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Praja Mandal Movement Part 2

( राजस्थान में प्रजामण्डल आन्दोलन )

जैसलमेर प्रजामंडल ( Jaisalmer Praja Mandal )

यहां की राजतंत्र का सर्वप्रथम विरोध,यहां के व्यापारियों ने 1896 में किया था। 1920 से यहां राष्ट्रीय भावना अंकुरित होने लगी। 12 फरवरी 1920 को प्रवासी जैसलमेर वासियोंने कुछ अन्य जातियों के सहयोग से महारावल के समक्ष एक मांग पत्र प्रस्तुत किया। जैसलमेर में जन जागृति लाने का श्रेय सागरमल गोपा को दिया जाता है।

जैसलमेर में रघुनाथ सिह मेहता की अध्यक्षता में 1932 में माहेश्वरी युवक मंडल की स्थापना की गई।m 1937-38 में शिव शंकर गोपा ,मदन लाल पुरोहित, लाल चंद जोशी आदि ने लोक परिषदकी स्थापना का प्रयास किया। जिसका महारावल ने दमन कर दिया। महारावल के दमन नीति के कारण संस्थापकों को जैसलमेर छोड़ना पड़ा।

1940 में सागरमल गोपा ने जैसलमेर में गुंडा राज नामक पुस्तिका छपवाकर वितरित करवा दी थी। इस कारण उन्हें 6 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई।

3 अप्रैल 1946 को सागरमल गोपा पर तेल छिड़क कर जिंदा जला दिया गया था। 4 अप्रैल 1946 को सागरमल गोपा का देहांत हो गया। शहर में यह खबर फैला दी की गोंपा स्वयं ने अपने ऊपर तेल छिड़क कर आग लगा ली और आत्महत्या कर ली।

जनता की मांग के कारण गोपाल स्वरूप पाठक आयोग का गठन किया गया। आयोग द्वारा गोपा जी की मृत्यु को आत्महत्या करार दिया गया था

सागरमल गोपा की जेल में रहते हुए 15 दिसंबर 1945 को मीठालाल व्यास द्वारा जोधपुर में जैसलमेर राज्य प्रजा मंडल का गठन किया गया। जैसलमेर राज्य प्रजा मंडल की स्थापना की जिससे से जन आंदोलन को और प्रखर बना दिया।

अगस्त 1947 में जैसलमेर के राजकुमार गिरधारी सिंह ने महाराजा जोधपुर के साथ मिलकर जैसलमेर को पाकिस्तान में शामिल करने की योजना बनाई थी। लेकिन भारत सरकार के प्रयत्नों से इस योजना को सफल नहीं होने दिया गया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी महारावल का रूप राष्ट्रविरोधी ही रहा और पाकिस्तान में मिलने का विचारकरने लगा। इस प्रकार के उग्र वातावरण में जैसलमेर 30 मार्च 1949 को वृहत राजस्थानमें विलीन हो गया।

नोट – सागरमल गोपा ने “देश के दीवाने” ,”जैसलमेर में गुंडा राज” और “”रघुनाथ सिंह का मुकदमा”” पुस्तकें प्रकाशित करी थी

भरतपुर प्रजामण्डल ( Bharatpur Praja Mandal )

भरतपुर में स्वतंत्रता आंदोलन का श्रीगणेश जगन्नाथदास अधिकारी व गंगा प्रसाद शास्त्रीने किया था मेकेंजी कि दमनकारी नीति पुलिस अत्याचार एवं मौलिक अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंध के विरोध में 1928 में भरतपुर राज्य प्रजा संघकी स्थापना की गयी। 

1930 में जगन्नाथ कक्कड़ ,गोकुल वर्मा और मास्टर फकीरचंदआदि ने भरतपुर कांग्रेस मंडल की नींव डाली। जवाहर लाल नेहरू की प्रेरणा से सितंबर 1937में गोकुल चंद वर्मा, गोरी शंकर मित्तल आदि ने मिलकर भरतपुर कांग्रेस मंडल की स्थापना की। 

हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के पश्चात और भरतपुर राज्य के महाराजा की छत्रछाया में लोकतांत्रिक प्रशासन की स्थापना के उद्देश्य से 1938 में श्री किशन लाल जोशी गोपी लाल यादव मास्टर आदित्येंद्र और युगल किशोर चतुर्वेदी के प्रयासों से भरतपुर राज्य प्रजामंडलकी स्थापना की गई। 

गोपी लाल यादव को प्रजा मंडल का अध्यक्ष बनाया गया।  ठाकुर देशराज और पंडित रेवतीशरण शर्मा को उपाध्यक्ष बनाया गया।  किशन लाल जोशी को महामंत्री बनाया गया। भरतपुर प्रजामंडल को मान्यता नहीं मिलनेके कारण भरतपुर रियासत द्वारा इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। 

1939 में महाराजा ब्रजेंद्र सिंह के राजसिंहासन ग्रहण करने के बाद ही शीघ्र प्रजामंडल और राज्य सरकार के बीच समझौता हो गया। इस समझौते के तहत 25 अक्टूबर भरतपुर प्रजामंडल का पंजीकरण भरतपुर प्रजा परिषद के नाम से कर दिया गया भरतपुर प्रजा परिषद के अध्यक्ष मास्टर आदित्येंद्र को बनाया गया। 

भरतपुर प्रजा परिषद का प्रथम अधिवेशन 30 दिसंबर 1940 को जय नारायण व्यास की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। भरतपुर प्रजा परिषद का दूसरा अधिवेशन 23-24 मई 1945 को बयाना में हुआ। अंत में 1947के आंदोलन के बाद राज्य सरकार और प्रज्ञा परिषद में समझोता हो गया। 

3 अक्टूबर 1947 को भरतपुर के लक्ष्मण मंदिर पर आयोजित सभा में महाराजा ने लोकप्रिय मंत्रीमंडल बनाकर उसमें चार मंत्रियों को शामिल करने और 11 सदस्य की संविधान निर्मात्री समिति के गठन की घोषणा की। दिसंबर 1947 में भरतपुर में एक लोकप्रिय सरकारका गठन हुआ

दिसंबर 1947 को प्रजा परिषद के मास्टर आदित्येंद्र और गोपी लाल यादव को हिंदू महासभा के हरिदत्त शर्मा को और जमीदार किसान सभा के ठाकुर देशराज को मंत्रिमंडलमें शामिल किया गया 18 मार्च 1948 को भरतपुर का मत्स्य संघ में विलय हो गया। 

जुगल किशोर चतुर्वेदी “दूसरे जवाहर लाल नेहरु” के नाम से प्रसिद्ध है। गोकुल वर्मा को शेर – ए-भरतपुर कहा जाता है।

करौली प्रभामण्डल ( Karauli PrajaMandal )

अप्रैल 1939 में प्रजा मण्डल की स्थापना की गई। करौली में राजनीतिक जागृति की शुरुआत करौली राज्य सेवक संघ के माध्यम से हुई।संघ के अध्यक्ष मुंशी त्रिलोकचन्द माथुर ने सितम्बर 1938 में प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी, अजमेर की एक शाखा करौली में स्थापित की थी। 1946 में चर्खा संघ के कार्यकर्ता चिरंजीलाल शर्मा प्रजामण्डल के अध्यक्ष बने।

धौलपुर प्रजामण्डल ( Dholpur PrajaMandal )

श्री ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु और श्री जौहरीलाल इन्दु ने सन् 1934 में नागरिक प्रचारिणी सभा की स्थापना की। इसके अन्य कार्यकर्ता ओमप्रकाश वर्मा, रामदयाल, रामप्रसाद, बांकेलाल, केशवदेव, केदारनाथ आदि थे। 1936 ई. में धौलपुर में श्री कृष्ण दत्त पालीवाल के नेतृत्व में धौलपुर प्रजामण्डल की स्थापना की गई।

विशेषताएँ

तसीमों हत्याकांड – 11 अप्रैल , 1947

नायक

  • पहला शहीद- छतरसिंह परमार
  • दूसरा शहीद- ठाकुर पंचम् सिंह कुशवाहा (जो धौलपुर निवासी था)

आचार सुधारिणी सभा – धौलपुर में जन -जागृति का श्रेय यमुना प्रसाद वर्मा को दिया जाता है। धौलपुर में 1910 ई. में यमुना प्रसाद वर्मा द्वारा इस संगठन की स्थापना की गई।

झालावाड प्रजामण्डल ( Jhalwad PrajaMandal )

झालावाड़ में जन जागृति का कार्य श्याम शंकर ,अटल बिहारीके प्रयासों से प्रारंभ हुआ। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने 1919 में झालावाड़ में झालावाड़ सेवा समितिकी स्थापना की। मांगीलाल भव्य तनसुखलाल मित्तल मदन गोपाल जी रामनिवासआदि ने हाडोती मंडल की गतिविधियों को झालावाड़ में कुशलता से संचालन कर सार्वजनिक चेतना का कार्य किया।

25 नवंबर 1946 को झालावाड़ प्रजामंडल का गठन किया गया। झालावाड़ प्रजामंडल का गठन मांगीलाल भव्य ने मदन गोपाल ,कन्हैया लाल मित्तल, मकबूल आलम और रतन लाल के साथ मिलकर किया था।

मांगीलाल भव्य को झालावाड़ प्रजामंडल का अध्यक्षऔर मकबूल आलम को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया। इस प्रजामंडल को नरेश हरिश्चंद्र सिंह का सीधा समर्थन प्राप्त था।

अक्टूबर 1947 में नरेश हरिश्चंद्र ने सहर्ष लोकप्रिय मंत्री मंडल का गठन कर दिया। जो सरकार बनने पर प्रधानमंत्री बने थे। इस मंत्री मंडल में मांगीलाल भव्य और कन्हैया लाल को मंत्री बनाया गया। यह राजस्थान का अंतिम प्रजामंडल था।

यह एकमात्र प्रजामंडल था जिस से वहां के शासक नरेश हरिश्चंद्र का ( राज संरक्षण) समर्थन प्राप्त था।

अलवर प्रजामण्डल ( Alwar PrajaMandal )

अलवर में हरीनारायण शर्मा और कुंज बिहारी मोदी के रचनात्मक कार्यके द्वारा जनता में जागृति उत्पन्न करने का प्रयास किया गया। इन्होंने अलवर में अस्पृश्यता निवारण संघ ,वाल्मीकि संघ और आदिवासी संघ की स्थापना कर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की दशा सुधारने का प्रयास किया।

इसी समय अलवर सरकार ने बानसूर व थानागाजी तहसीलों में *लगान वृद्धिकर दी और  कई नए कर लगा दिए गए।

जब बानसूर व थानागाजी के किसानों ने कर देने से मना कर दिया तो राजा जयसिंह ने दोनों जगह सशत्र सैनिक भेज दिए। 14 मई 1925 को सैनिकों ने बिना पूर्व सूचना दिए गोलियां चला दी। परिणाम स्वरूप 15 व्यक्ति मारे गए और 250 घायल हो गए।

किसानो के क्रूर दमन से अलवर वासी अपनी सरकार से पहले ही नाराज थे। इस पर ब्रिटीश सरकार ने अलवर नरेश जयसिंह को 22 मई 1933 को अलवर से निकाल दिया था।

जेल से रिहा होते ही श्री कुंज बिहारी लाल मोदी और पंडित हरि नारायण शर्मा के प्रयत्नों से 1938 में अलवर प्रजामंडलकी स्थापना हुई। किंतु सरकार ने इस संस्था का पंजीकरण करना स्वीकार नहीं किया। 14 मई 1940 को उसके लिए पुन:प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया।

विवश होकर 1 अगस्त 1948 को सरकार ने इस प्रजामंडल का पंजीकरण किया। जनवरी 1944 में अलवर प्रजामंडल का पहला अधिवेशन श्री भवानी शंकर शर्मा की अध्यक्षतामें हुआ। इस सम्मेलन में सरकार की नीतियों की कटु आलोचना की गई और उत्तरदायी सरकार की मांग की गयी।

1946 में प्रजामंडल ने किसानों की मांगों का समर्थन करके उन्हें भू-स्वामित्व देने के प्रस्ताव का समर्थन किया था। 17 दिसंबर 1947 को महाराजा ने 2 वर्ष के भीतर राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करने की घोषणा की।

1 फरवरी 1948को भारत सरकार ने अलवर राज्य का शासन अपने हाथ में ले लिया। मार्च 1948 में मत्स्य संघ मैं अलवर के विलय के साथ ही राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। 

अलवर प्रजामंडल की स्थापना 1938में हुई थी।लेकिन इस का प्रथम अधिवेशन 1944 में हुआ था। प्रजामंडल की स्थापना हरि नारायण शर्मा और कुंज बिहारी मोदी द्वाराकी गई थी। लेकिन इस संस्था के रजिस्ट्रेशन के बाद सरदार नत्थूमल( नत्थामल) इसके अध्यक्ष बने थे।

डूंगरपुर प्रजामण्डल ( Dungarpur PrajaMandal )

डूंगरपुर में जन जागृति करने का श्रेय गुरु गोविंद गिरी को तत्पश्चात भोगीलाल पंड्या को है 1919 ईस्वी में भोगीलाल पंड्या ने “आदिवासी छात्रावास” की स्थापना कर जनचेतना फैलाने का प्रयास किया 1929 में गौरी शंकर उपाध्याय में “सेवाश्रम” स्थापित कर खादी प्रचार किया तथा वैचारिक क्रांति फैलाने के लिए हस्तलिखित “सेवक” समाचार पत्र प्रकाशित किया।

1935 ईस्वी में ठक्कर बापा की प्रेरणा से भोगीलाल पंड्या ने “हरिजन सेवा संघ” की स्थापना की। 1935 ईस्वी में ही शोभा लाल गुप्ता के नाम से आश्रम खोला माणिक्य लाल वर्मा ने 1935 ईस्वी में डूंगरपुर में “खांडलाई आश्रम” स्थापित कर भीलों में शिक्षा का प्रसार किया

1935 ईस्वी में माणिक्य लाल वर्मा, भोगीलाल पंड्या और गौरी शंकर उपाध्याय ने “बागड़ सेवा मंदिर” की स्थापना कर जनजागृति की 1938 ईस्वी में भोगीलाल पंड्या ने “डूंगरपुर सेवा संघ” की स्थापना कर जनजातियों में जन चेतना जारी रखी

26 जनवरी, 1944 ईस्वी को भोगीलाल पंड्या ने “डूंगरपुर प्रजामंडल” की स्थापना की। हरिदेव जोशी, गौरी शंकर उपाध्याय एवं शिवलाल कोटडिया इसके संस्थापक सदस्यों में से थे।

अप्रैल, 1946 में डूंगरपुर प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन भोगीलाल पण्ड्या के नेतृत्व में हुआ। जिसमे अन्य कार्यकर्ताओ के अलावा पंडित हीरालाल शास्त्री, मोहनलाल सुखाड़िया, और जुगल किशोर चतुर्वेदी ने भाग लिया।

20 जून, 1947 को सेवा संघ द्वारा संचालित रास्तापाल की पाठशाला के अध्यापक सेंगाभाई के साथ क्रूर व्यवहार किया गया और उसे बचाने आए पाठशाला के संरक्षक नाना भाई खांट और छात्रा भील बालिका काली बाई की गोली मारकर हत्या कर दी।

 दिसंबर, 1947 में महारावल डूंगरपुर ने राज्य प्रबंध कारिणी सभा की स्थापना की, जिसमे गौरी शंकर उपाध्याय व भीखा भाई को प्रजामण्डल प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित किया गया।

बांसवाडा प्रजामण्डल

बांसवाड़ा में हरिदेव जोशी मणिशंकर जानी, भूपेंद्र नाथ त्रिवेदी, लक्ष्मण दास, धूलजी भाई आदि द्वारा खादी प्रचार, हरिजनोद्धार,एवं भीलो की दशा सुधारने का कार्य किया गया। बांसवाड़ा में “चिमनलाल मालोत” द्वारा 1930 ईस्वी में “शांत सेवा कुटीर” की स्थापना की गई और “सूर्योदय पत्रिका” का प्रकाशन कर जन चेतना फैलाने का प्रयास किया गया।

भूपेंद्र नाथ त्रिवेदी ने धूल जी ,मोतीलाल जाड़िया, चिमनलाल, सिद्धि शंकर आदि के साथ मिलकर दिसंबर, 1946 ईस्वी में बांसवाड़ा प्रजामंडल की स्थापना की इसका अध्यक्ष विनोद चंद्र कोठारी को बनाया गया

धीरे-धीरे प्रजामंडल में आदिवासी भी सक्रिय भाग लेने लगे। इनमें प्रमुख थे चिप के दीला भगत, छोटी सरकरान के सेवा मछार, छोटी तेजपुर के दीपा भगत आदि प्रजामंडल के सहयोगी संगठनों के रूप में महिला मंडल, विद्यार्थी कांग्रेस और स्वयं सेवक दल का गठन किया गया-

फरवरी, 1946 के तीसरे सप्ताह में नगर से बाहर सभा का आयोजन किया गया, लोगों ने धारा 144 का उल्लंघन करते हुए, 24 फरवरी, 1946 को प्रधानमंत्री मोहन सिंह मेहता के बंगले को घेर लिया। उपयुक्त आंदोलन में महिला संगठन के नेतृत्व में स्त्रियों ने भी 144 धारा तोड़कर जुलूस निकाला

फरवरी 1947 में प्रजामंडल का अधिवेशन हुआ, जिसमें राज्य में उत्तरदाई शासन की स्थापना करने की मांग की गई,। महारावल में व्यवस्थापिका का चुनाव करवाकर मंत्रिमंडल का गठन किया

1948 ईस्वी में उपेंद्र त्रिवेदी के नेतृत्व में उत्तरदाई सरकार की स्थापना की गई। भूपेंद्र नाथ त्रिवेदी–मुख्यमंत्री, मोहनलाल त्रिवेदी–विकास मंत्री, नटवर लाल भट्ट—राजस्व मंत्री और चतर सिंह को जागीरदारों के प्रतिनिधि के रूप में लिया गया

परंतु यह मंत्रिमंडल 48 दिन तक ही कार्यरत रहा। राजस्थान के एकीकरण के समय, महारावल ने पुनः शक्ति प्राप्त करने का प्रयास किया, परंतु प्रजामंडल ने उसके प्रयास विफल कर दिए और बांसवाड़ा का राजस्थान संघ में विलय हो⚫

हाडोती प्रजामंडल 

हाडोती कोटा और बूंदी को सम्मिलित रूप से हाडोती बोला जाता है  परंतु सबसे पहले बूंदी में तत्पश्चात कोटा में प्रजामंडल का गठन हुआ

कोटा में

पंडित नैनू राम शर्मा ने इसकी स्थापना की इन्होंने बेकार विरोधी आंदोलन चलाया 1934 में हाडोती प्रजामंडल की स्थापना की  1939 ईस्वी में पंडित अभिन्नहरी के साथ मिलकर कोटा राज्य प्रजामंडल की स्थापना की

1941 में पंडित नैनू राम शर्मा की हत्या हो गई तब नेतृत्व अभिन्न हरि के पास आ गया तब उन्होंने 1 नवंबर 1941 में प्रजामंडल के दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता की 1942 में वह गिरफ्तार हो गए तब  1942 में प्रजामंडल के नए अध्यक्ष मोतीलाल चयन हुए

इन्होंने महारावल को पत्र भेजा और कहा कि आप ब्रिटिश सरकार से संबंध तोड़ ले उस समय किसानों और जनता में इतना आक्रोश था की प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने पुलिस को बैरकों में बंद कर के शहर कोतवाली पर कब्जा कर तिरंगा फहराया

करीब 2 सप्ताह तक कोटा के नगर प्रशासन पर जनता का कब्जा रहता है  ऐसा इतिहास दूसरी बार हुआ है की 2 दिन तक जनता ने प्रशासन को अपने हाथ में लिया पहली बार 1857 की क्रांति के दौरान हुआ

महारावल ने जब आश्वासन दिया कि सरकार दमन का सहारा नहीं लेगी गिरफ्तार किए गए कार्य करता रिहा कर दिये गए यद्यपि उत्तरदाई शासन का आश्वासन दिया गया परंतु कोई व्यवहारिक शासन नहीं हुआ

इस बीच स्वतंत्रता प्राप्त होने और संयुक्त राजस्थान बनने की प्रक्रिया शुरू होने से लोकप्रिय सरकार पद ग्रहण नहीं कर पाई

बूंदी जन आंदोलन

इसकी शुरुआत 1922 से मानी जाती है 1931 में बूंदी प्रजामंडल की स्थापना हुई स्थापना करने वाले कांतिलाल माने जाते हैं हालांकि इससे पहले पथिक और रामनारायण चौधरी ने वृद्धि और बेगार प्रथा के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया था  प्रजामंडल ने उत्तरदाई शासन की स्थापना और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग को बार-बार उठाया

बूंदी के राजा ने 1935 में सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लागू किया प्रजामंडल ने प्रशासनिक सुधारों की मांग की  1947 ईस्वी में प्रजामंडल के अध्यक्ष ऋषि दत्त मेहता बंदी बनाकर अजमेर भेज दिए गए उनकी अनुपस्थिति में ब्रिज सुंदर शर्मा ने नेतृत्व संभाला

प्रजामंडल को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया मेहता जी ने 1944 में अपनी रिहाई की बात बूंदी राज्य लोक परिषद की स्थापना की
जिसे कुछ समय बाद मान्यता मिल गई  महाराज ने बदलती परिस्थितियों को भांपते हुए संविधान निर्मात्री सभा का गठन किया जिसमें प्रजा मंडल के सदस्य मनोनीत किए गए

नवनिर्मित संविधान पारित होने से पहले ही बूंदी राजस्थान में विलीन हो गय इस प्रकार कोटा और बूंदी के शासकों ने जनता के साथ उतना अच्छा नहीं किया इन लोगों ने भी अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया और जनता के साथ दमनकारी नीतियों का पालन करते रहे परंतु जब भारत आजाद हो गया तब इन्होंने यू टर्न ले लिया

प्रतापगढ़ प्रजामण्डल 

प्रतापगढ़ में 1931-32 में स्वदेशी वस्त्र,खादी प्रचार और मद्यनिषेध का प्रचार-प्रसार कर जन जागृति फैलाई थी। इसके लिए मास्टर रामलाल, राधावल्लभ सोमानी, रतन लाल के नेतृत्व में प्रतापगढ़ में आंदोलन किया गया।

प्रतापगढ़ में जन जागृति फैलाने का मुख्य कार्य अमृत लाल पायक ने किया था। हरिजन उत्थान के लिए ठक्कर बप्पा की प्रेरणा से 1936में अमृत लाल पायक में प्रतापगढ़ में हरिजन पाठशालाकी स्थापना की थी।

1945 में चुन्नी लाल प्रभाकर और अमृत लाल पायक के नेतृत्व में प्रतापगढ़ प्रजामंडल की स्थापना की गई। 1947 को महारावल ने प्रतापगढ़ मे लोकप्रिय मंत्री मंडल के गठनकी घोषणा की।  2 मार्च 1948में प्रजामंडल के 2 प्रतिनिधि माणिक्य लाल और अमृत लाल पायक मंत्रिमंडल में ले लिए गए।

25 मार्च 1948 को प्रतापगढ भी  राजस्थान संघ का अंग बन गया।

किशनगढ प्रजामंडल

किशनगढ़ में कांति चंद्र चौथाणी ने 1930 में उपचारक मंडलकी स्थापना की थी। किशनगढ़ राज्य में श्री कांति चंद्र चोथानी के प्रयासों से 1939 में प्रजामंडल की स्थापना की गई। इस प्रजा मंडल का अध्यक्ष श्री जमाल शाह को बनाया गया और इसका मंत्री महमूद को बनाया गया था।

राज्य की ओर से प्रजामंडल की स्थापना का कोई विरोध नहीं किया गया। 1942 में किशनगढ़ प्रजामंडल ने चुनाव लड़ा और बहुमत प्राप्त किया। महाराजा किशनगढ़ ने 15 अगस्त 1947 से पूर्व एक सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर कर किशनगढ़ को भारतीय संघ का एक अंग बना दिया था।

किशनगढ़ भी 1948 में राजस्थान संघ में विलय हो गया था।

प्रजामंडल   संस्थापक     समय

  • जयपुर –कर्पूर चंद्र पाटली —— 1931
  • बूंदी —- कांतिलाल ———–1931
  • हाडोती(kota)–नैनू राम शर्मा —–1934
  • मारवाड़— भंवर लाल सराफ ——1934
  • बीकानेर —मगाराम वैद्य ——–1936
    धौलपुर — कृष्णदत्त पालीवाल —- 1936
  • Mewar— माणिक्य लाल वर्मा —-1938
  • भरतपुर — गोपी लाल यादव —– 1938
  • अलवर —- हरी वाराध्य शर्मा —–1938
  • शाहपुरा —रमेश चंद्र ओझा ——1938
  • सिरोही —– गोकुल भाई भट्ट —-1939
  • Karoli —-त्रिलोक चंद्र माथुर —-1939
  • किशनगढ़ —कांतिलाल चौधरी —-1939
  • कुशलगढ़ —भंवरलाल निगम —- 1942
  • डूंगरपुर —– भोगीलाल ——–1944
  • जैसलमेर —-मीठालाल व्यास —-1945
  • प्रतापगढ़ —— चुन्नीलाल ——1945
  • झालावाड़ — मांगीलाल भव्य —–1946
  • Banswada — भूपेंद्र सिंह पंडित — 1943

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

चित्रकूट त्रिपाठी, P K Nagauri, Nagaur, श्रवण कुमार सहारण, प्रभुदयाल मूण्ड, ज्योति प्रजापति, chandraprakash soni

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