( राजस्थान की अर्थव्यवस्था- संवृद्धि, विकास & आयोजना )

विकास ( Development )

आर्थिक विकास की संकल्पना अधिक व्यापक संकल्पना है और आर्थिक विकास में प्रति व्यक्ति उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ यह देखा जाता है कि अर्थव्यवस्था के आर्थिक और सामाजिक ढांचे में क्या परिवर्तन हुए हैं इस रूप में देखने पर आर्थिक विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सकल राष्ट्रीय उत्पादन में कृषि का हिस्सा लगातार गिरता जाता है जबकि उद्योगों सेवाओं व्यापार बैंकिंग और निर्माण गतिविधियों का हिस्सा बढ़ता जाता है

आर्थिक विकास का तात्पर्य– उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन की तकनीकी और संस्थागत व्यवस्था में और वितरण प्रणाली में परिवर्तन होता है ,जहा आर्थिक समृद्धि की जांच के लिए राष्ट्रीय आय के आंकड़ों पर गौर करना होता है वहां आर्थिक विकास का अनुमान मुख्य रूप से ढांचागत परिवर्तनों के आधार पर लगाया जाता है

आर्थिक विकास– परिमाणात्मक और गुणात्मक परिवर्तन (राष्ट्रीय उत्पाद और साथ ही जीवन की गुणवत्ता में सुधार जो राष्ट्रीय कल्याण में वृद्धि से संबंधित है )को दर्शाता है

आर्थिक विकास दर–सकल घरेलू उत्पादन में परिवर्तन की दर को आर्थिक विकास दर कहते हैं

आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य–कुपोषण बीमारी निरक्षरता गंदगी बेरोजगारी विषमता आदि को समाप्त करना है

समृद्धि और विकास का पूरक होना–आर्थिक विकास से गरीबी बेरोजगारी और और समानता में कमी आती है विकासशील देशों में आर्थिक संवृद्धि दर आर्थिक विकास दर की तुलना में कम होती है उच्च आर्थिक समृद्धि और विकास की गारंटी नहीं है विकास के लिए समृद्धि का होना आवश्यक है क्योंकि जीवन में गुणवत्ता विकास के लिए धन चाहिए जो समृद्धि से प्राप्त होता है

प्रसिद्ध पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक का कथन—महबूब उल हक का कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है उनके अनुसार “”विकास की प्रमुख समस्या गरीबी की सबसे भयानक किस्मों पर सीधा प्रहार करना है गरीबी भुखमरी बीमारी अशिक्षा बेरोजगारी और असमानताओं जैसी समस्याओं के उन्मूलन को विकास के मुख्य लक्ष्य””में शामिल किया जाना चाहिए

आर्थिक विकास की विचारधारा ( Ideology of economic development )

परंपरागत विचारधारा (Traditional ideology)– परंपरागत विचारधारा में आर्थिक विकास एक ऐसी स्थिति है जिसमें सकल राष्ट्रीय (या घरेलू) उत्पाद 5 से 7% प्रतिवर्ष की दर से बढ़ता रहे और उत्पादन और रोजगार संरचना में इस प्रकार परिवर्तन हो कि उस में कृषि का हिस्सा कम होगा विनिर्माण क्षेत्र और तृतीय क्षेत्र का हिस्सा बढ़ता जाए इस विचारधारा के अंतर्गत ऐसे कदम उठाने की बात कही जाती है जिसमें कृषि के स्थान पर औद्योगिकरण की गति को तेज किया जा सके गरीबी निवारण आर्थिक असमानताओं में कमी और रोजगार के अवसरों में वृद्धि जैसे उद्देश्यों की मात्र चर्चा भर की जाती है और यह मान्यता ले ली जाती है कि सकल राष्ट्रीय घरेलू उत्पाद में वृद्धि और प्रति व्यक्ति उत्पाद में वृद्धि होने से बाकी उद्देश्य को अपने आप धीरे-धीरे प्राप्तकर लिया जाएगा

समृद्धि का रिसाव प्रभाव–अर्थात सकल राष्ट्रीय उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के लाभ रिस रिस कर अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करेंगे इसे समृद्धि का रिसाव प्रभाव कहा जाता है

आर्थिक विकास की नई विचारधारा (New Idea for Economic Development) आठवीं दशक में आर्थिक विकास की संकल्पना को पुनः परिभाषित किया गया और आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य गरीबी असमानता और बेरोजगारी का निवारण रखा गया इस दौर में पुनर्वितरण के साथ समृद्धि का नारा दिया गया

आर्थिक विकास की परिभाषा( Definition of economic development )– प्राय: लोगों के भौतिक कल्याण में सुधार के रूप में की जाती है जब किसी देश में खासकर नीचे आए वाले लोगों के भौतिक कल्याण में बढ़ोतरी होती है जनसाधारण को अशिक्षा बीमारी और छोटी उम्र में मृत्यु के साथ गरीबी से छुटकारा मिलता है कृषि लोगों का मुख्य व्यवसाय ना रहकर औद्योगीकरण होता है जिसमें उत्पादन के स्वरुप में और उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले कारकों के स्वरूप में परिवर्तन होता है कार्यकारी जनसंख्या का अनुपात बढ़ता है और आर्थिक तथा दूसरे किस्म के निर्णय में लोगों की भागीदारी बढ़ती है तो अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदलता है और हम कहते हैं कि देश विशेष में आर्थिक विकास हुआ है

आर्थिक विकास का परिमाण और गुणात्मकता से संबंध(Relationship to Quantity and Quality of Economic Growth)– जहां आर्थिक विकास परिमाणात्मक और गुणात्मक दोनों प्रकार के परिवर्तनों से संबंधित है जहां आर्थिक विकास तभी कहा जाएगाजबकि जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो ऐसा माना जाता है कि प्रति व्यक्ति आय सूचकांक जीवन की गुणवत्त को सही रूप में प्रदर्शित नहीं करता है

आर्थिक विकास की माप( Measure of economic development)आर्थिक विकास की माप में अनेक चर सम्मिलित किए जाते हैं
?जैसे–आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं के स्वरुप में परिवर्तन शिक्षा और साक्षरता दर जीवन प्रत्याशा पोषण का स्वास्थ्य सेवाएं प्रति व्यक्ति उपभोग वस्तुएं आदि

महबूब उल हक ने–आर्थिक विकास को गरीबी के विरुद्ध लड़ाई के रूप में परिभाषित किया चाहे वह गरीबी किसी रूप की हो अथवा आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी निरक्षरता गंदगी बेरोजगारी विषमता आदि को प्रगतिशील रूप में कम करना और अंतिम रुप में समाप्त करना है

आर्थिक विकास की अवधारणा ( Concept of economic development )

आर्थिक विकास की बहुत अधिक व्यापक अवधारणा है जो अपने में आर्थिक समृद्ध, सामाजिक क्षेत्रक विकास और समावेशी विकास को सम्मिलित किए हुए हैं

1-बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आर्थिक विकास को आर्थिक समृद्धि के साथ में ही प्रयोग किया जाता था
2-जब आर्थिक विकास को आर्थिक समृद्धि से अलग करके देखा जाने लगा तो दो दृष्टिकोण उभरे

1⃣ परंपरागत दृष्टिकोण में- दो बातों पर जोर दिया गया
1-सकल घरेलू उत्पाद में 5 से 7% प्रतिवर्ष या उससे अधिक वृद्धि
2-कृषि से उद्योग और तृतीयक क्षेत्र की और अर्थव्यवस्था का संरचनात्मक परिवर्तन

2⃣ आर्थिक विकास के नए दृष्टिकोण में--भौतिक कल्याण में वृद्धि (खास तौर पर उन लोगों के भौतिक कल्याण में जिनकी आय बहुत कम है)गरीबी का निवारण, आय असमानताओं और बेरोजगारी का निवारण इत्यादि को भी शामिल किया गया

3-इस प्रकार आर्थिक विकास में उच्च आदर्श रखे गए और उन्हें पाने के लिए हर पिछड़ा देश कोशिश कर रहा है

आर्थिक विकास के मापक ( Measure of economic development )

राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय में वृद्धि आर्थिक विकास की आवश्यक दशाएं क्योंकि आर्थिक विकास में आर्थिक समृद्धि सम्मिलित है यदि अन्य बातें समान है तो प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में वृद्धि आर्थिक विकास लाएगी पर राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय परिमाणात्मक इकाइयां है यह आर्थिक समृद्धि की मापक है पर यह इकाइयां अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास की माप के लिए प्रयोग में नहीं लायी जा सकती

आर्थिक विकास के माप के तरीके ( Methods of Measuring Economic Growth )

आर्थिक विकास की माप के दो तरीके हैं–

1⃣- निरपेक्ष मापक
2⃣- सापेक्षिक मापक

1- आर्थिक विकास का आधारभूत आवश्यकता प्रत्यागम– इसका प्रतिपादन 1970 में विश्व बैंक ने किया

2- जीवन की भौतिक गुणवत्ता निर्देशांक प्रत्यागम- इस विधि को मौलिक रुप से सोचने का श्रेय जोन टिनवर्जन (1976) को जाता है पर इसे मारिश डी मारिश के नाम से भी जाना जाता है जीवन प्रत्याशा शिशु मृत्यु दर और साक्षरता तीनों को मिलाकर PQLI का निर्माण किया और इस निष्कर्ष पर आए की प्रति व्यक्ति ऊंचीGNP इस बात का आश्वासन नहीं देती कि कल्याण का स्तर ऊंचा है PQLI का अधिकतम मूल्य 100और न्यूनतम मूल्य एक होगा जबकि HDI(जिसकी बात आगे की गई है )का अधिकतम मूल्य एक और न्यूनतम मूल्य शुन्य होगा

3-क्रय शक्ति समता विधि- इस विधि का सबसे पहले प्रयोग 1935 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने किया और आजकल विश्व बैंक इसी विधि का प्रयोग विभिन्न देशों के रहन-सहन के स्तर की तुलना के लिए कर रहा है

4 -निवल आर्थिक कल्याण मापक- विलियम नोरधास और जेम्स टोविन ने जीवन की गुणवत्ता में सुधार जो आर्थिक विकास का मापक है कि मैं आपके लिए मेजर ऑफ इकोनॉमिक वेलफेयर(MEW) की धारणा विकसित कि इसे बाद में सैमुएलसन ने और संशोधित किया तथा इसे MEW मापक कहा

5- मानव विकास सूचकांक- इस सूचकांक का प्रतिपादन 1990 में यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट से जुड़े हुए अर्थशास्त्री महबूब उल हक तथा उनके अनेक सहयोगी अर्थशास्त्री प्रमुखतया A. K.सेन और सिंगर हंस ने किया

एचडी आई की धारणा 

कैपेबिलिटी के विस्तार की अवधारणा पर आधारित है यह धारणा एचडीआई के तीन आधारभूत आयाम है —
1-ज्ञान
2-जन्म के समय जीवन प्रत्याशा और
3-क्रय शक्ति समायोजित प्रति व्यक्ति के रुप में प्रदर्शित जीवन निर्वाह का स्तर

मानव विकास रिपोर्ट 2010 में- विषमता समायोजित मानव विकास सूचकांक लैंगिक विषमता सूचकांक बहुआयामी गरीबी सूचकांक की नई धारणाओं का प्रतिपादन किया गया

एचडीआई के विभिन्न अवधियों में मूल्य और अन्य देशों के HDआई मूल्य के आधार पर हम किसी देश की आर्थिक विकास की स्थिति पर प्रकाश डाल सकते ह

इस प्रकार किसी देश की दो अवधियों में अगणित HD आई इस बात पर प्रकाश डालेगी कि उस देश में सापेक्षिक आर्थिक विकास हुआ है या नहीं यह दो देशों की आर्थिक विकास की तुलनात्मक स्थिति पर प्रकाश डालता है वह भी सीमित चरों के संदर्भ में

HD आर 2010 में विषमता समायोजित HD आई बहुआयामी गरीबी सूचकांक और जेंडर इन इक्वलिटी इंडेक्स की धारणा विकसित की गई है जिसको यदि एचडीआई के साथ जोड़ दिया जाए तो आर्थिक विकास का अधिक स्पष्ट चित्र सामने आ सकता है

आर्थिक विकास को निर्धारित या प्रभावित करने वाले कारक–मोटे तौर पर निम्नांकित कारको को अलग कर सकते हैं जो किसी देश के आर्थिक विकास को प्रभावित करते हैं

1-प्राकृतिक संसाधन
2-तकनीकी प्रगति
3-अवस्थापना
4-जनसंख्या और मानवीय पूंजी
5-निवेश पूंजी निर्माण तथा पूंजी संचय
6-राजनीतिक और सामाजिक कारण
7-पूजी उत्पाद अनुपात या पूँजी गुणांक

मानव विकास ( Human development )

मानव विकास का दृष्टिकोण–इसका उद्देश्य एक स्वाभाविक बहुआयामी विकास है यह लोगों के लिए दिर्घ स्वस्थ और रचनात्मक जीवन जीने की सुनिश्चितता पर केंद्रित है वैश्विक मानव विकास प्रतिवेदन 1993 को नई दिल्ली में जारीकिया गया था यह देश के विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था जो कि आठवीं पंचवर्षीय योजना में मानव विकास की प्रतिबद्धता के रूप में प्रदर्शितहुआ था इसके बाद देश में इस अवधारणा पर आधारित अनेक विकास कार्यक्रम
जैसे-प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य, स्कूल में भोजन कार्यक्रम ,प्रारंभिक शिक्षा कार्यक्रम ,मजदूरी कार्यक्रम इत्यादि को लागू किया गया 1980 के दशक में आय में वृद्धि पर आधारित कार्यक्रमों पर अधिक ध्यान केंद्रितकिया गया जबकि 90 के दशक में शिक्षा और साक्षरताज्यादा प्रचलित मुद्दे थे

इस प्रकार गत दशक में मानव विकास की प्रवृत्ति अधिकार आधारित– विकास नीतियों जैसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम शिक्षा का अधिकार और भोजन का अधिकार पर आधारित रहे

मानव विकास सूचकांक ( human Development Index ) 

मानव विकास सूचकांक को पहली बार अमर्त्य सेन की सहायता से पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक ने 1990 में प्रकाशितकिया था जिसे यूएनडीपी द्वारा जारी किया जाता है एक देश में मानवीय जीवन के लिए बुनियादी आवश्यकता की औसत प्राप्ति को मानव विकास सूचकांक द्वारा मापाजाता है

मानव विकास सूचकांक के आकलन के आधार– मानव विकास सूचकांक के आकलन के निम्नलिखित आधार है–
1-जीवन प्रत्याशा
2-शिक्षा
3-प्रति व्यक्ति आय
4-असमानता प्रभाव
5-लिंग असमानता
6-बहुआयामी गरीबी सूचकांक (बाद के तीनों आधार को 2010 में सूचकांक में शामिल किया गया)

HD आई के अनुसार यूएनडीपी ने विश्व को चार श्रेणियों में विभाजित किया है–

  1. अति उच्च मानव विकास सूचकांक वाले देश– एचडीआई मूल्य 0.800से अधिक
  2. उच्च मानव विकास सूचकांक वाले देश– एचडीआई मूल्य 0.698-0.783
  3. मध्य मानव विकास सूचकांक वाले देश– एचडीआई मूल्य 0.510-0.698
  4. निम्न मानव विकास सूचकांक वाले देश– एचडीआई मूल्य 0.510 से कम

मानव विकास रिपोर्ट के विषय

1वर्ष 1990- मानव विकास की अवधारणा और मापन
2-वर्ष 2003–सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य: मानव निर्धनता की समाप्ति हेतु देशों के मध्य समझौता
3-वर्ष 2010-राष्ट्रों का वास्तविक धन:मानव विकास के मार्ग
4-वर्ष 2011– स्थिरता और इक्विटी:सभी के लिए एक बेहतर भविष्य
5-वर्ष 2012-वर्ष 2012 में यूएनडीपी ने मानव विकास रिपोर्ट जारी नहीं की
6-वर्ष 2013-दक्षिण का उदय: विविधतापूर्ण विषय में मानव प्रगति
7-वर्ष 2014-सतत मानव प्रगति”सुभेद्यता का न्यूनीकरण और लचीलेपन का निर्माण
8-वर्ष 2015- डेवलपमेंट रिपोर्ट वर्क फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट

यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट

14 दिसंबर 2015 को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की मानव रिपोर्ट 2015 जारी की गई इस रिपोर्ट का शीर्षक “” ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट:वर्क फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट””हैइस वर्ष के मानव विकास सूचकांक में नार्वे टॉप पर है जबकि ऑस्ट्रेलिया और स्विजरलैंड उसके ठीक नीचे है इस रिपोर्ट में भारत का विश्व के 188 देशों की वर्ष 2015 की रैंकिंग में 130 वां स्थान है पिछले वर्ष की इस रिपोर्ट में भारत 135 वें स्थान पर था इस प्रकार मानव विकास सूचकांक में भारत की स्थिति में 5 स्थान पर का सुधार हुआ है भारत को इस सूचकांक के लिए 0.609 अंक प्राप्त हुए हैं वर्ष 1980 से लेकर 2015 के मध्य भारत का मानव विकास सूचकांक 0.326 से बढ़कर 0.609 हो गया यह 68.1 प्रतिशत की वृद्धि सालाना दर पर यह 1.54% की वृद्धि है

मानव विकास सूचकांक तीन मुख्य आयामों पर आधारित है- इसमें

1-आयु और स्वास्थ्य जीवन
2-ज्ञान के लिए पहुंच और
3-जीवन स्तर शामिल है

भारत को समानता विशेषकर शिक्षा में असमानता के कारण मानव विकास सूचकांक में 28.6 प्रतिशत का नुकसान हुआ है

भारत मानव विकास रिपोर्ट ( India Human Development Report )

भारत की प्रथम मानव विकास रिपोर्ट वर्ष 2001 में प्रकाशित की गई इसमें संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की शासन की अवधारणा को आत्मसात करते हुए मानव विकास पर आधारित शासन का पक्ष रखा गया था आगे इस सुशासन के विचार की संस्थाओं सेवा प्रदाय व्यवस्था और नियमों प्रक्रियाओं एवं विधि समस्त सहयोगी और अधीनस्थ व्यवस्था के मध्य निरंतर और परस्परता कार्यकलाप के रूप में देखा गया

भारत का द्वितीय मानव विकास प्रतिवेदन 2011 में प्रकाशित किया गया इसमें यह तर्क दिया गया कि आर्थिक विकास के लिए मानव संसाधनों में समुचित हस्तक्षेप और मानवीय क्रियाकलापों को विस्तृत करना आवश्यकताहै तभी इसके माध्यम से आय पर आधारित गरीबी में सफलतापूर्वक कमी लाई जा सकेगी साथ ही आहवन किया गया की सीमांत वर्गों के समावेशन को केंद्रित कर सामाजिक और आर्थिक नीतियों को एकीकृत किया जाए

योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार– राजस्थान की भारत में 1981 में 12वीं रैंकिंग थी जो नवे स्तर पर आ गई है इंस्टिट्यूट ऑफ़ अप्लाइड मैन पावर रिसर्च और योजना आयोग द्वारा जारी भारत के मानव विकास प्रतिवेदन 2011 टुवडर्स सोशल इंक्लूजन में दर्शाया गया है कि मानव विकास सूचकांक में वर्ष 1999- 2000 से 2007-08 नवीनतम वर्ष जिसके लिए अनुमानित किया जा सका है के मध्य 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई है समान रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछड़े राज्यों में मानव विकास सूचकांक राष्ट्रीय औसत दर से अधिक तेजी से बढ़ा है अतः यह कहा जा सकता है कि राज्य में मानव विकास सूचकांक के संदर्भ में विषमता हुई है

भारत मानव विकास रिपोर्ट-  2011 में 23 राज्यों में 0.790 एचडीआई मूल्य के साथ केरल प्रथम स्थान पर और 0.358 एचडीआई मूल्य के साथ छत्तीसगढ़ सबसे नीचे पायदान (23 वें स्थान )पर रहा राजस्थान 0.434 HDआई मूल्य क साथ सातवें स्थान पर रहा भारत का औसत 0.467 HDआई रहा

राजस्थान मानव विकास रिपोर्ट ( Rajasthan Human Development Report )

?राजस्थान का प्रथम मानव विकास प्रतिवेदन वर्ष 2002 में प्रकाशित हुआ था जो कि वैश्वीकरण के युग में स्थाई आजीविका को प्रोत्साहित करना विषय पर आधारित था यह प्रतिवेदन जहां एक और कृषि समस्याओं पर केंद्रित था वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय असंतुलन को भी दर्शाता है इसमें सर्वोपरि महत्व के रूप में जेंडर और स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों को चिन्हित किया गया इसमें राजकोषीय सुधार की आवश्यकता समष्टि अर्थव्यवस्था के स्थायित्व और स्थाई मानव विकास व्यूह रचनाको प्राथमिकता दी गई
राज्य के मानव विकास प्रतिवेदन का अद्यतन प्रतिवेदन अंक वर्ष 2008 में तैयार किया गया इसमें मानव विकास के विभिन्न घटक की राज्य में नवीनतम स्थिति को दर्शाया गया है

राजस्थान मानव विकास प्रतिवेदन- 2008 ( Rajasthan Human Development Report )

इंस्टिट्यूट ऑफ एंप्लॉयमेंट पावर रिसर्च योजना आयोग द्वारा जारी इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट 2011 टुवर्ड्स सोशल इंक्लूजन के अनुसार वर्ष 2008 में 29 राज्योंजिनमें आसाम के अत्यधिक साथ उत्तर पूर्वी राज्यों को एक माना गया है मैं राज्य का 17वां (0.434 )स्थान है

?राज्य के मानव विकास प्रतिवेदन का अधिकतम अंक– वर्ष 2008 में तैयार किया गया इसमें राज्य में विभिन्न मानव विकास सूचकांक को की नवीनतम स्थिति को दर्शाया गया है राजस्थान के 13 जिलों जैसे बांसवाड़ा बाड़मेर चित्तौड़गढ़ धोलपुर डूंगरपुर झालावाड जालौर जैसलमेर करोली टोंक सवाई माधोपुर सिरोही उदयपुर के जिला मानव विकास प्रतिवेदन भी तैयार किए गए हैं

राजस्थान मानव विकास रिपोर्ट 2007

राजस्थान मानव विकास रिपोर्ट 2007 के अनुसार– राजस्थान में शिक्षा विकास सूचकांक 0.755 ,स्वास्थ्य विकास सूचकांक 0.735 और आय विकास सूचकांक 0.640 रहा और मानव विकास सूचकांक 0.710 रहा

शिक्षा विकास सूचकांक के अनुसार– झुंझुनू सर्वाधिक उच्च शिक्षा सूचकांक 0.850 वाला जिला रहा जबकि निम्नतम शिक्षा सूचकांक वाला जिला बांसवाड़ा 0.630 और जालौर 0.638 रहा

स्वास्थ्य सूचकांक के अनुसार–बीकानेर सर्वाधिक स्वास्थ्य सूचकांक0.863 वाला जिला
अन्य उच्च स्वास्थ्य सूचकांक वाले जिले- हनुमानगढ़ 0.846 ,गंगानगर 0.816 ,झुंझुनू 0.850 है *जबकि निम्नतम स्वास्थ्य विकास सूचकांक वाला जिला डूंगरपुर 0.282 रहा

आय सूचकांक के आधार– पर गंगा नगर सर्वाधिक आय सूचकांक 0.825 वाला जिला रहा तत्पश्चात जयपुर 0.814,भीलवाड़ा 0.818,कोटा0.803 जिला जबकि न्यूनतम आय सूचकांक वाला जिला चूरु 0.226 रहा

गंगानगर सर्वाधिक उच्च मानव सूचकांक वाला जिला(0.809) का इसी प्रकार कोटा बीकानेर जयपुर हनुमानगढ़ अलवर झुंझुनू और सीकर उच्च मानव सूचकांक वाले जिले रहे

दूसरी ओर डूंगरपुर निम्नतम मानव विकास सूचकांक 0.409 वाला जिला इसके पश्चात बांसवाड़ा जालौर पाली निम्न सूचकांक वालेजिले रहे हैं

सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य और राजस्थान की स्थिति 

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 6 से 8 सितंबर 2000 में इन न्यूयार्क में आयोजित सहस्त्राब्दि शिखर सम्मेलन में विश्व समुदाय के आर्थिक और सामाजिक विकास से संबंधित आठ लक्ष्य को निर्धारित किया इन लक्ष्य को सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य की संज्ञा दी गई

शिखर सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में इन लक्ष्य को वर्ष 2015 तक प्राप्त करने की सीमा तय की गई इन आठ लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 21 लक्ष्य और 60सूचकांक निर्धारित किए गए हैं यह लक्ष्य सितंबर 2000 में हस्ताक्षरित सहस्त्राब्दि घोषणा पत्र का अंग हैजिस पर 189 देशों ने हस्ताक्षर किए थे यह लक्ष्य और इनके टारगेट आपस में अंतर संबंधित है और इन्हें समग्र रूप में समझना आवश्यक है

सहस्त्राब्दि घोषणा पत्र 2000 में–यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि यह प्रत्येक राष्ट्र के ऊपर बाध्यकारी है कि वह अपर्याप्त आय, व्यापक रूप से फैली भुखमरी, लेगिंक विषमताएं, पर्यावरण क्षरण ,शिक्षा ,स्वास्थ्य और स्वच्छ पेयजल के अभाव की समस्याओं पर प्रभावी कार्यवाही करें

संक्षेप में–सहस्राब्दि विकास लक्ष्य को निम्न रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है

1-अत्यंत गरीबी और भुखमरी को समाप्त करना
2-सार्वभौम प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य प्राप्त करना
3-लैंगिक समानता को बढ़ाना और महिलाओं के सशक्तिकरण का उद्देश्य प्राप्त करना
4-शिशु मृत्यु दर में कमी करना
5-मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार करना
6-एचआईवी- एड्स मलेरिया और अन्य बीमारियों की रोकथाम 7-पर्यावरण जीवंतता को सुनिश्चित करना
8-विकास के लिए वैश्विक साझेदारी की धारणा को अपनाना

राजस्थान में मानव विकास की स्थिति–भारत भी सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों पर हस्ताक्षर करने वाला देश था उत्तर भारत भी उन सीमाओं से बंधा हुआ था जो सहस्त्राब्दि घोषणा पत्र 2000 में निर्देशित था भारत के सभी राज्यों को समय रहते हुए इन लक्ष्य को प्राप्त करना था लेकिन अभी तक यह लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाई

मानव विकास के विभिन्न घटक-

1-शिक्षा
2-स्वास्थ्य एवं पोषण
3-महिलाओं की स्थिति
4-आजीविका

 

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No of Questions-26

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

प्रभुदयाल मूण्ड चूरु, SM Mokharia, निशा शर्मा, प्रीति मिश्रा, P K Nagauri

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