किसी देश की अर्थव्यवस्था द्वारा एक वर्ष की अवधि में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के शुद्ध मूल्य के योग को राष्ट्रीय आय कहते हैं।राष्ट्रीय आय में नागरिकों द्वारा विदेशों में अर्जित किए गए आय को गिना जाता है किंतु देश के अंदर विदेशी नागरिकों द्वारा अर्जित किए गए आय को शामिल नहीं किया जाता।

भारत में सबसे पहले राष्ट्रीय आय का अनुमान दादा भाई नौरोजी ने लगाया। उनके आकलन के अनुसार 1867-68 में देश में प्रति व्यक्ति आय 20 रुपए थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाने के लिए 1949 में राष्ट्रीय आय समिति का गठन किया गया। पी सी महालनोविस को राष्ट्रीय आय समिति का अध्यक्ष बनाया गया। भारत में राष्ट्रीय आय के संदर्भ में हिंदू विकास दर की अवधारणा प्रो राज कृष्ण द्वारा प्रस्तुत की गई।

राष्ट्रीय आय को चार तरीकों से दर्शाया जाता है- GDP, NDP, GNP, NNP.

सकल घरेलू उत्पाद ( GDP ): एक निश्चित भौगोलिक सीमा के भीतर एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। सकल घरेलू उत्पाद में देश में निवासरत विदेशी नागरिकों की आय की भी गणना होती है लेकिन देश के नागरिक विदेशों में जो आय अर्जित करते हैं उनको शामिल नहीं किया जाता।

शुद्ध घरेलू उत्पादन (Net Domestic Product – NDP): किसी देश की अर्थव्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद में से मूल्य ह्रास को घटाने पर जो शेष बचता है,वह शुद्ध घरेलू उत्पाद कहलाता है।

NDP = GDP – मूल्यह्रास।

सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Product – GNP): नागरिकों द्वारा एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को कहते हैं।

GNP=GDP+विदेशों में नागरिकों की आय – देश में विदेशी नागरिकों की आय।

शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद ( Net National Product – NNP): किसी देश की अर्थव्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में से मूल्य ह्रास को घटाने पर जो शेष बचता है उसे शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद कहा जाता है।

NNP=GNP – मूल्य ह्रास।

सकल राष्ट्रीय उत्पाद – मूल्यह्रास = शुद्ध राष्ट्रीयउत्पाद।

राष्ट्रीय आय ( National Income -NI ): जब शुद्ध राष्ट्रीय आय (NNP) का अनुमान साधन लागत के आधार पर लगाया जाता है, तो वह राष्ट्रीय आय होती है। यदि बाजार कीमत पर मूल्यांकन किया जाय तो, राष्ट्रीय आय = शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद – अप्रत्यक्ष कर + सब्सिडी।

प्रति व्यक्ति आय ( Per Capita Income, PCI ) = राष्ट्रीय आय ÷ राष्ट्र की कुल जनसंख्या।

जब प्रति व्यक्ति आय की गणना वर्तमान वर्ष के संदर्भ में किया जाता है तो उसे चालू मूल्य के आधार पर प्रति व्यक्ति आय कहते हैं। स्थिर मूल्य पर प्रति व्यक्ति आय की गणना दिए हुए आधार वर्ष के संदर्भ में किया जाता है। वर्तमान में आधार वर्ष 2004-05 से आगे करके 2011-12 किया गया है।

भारत में राष्ट्रीय आय की गणना वित्त वर्ष 1अप्रैल से 31 मार्च की अवधि के दौरान किया जाता है। भारत में राष्ट्रीय आय की गणना केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) द्वारा किया जाता है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन का गठन 02,मई 1951 में हुआ। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में तथा उप मुख्यालय कोलकाता में है।

भारत में राष्ट्रीय आय में तृतीयक क्षेत्र का योगदान अधिकतम है, इसके बाद क्रमशः द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र का स्थान है। भारत विश्व में एक मुख्य आर्थिक शक्ति बनने की ओर है। क्रय शक्ति के आधार पर भारत का अमेरिका और चीन के बाद तीसरा स्थान है। GDP के अनुसार भारत अर्थव्यवस्था विश्व का सातवां बड़ा अर्थव्यवस्था है।

1. आर्थिक संवृद्धि ( Economic growth )

आर्थिक संवृद्धि का सम्बन्ध मात्रात्मक वृद्धि से है किसी देश की अर्थव्यवस्था में किसी समयावधि में होने वाली उत्पादन क्षमता और वास्तविक आय की वृद्धि आर्थिक संवृद्धि कहलाती है मतलब किसी अर्थव्यवस्था में सकल राष्ट्रीय उत्पाद, सकल घरेलु उत्पादएव प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि।

आर्थिक विकास ( Economic Development )

देश, किसी स्थान, व्यक्ति समूह की आर्थिक संवृद्धि में वृद्धि कोआर्थिक विकास कहा जाता है आर्थिक विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक राष्ट्रीय आय में दीर्घकालिक वृद्धि होती है

आर्थिक संवृद्धि दर ( Economic growth rate )

  • निबल राष्ट्रीय उत्पाद में परिवर्तन की दर ‘ आर्थिक संवृद्धि दर ‘ कहलाती है।
  • आर्थिक संवृद्धि दर = गत वर्ष की तुलना में वर्तमान वर्ष के NNP में परिवर्तन वृद्धि या कमी / गत बर्ष का NNP ❌ 100
  • भारत जैसे विकासशील देशों में आर्थिक संवृद्धि दर , आर्थिक विकास दर की तुलना में कम होती हैं

आर्थिक विकास दर ( Economic growth rate )

  • आर्थिक विकास दर = गत वर्ष की तुलना में वर्तमान वर्ष के GDP में परिवर्तन (वृद्धि / कमी) / गत वर्ष का GDP ❌ 100

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य 

  • आर्थिक संवृद्धि एक सामान्य प्रक्रिया है परंतु आर्थिक विकास के लिए विशेष प्रयत्न की आवश्यकता होती है।
  • आर्थिक संवृद्धि एक स्थैतिक साम्य है जबकि आर्थिक विकास एक प्रावैगिक साम्य।
  • आर्थिक संवृद्धि विकसित देशों की समस्या है जबकि आर्थिक विकास अल्पविकसित देशों की समस्या है।
  • आर्थिक संवृद्धि बिना आर्थिक विकास के संभव है परंतु आर्थिक विकास बिना आर्थिक संवृद्धि के संभव नहीं।

आर्थिक संवृद्धि तथा आर्थिक विकास को एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है

दो भाई रोजगार की तलाश में A दुबई तथा एक B अमेरिका जाता है। दोनों पाँच वर्ष बाद भारत लौटतें है। A खूब अच्छा मकान बनवाता है, गले में मोटी सोने की माला तथा ट्रैक्टर-टाली ले लेता है, जमीन खरीदता है, अपने बच्चों को भी उसी रोजगार में लगा देता है। B भी बहुत अच्छा मकान बनवाता है, जमीन, कार, टी.वी. फ्रीज आदि लेता है, समाचार पत्रों को पढना शुरू कर देता है, विशेष प्रयासों से तकनीकी ज्ञान सीखकर वर्कशॉप खोलता है, अपने बच्चों को अच्छे शिक्षण संस्थानों में पढाना शुरू करता है तो A की आर्थिक संवृद्धि हुई तथा B का आर्थिक विकास हुआ ।

2. राष्ट्रीय आय व 2017-18 के आंकडे ( National Income and Statistics of 2017-18 )

1- मार्शल के अनुसार, “किसी देश का श्रम और पूंजी उसके प्राकृतिक साधानों पर कार्यशील होकर प्रतिवर्ष भौतिक और अभौतिक वस्तुओं का निश्चित वास्तविक उत्पादन करते है जिंसमे सब प्रकार की सेवाएं भी शामिल रहती है। इसे ही देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय कहते है।

परिभाषा की विशेषताएं –

राष्ट्रीय आय की गणना का आधार एक वर्ष है। मार्शल ने राष्ट्रीय आय में विदेशो से अर्जित आय को भी शामिल किया है। राष्ट्रीय आय की गणना कुल उत्पादन के आधार पर न करके “शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन” के आधार पर की है।

2- प्रो. पीगू के अनुसार, “राष्ट्रीय आय समाज की वस्तुगत आय का वह भाग है, जिसे मुद्रा में मापा जा सकता है एवमजिंसमे विदेशो से प्राप्त आय भी शामिल होती है। “पिगू की परिभाषा की विशेषताए – मुद्रा को मूल्यांकन का आधार बनाकर पीगू ने अपनी परिभाषा को सरल एवमं स्पष्ट बना दिया है। राष्ट्रीय आय में विदेशो से प्राप्त आय भी शामिल है।

3 – प्रो. साइमन कुजनेट्स,“राष्ट्रीय आय वस्तुओं और सेवाओं का वह वास्तविक उत्पादन है जो एक वर्ष की अवधि में देश की उत्पादन प्रणाली से अंतिम उपभोक्ताओं के हाथों में पहुँचता है।

4 – प्रो. कोलिन क्लार्क, “किसी विशेषअवधि में राष्ट्रीय अस्य को उन वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्यमे व्यक्त किया जाता है जो उस विशेष अवधि में उपभोग के लिए उपलब्ध होती है। वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य उनके प्रचलित विक्रय मूल्य पर निकलता है।

राष्ट्रीय आय के तीन दृष्टिकोण ( National income approach )

उत्पादन इकार्इयो का औद्योगिक वर्गीकरण-

  • क.प्राथमिक क्षेत्र
  • ख. द्वितीयक क्षेत्र
  • ग. तृतीयक क्षेत्र

राष्ट्रीय आय मापने की विधियॉ

1. उत्पादन विधि ‘‘ मूल्य वृद्धि विधि

2. आय वितरण विधि

3. अंतिम व्यय विधि:- विधिराष्ट्रीय आय देश के निवासियों को प्राप्त उन साधन आयो का योग है जो उन्हे देश के आर्थिक क्षेत्र के अंदर और बाहर उत्पादन कार्यों के लिए एक वर्ष में प्राप्त होती है ये साधन आय कर्मचारियों पारिश्रमिक, किराया, ब्याज, व लाभ के रूप में होती है राष्ट्रीय आय तीन दृष्टि कोणों से देखी जा सकती है

  • क. मूल्य वृद्धि दृष्टि कोण
  • ख. आय वितरण दृष्टि कोण
  • ग. अंतिम व्यय दृष्टिकोण उपरोक्त परिभाषा आय वितरण दृष्टि कोण के अनुसार है मूल्य वृद्धि
  • द. दृष्टिकोण के अनुसार राष्ट्रीय आय देश के आर्थिक क्षेत्र के अंदर स्थित सभी उत्पादन इकाइयों चाहे स्वामी निवासी हो या अनिवासी द्वारा साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि और विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय का योग हैअत: राष्ट्रीय आय = उत्पादन र्इकाइयों द्वारा साधन लागत पर शुद्धमूल्य वृद्धि + विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आयअंतिम व्यय दृष्टिकोण के अनुसार राष्ट्रीय आय उपभोग और निवेश पर होने वाले अंतिम व्यय में से स्थिर पूंजी का उपभोग व अप्रत्यक्ष कर घटाने आर्थिक सहायता व विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय जोड़ने पर ज्ञात होती है।

राष्ट्रीय आय ( National income )

देश के आर्थिक क्षेत्र के अंदर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं पर होने वालाअंतिम व्यय- स्थिर पूंजी का उपभोग- अप्रत्यक्ष कर +आर्थिक सहायता + विदेशो से प्राप्त शुद्ध साधन आयराष्ट्रीय आय के तीन दृष्टिकोण -उत्पादन इकार्इया वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करता है।

इसके लिये वे श्रम, भूमि, पूंजी और साहस के साहस के स्वामीयों की सेवाएॅ प्राप्त करती है। जब ये उत्पाद के साधन मिलकर उत्पादन करते है तो मूल्य वृद्धि के रूप में आय उत्पन्न होती है राष्ट्रीय आय का यह प्रथम दृष्टिकोण है.

इस दृष्टिकोण से आय का माप मूल्य वृद्धि या उत्पादन विधि द्वारा माप कहलाता है. उत्पादन इकार्इयों में उत्पन्न आय साधन स्वामित्वों को कर्मचारियों का पारिश्रमिक, किराया, ब्याज और लाभ के रूप में बाटी जाती है. इन सभी साधन आयों का योग घरेलू आय कहलाता है.

आय वितरण विधि के रूप में यह राष्ट्रीय आय को दूसरा दृष्टिकोण है साधनों के स्वामी प्राप्त आयों को उपभेाग और निवेश हेतु उत्पादन इकार्इयों से वस्तुएं व सेवाएँ खरीदने के लिए व्यय करते है  इन अंतिम व्ययों के योग के रूप में राष्ट्रीय आय का माप तीसरा दृष्टिकोण है। दूसरे शब्दों में राष्ट्रीय आय तीन प्रकार से मापी जा सकती है

जब यह उत्पन्न होती है उत्पादन विधि,जब यह बाटी जातीहै आय वितरण विधि और जब यह उपभोग ओर निवेश पर व्यय की जाती है अंतिम व्यय निधि कहते है चाहे हम किसी भी विधि आय मापे हमें सबसे पहले देश के आर्थिक क्षेत्र में स्थित उत्पादन इकार्इयों का विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में वर्गीकरण आवश्यक होता है।

उत्पादन इकार्इयो का औद्योगिक वर्गीकरण ( Industrial classification of production units )

देश के आर्थिक क्षेत्र के अंदर स्थित सभी उत्पादन इकार्इयों को सर्वप्रथम एक समान वर्गो में बांटा जाता है देश की समस्त उत्पादन गतिविधियों को तीन विस्ततृ वर्गो प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्रों में बांटा जाता है इस क्षेत्र का विकास मुख्यतया प्राथमिक तथा द्वितीयक क्षेत्रों में विकास पर निर्भर होता है इसलिए इस तीसरे महत्व का क्षेत्र माना जाता है.भारतीय अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित क्षेत्रों और उपक्षेत्रों में बांटा गया है

क. प्राथमिक क्षेत्र –

  • 1.कृषि
  • 2.वानिकी एवं लठ्ठा बनाना
  • 3.मत्स्यन
  • 4.खनन एवं उत्खननख

द्वितीयक क्षेत्र-

  • 1.पंजीकृत विनिर्माण
  • 2.अपंजीकृत विनिर्माण
  • 3.विद्युत, गैस एवं जल आपूर्ति
  • 4.निर्माण

ग तृतीयक क्षेत्र-

  • 1.व्यापार, होटल एवं जलपान गृह
  • 2.परिवहन, भंडारण एवं संचार
    3.बैकिंग एवं बीमा
  • 4.स्थावर संपदा, आवासों का स्वामित्व एवं व्यवसायिक सेवाए
  • 5.लोक प्रसाधन एवं रक्षा
  • 6.अन्य सेवाए

राष्ट्रीय आय मापने की विधियॉ – राष्ट्रीय आय मापने की विधियॉ है ये विधियॉ निम्नलिखित है।

1. उत्पादन विधि ( Production method ) ‘‘ मूल्य वृद्धि विधि ‘‘ :-

इस विधि में मूल्य वृद्धि दृष्टिकोण से राष्ट्रीय आय मापी जाती है. इस विधि द्वारा राष्ट्रीय आय मापने के नि.लि. चरण है-

देश के आर्थिक क्षेत्र में स्थित उत्पादन इकार्इयों को औद्योगिक वर्गो में बॉटना जैसे – कृषि खनन, विनिर्माण, बैकिंग, व्यापार आदि निम्नलिखित चरणों में प्रत्येक औद्योगिक क्षेत्रों की साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि का अनुमान लगाना.

  • 1.उत्पादन के मूल्य का अनुमान लगाना
  • 2.मध्यवर्ती उपभोग के मूल्य का अनुमान लगाना और इसे उत्पादन मूल्य में से घटाकर बाजार कीमतपर सकल मूल्य वृद्धि ज्ञात करना
  • 3.बाजार कीमत पर सकल मूल्य वृद्धि मे से स्थिर पूंजी का उपभोग व अप्रत्यक्ष कर घटाकर और आर्थिक सहायता जोडकर साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि ज्ञात करना संक्षेप में – उत्पादन का मूल्य-मध्यवर्ती उत्पाद का मूल्य=बाजार कीमत पर सकल मूल्य वृद्धि बाजार कीमत पर सकल मूल्य वृद्धि-स्थिर पूंजी का उपभोग- शुद्ध अप्रत्यक्ष कर= साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि

सभी औद्योगिक क्षेत्रों की साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि को जोडकर साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद ज्ञात करना, साधन लागत पर शुद्ध घरेलु उत्पाद में विदेशो से प्राप्त शुद्ध साधन आय जोडकर राष्ट्रीय आय ज्ञात करना

सावधानियॉं :-

उत्पादन विधि द्वारा राष्ट्रीय आय मापने में निम्नलिखित सावधानियॉं रखना आवश्यक है।

1.उत्पादन की दोहरी गणना से बचे :- इसके लिए कुल उत्पादन का मूल्य लेने के बजाय प्रत्येक उत्पादन इकाइ्र की केवल शुद्ध मूल्य वृद्धि ही लें इस प्रकार राष्ट्रीय आय के मापन में दोहरी गणना के समस्या से बचा जा सकता है।

2.स्वय उपभोग के लिए किया गया उत्पादन- जिसकी कीमत लगायी जा सकती हो उत्पादन में अवश्य शामिलकिया जाना चाहिए इससे राष्ट्रीय आय का सही अनुमान लगेगा उदाहरण के लिए, यदि एक परिवार गेंहू का उत्पादन करता है और उसका एक भाग परिवार की आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए रख लेता है तो इस स्वयं उपभोग के लिए रखे गये उत्पादन का मूल्य उत्पादन मे अवश्य शामिल किया जाना चाहिए।

3.पुरानी वस्तुओ का विक्रय- चालू उत्पादन में शामिल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इनका मूल्य पहले ही उत्पादन में शामिल किया जा चुका है लेकिन इस विक्रय के पीछे जो सेवाएॅं है उनका मूल्य इसमें अवश्य शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि इनका उत्पादन नया है मान लिजिए आप एक पुरानी सार्इकल बेचते है इस सार्इकल का मूल्य उत्पादन मूल्य में शामिल नहीं किया जायेगा क्योंकि इसे उत्पादन में तब शामिल कर लिया गया था जब नर्इ सार्इकिल बेची गर्इ थी।

2. आय वितरण विधि ( Income distribution method ):-

इस विधि में राष्ट्रीय आय उस समय मापीजाती है जब उत्पादन र्इकार्इयॉं आय को साधन के स्वामीयों में बाटती है इसके मापने के निम्नलिखित चरण हैं

उत्पादन इकार्इयों का औद्योगिक क्षेत्रो में वर्गीकण करें जैसे कृषि, वानिकी, विनिर्माण, बैकिग व्यापार आदि। प्रत्येक औद्योगिक क्षेत्र द्वारा भुगतान की गर्इ निम्नलिखित साधन आयो का अनुमान लगाये।

  1. कर्मचारियों का पारिश्रमिक
  2. किराया,
  3. ब्याज,
  4. लाभ एक औधोगिक वर्ग द्वारा भुगतान की गर्इ साधन आयो का योग उस क्षेत्र द्वारा साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि केसमान होता है।

साधन लागत पर शुद्ध घरेलु उत्पाद ज्ञात करने के लिए सभी औधोगिक क्षेत्रो द्वारा भुगतान की गर्इ साधन आयों को जोडे। साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद ज्ञात करने के लिए साधन लागत पर श्शुद्ध घरेलु उतपाद में विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय जोड़ें

सावधानियॉं –

आय वितरण विधि द्वारा राष्ट्रीय आय मापने में निम्नलिखित सावधानियॉं रखना आवश्यक है।

1.कर्मचारियों के पारिश्रमिक का अनुमान लगाते समय कर्मचारियों कोमिलने वाली नगद मजदूरी के अलावा सुविधाओं के रूप में मिलने वाली सभी लाभ शामिल करने चाहिए कर्मचारियों को मिलने वाला केवल नगद भुगतान ही शामिल नहीं करना चाहिए

2.ब्याज का अनुमान लगाते समय केवल उत्पादन के लिए दिये गये ऋण पर मिलने वाले ब्याज ही शामिल किया जाना चाहिए उपभोग के लिए ऋण पर दिये जाने वाला ब्याज गैर साधन आय है अत: यह राष्ट्रीय में शामिलनहीं होता।

3.उपहार, दान, कर, जुर्माना, लाटरी आदि से आय साधन आय ना होकर हस्तांतरित आय है अत: इन्हें राष्ट्रीय आय के अनुमान में शामिल नहीं करते।

3. अंतिम व्यय विधि ( Last expense method ):-

राष्ट्रीय आय व्यय बिंदू पर भी मापी जा सकती है इस विधि में हम पहले बाजार कीमत पर सकल घरेलु उत्पाद मानते है जोकि उपभोग और निवेश हेतु अंतिम उत्पादो पर होने वाला व्यय है इसमें से हम स्थिर पूंजी का उपभोग और शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाकर और विदेशो से प्राप्त शुद्ध साधन आय जोड़कर राष्ट्रीय आय प्राप्त करते हैं।उपभोग उपभोग पर अंतिम व्यय का वर्गीकरण –

  • परिवार उपभोग व्यय
  • सामान्य सरकार उपभोग व्यय में किया जाता हैं

निवेश व्यय दो वर्गो में बाटा जाता है-1.आर्थिक क्षेत्र के अंदर निवेश 2.आर्थिक क्षेत्र के बाहर निवेश इस विधि के निम्नलिखित चरण है

अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के अंतिम उत्पादों पर होने वाले निम्नलिखित व्ययों का अनुमान लगाये :-

  1. निजी अंतिम उपभोग व्यय
  2. सरकारी अंतिम उपभोग व्यय
  3. सकल घरेलु पूंंजी निर्माण
  4. शुद्ध निर्यात

उपरोक्त सभी क्षेत्रों के अंतिम उत्पादों पर होने वाले व्ययों को जोड़ने से हमें बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद ज्ञात होता है

बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद में से स्थिर पूंजी का उपभोग और अप्रत्यक्ष कर घटाकर तथा आर्थिक सहायता जोड़कर साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद ज्ञात होता है

साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद = बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद – स्थिर पूंजी का उपभोग – अप्रत्यक्ष कर+ आर्थिक सहायता.

साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद में विदेशो से प्राप्त शुद्ध साधन आय जोडने पर साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद ज्ञात होता है

साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद=साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय

सावधानियॉं :-

व्यय विधि द्वारा राष्ट्रीय आय मापने में निम्नलिखित सावधानियॉं रखना आवश्यकता हैं :-

  1. मध्यवर्ती उत्पादों में होने वाले व्यय को शामिल न करें ताकि व्यय की दोहरी गणना से बचे केवल अंतिम उत्पादों पर होने वाले व्यय को शामिल करें
  2. उपहार, दान, कर, छात्रवृित्त्ा आदि के रूप में होने वाला व्यय अंतिम उत्पादों पर होने वाला व्यय नहीं है ये हस्तांतरणीय व्यय है जिन्हें राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करना चाहिए
  3. पुरानी वस्तुओं के खरीदने पर होने वाला व्यय शामिल नहीं करना चाहिए क्योंकि जब ये वस्तुएं पहली बार खरीदी गर्इ इन पर किया गया शामिल हो चुका था

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

श्रवण कुमार सहारण, प्रभुदयाल मूण्ड चूरु, SM_Mokharia

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