अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विद्वानों ने राष्ट्रीय शक्ति को राष्ट्र का केन्द्र-बिन्दु माना है जिसके चारों ओर उसकी विदेश नीति के विभिन्न पहलू चक्कर काटते रहते हैं ।

 मॉरगेन्थाऊ के अनुसार- “राष्ट्रीय शक्ति राष्ट्र की वह शक्ति है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति दूसरे राष्ट्रों के कार्यों, व्यवहारों और नीतियों पर प्रभाव तथा नियन्त्रण रखने की चेष्टा करता है।”

यह राष्ट्र की वह क्षमता है, जिसके बल पर वह दूसरे राष्ट्रों से अपनी इच्छा के अनुरूप कोई कार्य करा लेता है ।

पेडंलफोर्ड तथा लिंकन के अनुसार, “यह शब्द (राष्ट्रीय शक्ति शब्द) राष्ट्रीय शक्ति की भौतिक और सैनिक शक्ति तथा सामर्थ्य का सूचक है….राष्ट्रीय शक्ति को हम शक्ति एवं सामर्थ्य का वह योग मान सकते हैं जो एक राज्य अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए तथा राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उपयोग में लाता है ।”

हार्टमैन के शब्दों में- “राष्ट्रीय शक्ति में यह बोध होता है कि, अमुक राष्ट्र कितना शक्तिशाली अथवा निर्बल है या अपने राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति करने की दृष्टि से उसमें कितनी क्षमता है ।”

 आर्गेन्स्की लिखते हैं कि “अपने हितों के अनुकूल दूसरे राष्ट्रों के व्यवहार को प्रभावित करने की योग्यता का नाम शक्ति है । जब तक कोई राष्ट्र यह नहीं कर सकता, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, चाहे वह कितना ही सम्पन्न क्यों न हो, परन्तु उसे शक्तिशाली नहीं कहा जा सकता है।”

जार्ज श्वर्जनबर्जर ने शक्ति को अपनी इच्छा का दूसरों पर आरोपीकरण तथा अपालन की स्थिति में प्रभावकारी अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की क्षमता कहा है ।

हॉस के शब्दों में-“शक्ति वह बल है जो राष्ट्र अपने हित की पूर्ति के लिए दूसरे राष्ट्र पर डालता है ।”

 

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हरेन्द्र सिंह, इंद्रा, नरेश अखावत, Arjun kota, नवीन कुमार, झुन्झुनू

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