मौर्य वंश ( Mauryan dynasty 322-185 ईसा पूर्व )

मगध साम्राज्य के पश्चात मौर्य काल का प्रादुर्भाव हुआ मगध काल का अंतिम शासक धनानंद था यह सिकंदर महान का समकालीन था सिकंदर के जाने के पश्चात मगध में अशांति फैल गई फलस्वरूप चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य (विष्णुगुप्त )की सहायता से मगध सत्ता पर अधिकार कर लिया और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की
चंद्रगुप्त मौर्य ने धीरे-धीरे चाणक्य की सहायता से संपूर्ण भारत को राजनीतिक एकता के सूत्र में पिरोया मौर्य साम्राज्य भारत का प्रथम व्यापक तथा भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे विशाल साम्राज्य था मौर्य साम्राज्य हिंदुकुश पर्वत से कावेरी नदी तक फैला था  मौर्य काल में सर्वप्रथम सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की गई जिसे सम्राट अशोक ने “जियो और जीने दो” के सिद्धांत पर आगे बढ़ाया

पूर्व काल के बौद्ध लेखक भी मौर्यों को क्षत्रिय जाति के सदस्य समझते थे और उनका उल्लेख पिप्पलिवन के छोटे गणतंत्र की शासक -जाति के रूप में करते हैं, जो शायद नेपाल की तराई में रूम्मिनदेई और गोरखपुर जिले के कसिया के बीच में बुद्ध के समय निवास करते थे ।
चन्द्रगुप्त के लिए बृषल उपनाम विशाखदत्त के मुद्राराक्षस नामक संस्कृत नाटक में लिखा गया है, जो सदा शूद्रों के लिए प्रयोग नही किया गया था ।यह क्षत्रिय व अन्य लोगों के लिए भी कहा गया है जो कि ब्राह्मण धर्मग्रंथों के कथित नियमों का पालन नहीं करते थे ।

मौर्य प्रशासन केंद्रीय राजतंत्रात्मक प्रशासन था जिसने पहली बार भारत को राजनीतिक एकता के सूत्र में बांधा। अर्थशास्त्र में राजा को परामर्श दिया गया है कि वह संपूर्ण शक्ति को अपने हाथों में ग्रहण करें। प्राचीन भारत में सबसे विस्तृत नौकरशाही मौर्य काल में थी अर्थव्यवस्था पर राजकीय नियंत्रण सर्वाधिक था।

” प्रजा के सुख में राजा का सुख है और प्रजा की भलाई में उस की भलाई राजा को जो अच्छा लगे वह हितकर नहीं है वरन हितकर वह है जो प्रजा को अच्छा लगे” -अर्थशास्त्र

कोटिल्य ने राज्य के सप्तांग बताए हैं।
1 राजा
2 अमात्य
3 राष्ट्र
4 दुर्ग
5 बल (सेना)
6 कोष
7 मित्र

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में मंत्रिपरिषद को एक वैधानिक आवश्यकता मानते हुए कहा है कि “राज्य एक पहिए पर नहीं चल सकता।” मंत्रिपरिषद के सदस्यों को 12000 पण वार्षिक मिलते थे जबकि मंत्रियों के सदस्यों को 48000 पण वार्षिक वेतन मिलता था। मंत्रिण बहुत ही विश्वसनीय व्यक्तियों की एक छोटी होती थी जिससे जिसमें प्रायः 3 – 4 व्यक्ति होते थे।

अशोक के अभिलेखों में मंत्रिपरिषद को परिषा कहा जाता कहा गया है।राजा को प्रशासन में मदद देने के लिए 18 पदाधिकारियों का एक समूह होता था जिसे तीर्थ कहा जाता था यह अमात्य भी कहे जाते थे। सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ मंत्री एवं पुरोहित थे मंत्रियों की नियुक्ति हेतु उनके चरित्र को जांचा परखा जाता था जिसे उपधा परीक्षण कहते थे।

युक्त तथा उपयुक्त केंद्रीय तीर्थ एवं अध्यक्षों के नियंत्रण में कार्य करते थे इनके द्वारा केंद्रीय व स्थानीय शासन के बीच संपर्क बना रहता था।मंत्रिपरिषद के नीचे द्वितीय श्रेणी के पदाधिकारी थे जिन्हें अध्यक्ष कहा जाता था। अर्थशास्त्र में 26 अध्यक्षों का उल्लेख है।

मौर्य वंश की उत्पत्ति के कारण

मगध पर कुटिल और क्रूर शासक धनानंद का राज्य था उसने चाणक्य के काले वर्ण और चेचक के दागों से युक्त चेहरे के कारण उसे एक राजभोग में अपमानित कर दिया था चाणक्य ने उसी समय अपनी शिखा खोलकर घोषणा कर दी कि नंद वंश का नाश करके अपनी शिखा बांधेगा और इसी खोज में उन्होंने मुरा के पुत्र जिसे चाणक्य नंद का क्षत्रिय राजयुवक स्वीकार करते हुए अपने साथ लिया उसे राजनीति और युद्ध कला में प्रवीण करके नंद वंश के नाश के लिए तैयार किया

इतिहासकार मार्शल महोदय ने सांची के पूर्वी गेटों की चित्रकारी के आधार पर मोर पक्षी के चित्र बने हुए हैं निष्कर्ष निकलता है कि संभवत मोर पक्षी मौर्य वंश का राज्य चिन्ह था और इस राज्य के कारण वंश का नाम मौर्य वंश पड़ा

मौर्य साम्राज्य की स्थापना भारतीय इतिहास के एक युग का अंत और दूसरे युग का आरंभ करता था जिसका अंत होता है उसे अनैतिहासिक और जिसका आरंभ होता है उसे ऐतिहासिक युग कहते हैं

स्मिथ ने इस युग की प्रशंसा करते हुए लिखा है मौर्य राजवंश का प्रार्दुभाव इतिहासकार के लिए अंधकार से प्रकाश की मार्ग का निर्देश करता है इस काल का तिथि क्रम निश्चित हो जाता है चंद्रगुप्त मौर्य के प्रयासों से पूर्व भारतीय राज्यों के असंख्य टुकड़े संयुक्त हो जाते हैं पहले राज्य में राज्य करने वाले राजा कहलाते थे चंद्रगुप्त सम्राट का अधिकारी बन गया

मौर्य काल की तिथि निश्चित है मौर्य काल का इतिहास को जानने के साधन बहुत ठोस और व्यापक है इस काल का इतिहास जानने के लिए धार्मिक ग्रंथों के अतिरिक्त अन्य साधन भी है जैसे की ऐतिहासिक ग्रंथ, विदेशी विवरण, अभिलेख आदि प्राप्त हुए हैं

मौर्य वंश पर प्रकाश डालने वाले ऐतिहासिक ग्रन्थ

कौटिल्य का अर्थशास्त्र महत्वपूर्ण ग्रंथ है कोटिल्य को चाणक्य, विष्णुदत्त तथा अन्य नामों से पुकारा जाता है कौटिल्य का अर्थशास्त्र विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ है और उससे मौर्यकालीन इतिहास का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है मौर्यकालीन इतिहास को जानने के लिए दूसरा साधन मुद्राराक्षस नामक नाटक है इसका रचनाकार विशाखदत्त है यह एक ऐतिहासिक नाटक है और मौर्य काल के प्रारंभिक इतिहास को जानने में बड़ा सहायक सिद्ध होता है

कालिदास की अभिज्ञान शाकुंतलम्, मेघदूत वगैरह तथा कश्मीरी लेखक कल्हण की राजतरंगिणी, महर्षि पतंजलि के महाभाष्य भी मौर्य इतिहास पर प्रकाश डालते हैं

विदेशी इतिहासकारों में मेगस्थनीज नामक लेखक यूनानी राजदूत था वह मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र में कई वर्ष तक रहा मौर्यकाल को इन्होंने क्रमबद्ध और तिथि क्रम सहित लिखा, चीनी यात्रियों में फाह्यान और व्हेनसांग तथा तिब्बती लेखकों में तारानाथ का नाम अग्रगण्य है

मौर्यकालीन इतिहास जानने के अत्यंत विश्वसनीय और प्रामाणिक साधन अभिलेख है सम्राट अशोक ने स्तम्भो, शिलाओं तथा गुफाओं की दीवारों पर अनेक लेख लिखवाएं हैं जो आज भी उसकी कृति का गान कर रहे हैं मौर्य साम्राज्य का तीसरा शासक अशोक था जो चंद्रगुप्त का पौत्र और बिंबिसार का पुत्र था

मौर्यकालीन इतिहास को जानने के साधन बौद्ध और जैन साहित्य हैं चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म और अशोक ने बुद्ध धर्म का आश्रय लिया था

प्रान्तीय प्रशासन ( Provincial administration )

चन्द्रगुप्त मौर्य ने शासन संचालन को सुचारु रूप से चलाने के लिए चार प्रान्तों में विभाजित कर दिया था जिन्हें चक्र कहा जाता था। इन प्रान्तों का शासन सम्राट के प्रतिनिधि द्वारा संचालित होता था।

सम्राट अशोक के काल में प्रान्तों की संख्या पाँच हो गई थी। ये प्रान्त थे-

प्रान्त राजधानी

  • प्राची (मध्य देश )- पाटलिपुत्र
  • उत्तरापथ – तक्षशिला
  • क्षिणापथ – सुवर्णगिरि
  • अवन्ति राष्ट्र – उज्जयिनी
  • कलिंग – तोसली

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मौर्यवंश के मुख्य शासक

1. चन्द्रगुप्त मौर्य – 322-298 ईसा पूर्व (25 वर्ष)
2. बिन्दुसार  – 298-273 ईसा पूर्व (25 वर्ष)
3. सम्राट अशोक – 273-232 ईसा पूर्व (41 वर्ष)
4. कुणाल – 232-224 ईसाv पूर्व (8 वर्ष)
5. दशरथ मौर्य –232-224 ईसा पूर्व (8 वर्ष)
6. सम्प्रति – 224-215 ईसा पूर्व (9 वर्ष)
7. शालिसुक –215-202 ईसा पूर्व (13 वर्ष)
8. देववर्मन्  – 202-195 ईसा पूर्व (7 वर्ष)
9. शतधन्वन् मौर्य – 195-187 ईसा पूर्व (8 वर्ष)
10. बृहद्रथ मौर्य – 187-185 ईसा पूर्व (2 वर्ष)

1. चंद्रगुप्त मौर्य  (322 ईसा पूर्व – 298 ईसा पूर्व)

चाणक्य की सहायता से नंद वंश के शासक धनानंद को मारकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार मौर्य शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा मुरा से बना है तथा मौर्य का जन्म नंद राज्य की नाई जाति की शूद्र पत्नी से जन्म हुआ था और मुरा से उत्पन्न होने के कारण चंद्रगुप्त का नाम मोर्य कहलाया और उसके वंशज मौर्य वंशज के लाए

चंद्रगुप्त मौर्य को ग्रीक साहित्य में सैंड्रोकोटस या एंड्रोकोट्स कहा गया है। सर्वप्रथम विलियम जोंस ने सैंड्रोकोट्स की पहचान चंद्रगुप्त मौर्य से की। चन्द्रगुप्त की चाणक्य से भेंट विन्ध्याचल के जंगलों में हुई थी ग्रीक व लैटिन लेखक चाणक्य का जिक्र नहीं करते किन्तु एक सिंह व हाथी के साथ चन्द्रगुप्त की मुठभेड़ का जिक्र करते हैं ।इससे इस बात की पुष्टि होती है कि चन्द्रगुप्त विन्ध्याचल के जंगलों में रहता था ।

इसने अपने गुरु चाणक्य की सहायता से अंतिम नंद शासक घनानंद को पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना की। मुद्राराक्षस में चाणक्य की इस योजना का वर्णन है।

ब्राह्मण साहित्य में चंद्रगुप्त मौर्य को शूद्र जैन एवं बौद्ध साहित्य में क्षत्रिय तथा ग्रीक साहित्य में निम्न कुल का नहीं बल्कि निम्न परिस्थिति में जन्मा हुआ बताते हैं। विशाखदत्त में मुद्राराक्षस में उसे वर्षल (निम्न कुल का) कहा गया है। महावंश के अनुसार कोटिल्य ने चंद्रगुप्त को जंबूद्वीप (भारत) का शासक बनाया।

यूनानी लेखक प्लूटार्क व जस्टिन के अनुसार उसने छः लाख की सेना लेकर संपूर्ण भारत को रौंद डाला। प्लूटार्क व जस्टिन ने चंदगुप्त की सिकन्दर से भेंट का उल्लेख किया हैं।

चंद्रगुप्त मौर्य को किसने क्या कहा।

  • स्ट्रेबो व जस्टिन –  सेणड्रोकोटस
  • एरियन व प्लूटार्क – एंड्रोकोट्स
  • फिलार्कस – सेणड्रोकोप्टस

एरियन ने चन्द्रगुप्त मोर्य को साधारण वंश का व्यक्ति कहा है । जस्टिन और प्लूटार्क दोनों ने मकदूनियाई राजा सिकन्दर के पास चन्द्रगुप्त के जाने का उल्लेख किया है । लेकिन यह विचित्र है कि कुछ आधुनिक लेखक जस्टिन के पाठ में संशोधन कर ” अलेक्जेंड्रम “(Alexanderum) के स्थान पर ” नन्द्रम ” (Nandrum) पढ़ने का प्रस्ताव रखते हैं । इस तरह की काल्पनिक शुद्धि शायद ही मान्य हो ।

मध्य कालीन शिलालेखों में चन्दगुप्त मोर्य को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया गया है ।

सिकंदर ने उस समय सिंहासन प्राप्त किया जब सिकन्दर का एक सेनापति अपनी भावी उन्नति की नींव डाल रहा था । सिकन्दर के साम्राज्य का बंटवारा होने पर बेबीलोन सेल्यूकस को मिला । यह उसे पहले त्रिपरदीसस की सन्धि (321 ईसा पूर्व ) के बाद और आगे चलकर ईसा पूर्व 312 में जब उसकी तिथि गणना होती है , मिला ।

सेल्यूकस ने राजा की उपाधि 306 ईसा पूर्व ग्रहण की थी चन्द्रगुप्त मोर्य जब लड़का था तब वह सिकन्दर से पंजाब में मिला था

चन्द्रगुप्त मौर्य मालवा व कठियावाड़ पर अधिकार किया था  तमिल अनुश्रुती “वम्ब मोरियम “(नये मौर्य राजा )का दक्षिण में तिनेवेल्ली जिले तक अधिकार का जिक्र किया है । लेकिन यह कार्य विद्वान कोकण के मौर्यों का मानते हैं जो काफी बाद के हैं ।अगर ऐसा हुआ भी कि पूर्व कालीन मौर्य तिनेवेल्ली तक गये हों, तो वह अवश्य ही थोड़े दिनों के भीतर ही इस भाग से लौट आये होंगे क्योंकि मौर्य साम्राज्य की दक्षिणी सीमा चन्द्रगुप्त मौर्य के पोते अशोक के काल में मैसूर के चित्तलदुर्ग जिले तक ही सीमित थी । पाण्डय राज्य जिसमें तिनेवेल्ली जिला शामिल था, उस सम्राट के अभिलेखों में सीमा -राज्य के जैसा उल्लेखित नहीं है ।

2. बिंदुसार ( 298 ईसापूर्व – 274 ईसा पूर्व)

बिंदुसार चंद्रगुप्त मौर्य का पुत्र था किसी ग्रीक लेखों में अमित्रघात (अमित्रोकेटस) कहा गया है।  वायु पुराण में मद्रसार तथा जैन ग्रंथों में सिंहसेन कहा गया है। जैन ग्रंथों के अनुसार बिंदुसार की माता का नाम दुर्धरा था। बिंदुसार आजीवक धर्म का अनुयाई था।

प्लिनी के अनुसार मिस्र के शासक टॉलमी द्वितीय फिलाडेल्फस डायनोसिस नामक राजदूत बिंदुसार के दरबार में भेजा। एथिनियस नामक यूनानी लेखक के अनुसार बिंदुसार ने सीरिया के शासक एंटीयोकस प्रथम को मैत्रीपूर्ण पत्र लिखकर निम्न तीन वस्तुओं की मांग की
1 मदिरा
2 सुखी अंजीर और
3 दार्शनिक

सीरियाई शासक ने दार्शनिक के अलावा अन्य वस्तुएं भिजवा दी तथा दार्शनिक के बारे में यह कहा कि यूनानी कानून के अनुसार दार्शनिक का विक्रय नहीं किया जा सकता।

दिव्यावदान के अनुसार बिंदुसार के समय तक्षशिला में दो विद्रोह हुए जिनके दमन हेतु प्रथम बार अशोक और दूसरी बार सुसीम को भेजा गया।  चाणक्य बिंदुसार का प्रधानमंत्री था चाणक्य के बाद राधागुप्त प्रधानमंत्री बना। बिंदुसार की सभा में 500 सदस्य वाली एक मंत्रिपरिषद थी जिसका प्रधान खल्लाटक था।

बुद्धघोष द्वारा रचित सामंतपासादिक व सुमंगल विलासिनी से एवं आर्य मंजु श्री मूल कल्प से अशोक के जीवन की घटनाएं मिलती है अशोकावदानमाला में उपगुप्त द्वारा अशोक को दिए गए धर्मोपदेश की जानकारी मिलती है।

3. अशोक

अशोक की माता का सुभद्रांगी नाम था अशोक के व्यक्तिगत जीवन की जानकारी लघु शिलालेख में मिलती है अशोक की राजकीय घोषणाएं लघु स्तंभ लेख प्राप्त होती है अशोक के राजा बनने की भविष्यवाणी पिंगलवत्स की थी अशोक का समकालीन तुरमय मिस्र का शासक था अशोक की उपाधि देवाननपिय की उपाधि और दशरथ ने धारण की थी

अशोक की पत्नियां –
1 देवी या वेदिश महादेवी ➖ विदिशा की (सिंहली अनुश्रुति)
2 तिष्यरक्षिता (दिव्यावदान)
3 कारूवाकी ( लेखों में प्राप्त एकमात्र नाम)

राजतरंगिणी ग्रंथ से पता चलता है कि श्रीनगर ( कश्मीर) नगर का संस्थापक अशोक था  सारनाथ स्तंभ के फलक पर अंकित पशुओं का सही क्रम  हाथी, अश्व, वृष , सिंह है

अशोक कालीन ग्राम के प्रकार – परिहारक, अतुल्य, कुप्या

अशोक के समय सौराष्ट्र का गर्वनर तुशाष्प था अशोक के रुम्मिन्देई अभिलेख का विषय प्रशासनिक न होकर आर्थिक था  अशोक का सबसे लंबा स्तम्भ लेख भाब्रू लेख था

अशोक ने धम्म की परिभाषा राहुलवाद सूत्र से ली थी।  अशोक ने अपने राज्य में 84000 स्तुपो का निर्माण कराया था। अशोक की धार्मिक सहिष्णुता की नीति 12 वे शिलालेख में है अशोक का एकमात्र दिल्ली टोपरा अभिलेख जिस पर अशोक के सातो स्तम्भ लेख उतकृत है

अशोक के ग्रीक एवं आरमाइक लिपि के अभिलेख अफगानिस्तान से मिले हैं अशोक ने रुम्मिदेई स्तम्भ लेख में भू राजस्व की दर घटा देने की घोषणा की थी 

अशोक ने प्रथम पृथक शिलालेख कहा है कि –“सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं।” 

अशोक ने भारत का प्रथम अस्पताल एवं ओषधि बाग का निर्माण करबाया था अशोक के काल में अनुसंधान प्रत्येक पांचवें वर्ष धर्म प्रचार हेतु भ्रमण था 

अशोक के धम्म के स्वरूप पर विभिन्न विद्वानों के मत

  • फ्लीट “अशोक का धम्म राजधर्म था ।”
  • राधाकुमुद मुखर्जी “अशोक का धम्म सभी धर्मों की साझा सम्पत्ति था ।”
  • सेनार्ट “अशोक का धम्म बौद्ध धर्म का सर्वांगीण चित्रण था ।”
  • रोमिला थापर “अशोक का धम्म उसकी निजी कल्पना थी जो उसने प्रशासनिक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर बनाई थी ।”
  • डी. आर. भण्डारकर “अशोक का धम्म उपासक बौद्धधर्म था ।”
  • रमाशंकर त्रिपाठी व स्मिथ “अशोक के धम्म के तत्व विश्वजनीन (Universal )हैं और हम उस पर किसी धर्म विशेष को प्रोत्साहन अथवा संरक्षण प्रदान करने का दोषारोपण नहीं कर सकते ।”
  • रोमिला थापर “अशोक ने धम्म को सामाजिक दायित्वों की एक वृत्ति के रूप में देखा था ।इसका उद्देश्य एक ऐसी मानसिक वृत्ति का निर्माण करना था जिसमें सामाजिक उत्तरदायित्वों को एक व्यक्ति के दूसरे के प्रति व्यवहार को अधिक महत्वपूर्ण समझा जाए ।इसमें मनुष्य की महिमा को स्वीकृति देने और समाज के कार्यकलापों में मानवीय भावना का संचार करने का आग्रह था ।

अशोक के अभिलेख और शिलालेख

अभी तक अशोक के 47 से अधिक स्थानों पर अभिलेख प्राप्त हुए हैं यह अभिलेख राजकीय आदेश के रूप में जारी किए गए थे अशोक ने अधिकांश अभिलेख ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृतिक भाषा में लिखवाए थे सामान्यत अशोक के अभिलेखों में 3 लिपियों का प्रयोग किया गया है यह लिपियां निम्न है

  1. ब्राह्मी लिपि
  2. खरोष्ठी लिपि- मंसेरा (हजारा पाकिस्तान) और शाहबाजगढ़ी अभिलेखों से प्राप्त यह लिपि दाईं से बाईं ओर लिखी जाती है
  3. ग्रीक लिपि शार ए कुजा अभिलेख द्वीभाषी अभिलेख है

काबुल नदी के किनारे जलालाबाद के पास से प्राप्त लमघान शिलालेख आरामाइक लिपि का महत्वपूर्ण शिलालेख है

अशोक के अभिलेखों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है 

  1. शिलालेख
  2. लघु शिलालेख
  3. स्तंभ लेख
  4. लघु स्तंभ लेख
  5. गुहालेख

शिलालेख

यह पहाड़ों की शिला ऊपर लिखित अभिलेख है यह निम्न है वृहद शिलालेख यह 14 विभिन्न लेखों के समूह है जो 8 स्थानों पर प्राप्त हुए हैं शाहबाजगढ़ी मनसेरा कालसी ,गिरनार ,धौली व जोगढ़  5वें अभिलेख में अशोक के राज्यारोहण के 13वे वर्ष के बाद धम्म महामात्र की नियुक्ति का उल्लेख है

आठवीं शिलालेख में सम्राट अशोक द्वारा आखेंटन का त्याग तथा धम्म यात्रा करने की सूचना दी गई है दूसरे व 11वीं शिलालेख में अशोक की धम्म नीति की व्याख्या की गई है  13वा अभिलेख सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है इस अभिलेख में कलिंग विजय उसके हृदय परिवर्तन तथा उसके द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने की सूचना मिलती है

इसमें युद्ध विजय के बदले धम्म विजय पर बल दिया गया है  इस अभिलेख से ही अशोक की विदेश नीति पर प्रकाश पड़ता है लघु शिलालेख अशोक के लघु शिलालेख विभिन्न क्षेत्रों जैसे रूपनाथ ,सासाराम ,दिल्ली ,गुर्जर , भाब्रू (बैराट), मास्की ,ब्रम्हगिरी, सिद्धपुर, जस्टिन रामेश्वर , गोवीमठ ,पालकी ,गुंडू, राजूल, तथा उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में स्थित अहरौरा से प्राप्त हुए हैं

मास्की तथा गुर्जरा, उदय गोलम, तथा कर्नाटक से प्राप्त शिलालेख में अशोक को उनके व्यक्तिगत नाम से पुकारा गया है मास्को शिलालेख में उनका नाम अशोक देवानांमप्रिय मिलता है मास्को शिलालेख रायचूर कर्नाटक में प्राप्त है

स्तंभ लेखों की संख्या 7 है जो 6 स्थानों पर मिलते हैं दिल्ली टोपरा, दिल्ली मेरठ, लोरिया अरेराज ,लौरिया नंदनगढ़, रामपुरवा व प्रयाग (इलाहाबाद ) प्रयाग का शिलालेख पहले कौशांबी मे था जिसे बाद में प्रयोग में लाया गया  लघु स्तंभ लेख अशोक के लघु स्तंभ लेख निम्नलिखित स्थानों पर स्थापित है

सांची ,सारनाथ ,कौशांबी, निगाली, सागर, रुम्मिनदेई, इन स्तंभों में राजकीय घोषणाएं खुदी हुई है कौशांबी के लघु स्तंभ लेख में अशोक अपने महा मात्रो को आदेश देता है कि वह संघ भेद को रोके
रुम्मिनदेई स्तंभ लेखों से ज्ञात होता है कि अशोक ने बुद्ध के जीवन से संबंधित पवित्र स्थानों की यात्रा की थी  गुहा अभिलेख बिहार में गया के पास बाराबार की पहाड़ियों में अशोक के तीन गुहालेख मिलते हैं

मौर्य साम्राज्य के पतन के मुख्य कारण 

अशोक के उत्तराधिकारी योग्य नहीं थे वह परिस्थितियों के अनुकूल नवीन नीति अख्तियार नहीं कर सके परवर्ती मौर्य के सामने तेजी से शासक बदलने के कारण राजनीतिक व प्रशासनिक अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गई थी अशोक की धम्म नीति ने साम्राज्य के सैन्य आधार को कमजोर कर दिया था

Mauryan dynasty important facts and Quiz

  1. सेल्युकस व चंद्रगुप्त के मध्य हुए युद्ध का विवरण किसने दिया- एप्पीयानस
  2. चंद्रगुप्त मौर्य की दक्षिण भारत विजय की जानकारी मिलती है- तमिल ग्रंथ अहनानुर व मुरनानुर
  3. बिन्दुसार को सिंघसेन कहा गया है- जैन ग्रंथो में
  4. पुराणों में अशोक का नाम मिलता है- अशोक वर्धन
  5. राज्याभिषेक से पूर्व अशोक कहा का राज्यपाल था- उज्जैन
  6. अशोक के कलिंग आक्रमण के समय वहाँ का शासक था- नंदराज
  7. चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रोकोटट्स किसने कहा- एरियन व प्लूटार्क
  8. चंद्रगुप्त मौर्य के समय सुदर्शन झील का निर्माण किसने किया- पुष्यगुप्त वैश्य
  9. चाणक्य प्रधानमंत्री था- चंद्रगुप्त मौर्य व बिन्दुसार
  10. जैन ग्रंथो के अनुसार बिन्दुसार की माता का क्या नाम था- दुर्धरा
  11. सर्वप्रथम किसने बताया मयूर मौर्यो का राजवंशीय चिन्ह है। – ग्रन्वेडल महोदय ने
  12. किसने चन्द्रगुप्त की सेना को डाकुओ का गिरोह कहा- जस्टिन ने
  13. किसके अनुसार बिंदुसार 16 राज्यो का विजेता था- बौद्ध विद्वान तारानाथ के अनुसार
  14. अशोक के प्रयाग स्तम्भ लेख में उसकी किस रानी का उल्लेख मिलता है। – रानी करुवकी
  15. अशोक को किस अभिलेख में प्रियदर्शी कहा गया है। – भाब्रू अभिलेख में

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No of Questions-47

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

कमलनयन पारीक अजमेर, अनीश खाँ, SETHI ROJH BIKANER, प्रियंका वर्मा, लोकेश स्वामी, पुष्पलता अजमेर, लोकेश नागर, जुल्फिकार अहमद दौसा, महेन्द्र चौहान, चित्रकूट त्रिपाठी

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