाओं के बीच चलता रहता है
  • सवाल-जवाब के अंतिम पंक्ति के छोर पर बाध्य नगरिया ढोलक शहनाई धना धन बजे उठते हैं इधर स्त्री और पुरुष नाटक पति के साथ नृत्य करते हैं स्त्रियों के मुख पर घूंघट डाले रहता है हाथ में पैरों की मुद्राएं दर्शनीय होती हैं ताल की समाप्ति पर फिर यही क्रम शुरू होता है !
  • बिरहा नृत्य बघेलखंड में सभी जातियों में प्रचलित है आहिर, तेली, गडरिया ,बारी जातियों में बिरहा नृत्य विशेष लोकप्रिय है आहीर, गडरिया, बारी लोग गांव के ठाकुर या अन्य आदमियों के घर बिरहा गाकर जाते हैं
  • यह प्रथा बघेलखंड में दादर ले जाना कहलाती है दीपावली के अवसर पर गाए जाने वाले और नाचने की प्रथा है हाथ में मोर पंख ,रंगीन डंडे और बाजे होते हैं पेड़ों और कमर में घंटियां बंधी होती है उल्लास से उछलते-कूदते बिरहा की ऊंची नीची तान छोड़ते हुए द्वार-द्वार पर गाना बजाना त्योहारी लेना गाड़ियों के बिरहा नाच की विशेषता है पुरुष सफेद रंग बिरंगे तारो की जाली बांधते हैं सिर पर पगड़ी या साफा बाधा जाता है !

2. राई नृत्य 

  • बुंदेलखंड की तरह बघेलखंड में वीर राई नृत्य का प्रचलन है दोनों की राय में बेहद फर्क है बुंदेलखंड में बेड़नी और मृदंग राई की जान होती है बघेलखंड में राई ढोलक और नागाड़ियों पर गई बजाई जाती है लेकिन पुरुष स्त्री वेश धारण कर नाचते हैं राज विशेषकर अहीर नाचते हैं कहीं-कहीं ब्राह्मण जाति की स्त्रियों के प्रचलन हैं
  • पुत्र जन्म पर किराया वेश्य महाजनों के यहां भी यह नृत्य होता है स्त्रियां हाथों पैरों और कमर में विशेष मुद्राओं में नाचती हैं राही गीत श्रृंगार परख होते हैं परंतु बुंदेलखंड की तरह योवन और श्रृंगार का उद्गम और इसकी तीव्र गति यहां नहीं होती राई नृत्य में स्त्रियों की वेशभूषा और गहने परंपरागत ही होते हैं पुरुष धोती बाना साफा और पैरों में घुंगरू पहनते हैं !

3. केहरा न्रत्य

  • केहरा स्त्री और पुरुष दोनों अलग अलग शैली में नाचते हैं इसकी मुख्य ताल कहरवा ताल है इसके साथ बांसुरी की जब मधुर धुन चढ़ जाती है तब पुरुष नर्तकों के हाथ और पैरों की नृत्य गति असाधारण हो जाती है महिलाओं के हाथों और पैरों की मुद्राओं का संचालन और गति में हो जाता है नृत्य के पहले पुरुष केहरा गाते हैं नृत्य के समय पर पहुंचने पर मुख्य नर्तक कोई दोहा कहता है
  • और दोहे की अंतिम कड़ी के साथ हाथों के झटकों के साथ पूरी गति से नृत्य प्रारंभ होता है नृत्य और संगीत का सामंजस्य लोगों में इतना जोश भर देता है कि कितने ही लोग बरबस नाचने लगते हैं नाचने के पहले स्त्रियां भी केहरा गाती हैं स्त्रियां नाचते-नाचते फिरहरि लेती हैं और फ़िरहरि केहरा की एक खास मुद्रा है
  • और फ़िरहरि में स्त्रियां हाथ देकर चकरी लेती हैं केहरा नाच के एक खास मुद्रा है और फ़िरहरी जो हर जाति में है बारी जाति है केहरा नाच विशेष लोकप्रिय है !

बुंदेलखंड अंचल लोकनृत्य

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1. राई लोक नृत्य

  • राई बुंदेलखंड का एक लोकप्रिय नृत्य है शादी विवाह उत्सव के अवसर पर राई नृत्य का आयोजन स्वभाव और प्रतिष्ठा प्रदान करता है राई के केंद्र में बैंडनी (नर्तकी) होती है जिसे गति देने का कार्य मृदंग वादक करता है
  • राई नृत्य के विश्राम का स्थान स्वान्ग ले लेते हैं स्वान्ग के माध्यम से हंसी मजाक सटीक प्रस्तुति गुदगुदाने का कार्य करती है विश्राम के बाद पुना राई प्रारंभ होती है बेजोड़ लोक संगीत तीव्र गति नृत्य और तत्कालिक कविता के मूल्यांकन राई नृत्य को एक ऐसी संपूर्णता प्रदान कर दी है जिसका सामान्यता अन्य लोक नृत्यों में संयोग दुर्लभ ही है !

2. कानड़ा

  • बुंदेलखंड में कानड़ा मूल रूप से धोबी समाज के लोग करते हैं इसमें पहले गजानन भगवान की कथा गाई जाती है साथ ही गायन से पूर्व गुरु वंदना की जाती है मुख्यता यह नृत्य शुभ अवसरों ,विवाह आदि पर किया जाता है
  • कानड़ा नृत्य में मुख्य भाग्य सारंगी लौटा ढोलक और तारे होते हैं कभी-कभी ढोलक की जगह मृदंग का भी प्रयोग किया जाता है !

3. सैरा नृत्य

  • बुंदेलखंड में श्रवण भादो में सैरा नृत्य किया जाता है यह पुरुष प्रधान नृत्य है इस नृत्य में 14 से 20 व्यक्ति भाग लेते हैं उनके हाथों में लगभग सवा हाथ का एक एक डंडा रहता है नर्तक वृत्ताकार में खड़े होकर कृष्ण लीलाओं से संबंधित गीत गाते हुए नृत्य करते हैं पहले आधे नर्तक फिर दूसरे आधे नर्तक गीत को दोहराते हैं
  • नर्तक की वेशभूषा साधारण होती है साफा ,कुर्ता बंडी धोती हाथ में रुमाल तरफ कमर में पट्टा और पैरों में घुंघरू होते हैं इस नृत्य में ढोलक टिमकी मंजीरा मृदंग और बांसुरी वाद्य प्रमुख होते हैं !

4. बधाई

  • बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में शादी विवाह के अवसर पर बधाई नृत्य करने की परंपरा है इस नृत्य में स्त्री पुरुष की संयुक्त भूमिका होती है कहीं-कहीं घोड़ी सजा संवार कर नाचने की प्रथा भी पर है पहले नर्तक वृत्ताकार में खड़े होकर नृत्य करते हैं
  • फिर एक एक करके व्रत के भीतर जाकर विभिन्न मुद्राओं में नृत्य किया जाता है थक जाने पर दूसरे नर्तक उसका स्थान ले लेते हैं इस नृत्य में दो नर्तक और नर्तकी एक साथ नाचते हैं बधाई एक ताल है जिसे ढोलकि या ढसले पर बजाया जाता है !

5. ढिमरयाई

  • ढिमरयाई लोक नृत्य बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचल में अधिक प्रचलित है ढीमर जाती के लोग इस नृत्य को करते हैं इसलिए इसे ढिमरयाई नृत्य कहते हैं शादी विवाह एवं नवदुर्गा आदि अवसरों पर यह नृत्य किया जाता है नृत्य करते समय प्रमुख नर्तक श्रंगार और भक्ति से गीत गाता है ! सेहवत के लोग उसे दोहराते हैं
  • मुख्य नर्तक कत्थक की तरह परिचालन करते हुए गीतों के हाव भाव द्वारा समझाने की चेष्टा करता है इस नृत्य की विशेषता पद चालन की है दौड़ना पंजों के बल चलना मृदंग की थाप पर कलात्मक ढंग से ठुमकना पदाघात करना आदि समय पर ध्रुत गति से घूमते हुए सात आठ चक्कर लगाना इसके प्रमुख भाव है इस नृत्य में केंकडिया मृदंग ढोलक टीमकी आदिवासी बजाए जाते हैं !

मालवा के लोक नृत्य

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1. मटकी नाच (नृत्य)

  • मालवा में मटकी नाच का अपना पारंपरिक रंग है विभिन्न अवसरों विशेषकर सगाई ,विवाह, पर मालवा के गांव की महिलाएं मटकी नाच करती हैं एक ढोल या ढोलक जी एक खास ले जो मटकी के नाम से जानी जाती है उस की थाप पर महिलाएं नृत्य करती हैं
  • मटकी ताल के कारण इस नृत्य का नाम मटकी नृत्य पड़ा प्रारंभ में एक ही महिला नाचती है परंतु आवेग में कभी-कभी दो महिलाएं नृत्य करने लगती हैं इसे झेला कहते हैं आजकल मटकी नृत्य में कई महिलाएं सम्मिलित होती हैं और हाथ पैरों की मुद्राओं के साथ मटकी नृत्य में कलात्मक वैभव सृजित करती है !
  • महिलाएं अपनी परंपरागत वेशभूषा में पूरा चेहरे पर घूंघट डाले नृत्य करती हैं नाचने वाली पहले गीत की कड़ी उठाती है फिर वापस की महिलाएं समूह में इस कड़ी को दोहराती तिहराती है नृत्य में हाथ और पैरों का संचालन दर्शनीय होता है नृत्य के केंद्र में ढोल होता है
  • ढोल पर मटकी ताल इस नृत्य की मुख्य ताल है ढोलकी मटकी और डंडे से बजाया जाता है मटकी नाच में आड़े खड़े और रजवाड़ी नाच की मुद्राओं का भी इस्तेमाल किया जाता है !

2. आड़ा खाड़ा राजवाड़ी नाच

  • आड़ा खड़ा राजवाड़ी नृत्य की परंपरा किसी भी अवसर विशेष पर समूचे मालवा में देखी जा सकती है परंतु विवाह में तो मंडप के नीचे वाला आड़ा खड़ा राजवाड़ी नृत्य अवश्य किया जाता है ढोलकी परंपरा कहेरवा दादरा आदिं पर आड़ा खडा राजवाड़ी नाच किया जाता है
  • ढोल डंडे और कीमडी से बजाया जाता है आड़ा खड़ा राज वाडी महिला पर नृत्य कर कहरवा ताल पर किया जाता है खड़ा खड़े-खड़े किया जाता है और राजवाडी साड़ी के पल्लू को पकड़कर किया जाता है !

बघेलखंड के लोक नृत्य 

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1. बिरहा अथवा अहींराई नृत्य

  • बघेलखंड में बिरहा गायन के साथ नृत्य वृत्ति भी है बिरहा नृत्य का कोई समय निश्चित नहीं होता मन चाहे जब मौज में बिरहा किया जा सकता है विशेषकर शादी विवाह, दीपावली में बिरहा नृत्य होता है जब बिरहा नृत्य अहीर लोग करते हैं तब वह अहीराई कहलाता है इसी प्रकार जिस जाति में यह नृत्य किया जाता है उसी जाति के नाम से वह जाना चाहता है बिरहा में पुरुष नाचते हैं
  • और कभी-कभी स्त्रियां भी उसमें शामिल होती है जब स्त्री पुरुष नाचते हैं तब सवाल-जवाब होते हैं बिरहा की दो पंक्तियां दोहे की तरह बघेली शैली में लंबी तान लेकर प्रमुख नर्तक उठता है और दोहे के अंत में नृत्य तीव्र गति से चलता है गीत में सवाल-जवाब होते हैं यह क्रम पुरुष और महिलाओं के बीच चलता रहता है
  • सवाल-जवाब के अंतिम पंक्ति के छोर पर बाध्य नगरिया ढोलक शहनाई धना धन बजे उठते हैं इधर स्त्री और पुरुष नाटक पति के साथ नृत्य करते हैं स्त्रियों के मुख पर घूंघट डाले रहता है हाथ में पैरों की मुद्राएं दर्शनीय होती हैं ताल की समाप्ति पर फिर यही क्रम शुरू होता है !
  • बिरहा नृत्य बघेलखंड में सभी जातियों में प्रचलित है आहिर, तेली, गडरिया ,बारी जातियों में बिरहा नृत्य विशेष लोकप्रिय है आहीर, गडरिया, बारी लोग गांव के ठाकुर या अन्य आदमियों के घर बिरहा गाकर जाते हैं
  • यह प्रथा बघेलखंड में दादर ले जाना कहलाती है दीपावली के अवसर पर गाए जाने वाले और नाचने की प्रथा है हाथ में मोर पंख ,रंगीन डंडे और बाजे होते हैं पेड़ों और कमर में घंटियां बंधी होती है उल्लास से उछलते-कूदते बिरहा की ऊंची नीची तान छोड़ते हुए द्वार-द्वार पर गाना बजाना त्योहारी लेना गाड़ियों के बिरहा नाच की विशेषता है पुरुष सफेद रंग बिरंगे तारो की जाली बांधते हैं सिर पर पगड़ी या साफा बाधा जाता है !

2. राई नृत्य

  • बुंदेलखंड की तरह बघेलखंड में वीर राई नृत्य का प्रचलन है दोनों की राय में बेहद फर्क है बुंदेलखंड में बेड़नी और मृदंग राई की जान होती है बघेलखंड में राई ढोलक और नागाड़ियों पर गई बजाई जाती है लेकिन पुरुष स्त्री वेश धारण कर नाचते हैं राज विशेषकर अहीर नाचते हैं
  • कहीं-कहीं ब्राह्मण जाति की स्त्रियों के प्रचलन हैं पुत्र जन्म पर किराया वेश्य महाजनों के यहां भी यह नृत्य होता है स्त्रियां हाथों पैरों और कमर में विशेष मुद्राओं में नाचती हैं राही गीत श्रृंगार परख होते हैं परंतु बुंदेलखंड की तरह योवन और श्रृंगार का उद्गम और इसकी तीव्र गति यहां नहीं होती राई नृत्य में स्त्रियों की वेशभूषा और गहने परंपरागत ही होते हैं पुरुष धोती बाना साफा और पैरों में घुंगरू पहनते हैं !

3. केहरा न्रत्य

  • केहरा स्त्री और पुरुष दोनों अलग अलग शैली में नाचते हैं इसकी मुख्य ताल कहरवा ताल है इसके साथ बांसुरी की जब मधुर धुन चढ़ जाती है तब पुरुष नर्तकों के हाथ और पैरों की नृत्य गति असाधारण हो जाती है महिलाओं के हाथों और पैरों की मुद्राओं का संचालन और गति में हो जाता है नृत्य के पहले पुरुष केहरा गाते हैं नृत्य के समय पर पहुंचने पर मुख्य नर्तक कोई दोहा कहता है
  • और दोहे की अंतिम कड़ी के साथ हाथों के झटकों के साथ पूरी गति से नृत्य प्रारंभ होता है नृत्य और संगीत का सामंजस्य लोगों में इतना जोश भर देता है कि कितने ही लोग बरबस नाचने लगते हैं नाचने के पहले स्त्रियां भी केहरा गाती हैं स्त्रियां नाचते-नाचते फिरहरि लेती हैं
  • और फ़िरहरि केहरा की एक खास मुद्रा है और फ़िरहरि में स्त्रियां हाथ देकर चकरी लेती हैं केहरा नाच के एक खास मुद्रा है और फ़िरहरी जो हर जाति में है बारी जाति है केहरा नाच विशेष लोकप्रिय है !

4. दादर नृत्य

  • दादर बघेलखंड का प्रसिद्ध नृत्य है दादर नृत्य अधिकांश पुरुषों के द्वारा खुशी के अवसर पर किए जाते हैं कहीं-कहीं पुरुष नारी वेश में नाचते हैं दादर के लिए कॉल कोटवार कहार विशेष रूप से प्रसिद्ध है यह जातियां दादर लेकर निकलती हैं दा धर के मुख्य भाग्य नगडिया ढोल ढोलक ठप और शहनाई !
  • कभी-कभी महिलाएं नाचती हैं वह पुरुष वाद्य बजाते हुए कहते हैं महिलाएं घुंघट में नाचती हैं पैरों में घुंघरू बांध देती हैं हाथ पैरों और कमर में मुद्राओं से दादी नृत्य परंपरा का निर्वाह करती हैं जातीय गीतों के साथ दादर नृत्य में अपनी नीजी विशेषता होती है इन जातीय विशेषताओं के कारण की ही कीह ,दादर ,बरीहाई दादर आदि नामों से दादर की प्रतिष्ठा पूरे बघेल खंड में है !

5. कलसा नृत्य 

  • भारत की अगवानी में सिर पर कलश रखकर नाचने की परंपरा अहीरों गुणता गडरियों में समान रूप से प्रचलित है द्वार पर स्वागत की रश्म होने के पश्चात नृत्य शुरू होता है नगडिया ढोल शहनाई की समवेत लोकधुन पर कलसा नृत्य चलता है नर्तक का कोई खास वेश नहीं होता बल्कि परंपरागत धोती बंडी साफा पहन कर यह नृत्य किया जाता है
  • नर्तक पैरों में घुंघरू बांध का है गुजरात के भवाई नृत्य की तरह कल सा नृत्य में सिर्फ 7 घंडे रखकर नाचने की परंपरा प्राचीन है सात घड़ों के साथ शरीर का संतुलन नृत्य को बड़ी सहजता से लय ताल के संतुलन में साथ साधता चलता है पुरुष नर्तक के साथ कभी-कभी महिला मीना जी हैं !

6. केमाली नृत्य

  • केमाली नृत्य को साजन सजना नृत्य भी कहते हैं केमाली में स्त्री पुरुष दोनों हिस्सा लेते हैं केमाली विवाह के अवसर पर किया जाता है केमाली के गीत जवाब की शैली में होते हैं साजन सजनई गीत बड़े कर्णप्रिय गौर भावप्रवण होते हैं
  • साजन सजनई लंबे गीत होते हैं गीत में भादो की ताल दोहरी तिहरी होती जाती है इस गीत के गायन के उतार-चढ़ाव में असाधारण थे सीहोर आकर्षण बढ़ जाता है केमाली गीत और नृत्य भर रात भर चलते हैं !

 

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No of Questions-25

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

विष्णु गौर सीहोर, मध्यप्रदेश, रंजना सोलंकी जिला बड़वानी, संदीप जी उमरिया

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