20 वी शताब्दी में बहुलवाद का उदय सम्प्रभुता के एकलवादी सिद्धान्त के विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप हुआ। बहुलवाद एक प्रतिकियास्वरूप सिद्धान्त है। बहुलवाद वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार समाज मे आज्ञापालन कराने की शक्ति एक ही जगह केंद्रित नही होती,बल्कि वह अनेक समूहों में बिखर जाती है।ये समूह मानव की भिन्न भिन्न आवश्यकताए पूरी करने का दावा करते हैं।

बहुलवाद को विचारधारा के रूप में स्थापित करने का श्रेय जर्मन समाजशास्त्री गीयर्क तथा बिर्टिश विद्वान मेटलेंड को है, जिन्हें आधुनिक राजनीतिक बहुलवाद का जनक कहा जाता है।

सम्प्रभुता के बहुलवादी सिद्धान्त के मुख्य समर्थक लास्की, बार्कर, लिंडसे, क्रेब, डीगवी, मिस फॉलेट आदि है।

बहुलवाद इस तथ्य में विश्वास करता है कि मनुष्य के सर्वागीण विकास में सामाजिक स्तर पर विकसित अनेक प्रकार के संघो का अपना विशेष योगदान होता है।ये संघ समान रूप से प्रभावशाली तथा एक दूसरे से स्वतंत्र होते है तथा इनमे कोई भी संघ दूसरों से अधिक महत्वपूर्ण या सर्वोच्च नही होता ।बहुलवादी राज्य को भी अन्य सामाजिक संघो की तरह एक संघ मानते है।

लास्की के शब्दों में- चूँकि समाज का स्वरूप संघीय है, अतः सत्ता का स्वरूप भी संघीय होना चाहिये

एक राजनीतिक मान्यता के रुप में:- समाज में किसी एक मूल्य,साध्य या ध्येय को सर्वोपरि मानकर सब मनुष्यों को उसके अनुरूप ढालने का प्रयत्न उचित नही है,बल्कि भिन्न-2 मूल्यों और हितों के आधार पर स्वायत्त समूहों के गठन की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिये और सब व्यक्तियों को अपने-2 विवेक के अनुसार इनमें से किसी भी मूल्य या ध्येय के साथ जुड़कर उसे बढावा देने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए । यह बहुलवाद का दार्शनिक आधार है ।

राजनीतिक बहुलवाद:- बहुलवाद समाज ऐसा समाज है जिसमें शक्ति एवं सत्ता एक ही जगह केन्द्रित नही होती है,बल्कि सामाजिक जीवन के अनेक केन्द्रों में फ़ैली हुई होती है ।

 

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