( मुग़ल काल कला और संस्कृति )

मध्य काल में भारतीय स्थापत्य कला का विकास वस्तुत: हिन्दू और मुस्लिम दोनों जातियों की सम्मिलित प्रतिभा के कारण हुआ।  कुछ विद्वानों ने मध्य कालीन स्थापत्य कला शैली को पठान, सरासिन अथवा इस्लामिक शैली के नाम से पुकारा है, जो युक्तिसंगत नहीं है।

वस्तुत: इस शैली को इंडो इस्लामिक शैली की संज्ञा से विभूषित करना ही उपयुक्त होगा क्योंकि इसमें हम भारतीय तथा इस्लामिक दोनों शैलियों का सुंदर समन्वय पाते हैं।

भारत वर्ष में जब इस्लाम का प्रवेश हुआ, इस्लाम के अनुयायी इस शैली को भी अपने साथ लाये परन्तु कुछ कारणों से इस शैली का स्वतंत्र विकास नही हो पाया। दुसरे शब्दों में मुसलमानों को भारत में प्रचलित प्राचीन भारतीय स्थापत्य शैलियों से सामंजस्य कर निर्माण कार्य करने पड़े।

भारत में पहले से ही कही अधिक उन्नत ब्राह्मण,जैन,बोद्ध स्थापत्य शैलियां प्रचलित थी जिस शैली को हम इन्डो इस्लामी शैली के नाम से जानते है वह वास्तव में भारतीय एवम इस्लामिक शैलियों का सम्मिश्रण ही हैं।

मुग़ल काल इंडो इस्लामिक स्थापत्य कला शैली की पराकाष्ठा का युग माना जाता है। पर्सी ब्राउन ने मुग़ल काल को भारतीय वास्तुकला का ‘ग्रीष्म काल’ माना हैं, जो प्रकाश एवम उर्वरा का प्रतीक माना जाता हैं।

स्मिथ ने मुगलकालीन वास्तुकला को कला की रानी कहा है। मुग़ल स्थापत्य कला का काल मुख्य रूप से 1526 ईस्वी से लेकर 1857 ईस्वी तक माना जाता हैं। मुग़ल स्थापत्य कला में फारस, तुर्की, मध्य एशिया, गुजरात, बंगाल, जोनपुर आदि स्थानों की शैलियों का अनोखा मिश्रण हुआ था।

मुग़ल काल में पहली बार पत्थर के अलावा प्लास्टर एवम पच्चीकारी का प्रयोग किया गया। सजावट के लिए मार्बल पर जवाहरात एवं कीमती पत्थर की जडावत का प्रयोग, पथरों को काटकर फूल पत्ते, बेल बूटे एवम गुम्बदों तथा बुर्जों को कलश से सजाया जाता था।

Babar

( बाबर 1526 ई.-1530 ई.)

प्रथम मुग़ल सम्राट जिसका शासन काल बहुत कम था परन्तु स्थापत्य कला का उच्चकोटि का पारखी होने के कारण उसे भारतीय भवनों की समीक्षा करने का अवकाश मिल ही गया। उसे तुर्क एवं अफगान शासको द्वारा बनवाई गई दिल्ली एवं आगरे की इमारते पसंद नहीं आई और वहां के वास्तु कला के नमूने उसे नीचे स्तर के प्रतीत हुए।

किन्तु बाबर को ग्वालियर की शिल्प कला ने बहुत अधिक प्रभावित किया और उसने मानसिंह एवं विक्रमजीत के महलों को अद्वितीय बताया। संभव है अपने महलो के निर्माण में वह ग्वालियर शैली से प्रभावित हुआ। बाबर ने आगरा, फतेहपुर सीकरी, बयाना, धोलपुर, ग्वालियर, अलीगढ आदि में भवन निर्माण हेतु सैकड़ो कारीगर नियुक्त किये थे।

इन क्षेत्रो में उसने भवन निर्माण न करवा कर मंडप,स्नानागार,कूए,तालाब, फ़व्वारे ही बनवाए थे। बाबर के द्वारा निर्मित केवल दो तीन भवन ही उपलब्ध है। ये भवन है पानीपत के काबुली बाग़ में स्थित मस्जिद, दूसरी संभल की जमा मस्जिद और तीसरी आगरा के किले के अंदर निर्मित मस्जिद।

उसके काल की एक अन्य मस्जिद अयोध्या में भी पाई गई है जिसे सम्राट की आज्ञा से अबुल बारी न बनवाया था। बाबर द्वारा निर्मित भवन शिल्प कला की दृष्टि से बहुत सामान्य है।

Humayun  

हुमायु 1530ई.-1540ई. और 1555ई.-1556ई.)

हुमायु द्वारा निर्मित केवल दो मस्जिदों के अवशेष आज मौजूद है आगरा में निर्मित मस्जिद एवं दूसरी फतेहाबाद की विशाल एवं संतुलित मस्जिद।

फतेहाबाद की मस्जिद का निर्माण 1540ई. में किया गया। इसमें फारसी शैली में प्रचलित प्रस्तर मीना कारी सज्जा का प्रयोग किया गया सर्वप्रथम यह प्रयोग 15 वी शताब्दी के उत्तरार्ध में बहमनी शासकों ने किया।

उसने 1533ई. में दीनपनाह धर्म का शरण स्थल नामक नगर की नीव डाली। इस नगर जिसे पुराना किला के नाम से जाना जाता है की दीवारे रोड़ी से निर्मित थी। इसे बाद में शेर शाह ने तुडवा दिया

Sher Shah Suri

शेरशाह सूरी (1540ई.-1545ई.)

शेर शाह ने हुमायूँ के द्वारा निर्मित दीन पनाह को नष्ट करवा कर उसके भग्नावशेषों पर पुराने किले का निर्माण करवाया। इनमे उसने एक मस्जिद भी बनवाई थी जो पुराने किले की मस्जिद अथवा किला ए कुहना मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध है।

अकबर के शासन के पूर्व की इंडो मुस्लिम शिल्प कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना सहसा राम में झील केंद्र में एक ऊँचे टीले पे निर्मित शेरशाह का मकबरा है। बाहय निर्माण की दृष्टि से शेरशाह का मकबरा इस्लामी ढंग का बना हुआ है किन्तु इसका भीतरी भाग तोरणों या हिन्दू ढंग के खम्भों से सजा हुआ है।

शेर शाह के उत्तराधिकारियो के शासन काल में किसी उल्लेखनीय भवन का निर्माण नहीं हो पाया।

Akbar

अकबर (1556ई.-1605ई.)

अकबर ने विभिन्न स्थानों की कारीगरी का उपयोग कर एक नूतन भारतीय अथवा राष्ट्रीय शैली का निर्माण किया और इस शैली में उसने आगरा फतेपुर सीकरी, लाहोर,इलाहबाद,अटक आदि विभिन्न स्थानों में अनेक दुर्ग,राजप्रसाद,भवन,मस्जिद,मकबरे आदि बनवाए।

अकबर के शासन काल की पहली इमारत दिल्ली स्थित हुमायूँ का मकबरा है। इसका निर्माण हुमायूँ की विधवा पत्नी हाजी बेगम की देख रेख में हुआ था। यह 1569ई. में बनकर तैयार हुआ और इसमें फारसी व भारतीय कलाओ का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। भारत में निर्मित उभरी हुयी दोहरी गुम्बंद का यह पहला उदाहरण है।

इसके बाद आगरा ,लाहौर के किले का निर्माण हुआ। आगरे के लाल किले की दीवारे लगभग 70 फुट ऊँची हैतथा इसका घेराव डेढ़ मील(2.4 km) है। आगरे के किले में 2 मुख्य द्वार है जिनमे से एक पश्चिम की और दूसरा इस से छोटा अमर सिंह द्वार है। किले के पश्चिम द्वार को दिल्ली व हाथी द्वार के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसके मुख्य मेहराब पर दो हाथियों की आकृति उकेरी हुई है।

इस किले के भीतर अकबर ने लगभग 500 इमारतों का निर्माण करवाया। अकबर द्वारा निर्मित ये इमारते लाल बलुआ पत्थर की थी जिन्हें शाहजंहा ने तुडवा कर इसके स्थान पर संगमरमर की नई इमारतों का निर्माण करवाया।

किले में अकबर द्वारा निर्मित सर्वाधिक महत्वपूर्ण इमारते जहाँगीरी महल एवं अकबरी महल है। इनके निर्माण में भी लाल पत्थरों का प्रयोग किया गया है। जहाँगीरी महल अकबरी महल की अपेक्षा अधिक बड़ा एवं सुंदर है। जहाँगीरी महल हिन्दू डिजाइन का है और इसमें सजावट भी हिन्दू ढंग की है। इन कारणों से इसे सरलता से हिन्दू भवन कहा जा सकता है।

आगरे किले की रूप रेखा ग्वालियर के किले से मिलती है जिसे मान सिंह ने बनवाया था। लाहौर के किले का निर्माण भी लगभग आगरे के किले के निर्माण के समय ही हुआ था। दोनों किलों में समरूपता भी है, किन्तु लाहौर के किले की सजावट अपेक्षा कृत घनी है।

इसके अतिरिक्त अकबर ने इलाहाबाद एवं अजमेर में भी किले बनवाए। फतेहपुर सीकरी (स्थापना 1569ई.) (1571ई.-1585ई. तक राजधानी रही) अकबर ने एक नयी राजधानी फतेपुर सीकरी का निर्माण करवाया। यहाँ भी उसने राजप्रसाद,बेगमों, शहजादों के महल कार्यालय आदि का निर्माण करवाया।

सिकरी में सम्राट ने अनेक भवनों का निर्माण करवाया किन्तु इनमे मुहाफ़िज़ खाना,दीवाने आम,दीवाने ख़ास,खजाना महल,पञ्च महल,महारानी मरियम का महल,तुर्की सुल्ताना का महल,जोधा बाई का महल और बीरबल का महल विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

अधिकांश इमारतो में हिन्दू मुस्लिम कलाओ का सुंदर समन्वय दृष्टिगोचर होता है। किन्तु इनमे हिन्दू शैली की प्रधानता है। इनमे से कुछ की सजावट जैसे दीवाने खास में लगे हुए खम्भों की शोभा बढ़ाने वाले तोड़े , पंच महल और जोधा बाई के महल में लगे हुए उमरे घंटे तथा जंजीर और मरियम के महल में पत्थरों पर खोदे गए पशुओ के चित्र आदि हिन्दू एवं जैन शैलियों के है।

किले के अंदर निर्मित जामा मस्जिद और उसका प्रवेश द्वार जिसे अकबर ने अपनी दक्षिण विजय के बाद नए सिरे से बनवाया, बुलंद दरवाजे के नाम से जाना जाता है। दरवाजे की ऊँचाई 134 फीट व सीढ़ियों की 72 फीट इस प्रकार यह 176 फीट ऊंचा है।

सीकरी के निर्माण में 11 वर्ष लगे। बाद में सलीम चिश्ती की दरगाह आदि बने। इसके अतिरिक्त अकबर ने मेरटा, आमेर में मस्जिद का निर्माण करवाया इलाहबाद में उसने 40 खम्भों का महल तथा सिकंदरा में अपने मकबरे की योजना तैयार की।

अकबर के मकबरे का निर्माण 1613ई. में उसके पुत्र जहाँगीर ने करवाया।

Features of Islamic and Indian styles ( इस्लामी एवं भारतीय शैलियों की विशेषताएं )

इस्लामी स्थापत्य कला की विशष्टिता गुम्बंद, ऊँची ऊँची मीनारे,मेहराब तथा डांटे थी और भारतीय शिल्पकला की विशेषता चोरस छत,छोटे खम्बे नुकीले मेहराब और तोडें थी। सम्पूर्ण मध्य काल में भारतीय स्थापत्य कला ने अनेक तरीको से इस्लामी शैली को गहरे रूप से प्रभावित किया।

प्रथम मुसलमानों को भारत वर्ष में स्थानीय कारीगरों तथा शिल्पियों को भवनों के निर्माण हेतु नियुक्त करना पड़ा। इन लोगो को अपनों देशी स्थापत्य कला के रूप तथा पद्धति का स्पष्ट ज्ञान था। अत: उन्होंने जाने अनजाने रूप में इस्लामी इमारतो में अपनी स्थानीय शिल्प कला कारीगरी का समावेश कर दिया। वस्तुत: इन इमारतो को बनाने में विदेशी मष्तिष्क काम कर रहा था किन्तु हाथ भारतीयों का था।

द्वितीय प्राय: सभी प्रारंभिक सुल्तानों ने धर्मान्धता के कारण हिन्दू और जैन मंदिरों को तोडा और उन्ही के मलबे से उन्होंने अपने महल मस्जिद और गुम्बदो का निर्माण करवाया। अत: उनके भवनों पर भारतीयता की छाप पड गयी।

तृतीय , यद्यपि हिन्दू और मुसलमानों के भवनों में अनेक विभिन्नताएं थी परन्तु कुछ समानताएं भी थी। अत: थोडा सा परिवर्तन कर भारतीय भवनों को इस्लामिक रूप दे दिया गया और इस तरह मध्य कालीन भवनों पर भारतीयता की छाप अंकित हो गयी।

मुग़ल काल में शिक्षा के प्रमुख केन्द्र ( Center of Education in the Mughal Period ) 

मुग़ल काल में शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में आगरा, फ़तेहपुर सीकरी, दिल्ली, गुजरात, लाहौर, सियालकोट, जौनपुर, अजमेर आदि विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। मुग़ल काल के शासकों ने ‘फ़ारसी’ को अपनी राजभाषा बनाया था। इस काल का फ़ारसी साहित्य काफ़ी समृद्ध था। फ़ारसी के अतिरिक्त हिन्दी, संस्कृत, उर्दू का भी मुग़ल काल में विकास हुआ।

डॉक्टर श्रीवास्तव के अनुसार, “यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रत्येक बच्चा स्कूल या कॉलेज जाएगा, मुगल सरकार के पास शिक्षा का कोई विभाग नहीं था। मुगल शासनकाल के दौरान शिक्षा एक व्यक्तिगत मामले की तरह था, जहाँ लोगो ने अपने बच्चो को शिक्षित करने के लिए अपने खुद के प्रबंध कर रखे थे।”

इसके अतिरिक्त, हिंदुओं और मुस्लिमों दोनों के लिए अलग – अलग स्कूल थे और बच्चो को स्कूल भेजने की उनकी भिन्न-भिन्न प्रथाएं थी।

हिन्दू शिक्षा – हिन्दुओं के प्राथमिक विद्यालयों का रख-रखाव अनुदान या निधियों के द्वारा किया जाता था, जिसके लिए विद्यार्थियों को शुल्क नही देना पड़ता था।   

मुस्लिम शिक्षा-  मुस्लिम अपने बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए मक्तब मे भेजा करते थे, जो मस्जिदों के पास हुआ करते थे एवं इस प्रकार के स्कूल प्रत्येक शहर एवं गाँव मे होते थे। प्राथमिक स्तर पर, प्रत्येक बच्चे को कुरान सीखना पड़ता था।

महिलाओं कि शिक्षा- समृद्ध लोगो के द्वारा उनकी बेटियों को घर पर ही शिक्षा प्रदान करने के लिए निजी शिक्षकों कि व्यवस्था की जा रही थी, महिलाओं को प्राथमिक स्तर से ऊपर शिक्षा का कोई अधिकार नहीं था।

मुग़ल काल साहित्य ( Mughal era literature )

फ़ारसी साहित्य ( Persian Literature )

मुग़लकालीन फ़ारसी साहित्य की प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं-

बाबरनामा ( Baburnama )- बाबर द्वारा रचित तुर्की भाषा की यह कृति, जिसका अकबर ने 1583 ई. में अर्ब्दुरहमान ख़ानख़ाना द्वारा अनुवाद करवाया था, भारत की 1504 से 1529 ई. तक की राजनीतिक एवं प्राकृतिक स्थिति पर वर्णनात्मक प्रकाश डालती है 

तारीख़-ए-रशीदी – हुमायूँ की शाही फ़ौज में कमांडर के पद पर नियुक्त मिर्ज़ा हैदर दोगलत द्वारा रचित यह कृति मध्य एशिया में तुर्कों के इतिहास तथा हुमायूँ के शासन काल पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालती है।

क़ानूने हुमायूँनी- 1534 ई. में ख्वान्दमीर द्वारा रचित इस कृति में हुमायूँ की चापलूसी करते हुए उसे ‘सिकन्दर-ए-आजम’, ख़ुदा का साया आदि उपाधियाँ देने का वर्णन है।

हुमायूँनामा ( Humayunnama )  दो भागों में विभाजित यह पुस्तक ‘गुलबदन बेगम’ द्वारा लिखी गयी, जिसके एक भाग में बाबर का इतिहास तथा दूसरे में हुमायूँ के इतिहास का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त इस पुस्तक से तत्कालीन सामाजिक स्थिति पर भी प्रकाश पड़ता है।

तजकिरातुल वाकयात- 1536-1537 ई. में ‘जौहर आपताबची’ द्वारा रचित इस पुस्तक में हुमायूँ के जीवन के उतार-चढ़ाव का उल्लेख है।

वाकयात-ए-मुश्ताकी- लोदी एवं सूर काल के विषय में जानकारी देने वाली यह कृति ‘रिजकुल्लाह मुश्ताकी’ द्वारा रचित है।

तोहफ़ा-ए-अकबरशाही – अकबर को समर्पित इस पुस्तक को ‘अब्बास ख़ाँ सरवानी’ ने अकबर के निर्देश पर लिखा था। इस पुस्तक से शेरशाह मे विषय मे जानकारी मिलती है।

तारीख़-ए-शाही – बहलोल लोदी के काल से प्रारम्भ होकर एवं हेमू की मृत्यु के समय समाप्त होने वाली यह पुस्तक ‘अहमद यादगार’ द्वारा रचित है।

तजकिरा-ए-हुमायूँ व अकबर- अकबर द्वारा अपने दरबारियों को हूमायूँ के विषय में जो कुछ जानते हैं, लिखने का आदेश देने पर अकबर के रसोई प्रबंधक ‘बायर्जाद बयात’ ने यह पुस्तक लिखी थी।

नफाइस-उल-मासिर- अकबर के समय यह प्रथम ऐतिहासिक पुस्तक ‘मीर अलाउद्दौला कजवीनी’ द्वारा रचित है, जिससे 1565 से 1575 ई. तक की स्थिति का पता चलता है।

तारीख़-ए-अकबरी- 9 भागों में विभाजित यह पुस्तक ‘निज़ामुद्दीन अहमद’ द्वारा रचित है। इसके प्रथम दो भाग मुग़लों के इतिहास का उल्लेख करते हैं तथा शेष भाग दक्कन, मालवा, गुजरात, बंगाल, जौनपुर, कश्मीर, सिंध एवं मुल्तान की स्थिति का आभास कराते हैं।

इंशा – अबुल फ़ज़ल की रचना ‘इंशा’ (अकबर द्वारा विदेशी शासकों को भेजे गये शाही पत्रों का संकलन) ऐतिहासिक एवं साहित्यिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है।

मुन्तखब-उत-तवारीख़ – 1590 ई. में प्रारम्भ अब्दुल कादिर बदायूंनी द्वारा रचित यह पुस्तक हिन्दुस्तान के आम इतिहास के रूप में जानी जाती है, जो तीन भागों में विभाजित है। प्रथम भाग जिसे ‘तबकाते-अकबरी’ का संक्षिप्त रूप भी कहा जाता है, सुबुक्तगीन से हुमायूँ की मृत्यु तक की स्थिति का उल्लेख करता है तथा तीसरा भाग सूफ़ियों, शायरों एवं विद्वानों की जीवनियों पर प्रकाश डालता है। पुस्तक का रचयिता बदायूंनी, अकबर की उदार धार्मिक नीतियों का कट्टर विरोधी होने के कारण अकबर द्वारा लागू की गई उसकी हर नीति को इस्लाम धर्म के विरुद्ध साज़िश समझता था।

तुजुक-ए-जहाँगारी- जहाँगीर ने इस पुस्तक को अपने शासन काल के 16वें वर्ष तक लिखा। उसके बाद के 19 वर्षों का इतिहास ‘मौतमिद ख़ाँ ने अपने नाम से लिखा। अन्तिम रूप से इस पुस्तक को पूर्ण करने का श्रेय ‘मुहम्मद हादी’ को है। यह पुस्तक जहाँगीर के शासन कालीन उतार-चढ़ाव तथा शासन सम्बन्धी क़ानूनों का उल्लेख करती है।

इक़बालनामा-ए-जहाँगीरी- जहाँगीर के शासन काल के 19वें वर्ष के बाद की जानकारी देने वाली यह पुस्तक ‘मौतमद ख़ाँ बख्शी’ द्वारा रचित है।

पादशाहनामा- ‘पादशाहनामा’ नाम से कई पुस्तकों की रचना हुई है, जिन रचनाकारों ने इन पुस्तकों की रचना की है, वे निम्नलिखित हैं-

नुस्खा-ए-दिलकुशा- औरंगज़ेब की शासन कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति का उल्लेख करने वाली यह पुस्तक ‘भीमसेन कायस्थ’ द्वारा रचित है।

मासिर-ए-आलमगीरी- ‘साकी मुस्तैद ख़ाँ’ द्वारा रचित यह कृति औरंगज़ेब के शासन काल के 11 वें वर्ष से लेकर 20वें वर्ष तक की स्थिति पर प्रकाश डालती है। ‘जदुनाथ सरकार’ ने इस कृति को ‘मुग़लराज्य का गजेटियर’ कहा है।

फतवा-ए-आलमगीरी- मुस्लिम क़ानूनों का अत्यन्त प्रामाणिक एवं विस्तृत सार संग्रह ‘फतवा-ए-आलमगीरी’ के नाम से जाना जाता है, जिसे औरंगज़ेब के आदेश से धर्माचार्यों के एक समूह ने तैयार किया था।

संस्कृत साहित्य ( Mughal period Sanskrit literature )

मुग़ल काल में संस्कृत का विकास बाधित रहा। अकबर के समय में लिखे गये महत्त्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ थे- महेश ठाकुर द्वारा रचित ‘अकबरकालीन इतिहास’, पद्म सुन्दर द्वारा रचित ‘अकबरशाही शृंगार-दर्पण’, जैन आचार्य सिद्ध चन्द्र उपाध्याय द्वारा रचित ‘भानुचन्द्र चरित्र’, देव विमल का ‘हीरा सुभाग्यम’, ‘कृपा कोश’ आदि।

अकबर के समय में ही ‘पारसी प्रकाश’ नामक प्रथम संस्कृत-फ़ारसी शब्द कोष की रचना की गई। शाहजहाँ के समय में कवीन्द्र आचार्य सरस्वती एवं जगन्नाथ पंडित को दरबार में आश्रय मिला हुआ था। पंडित जगन्नाथ ने ‘रस-गंगाधर’ एवं ‘गंगालहरी’ की रचना की। पंडित जगन्नाथ शाहजहाँ के दरबारी कवि थे।

जहाँगीर ने ‘चित्र मीमांसा खंडन’ (अलंकार शास्त्र पर ग्रंथ) एवं ‘आसफ़ विजय’ (नूरजहाँ के भाई आसफ़ ख़ाँ की स्तुति) के रचयिता जगन्नाथ को ‘पंडिताराज’ की उपाधि से सम्मानित किया था। वंशीधर मिश्र और हरिनारायण मिश्र वाले संस्कृत ग्रंथ हैं- रघुनाथ रचित ‘मुहूर्तमाला’, जो कि मुहूर्त संबंधी ग्रंथ है और चतुर्भुज का ‘रसकल्पद्रम’ जो औरंगज़ेब के चाचा शाइस्ता ख़ाँ को समर्पित है

हिन्दी साहित्य  ( Mughal period Hindi literature )

बाबर, हुमायूँ और शेरशाह के समय में हिन्दी को राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ, किन्तु व्यक्तिगत प्रयासों से ‘पद्मावत’ जैसे श्रेष्ठ ग्रन्थ की रचना हुई। मुग़ल सम्राट अकबर ने हिन्दी साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। मुग़ल दरबार से सम्बन्धित हिन्दी के प्रसिद्ध कवि राजा बीरबल, मानसिंह, भगवानदास, नरहरि, हरिनाथ आदि थे।

व्यक्त्गित प्रयासों से हिन्दी साहित्य को मज़बूती प्रदान करने वाले कवियों में महत्त्वपूर्ण थे- नन्ददास, विट्ठलदास, परमानन्द दास, कुम्भन दास आदि। तुलसीदास एवं सूरदास मुग़ल काल के दो ऐसे विद्वान् थे, जो अपनी कृतियों से हिन्दी साहित्य के इतिहास में अमर हो गये। अर्ब्दुरहमान ख़ानख़ाना और रसखान को भी इनकी हिन्दी की रचनाओं के कारण याद किया जाता है।

इन सबके महत्त्वपूर्ण योगदान से ही ‘अकबर के काल को हिन्दी साहित्य का स्वर्ण काल’ कहा गया है। अकबर ने बीरबल को ‘कविप्रिय’ एवं नरहरि को ‘महापात्र’ की उपाधि प्रदान की। जहाँगीर का भाई दानियाल हिन्दी में कविता करता था।

शाहजहाँ के समय में सुन्दर कविराय ने ‘सुन्दर शृंगार’, ‘सेनापति ने ‘कवित्त रत्नाकर’, कवीन्द्र आचार्य ने ‘कवीन्द्र कल्पतरु’ की रचना की। इस समय के कुछ अन्य महान् कवियों का सम्बन्ध क्षेत्रीय राजाओं से था, जैसे- बिहारी महाराजा जयसिंह से, केशवदास ओरछा से सम्बन्धित थे। केशवदास ने ‘कविप्रिया’, ‘रसिकप्रिया’ एवं ‘अलंकार मंजरी’ जैसी महत्त्वपूर्ण रचनायें की।

अकबर के दरबार में प्रसिद्ध ग्रंथकर्ता कश्मीर के मुहम्मद हुसैन को ‘जरी कलम’ की उपाधि दी गई। बंगाल के प्रसिद्ध कवि मुकुन्दराय चक्रवर्ती को प्रोफ़ेसर कॉवेल ने ‘बंगाल का क्रैब’ कहा है।

उर्दू साहित्य ( Mughal period Urdu literature )

उर्दू का जन्म दिल्ली सल्तनत काल में हुआ। इस भाषा ने उत्तर मुग़लकालीन बादशाहों के समय में भाषा के रूप में महत्व प्राप्त किया। प्रारम्भ में उर्दू को ‘जबान-ए-हिन्दवी’ कहा गया। अमीर ख़ुसरो प्रथम विद्वान् कवि था, जिसने उर्दू भाषा को अपनी कविता का माध्यम बनाया।

मुग़ल बादशाहों में मुहम्मद शाह (1719-1748 ई.) प्रथम बादशाह था, जिसने उर्दू भाषा के विकास के लिए दक्षिण के कवि शम्सुद्दीन वली को अपने दरबार में बुलाकर सम्मानित किया। वली दकनी को उर्दू पद्य साहितय का जन्मदाता कहा जाता है। कालान्तर में उर्दू को ‘रेख्ता’ भी कहा गया। रेख्ता में गेसूदराज द्वारा लिखित पुस्तक ‘मिरातुल आशरीन’ सर्वाधिक प्राचीन है।

ललित कला ( Fine arts ):

भारत मे चित्रकला के विकास के लिए मुगल काल को स्वर्णिम दौर माना गया। कला सिखाने के लिए भिन्न प्रकार के स्कूल इस प्रकार थे:

प्राचीन परंपरा के विद्यालय ( School of Ancient Traditions ): भारत मे चित्रकला की प्राचीन शैली सल्तनत काल से पहले समृद्ध हुई थी । लेकिन आठवीं शताब्दी के बाद इस परंपरा का पतन होने लगा था लेकिन तेरहवीं शताब्दी मे ताड़ के पत्तों पर पांडुलिपियों एवं जैन ग्रन्थों के चित्रण से यह प्रतीत होता है कि परंपरा पूर्णतया समाप्त नही हुई थी।

मुगल चित्रकला ( Mughal painting ):मुगल शासन काल के दौरान अकबर के द्वारा विकसित विद्यालय, उत्पादन के केंद्र की तरह थे।

यूरोपीय चित्रकला ( European painting ): अकबर के दरबार मे पुर्तगाली पादरी ने यूरोपियन चित्रकला का प्रारम्भ किया।

राजस्थान चित्रकला विद्यालय: इस प्रकार के चित्रकला मे वर्तमान विचारों एवं पश्चिमी भारत के पूर्व परम्पराओं एवं मुगल चित्रकला की भिन्न भिन्न शैली के साथ जैन चित्रकला विद्यालय का संयोजन शामिल है।

पहाड़ी चित्रकला विद्यालय: इस विद्यालय ने राजस्थान चित्रकला की शैली को बनाए रखा और इसके विकास मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

P K Nagauri , Naveen Kumar 

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