Madhya Pradesh Folk Music

( मध्यप्रदेश के प्रमुख लोकगीत )

मध्य प्रदेश के चारों अंचलों निमाड़, मालवा, बघेलखंड, और बुंदेलखंड में अनेक पारंपरिक लोक गायन शैलियां प्रचलित है पर्व, त्यौहार,अनुष्ठान,रितु और संस्कार संबंधी लोकगीत गाने की परंपरा प्रत्येक अंचल में मिलती है पुरुष परख और महिला परख दोनों तरह की गायन शैलियां हर जगह देखी जा सकती है !

निमाड़ अंचल के प्रमुख लोकगीत ( Nimad Zoneal Folk Song )

लोकगीत :- निमाड़ अंचल के जीवन का कोई भी अवसर ऐसा नहीं मिलता जब कोई ना कोई गीत ना गाया जाता हो जन्म, विवाह और मृत्यु आदि सोलह संस्कारों के अवसरों पर अलग-अलग लोग धुनो में लोकगीत गाए जाते हैं !

संस्कार गीत प्रया: घर की महिलाएं ही गाती है पर्व त्यौहार अनुष्ठान गीतों की प्रकृति स्त्री और पुरुष परख होती है लोकगीतों की गायन शैली प्राया अलग-अलग होती है निमाड़ी लोक गायन का माधुर्य विवाह गणगौर,संत सिंगाजी भजन कलगी तुर्रा आदि परंपरा विधाओं में मिलता है !

कलगी -तुर्रा गीत :- कलगी तुर्रा प्रतिस्पर्धात्मक लोक गायन शैली है यह एक प्राचीन लोक गायकी है इस गायन शैली का प्रसार एक समय कर्नाटक से लगाकर उत्तर प्रदेश तक था निमाड़ मालवा बुंदेलखंड और मंडला में कलगी तुर्रा गायन मंडलिया अभी भी मौजूद है चंग की थाप पर रात -रात भर कलगी तुर्रा गाया जाता है इसके दो अखाड़े होते हैं

एक कलगी अखाड़ा दूसरा तुर्रा अखाड़ा अखाडे के गुरु को उस्ताद कहते हैं आशु कविता के साथ महाभारत की कथाएं, पौराणिक आख्यानो से लेकर वर्तमान प्रसंगों को सवाल-जवाब के शानदार माध्यम से पारंपरिक गायिका में पिरोया जाता है कलगी तुर्रा का आध्यात्मिक पक्ष भी है कलगी भी दल शक्ति और तुर्रा दल शिव को बड़ा बताने की कोशिश करता है !

कलगी तुर्रा की उत्पत्ति संबंधी एक पुरानी कथा प्रचलित है चंदेरी के राजा शिशुपाल की राज्यसभा में दो प्रमुख ख्याल गायक तुकनगिर और शाह अली फकीर थे दोनों ही अपने-अपने ख्याल गायिकी के पारंगत थे

एक बार राज दरबार में दोनों का मुकाबला हुआ दोनों ने एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर जवाब दिए राजा के लिए यह निर्णय करना मुश्किल था कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है राजा ने दोनों को पुरस्कृत किया तकनगिर ने अपनी पगड़ी का हीरा जड़ी तुर्रा और शाह अली फकीर ने माणक मोती से जुड़ी कलकी भेंट की तबसे तुकनगिर के ख्याल गायिकी का नाम तुर्रा और शाह अली फकीर की गायिका कलकी के नाम अभिनित हुई गोगवा के सुश्री सुमेर सिंह सुमन और कसरावद के श्री मनसाराम इस समय तुर्रा और कलकी के सबसे बड़े गुरु अर्थात उस्तादों में से है !

संत सिंगाजी गीत:- संत सिंगा जी 15वीं सदी के निर्गुण संत कवियों में सबसे अग्रणी हैं अपनी आध्यात्मिक साधना और शुचित के कारण संत सिंगाजी के पद समुचे निर्माड़ और मालवा के हिस्से में इतने लोगप्रिय हुए कि निमाड़ के सिंगाजी के पद गायन की एक अलग शैली बन गई संत सिंगाजी ने निमाड़ी में कई सौ आध्यात्मिक पदों की रचना की कहते हैं

मृदंग और झांझ के साथ उच्च स्वर में भजन गाने की शैली का विकास स्वयं सिंगाजी ने किया था तब से लगातार आज तक निमाड़ के गांव-गांव में संत सिंगाजी के भजन गाए जाते हैं संत सिंगाजी ने पहली बार खेती और गृहस्थी संबंधित प्रतीकों को अपने काव्य में स्थान दिया है

और यही उनके पदों की प्रमुख विशेषता बन गई संत सिंगाजी की छाप लगाकर आज हजारों लोग पद गायन मंडलियां गा रही हैं उनमें नागझिरी के दगडू गप्पल और हरसूद की सूश्री जीवनता खेड़े मंडलियों की आज की संत सिंगाजी भजन गायन शैली की श्रेष्ठ मंडलिया कही जा सकती है !

निर्गुणीया गीत :- निमाड़ी लोक में निर्गुणी और सगुण संत कवियों की छाप लगाकर पदों की रचना और गाने की सुधीर और समृद्ध परंपरा रही है इसमें कबीर, मीरा, रैदा, ब्राह्मद, दादू सूर आदि की छाप वाले भजन लोक में सबसे अधिक प्रचलित है

अनेकों अनाम लोककवियों ने परंपरा से चली आ रही चिंताधारा अथवा पंथ को सर्वोपरि माना और अपनी रचनाओं में आंचलिक विशेषताओं घटना और लोक प्रतीकों को काल्पनिक तरीके से समाहित कर कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया कि वे कबीर सूर मीरा आदि की रचना लगे ! उन्होंने अपना व्यक्तित्व और कृतित्व सभी कुछ अपने प्रेरणा साध्य को समर्पित कर दिया !

निर्गुण धारा के प्रवर्तक कवि शिरोमणि संत कबीर की विचारधारा का बाद के अनेक कवियों पर इतना जबरदस्त प्रभाव पड़ा कि वह अपना नाम छोड़कर कबीर की छाप लगाकर पद गाने लगे इसके कारण कबीर की विचार धारा श्रंखला समस्त उत्तर प्रदेश में फैल गई और आंचलिक बोलियों में भी कबीर की निर्गुण विचारधारा का समावेश हो गया इसके कारण निर्गुणी या गायन की आंचलिक शैलियों काफी भी विकास हुआ

अलग-अलग अंचल में अपने-अपने ढंग से लोग कबीर के लोग पद गाने लगे निर्गुणी या गायन शैली का मुख्य आधार बाद हक़ ताटा और खड़ताल रहे हैं एकतारे पर भजन गाते हुए कई साधु वर भिक्षुक गांव शहर और गलियों में मिल जाते हैं यह प्राया निर्गुनीया का भजन ही गाते हैं निर्माड में निर्गुणी भजन गायक इकतारे के साथ झाँझ मृदंग लगा कर भी गाते हैं निर्गुणी या गायन को नारदीय भजन भी कहा जाता है !

मसाण्या अथवा कायाखो के गीत :- निमाड़ के मृत्यु गीतों को मसाण्या अथवा कायाखो के गीत कहते हैं किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर आत्मा की उभरता और शरीर की नश्वरता संबंधी पारंपरिक गीत गाए जाते हैं इनके गाने की शैली संत सिंगाजी भजन से थोड़ी भिंन्न है !

मसाण्या अथवा कायाखो गीतों को भी झांझ मृदंग और इकतारे के साथ समूह में गाया जाता है मसाण्या अथवा कायाखो गीता में आत्मा को दुल्हन की उपमा दी जाती है और शरीर को दूल्हा कहां जाता है मसाण्या अथवा कायाखो गीत प्राया मृत्यु के अवसर पर ही गाए जाते हैं अन्य समय में गाना प्रतिबंधित होता है

फाग गायन (गीत) :- होली के अवसर पर फाग गीत गाए जाते हैं जो प्रायः कृष्ण और राधा पर केंद्रित होते हैं दो या तीन ढफ बजाते हुए ऊंचे स्वर में सामूहिक रूप से पुरुष वर्ग फाग गायन करता है जिसमें हंसी, मजाक, ठिठोली, छेड़छाड़ के गीत प्रमुख होते हैं स्त्री परख फाग गायन अलग होता है !

गरबा गीत :- निमाड़ में गरबा स्त्री परक अनुष्ठानिक लोग गए है नवरात्रि में गरबे की स्थापना के साथ महिलाएं ताली की थाप पर गरबा गीत गाती है जिसकी गायन शैली सर्वथा अलग होती है इसके साथ नृत्य प्रवृत्तियां भी है !

गरबी गीत :- गरीबी प्रया पुरुष परक लोक गायन है इसे झांज मृदंग के साथ गाया बजाया जाता है गरबी गीत निमाड़ी लोक नाट्य गायन का एक प्रमुख अंग है गरबी भक्ति श्रृंगार और हास्य परख होती है जो नृत्य और बैठकी गायकी दोनों में चलती है गरबी मूलतः देवी गीत है !

गवलन गीत :- गवलगीत कृष्ण लीला गीत है इसके गायन की पद्धति गरबी से भिन्न होती है गवलन गीतों का मुख्य उपयोग रासलीला में किया जाता है गवलन गीत पुरुष वर्ग होते हैं जो झाँझ मृदंग और ढोलक पर गाए जाते हैं !

नाथपंथी गीत:- निमाड़ में नाथ योगियों में सर्वथा अलग प्रकार के लोक गायन की पद्धति है नाथ जोगी भगवा वस्त्र पहने हाथ में रेकडी अथवा रू रू बाजा बजाते गाते गांव शहर में दिखाई देते हैं नाथ जोगी प्राया गोरख,कबीर अथवा भरथरी गाथा गाते हुए मिल जाते हैं निमाड़ के नाथ जोगी महिलाएं प्रया सुबह-सुबह परभाती गाती हुई मिलती है और घर घर से नेक लेती है !

मालवा अंचल के प्रमुख लोक गीत ( Malwa anchal Folk Song )

मालवी लोकगीत :- मालवा में पुंसवन, जन्म, मुंडन, जनेऊ, सगाई, विवाह के अवसर पर पारंपरिक लोकगीत गाने की प्रथा है पर्व ऋतु त्योहार अनुष्ठान संबंधी गीतो के गाने की परंपरा भी समूचे मालवा अंचल में मिलती है मालवी लोक गायन में एक प्रकार से बोली कि मिठास के साथ वहां की प्रकृति, धरती और संस्कृति की समृद्धि और सौंदर्य के मूल स्वर सहज रुप से सुनाई देते हैं !

भरथरी गायन :- मालवा में नाथ संप्रदाय के लोग चिंकारा पर भरतरी का गायन करते हैं चिंकारा नारियल की नाट्टी बॉस और घोड़े के बालों से निर्मित एक प्राचीन और पारंपरिक वाद्य यंत्र है चिंकारा बालों से बने धनुष से बजाया जाता है

जिसमें रू -रू की निरंतर ध्वनि निकलती है भरथरी गोपीचंद कथा गोरख वाणी कबीर मीरा जी के भजन गाते हुए नाथपंथी लोग भोर में मालवा के गांव में आज भी मिल सकते हैं कुछ नाथपंथी अखाड़ों के सितार तबले की संगत में बैठकर भरथरी गोपीचंद भजन आदि गाने की परंपरा है !

निर्गुणी भजन गायन:- मालवा के निर्गुणी लोक पद गायन परंपरा बहुत पुरानी है निर्गुणी या भजनों में कबीर के अध्यात्म की छाप होती है जिसमें नश्वर शरीर और अमर आत्मा का परमात्मा संबंधी तत्वों की सरल ग्रामीण प्रतीकों में विवेचना होती है निर्गुण या भजनों में एक तारा और मंजीरे के स्वरों के साथ मालवा के लोकधुनों और मालवी कि माधुर्य बोली देखी जा सकता है

निर्गुणी भजन गाने वाले कई दल मालवा में मौजूद है उनमें श्री पहलाद टीपाण्णा का दल सर्वश्रेष्ठ कहा जा सकता है जिन्होंने कबीर के मालवी लोक पद गायन में स्वर और कई गायकी कि देश में सर्वथा अलग पहचान बनाई है !

संजा गीत:- संजागीत् मूलतः किशोरियों की पारंपरिक गायन पद्धति है इसमें किसी प्रकार का सहवाध नहीं होता पितृपक्ष पक्ष में किशोरियां संजा पर्व मानाती है ! गोबर और फूल पत्तियों से संजा की सुरूर आकृतियां बनाती हैं

शाम को उनकी पूजा आरती करती हैं तथा संध्या गीत गाती है किशोरियों के मधुर कंठों से जब संजा गीतों के स्वर होते हैं तब ऐसा लगता है जैसे बाल्यावस्था की कोमल पवित्र भावनाओं का लोक संगीत शाम के झुटपुटे में हर आंगन में साकार हो रहा है 16 दिन सर्व पितृ अमावस्या को किशोरियों अपनी सहेलियों संजा को सम्मान देते हुए विदा कर देते हैं संजय एक गीत ही पर्व है !

हीड़ गायन :- श्रवण के महीने में मालवा में हीड़ गायन की प्रथा है इधर बाग-बगीचों में झूले पड़ते हैं उधर गांव में हिड़ गायन की प्रतिस्पर्धा शुरू होती है युवा गायन मूलतः अहीरों के अवधान परख लोग का ज्ञान है

जिसमें कृषि संस्कृति और आंतरिक परतो का सूक्ष्म वर्णन मिलता है ग्यारस माता की कथा का गायन भी इसी अवसर पर किया जाता है गोवर्धन पूजा के समय भी हीड़ गायन किया जाता है जो लाय ऊंचे स्वर में होता है जिसमे अलाप भी लिए जाते हैं !

पर्व त्योहार संबंधी गायन :- संपूर्ण मालवा में होली पर फाग, दीपावली पर दीवारी,जन्माष्टमी पर कृष्ण लीला, गीत नवरात्रि में देवी गीत गाने की परंपरा समूचे मालवा में प्रचलित है !

बरसाती बरसाती गीत:- बरसाती बरसाता ऋतु कथा गीत है बरसाती बरसाता का कथन और गायन बरसात के समय में किया जाता है इसलिए इसका नाम बरसाती बरसाता पड़ा मालवा के गांव गाँव में घरों में बैठकर बरसाती बरसाता रात रात भर कहीं और गाई जाती है बरसाती बरसाता की शैली चंपू काव्य की तरह होती है

जिसमें मालवी गद्य और पद्य का चरमोत्कर्ष देखा जा सकता है ऋतु गीतों में मालवा में बारहमासा गीत प्रया बरसात में गाए जाते हैं

बुंदेलखंड के प्रमुख लोकगीत ( Bundelkhand folk songs )

बुंदेली लोकगीत :- शौर्य और श्रंगार की धरती बुंदेलखंड की कला और संस्कृति सबसे अलग है यहां के लोकगीतों में स्वर और उत्कर्ष और श्रृंगार के भाव गुंफित होते हैं यहां के लोक गायन के तारत्व के दो मुख्य स्वर हैं एक षडज और दूसरा मध्यम ! पुरुष परख और बाल सुलभ लोक गायन का स्वर प्राया सडज यानी सा होता है

और वन्य संस्कार गीतों में महिलाएं मध्यम यानी मां सुर में गाती है लोकगीतों के विषय में पारिवारिक पृष्ठभूमि लिए हुए होते हैं जिनमें लोकजीवन की सामाजिकता का संपुट होता है लोकगीतों में लोग दोनों की माधुरी का विविध बुंदेली लोकगीतों की खास पहचान है जिसमें भी तरह तरह के लोग राग देश में प्रचलित हैं बे सब बुंदेली लोकगीतों की परंपरा से प्रयुक्त हुए हैं !

आल्हा गायन :- आल्हा गायन वीर रस प्रधान काव्य आल्हा की रचना लोक कवि जगनिक नहीं लगभग 1000 वर्ष पहले की थी आल्हा खंड की मूल भाषा बुंदेली है इस कारण जगनिक द्वारा लिखी आल्हा ऊदल की 52 लड़ियां लोग कष्ठों में सहज रुप से विराजमान हो गई जगनीक द्वारा लिखित आल्हा कथा का प्रमाणिक रुप आज तक नहीं मिल पाया है

लेकिन आल्हा का लोक प्रचलित रूप बुंदेलखंड के गांव के अल्हेत आज भी गाते हैं फिर भी आल्हा की मूल कथा में अंतर नहीं आया है उसमें लोककथा और गीता और आल्हा और उदल के जीवन की घटनाओं में कोई खास फेरबदल आज तक नहीं हुई है आल्हा प्राय वर्षा ऋतु में गाया जाता है

कहीं-कहीं आल्हा गायन खड़े होकर भी किया जाता है बुंदेलखंड में कई गायक ऐसे हैं जिन्हें आल्हा ऊदल की 52 लड़ियां कंठस्थ है आल्हा छंद के कारण इसका नामकरण आल्हा खंड पड़ा आल्हा खंड संसार की सबसे लंबी गाथाओं में से एक है !

भोला गीत अथवा बंबुलिया :- बंबुलिया बुंदेलखंड की वाचिक परंपरा के मधुर गीत हैं जिन्हें लंबे लमेटरा गीत भी कहा जाता है बंबुलिया गीत प्राय स्त्री पुरुष समूह द्वारा बिना वाद्य यंत्र के श्रवण मास में शिवरात्रि, बसंत पंचमी,मकर सक्रांति के अवसर पर गाया जाता है

बंबुलिया गीतो की राग लंबी होती है स्त्री पुरुष अलग-अलग आमने-सामने बैठकर समवेत स्वर में गीत गाते हैं गीत प्रया प्रश्न उत्तर शैली में होते हैं उनका दोहरा भी होता है भोला गीत शिव और शक्ति से संबंधित है नर्मदा स्थान जाते समय महिला समूह में भोला गीत गाती हुई निकलती है !

फाग गीत :- फाग गायन होली के अवसर पर होता है फागुन माह के लगते ही समूचे बुंदेलखंड में ठाकुर फाग,ईसुरी फाग,राई फाग शुरू हो जाते हैं जो होली जलने के बाद रंग पंचमी तक चलते हैं स्त्री-पुरुष एक दूसरे पर रंग गुलाल लगाकर गीत गाकर नृत्य करते हुए ठाकुर भाग गाते हैं ठाकुर भाग में मृदंग टिमकी और मंजीरा बजाया जाता है ठाकुर फाग में स्त्रियां जीराई का खेल खेलती है

स्त्री या लड़यियो अथवा चोटियों से गीत गाते हुए पुरुषों पर वार करती है और पुरुष चतुराई से वार से बचते हैं जीराई का आकार अंग्रेजी के एस अक्षर के समान होता है ईसुरी की चौकड़िया फाग बैठकर गाई जाती है राई फाग राई नृत्य के साथ गई जाती है !

बैरायटा गायन :- बैरायटा मूल कथा गायन शैली है जिसमें मुख्य रुप से महाभारत कथाओं के साथ अनेक ऐतिहासिक चरित्र लोक नायकों की कथाएं गाई जाती है बैरायटा गायन केंद्रीय रूप से एक व्यक्ति गाता है वह सहयोगी गायक मुखिया का साथ देते हैं

और कथा को आगे बढ़ाने के लिए हुंकार देते हैं बीच-बीच में कुछ संवाद भी बोलते हैं बैरायटा गायन में लोक कथाओं का भी गायन किया जाता है बैरायटा गायन में कलात्मकता के साथ-साथ प्रसंग अनुकूल हाथ और चेहरे के हाव भाव गायन शैली को प्रभावशाली बनाने में सक्षम होते हैं !

देवारी गायन :- देवारी गायन दोहों पर केंद्रित होता है अहीर गवली बरेलदी धोशी आदि जातियों में देवारी गायन और नृत्य करने की परंपरा है दीपावली के अवसर पर ग्वाल बाल सिर पर मोर पंख धारण कर घर-घर देवारी मांगते हैं नेक पाते हैं और ऊंचे स्वर में दोहा गाकर ढोलक नगरिया बांसुरी की समवेत धुन पर तेजी से नृत्य करते हैं देवारी के दोहों के विषय कृष्ण राधा प्रेम प्रसंग भक्ति कथा वीर रस से परिपूर्ण होते हैं

जगदेव का पुवारा गीत :- पुवरा मूलत: भजन शैली में है देवी की स्तुति से संबंधित एक लंबा आख्यान जिसे भक्त गाते हैं क्षेत्र और क्वार मास में गाते हैं इस अवसर पर जावार और गीत भी गाए जाते हैं देवगीतो के नाम से भी जाना जाता है देवी दो कि धुने मधुर होती हैं !

बघेलखंड के प्रमुख लोकगीत ( Baghelakhand folk songs )

बघेली लोकगीत :- बघेली लोकगीत की गायन शैली मध्य प्रदेश के अन्य अंचलों से थोड़ी भिन्न है क्योंकि बघेली बोली अवधि से प्रभावित है बघेली लोक गीतों का मूल स्वर तीव्र मध्यम है इनमें बघेलखंड की जातियों और जनजातियों की आंतरिक ऊर्जा का उत्कर्ष देखा जा सकता है बघेली लोकगीत में लोक की व्यापकता सरलता भाव प्रवणता और सुबोध का सहज रुप से देखी जा सकती है

बघेली लोक गीतों में जहां पारंपरिक कल्पना का वैभव प्रसरीत है वही बघेलखंड की संस्कृति की झांकी भी प्रति!बिंबात्मक होती है लोकगीतों में जितने लोगों की विविधता और विषय की भिन्नता मिलती है उसने किसी अन्य लोग बिना में नहीं देखी जाती है !

बसदेवा गायन :- बसदेवा बघेलखंड की एक पारंपरिक गायक जाति है जिन्हें हरबोले कहा जाता है बसदेवा मुलत: कथा गायक है श्रवण कुमार की कथा गायन करने के कारण इन्हें सरमन गायक भी कहा जाता है बसदेवा परंपरा के कई तरह की कथा और गाथाएं गाते हैं बसदेवा सिर पर कृष्ण की मूर्ति और पीला वस्त्र धारण कर हाथ में चोट की सूजन और सारंगी लिए गाते हैं

बसदेवा गायक कई कई यजमान के लिए गांव-गांव निकल पड़ते हैं बसदेवा मुख्य तत्वों गायक होते हैं मुख्य गायक गाथा की पंक्ति उठाता है दूसरा पंक्ति समाप्ति तक उसे उसी राग में तेजी से दोहराता है और अंत में हर गंगे की टेक हर पंक्ति के बाद लगाता है बस देवा जाती रामायण कथा के साथ कर्ण कथा,मोरध्वज,गोपीचंद भरथरी भोले बाबा आदि लोगों का चरित्र कथा गाते हैं !

बिरहा गायन :- बघेलखंड में बिरहा गायन परंपरा सभी व्यक्तियों में पाई जाती है बिरहा की गायन शैली सर्वथा मौलिक और माधुरी पूर्ण है बिरहा प्राया खेत,सुनसान राहों में सवाल जवाब के रूप में गाया जाता है कहीं-कहीं बिरहा विना वाद्य यंत्रों और गाए जाते हैं

कानों में उंगली लगा कर ऊंची टेर के साथ बिरहा गाया जाता है गायक गाते समय भोहों को नचाता है तब ऐसा लगता है जैसे कोई प्रश्न पूछ रहा है उतरती रात में बिरहा कि थाने आकर्षण और कर्णप्रिय लगती हैं बिरहा श्रृंगार परक बिरहा गीत है !

बिदेशिया गायन :- बिदेशिया गायन समूचे बघेलखंड में मिलता है गडरिया, तेली,कोटवार जाति के लोग विदेशिया गायन में परंपरा में विशेष दक्षता रखते हैं विदेशियों की राग लंभी और गंभीर होती है विदेशिया का गायन प्राया जंगल अथवा सुनसन रात में किया जाता है विदेशिया बिछुआ और मिलन की अभिलाषा के गीत हैं

जिनमें लोक नायक नायिका के मन की आतुरता का सहज चित्रण होता है जिसमें उपालंभ भी होता है उतरती गहरी सुनसान रात में बिदेशिया गीतों की ताने सुनने वालों को बेचैन कर देती है

फाग गायन :- बघेलखंड में फाग गायन की परंपरा सबसे पहले और मौलिक है यहां नागाडो के ऊपर फाग गायन किया जाता है फ़ाग गायनो में पुरुष की मुख्य भागीदारी होती है सामूहिक स्वरों में फाग गीतों की पंक्तियों का गायन ना कालों की विलंबित ताल पर शुरू होता है और धीरे-धीरे तीव्रता की ओर बढ़ता है

नगाड़ों की टंकार और समूह कंठों का ऊंचा स्वर आमुचा स्वर फाग गायन में एक जोशीला वातावरण निर्मित करने में सफल होता है और गायक का व्रन्द गायन के साथ घूमने लगते हैं बघेलखंड में फाग गायन कि कई लोग मंडलियां हैं !

मध्य प्रदेश के अन्य प्रमुख लोकगीत ( Other folk songs of Madhya Pradesh )

लावणी गायन :- लावणी गायन मुख्य रूप से मालवा निमाड़ अंचल में गाया जाता है यह प्राया सुबह के समय गाया जाता है यह निर्गुणी दार्शनिक गीत है जिसे सामूहिक द्रूत जीवन शैली भी कहते हैं यह महिलापरख और पुरुष परक है !

ढोला मारू गीत :- ढोला मारू गीत मालवा-निमाड़ तथा बुंदेलखंड में गाए जाते हैं ढोला मारू गीत का गायन रात के समय ढोला-मारू नाटक के साथ साथ किया जाता है ढोला मारू गीत मे प्रेम कथा का गायन किया जाता है एवं उच्च स्वर में गाया जाता यह एक लोक गायन शैली है

पंडवानी गीत :- पंडवानी गीत मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के शहडोल अनूपपुर एवं बालाघाट जिले में गाए जाते हैं यह अधिकतर शाम के समय आयोजित किया जाता है पंडवानी गीत मुख्य रूप से कथा का वर्णन किया जाता है पंडवानी गीत एक उच्च स्वर सहित एकल कथा गायन शैली है !

बांस गीत :- बांस गीत मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़ से जुड़े जिलों में गाया जाता है बांस गीत मुख्य रूप से रात के समय गाया जाता है मोरध्वज एवं कर्ण की गाथाओं पर आधारित यह गीत महिला परख होते हैं उच्च स्वर सहित कथात्मक गायन शैली मुख्य है

घोटुल पाटा गीत:- घोटुल पाटा गीत मुनिया आदिवासी क्षेत्रों में गाया जाता है यह गीत सिर्फ मृत्यु के अवसर पर ही गाया जाता है राजा जो लोगों को सहाय की कथा के साथ प्रवृत्ति के जटिल रहस्यों का वर्णन होता है यह गीत मुख्य रूप से बुजुर्गों द्वारा सामूहिक कथा गायन रूप में गाया जाता है अन्य अवसरों पर गाना प्रतिबंधित होता है !

लोरिक चंदा गीत :- लोरिक चंदा गीत उत्तर भारत के क्षेत्र में गाया जाता है यह शाम के समय गाए जाने वाला गीत है लोरिक चंदा गीत की विषय-वस्तु कथा नाक होती है उच्च स्वर सहित गाथा आत्म गायन शैली इसकी प्रमुख पहचान है

ददरिया गीत :- ददरिया गीत बेगा आदिवासी क्षेत्रों में गाया जाता है यह किसी भी अवसर पर शादी विवाह जन्म आदि पर गाया जाता है लोग जीवन एवं साहित्य की प्रेमगाथाओ का गायन करना इसकी प्रमुख विषय वस्तु है इस गायन शैली में महिला परक पुरुष पर एक सामूहिक सवाल जवाब गायन शैली होती है

रेलो गीत :- रेलो लोकगीत मुख्य रूप से भील कोरकू आदिवासी जनजाति द्वारा गाया जाता है इस कीट की मुख्य विशेषता यह है कि यह केवल युवा युवतियों का गीत है ! और युवा युवतियों के द्वारा ही गाया जाता है

चौकड़िया फाग :- चौकड़िया फाग मुख्य रूप से बुंदेलखंड क्षेत्र में गाया जाता है इस गीत में की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें शुरू की रचनाएं गाई जाती है !

 

Quiz 

Question – 28 

0%

Q.1 सिंगाजी और दलूजी गीत किस अंचल में गाए जाते हैं ?

Correct! Wrong!

Q.2 घोटुल पाटा गीत आदिवासी क्षेत्रों में गाने की परंपरा है यह किसप्रकार का गीत है?

Correct! Wrong!

Q.3 संजा गीत किन के द्वारा गाया जाता है?

Correct! Wrong!

Q.4 निम्न में से किस गीत को "लमटेरा गीत" भी कहा जाता है ?

Correct! Wrong!

Q.5 बिरहा गायन मुख्य रूप से किस अंचल में गाया जाता है?

Correct! Wrong!

Q.6 निम्न में से कौन सा गीत मालवांचल से संबंधित है?

Correct! Wrong!

Q.7 फाग गायन में मुख्य भागीदारी किनकी होती है?

Correct! Wrong!

Q.8 निम्न में से कौन सा गीत पुरुष परक गीत है ?

Correct! Wrong!

Q.9 नागझिरी के श्री दगडू गप्पल किस प्रकार की गायन शैली के लिए प्रसिद्ध हैं?

Correct! Wrong!

Q.10 गरबा /गरबी/ गवलन गायन शैली मुख्य रूप से किस अंचल में गाई जाती है?

Correct! Wrong!

Q.11 संत सिंगाजी भजन गायन शैली के मुख्य वाद्य यंत्र कौन से हैं?

Correct! Wrong!

Q.12 संत सिंगाजी कौन सी सदी के निर्गुणी संत कवियों में सबसे अग्रणी है ?

Correct! Wrong!

Q.13 कलगी तुर्रा लोक गायन शैली किस प्रकार की है ?

Correct! Wrong!

Q.14 वर्तमान में कलगी तुर्रा गीत के सबसे बड़े गुरु अर्थात् उस्ताद कौन है ?

Correct! Wrong!

Q.15 आल्हा गीत किस प्रकार का गीत है?

Correct! Wrong!

16 ददरिया गीत की मुख्य विशेषता क्या है ?

Correct! Wrong!

17 ढोला-मारू मूलतः किस राज्य की लोक कथा है ?

Correct! Wrong!

18 बेगा आदिवासी युवतियां जब अपनी पसंद के युवक का चुनाव करती हैं तब कौन सा गीत गाती है और नृत्य करती हैं?

Correct! Wrong!

19 घोटुल पाटा गीत को निम्न में से कौन गाते हैं?

Correct! Wrong!

20 चौकड़िया फाग किस क्षेत्र का गीत है?

Correct! Wrong!

21 आल्हा गीत गाया जाता है ?

Correct! Wrong!

Q 22.उत्तर भारत की लोकप्रिय प्रेम लोकगाथा क्या है?

Correct! Wrong!

Q 23. ग्रामीण यंत्र-तन्त्र की रहस्यात्मकता के साथ कोंन सी लोकशैली गया गायी जाती है ?

Correct! Wrong!

Q 24.युवा-युवतियों का गीत है?

Correct! Wrong!

Q 25.सिंगाजी ओर दलुजी का गीत किस जाति का सम्बंध गीत है ?

Correct! Wrong!

पृशन 26-बांस गीत कहां गाया जाता है।

Correct! Wrong!

पृशन 27-चंदा गीत किस क्षेत्र मे गाया जाता है।

Correct! Wrong!

पृशन 28- बिरहा कहां का गायन है।

Correct! Wrong!

Madhya Pradesh Folk Music Quiz ( मध्यप्रदेश के प्रमुख लोकगीत )
बहुत खराब ! आपके कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
खराब ! आप कुछ जवाब सही हैं! कड़ी मेहनत की ज़रूरत है
अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया ! अधिक तैयारी की जरूरत है
बहुत अच्छा ! आपने अच्छी कोशिश की लेकिन कुछ गलत हो गया! तैयारी की जरूरत है
शानदार ! आपका प्रश्नोत्तरी सही है! ऐसे ही आगे भी करते रहे

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

विष्णु गौर सीहोर, मध्यप्रदेश, रानी जी राजपूत,भोपाल, रंजना जी सोलंकी, बड़वानी, संदीप जी उमरिया