Madhya Pradesh Folk Drama

( मध्यप्रदेश के प्रमुख लोकनाटय )

मालवा का लोकनाट्य ( Malva folk drama )

माच:- माच मालवा का पारंपरिक लोक नाट्य लोकरंग की दृष्टि से माच का लोक का संपूर्ण लोकनाट्य कहा जाता है लोकनाट्य कि वह सभी लोग तत्व मौजूद हैं जिनके आधार पर माच को देश के अन्य पारंपरिक लोक नाट्य के समक्ष रखा जा सकता है मालवा में माच का जो रुप दिखाई देता है उसका प्रारंभ लगभग 300 वर्ष पहले हुआ था

माच का उद्भव राजस्थान के ख्याल से हुआ है क्योंकि मैं माच की प्रवृत्ति राजस्थानी ख्याल से बहुत कुछ मिलती है इसलिए प्रारंभिक माच को माच का खेल कहा जाता था खेल ख्याल का संक्षिप्त रूप है बाद में मालवा की पारंपरिक लोक विधाओं ने माच के रुप स्वरुप को गढने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है

माच से पूर्व मालवा के लोक विधाओं में गीत,हीड़,ओर, गम्मत आदि लोक नाटक के तत्वों ने माच को सबसे अधिक प्रभावित किया लोक कलाकारों और लोक गायकों के सामूहिक प्रयास से मालवा के माच को सहायता सार्थक परिणित मिली पूर्ण विकसित राजस्थानी ख्याल की मूल उद्भावना के सहारे मालवी परिवेश की लोकरंग चेतना के सामूहिक सार्थक संकलन का नाम माच है

किसी ने पारंपरिक गीतों की लोक धनेश चुनी,किसी ने कला की तुलना की प्रतिस्पर्धात्मक गायकी, किसी ने गम्मत से अभिनय और संवाद की परंपरा चुने और एक लोकनाट्य का रूप बना गम्मत पर आया प्राय: गली चौराहों पर किया जाने वाला लाटय है

ठीक इसके विपरीत कुछ नया करने की दृष्टि से मारच को लकड़ी के उंचे खम्बे प्ड़ बनाकर करने का निश्चय उस समय के लोक रंग कर्मियों ने किया मंच बनाकर विभिन्न खेल करने के कारण मालवा के इस खेल का नाम माच पडा ! मंच से नाच की शब्द युति संभव है माच से समाज की उत्पत्ति संस्कृत सम्म्त भी है ‘

मालवा का माच मध्य प्रदेश का शीर्ष प्रतिनिधि लोकनाट्य उज्जैन शहर में बंनी इस लोकरंग शैली ने ग्रामीण जनमानस को भी अपनी गहराइयों से प्रभावित किया जितना शहरी जन जीवन को उज्जैन के अतिरिक्त इंदौर तोहार रतलाम मंदसौर जबलपुर शाजापुर और देवास के जिले के मुख्य केंद्र है !

भारत के लोकधर्मी नाटक के परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान है ! इसमें मंच के लिए बहुत ही मामूली सामग्री जरूरी होती है माच अधिकतर खुले में आयोजित किया जाता है माच प्रदर्शन की निर्धारित तिथि से एक पखवाड़े पूर्व मार्च का खंभ गाढते हैं माच के गुरु अथवा मुखिया के हाथों खंबे की पूजा विधि संपन्न होती है ढोलक तथा सारंगी महाराज के प्रमुख वाद्य यंत्र है!

यद्यपि मार्च में धार्मिक पौराणिक और सामाजिक कथानकों पर आधारित खेल लिखे गए परंतु श्रृंगार परक प्रवृत्ति के कारण प्रेमाख्यानों पर आधारित खेल ही जनता में अधिक लोकप्रिय हुए सामान्यता स्त्रियां मार्च में भाग नहीं लेती हैं माच एक संगीतमय नाट्य विधा एवं प्रभावी प्रयोगधर्मी जनमंच है

लोगधर्मी की दृष्टि से इसका आरंभ 17वीं शताब्दी में हुआ कम संवाद,अश्लील भावो, का प्रदर्शन और कथा वृद्धों की शिथिलता के बावजूद मार्च की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो दर्शकों को आकर्षित करती हैं बालमुकुंद गुरु को माच का प्रवर्तक कह सकते हैं इसके बाद उस्ताद कालूराम ने मार्च को नए स्पर्श दिया !

रंगकर्म की दृष्टि से आज माच का खेल संपूर्ण लोकनाट्य में के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है मालवा कि यह लोकरंग शैली देश में पहचानी जाने लगी है पुराने स्वरूप को त्यागकर माच आज एक संपूर्ण प्रदर्शनकारी विधा में बदल गया है इसका श्रेय वर्तमान माच गुरुओ जाता है इनमें प्रमुख रुप से श्री सिद्धेश्वर सेन, ओमप्रकाश शर्मा का नाम विशेष उल्लेखनीय है !

माच का लोक नाट्य रूप जितना वैभवशाली है उसका भविष्य उतना ही अनिश्चित धीरे धीरे गांव की माच मंडलियां प्रदर्शन और अर्थ के अभाव में विलुप्त होती जा रही हैं माच के प्रति लोगों का रुझान भी कम होता जा रहा है ऐसी स्थिति में मालवा के माच के संरक्षण की दिशा में लोग जान और शासन को कुछ सार्थक पहल करनी चाहिए वरना कुछ वर्षों में मालवा में माच विलुप्त हो जाने का खतरा है !

बुंदेलखंड का लोकनाट्य ( Bundelkhand’s folk drama )

स्वाँग स्वाँग बुंदेलखंड का पारंपरिक लोक नाट्य बुंदेलखंड में स्वाँग का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है स्वाँग प्राय : लोक नृत्य राई के विश्राम के क्षणों में किया जाता है इसलिए स्वाँग को की अवधि अधिक से अधिक 15 से 20 मिनट तक होती है

इसी के अनुरूप बुंदेली स्वाँग का रूप भी निर्धारित हुआ बुंदेलखंड में इसे नकल उतारना कहते हैं स्वांग का अर्थ रूप धारण करने से लिया जाता है स्वाँग भारतीय लोक के अति प्राचीन परंपरा है !

डाँ. नर्मदा प्रसाद गुप्त ने लिखा है बुंदेली स्वाँग के ही रूप का प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि ना तो वह केवल नकल है और ना लंबा नाटक यह संगीत नौटंकी और भगत में भिन्न है बुंदेली स्वांग का स्वरूप अन्य लोकनाट्य की तरह लोकधर्मी है स्वाँग राई के अंतर्गत नाटक गतिविधि है स्वर्ग का मूल उद्देश्य हास्य और व्यंग के माध्यम से शुद्ध मनोरंजन करना है

राई नृत्य किसी भी समय किया जाता है विशेषकर जन्म, विवाह, तथा अन्य खुशी के अवसर पर तभी स्वाँग भी होता है स्वांग का कोई विशेष मंच नहीं होता जहां राई नृत्य किया जाता है उसी जगह स्वाँग किए जाते हैं ! स्वाँग राई का मंचन प्राय घर अथवा चौराहे का आंगन होता है समतल धरती पर चारों और दर्शक बैठ जाते हैं बीच में जगह छोड़ देते हैं

यही जगह स्वाँग राई का उपयोग मंच होता है पहले मसाल के साथ स्वाँग किए जाते थे आजकल पर्याप्त विद्युत प्रकाश मे स्वाँग का मंचन जगमगाता है ! स्वाँग के पात्र की राई गायन और दर्शकों के बीच होते हैं स्वाँग में अधिक से अधिक तीन या चार पात्र होते हैं महिला पात्र की भूमिका भी पुरुष निभाते हैं

लेकिन मां -भाभी आदि की भूमिका नर्तकी बेडनिया निभाती है पात्रों की वेशभूषा बुंदेली होती है पुरुष धोती, कुर्ता,बंडी पहनते हैं नए लड़के पेंट, शर्ट,कोट, पहनकर अभिनय करते हैं स्त्री पात्र पुरुष साड़ी लपेट कर मुंह ढके अभिनय में उतरते हैं जिसका उद्देश्य स्वाँग के विषय की पूर्ति करना होता है कहीं-कहीं पुरुष स्त्री वेश में पूर्ण सिंगार के साथ उतरते हैं

धोती घाघरा चुनरी पोलका का सलवार कुर्ता आदि पहनते हैं स्त्री पात्र बुंदेली कहने भी पहनती है स्वाँग में एक विदूशक भी होता है जिस की वेशभूषा विचित्र होती है विदूसक हर तरह से चंचल और नॉट गतिविधि के केंद्र होता है समाज के हर तबके के पात्रों का स्वरूप प्रतीकात्मक होता है

स्वाँग में संगीत पक्ष की गुंजाइश बहुत कम होती है फिर भी कभी-कभी प्रसंग अनुकूल नगढीया अथवा मृदंग की थाप अवश्य दी जाती है गीत और संगीत स्वाँग के अंत में पूर्ण सक्षमता के साथ मंच पर अवतरित होता है तब स्वाँग के सारे पाठ नृत्य में शामिल होते हैं और स्वाँग के बीच गाना भी होता है जो स्वाँग के कथानक को आगे बढ़ने के लिए होता है

स्वाँग में बुंदेली बोली के पारंपरिक वैभव के दर्शन सहज रुप से होते हैं बुंदेली स्वाँग की स्वतंत्र हिसार बनाने की आज जरूरत है तभी स्वांग अपनी अलग व्यापक पहचान बना पाएगा स्वाँग का रूप प्रस्तुत की ओर से लिखे रंग का कर्म ही दृष्टि से जब तक मंच पर नहीं लाया जाता तब तक स्वाँग राई के मध्य में रहेगा स्वाँग में लोक नाट्य तत्व मौजूद है स्वाँग बुंदेलखंड का एक जवान लोकनाट्य है !

बुंदेलखंड में प्रचलित लोक नाट्य में स्वाँग सर्वाधिक प्रचलित एवं जन प्रिय रूप है स्वाँग प्रय: खुशी के अवसरों पर राई नृत्य के बीच में प्रदर्शित होता है यह नौटंकी से अधिक प्राचीन है स्वाँग सामाजिक,सांस्कृतिक, विसंगतियों,से संबंधित होते हैं !

इसके मूल में कोई कथा, घटना, लोक,गीत,लोक समस्या पहेलियां जादू टोना आदि कुछ भी हो सकता है लोग जीवन को सरस रखने के उद्देश्य से हादसे का आयोजन स्वाँग के माध्यम से होता है प्रतीक स्वाँग की रीढ़ है !

राई नृत्य के बीच में होने वाले स्वामी को एक निश्चित समय माना गया है यह क्राम में अधिक से अधिक चार या पांच स्वाँग खेले जाते हैं इसे विभिन्न त्योहारों का उत्सवों में प्रस्तुत किया जाता है

स्वाँग गेयऔर अभिनय दोनों हैं बुंदेलखंड में लड़के-लड़कियां जो स्वाँग का अभिनय करते हैं वह एकल होते हैं बुंदेलखंड के प्रमुख स्वामी को के नाम इस प्रकार हैं लाहोरिया,सुनार, दाऊद, धतूरा-खान, सूरा-लुवाओ,पंडित -ठाकुर,भूरी भैंस,बिछवा बाबा मरघट के मसान!

खंब स्वांग लोकनाट्य :- खंब स्वांग का अर्थ है खंबे के आसपास किए जाने वाले प्रहशन खंब यानी मेघनाथ खम्ब, खंड स्वाँग का आरंभ और अंत अनुष्ठान से होता है खंब स्वांग संगीत अभिनय और मंचीय दृष्टि से कोरकू आदिवासी का संपूर्ण नाट्य किवंदती की रावण पुत्र मेघनाथ ने कोरकूओ को एक बार बड़ी विपत्ति से बचाया था उसी की स्मृति में यह आयोजन किया जाता है प्रत्येक कोरकू गांव में एक मेघनाथ खंब होता है क्वार की रात्रि से देव प्रबोधिनी एकादशी तक इसी के आसपास कोरकू प्रत्येक रात नए-नए स्वाँग खेलते हैं

खम्ब स्वाँग मात्र पारंपरिक शुद्ध मनोरंजन का साधन नहीं है इसके साथ सामाजिक विसंगतियों पर भी चोट की जाती है देहाती प्रतीकों को लेकर आदिवासी कोरकू अपने बीच की मानवीय कमजोरियों को स्वाँग के माध्यम से उजागर करते हैं जीवन के छोटे-छोटे प्रसंग लेकर स्वाँग का ताना बाना बुनके में भी कोरककू व कलाकार सिद्धार्थ होते हैं स्वाँग के केंद्र में एक विदूषक होता है यह निमाड़ की गम्मत और महाराष्ट्र के तमाशे से मिलता-जुलता है इसमें मुख्य बाद झंझ और मृदंग होते हैं स्त्री वेशधारी पुरुष नर्तक विभिन्न मुद्राओं के साथ नाचते हैं !

निमाड़ के लोकनाट्य ( Nimar’s folk drama )

गम्मत:- गम्मत निमाड़ी जन जीवन का सबसे बड़ा साधन है गम्मत व्यंग का जीवंत रूप है समाज की सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक बुराइयों को विद्रोह पर चोट करना गम्मत का एक खास काम है बुंदेली में स्वाँग, छत्तीसगढ़ी में नाचा, महाराष्ट्र में नाचा, महाराष्ट्र तमाशे , का जो स्थान स्थान वही गम्मत निमाड़ में है

गम्मत निमाड का लोकरंग है विशेषकर नवरात्रि में गांव-गांव में गम्मत की जाती है गम्मत का मंच चारों ओर खुला होता है बीच में एक खंभा गाड़कर उसके चारों गौर कपड़े का चांदोबा तान न देते हैं इसी के नीचे गम्मत की जाती है गम्मत में एक विदूषक होता है

गणेश और सरस्वती वंदना के बाद नर्तकी का नाच और बाद में प्रमुख गम्मत शुरू होती है गम्मत का शुद्ध मनोरंजन के साथ समसामयिक घटनाओं की व्यंगात्मक अभिव्यक्ति है हास्य और व्यंग गम्मत की खासियत है गम्मत में मृदंग और झाँझ प्रमुख वाद्ययंत्र होते हैं !

रासलीला :- भादो में कृष्ण जन्माष्टमी के आसपास निमाड़ के गांव में रासलीला का आयोजन किया जाता है कृष्ण लीला की विभिन्न प्रसंगों की प्रस्तुति रासलीला में की जाती है मुख्य रूप से कृष्ण जन्म, माखन चोरी, कंस वध हरि प्रसंग रासलीला में किए जाते हैं

रंगों की प्रस्तुति परंपरागत होती है गीत नृत्य और संगीत का समन्वय रासलीला में प्रमुख रूप से होता है रासलीला में भी विदूसक और अन्य पात्र अपने अभिनय से गांव के दर्शकों को बांधे रखते हैं

रहय लोकनाट्य:- लोकनाट्य रहस्य एक अनुष्ठानिक नाट्य विधा है जिसे प्रमुखता है ग्रामीण अंचलों में श्रद्धा भक्ति और मनोरंजन के सम्मिलित भाव से आयोजित किया जाता है यह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि अध्यात्मक की कलात्मक अभिव्यक्ति है

रहस का अर्थ है रास या रासलीला है इसमें संगीत नृत्य प्रधान कृष्ण के विभिन्न लीलाओं अभिनय किए जाते हैं इसमें एक ही पखवाड़े में संपन्न किया जाता है छत्तीसगढ़ में यह बिलासपुर संभाग में प्रचलित है !

श्रीमद्भागवत के आधार पर श्री रेवाराम द्वारा रहय की पांडुलिपियां बनाई गई थी और इसी के आधार पर रहय का प्रदर्शन होता है पंचांग के अनुसार निश्चित तिथि पर होता है यह इसका आयोजन बेड़ा में किया जाता है रहस प्रारंभ करने के पूर्व इसका प्रतीक माना जाता है रहस में कथा का परिवेश निर्मित करने के लिए पुतरी का उपयोग किया जाता है

रहस पंडित दजो कर्मगत होता है जातिगत नहीं ! प्रथम लीला का गायन करता है पंडित के निर्देश पर यह रहस की समस्त क्रियाएं संपादित होती हैं लगभग पूरा गांव इसी के आयोजन में भागीदार होता है , रहस के प्रचार प्रसार में उल्लेखनीय व्यक्ति:- कौशल सिंह,विसेसर सिंह,केसरी सिंह,बिलासपुर के मंझला महाराज और बूली ग्राम के रीवा रामकुली वाला प्रमुख है

मनसुखा लोकनाट्य :- मनसुखा एक लोक प्रहसन है यह रास का बघेली रूपांतर है इसमें दो मंच और दों पदों का प्रयोग होता है साथ मे मेकअप का स्थान भी होता है मनसुख उर्फ विदूषक महोदय और गोपियों में नोक-झोंक चलती है छेड़छाड़ भी होती है मसखरो को गांव में मनसुखलाल भी कहते हैं !

हिंगोला लोकनाट्य :- हिंगोला एक मंच रहित सीधा और सरल नाट्य रूप है दो दलों में गीत की झार मचती है माटर टिमकी सहित तरुणी गायन वादन करते हैं जीता दल पराजित दल के पांव से तरह तरह के काम लेता है और हास्य का अविर्भाव होता है शत्रुहरणी भी हिंगाली देवी का समावेश किया जाता है कुमारी द्वारा हिंगोला का पाठ किया जाना चाहिए ऐसी मान्यता है मजे की बात यह है कि गीत गाते समय केवल नट -नटी ही नहीं दर्शक विभाग लेते हैं फलता भावों का सरचरीकरण होता है

लकड़बघा लोकनाट्य:- लकड़बघा आदिवासी युवक युक्तियों का लोकनाट्य है जो खुले मंच पर अभिनीत होता है यह विवाह के बाद खेला जाता है लड़की को लकड़बघा उठा ले जाता है लड़की करुण वंदन करती है निरुपाय लड़की लकड़बघे को प्रेम करने लगती है बाद में साह चर्य प्रेम होता है युवक जन लकड़बघों तीर से आहत करते हैं उसकी दर्द भरी चीखो को को सुनकर वह उसकी सेवा करती है इस आहेरी और वन्य में पशु के हार्दिक योग का अभिनय मार्मिकता से किया जाता है

जिंदवा (बहलोल) लोकनाट्य :- यह बघेलखंड क्षेत्र का लोक नृत्य है मुर्ली तो है ही स्त्री नाट्य है स्त्रियों द्वारा विभिन्न प्रसंगों पर हास्य के साथ अभिनय गायन सहित किया जाता है पुरुषों द्वारा देखने पर झाड़ू एवं मूल्यों से पिटाई होती है यह शादी के शुभ अवसर पर जब लड़के की बारात कन्या पक्ष के घर चली जाती है, तो घर की महिलाओं द्वारा यह कृत्य किया जाता है. जिसमे मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक की कथा होती है ! तथा यहाँ की गाथा गायन परंपरा नाटकीय रूप में देखने को मिलती है जिनमे नाटकीय तत्वों का समावेश होता है ! 

नौटंकी लोकनाट्य :- नौटंकी मूल्य तथा उत्तर प्रदेश का लोक नृत्य है किंतु मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड एवं बघेलखंड में इसका प्रचलन है यह किसी भी खुशी के अवसर पर किया जाता है विभिन्न लोक कथाओं में दांपत्य जीवन के प्रसंगों को हास्य व्यंग के साथ प्रस्तुत किया जाता है

भवाई लोकनाट्य :- यह लोकनाट्य झाबुआ एवं अलीराजपुर जिले में आदिवासियों द्वारा किया जाता है यह अन्य खुशियों के अवसरों पर शादी विवाह आदि पर किए जाने वाले लोक नृत्य है गणपति एवं बाकी पूजा के बाद सामाजिक प्रसंगों पर पुरुष कलाकारों द्वारा अश्लीलता पूर्वक अभिनय किया जाता है किंतु फिर भी इसकी अपनी प्रतिष्ठा और मान मर्यादा है

हिंगोला लोकनाट्य :- हिंगोला बघेलखंड क्षेत्र का लोकनाट्य है यह त्योहारों एवं उत्सव पर किया जाता है यह मंच रहित सीधा और सरल लोकनाट्य इसमें हास्य व्यंग व्यंग से युक्त दो दल में गीतों के माध्यम से नोकझोंक होती है नट नटी के नृत्य में दर्शक भी भाग लेते हैं

पंडवानी लोकनाट्य :- पंडवानी मूवी का छत्तीसगढ़ में देखने को मिलता है पर मध्यप्रदेश के शहडोल अनूपपुर बालाघाट जिले में भी इस लोकनाट्य देखने को मिलता है यह किसी भी अवसर शादी विवाह के अवसर पर आयोजित किया जाता है

ढोला मारू की कथा लोकनाट्य :- यह लोकनाट्य मध्य प्रदेश के राजस्थान से जुड़े सीमावर्ती क्षेत्र में प्रचलित है

 

Quiz 

Question -20

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Q.1 मालवा अंचल का प्रसिद्ध लोक नाट्य जिसे प्रतिनिधि लोकनाट्य भी कहा जाता है ?

Correct! Wrong!

Q.2 निम्नलिखित में से कौन सा लोकनाट्य विवाह के बाद खुली मंच पर किया जाता है ?

Correct! Wrong!

Q.3 निम्न में से किस लोक नाट्य में पशु एवं मनुष्य के हार्दिक योग का अभिनय किया जाता है ?

Correct! Wrong!

Q.4 मध्यप्रदेश का शीर्ष प्रतिनिधि लोकनाट्य है ?

Correct! Wrong!

Q.5 माचा का जन्म स्थान कौन सा है ?

Correct! Wrong!

Q.6 "ढोला मारू की कथा लोकनाट्य" मध्यप्रदेश के किस राज्य की सीमा से जुड़े क्षेत्र में प्रचलित है ?

Correct! Wrong!

Q.7 काठी मध्य प्रदेश के किस क्षेत्र का लोक नाट्य है ?

Correct! Wrong!

Q.8 स्वाँग का शाब्दिक अर्थ क्या है ?

Correct! Wrong!

Q.9 माच का जन्म लोकधर्म की दृष्टि से कौन सी शताब्दी में हुआ है ?

Correct! Wrong!

Q.10 माच लोकनाट्य के प्रवर्तक कौन माने जाते हैं ?

Correct! Wrong!

Q.11 बुंदेलखंड का सर्वाधिक प्रचलित एवं जन प्रिय लोकनाट्य कौन सा है ?

Correct! Wrong!

Q.12 निम्न में से किसके द्वारा श्रीमद् भागवत के आधार पर रहस की पांडुलिपियां बनाई गई थी ?

Correct! Wrong!

Q.13 नौटंकी का प्रचलन मध्यप्रदेश के किंन क्षेत्र में है ?

Correct! Wrong!

Q.14 निमाड़ अंचल में कौन सा/ से लोकनाट्य प्रचलित है ?

Correct! Wrong!

Q.15 पंडवानी मूलतः मध्य प्रदेश के किन जिलों में देखने को मिलता है ?

Correct! Wrong!

Q 16.संगीत पर सात पुस्तके किसने लिखी है?

Correct! Wrong!

Q 17.मटकी नृत्य का प्रचलन किस क्षेत्र में है?

Correct! Wrong!

Q 18.भोपाल के समीप होने वाला नृत्य का सम्बंध किस वर्ग से है?

Correct! Wrong!

Q 19.कालिदास अकादमी कहाँ है?

Correct! Wrong!

Q 20.लारूकाज किनका मुख्य पर्व है?

Correct! Wrong!

Madhya Pradesh Folk Drama Quiz ( मध्यप्रदेश के प्रमुख लोकनाटय )
बहुत खराब ! आपके कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
खराब ! आप कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया ! अधिक तैयारी की जरूरत है
बहुत अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया! तैयारी की जरूरत है
शानदार ! आपका प्रश्नोत्तरी सही है! ऐसे ही आगे भी करते रहे

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

विष्णु गौर सीहोर, मध्यप्रदेश