1.पावणा गीत ( Rendition song )

नये दामाद के ससुराल आने पर स्त्रियाँ भोजन करवाते समय गीत गाती है

2.हम सीढों गीत ( ham sidhon geet )

यह उत्तरी मेवाड़ के भीलों का प्रसिद्ध लोकगीत हमसीढों कहलाता है इसे स्त्री व पुरुष मिलकर गाते है

3. लावणी जीत ( Lavani geet )

लावणी का मतलब बुलाने से है नायक के द्वारा नायिका को बुलाने के अर्थ में यह गीत गया जाता है,कुछ लावनियाँ जैसे मोरध्वज, भर्तहरि, सेउसमन की लावनियाँ.

4. कुरजा गीत ( Kurja song )

यह एक सुन्दर ￰पक्षी होता है जो पश्चिम राजस्थान में देखा जा सकता है यह गीत वर्षा ऋतू में गया जाता है ऐसा माना जाता हे की प्राचीन काल में वियोगिनी स्त्रियां आपने प्रदेश गए पति को बुलाने का सन्देश देती है

5. झोरवा गीत ( Zorva song )

प्रेमिका का वियोग में गाया जाता है यह राज्य के जैसलमेर में गाया जाता है इस गीत में प्रेमी के इंतजार में व्यथित स्त्री की विरह व्यथा का चित्रण प्रस्तुत कर प्रितम को घर आने का सन्देश देते हुए गाया जाता है
“केसरिया बालम पधारो जी म्हारे देश”

कला और संगीत संस्थान ( Arts and music institute )

  • जवाहर कला केन्द्र- जयपुर  – 1993 ई. इस संस्था द्वारा सर्वाधिक सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।
  •  जयपुर कत्थक केन्द्र-जयपुर  -1978 ई.
  • रविन्द्र मंच- जयपुर  1963 ई.
  • राजस्थान संगीत संस्थान- जयपुर 1950 ई.
  • पारसी रंग मंच – जयपुर  1878 ई. जयपुर के शासक रामसिंह द्वितीय के द्वारा स्थापित है। इसे राम प्रकाश थियेटर भी कहा जाता है।
  • पशिचमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र – उदयपुर 1986 ई. यह केन्द्र बागौर हवेली में संचालित है।
  •  राजस्थान संगीत नाटक अकादमी- जोधपुर 1957
  • राजस्थान साहित्य अकादमी- उदयपुर जनवरी 1958 ई
  • भवानी नाट्यशाला – झालावाड़  महाराजा भवानी सिंह द्वारा 1921 ईं. में स्थापित की गई।
  • राजस्थान भाषा साहित्य एवं संस्कृत अकादमी- बीकानेर 1983
  • पं झाबर मल शर्मा शोध संस्थान- जयपुर 2000 ई.
  • सदीक खां मागणियार जोक कला एवं अनुसंधान परिषद/ लोकरंग – जयपुर 2002 ई
  • भारतीय लोक कला मण्डल -उदयपुर संस्थापक – देवी लाल सांभर  स्थापना – 1952 ई.
  • मारवाड़ नाटक संस्थान/मारवाड़ लोक कला मण्डल -जोधपुर संस्थापक-लक्ष्मण दास डांगी स्थापना- 1897 ई.
  • मरूधर लोक कला मण्डल – जोधपुर  संस्थापक -गणपत लाल डांगी  गणपत लाल डांगी को “गीगले का बापू” कहते है।
  • रूपायन संस्थान:- बौरूदा (जोधपुर)  स्थापना:- 1960 ई. संस्थापक – कोमल सिंह कोठारी
  • राजस्थान संस्कृत अकादमी – जयपुर  1980
  • राजस्थान उर्दू अकादमी – जयपुर 1979
  • राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी – जयपुर 1969
  • मौलाना अब्दुल कलाम आजाद अरबी फारसी शोध संस्थान – टोंक 1978
  • राजस्थान ललित कला अकादमी – जयपुर 1957

Rajasthan Folk song important facts and Quiz

प्रश्न-1 राजस्थान के लोक गीतों को कितने भागों में विभक्त किया गया है ?

उत्तर- राजस्थान के लोक गीतों को तीन भागों में विभक्त किया गया है
प्रथम वे गीत- जो जनसाधारण द्वारा विशेष अवसर पर गाए जाते हैं
द्वितीय गीत-जो राज्य के प्रभाव के कारण विकसित हुए और जिन्हे कई जातियों ने अपना पैशा बना लिया
तीसरे लोक गीत-में क्षेत्रीय प्रभाव दिखाई देता है

प्रश्न-2 जनसाधारण द्वारा गाए जाने वाले गीतों को विषय के आधार पर कितने भागों में बांटा जा सकता है ?

उत्तर- जनसाधारण द्वारा गाए जाने वाले गीतों को विषय के आधार पर 5 भागों में बांटा जा सकता है
1-संस्कार संबंधी गीत
2-त्यौहार और पर्व संबंधी गीत
3-धार्मिक गीत
4-ऋतु संबंधी गीत
5-विविध विषयों से संबंधित गीत जैसे इंडोनी कांगसियो गोरबंद

प्रश्न-3 राजस्थान के लोक गीतों की विशेषता क्या है ?

उत्तर- लोकगीत किसी विशेष क्षेत्र के जनमानस के स्वभाविक उद्गारों का प्रस्फुटन होता है जिसमें उल्लास प्रेम करुणा दुख की अभिव्यक्ति होती है इन के रचयिता के बारे में पता ना होना भाषा की अपेक्षा भावपूर्ण होना इसकी मुख्य विशेषताएं संस्कृति रहन सहन और मानवीय भावनाओं का सजीव वर्णन मौखिक होने पर भी ले बंद्ध होना आदि मुख्य विशेषताएं हैं यह हमारी संस्कृति को साकार करते हैं और परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखते हैं और आदिम संस्कृति के प्रवाहमान हैं

प्रश्न-4 निम्न क्षेत्रीय गीतों का वर्णन कीजिए—कुरंजा, मुमल ,केसरिया बालम ,बिछुडो ढोला मारु ?

उत्तर- 1- कुरंजा ( Kuranja )- यह मरुप्रदेश (जोधपुर )क्षेत्र का लोक गीत है इसकी गायन शैली मांड है और यह वर्षा ऋतु के समय गाया जाता है इस गीत का प्रतीक कुरंजा है इस गीत मे पत्नी पति को संदेश भेजती है एक प्रकार से विरह गीत है

2- मुमल ( Mumal ) – यह जैसलमेर क्षेत्र का लोक गीत है इसे किसी भी समय गाया जो सकता है यह गीत लोद्रवा की राजकुमारी मूमल पर आधारित है सुंदरता का नख से शिख वर्णन (श्रंगार गीत) है

3- केसरिया बालम ( Kesaria balam )-  मारवाड़ क्षेत्र का लोक गीत हैं इसकी गायन शैली मांड है यह बिरह और रजवाड़ी गीत स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है इस गीत को राजस्थान में आने वाले विशेष अतिथियों के आगमन के समय में गाया जाता है

4- बिछुडो ( Bichhuda )-  बिछुडो गीत-हाड़ौती क्षेत्र का लोक गीत है इसे किसी भी अवसर पर किसी भी समय गा सकते हैं इस लोकगीत में बिच्छू के डंक से मरणासन्न पत्नी द्वारा पति को दूसरे विवाह का संदेश देने के लिए कहा जाता है

5- ढोला मारू ( Dhola maru )–  यह सिरोही क्षेत्र का लोकगीत है यह गीत ढोला मरवण की प्रेमकथा पर आधारित प्रेम और श्रृंगार रस का गीत है ढा़ढी़यो द्वारा गाया जाने वाला यह एक प्रसिद्ध लोकगीत है

प्रश्न-5 राजस्थान की विभिन्न लोक गायन शैलियों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर- 1- मांड ( Mand )- मांड क्षेत्र (जैसलमेर) में गाए जाने वाली राग मांड राग कहलाती है मांड गायकी शास्त्री गायन कि लोक शैली है यह राजस्थान की एक श्रंगार रसात्मक राग है यहां की जैसलमेरी मांड ,बीकानेर मांड, जोधपुर मांड ,जयपुर की मांड आदि प्रसिद्ध राज्य के प्रसिद्ध मांड गायिका हैं स्वर्गीय गवरी देवी (बीकानेर )स्वर्गीय हाजल अल्लाह जिलाह बाई (बीकानेर) गवरी देवी (पाली )मांगीबाई (उदयपुर )श्रीमती जमीला बानो (जोधपुर )श्रीमती बन्नो बेगम (जयपुर आदी

2- मांगणियार ( Manganiyar )- राजस्थान की पश्चिमी मरुस्थलीय सीमावर्ती क्षेत्रों बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर आदी में मांगणियार जाति के लोगों द्वारा अपने यजमानों के यहां मांगलिक अवसरों पर गाए जाने वाले लोक गायन शैली है जिसमें मुख्यत: 6 राग और 36 रागनियां होती हैं मांगणियार मुस्लिम मूलतः सिंध प्रांत के हैं गायन वादन ही इनका प्रमुख पेशा है इन के प्रमुख वाद्य कमायचा खड़ताल आदी हैं प्रमुख मांगणियार कलाकार साफर खान मांगणियार, गफूर खान मांगणियार, गमडा़ खान मांगणिया, रुकमा देवी, अकला देवी ,समंदर खां मांगणियार, रमजान खान (ढोलक वादक) स्वर्गीय सद्दीक खान मांगणियार (प्रसिद्ध खड़ताल वादक) साकर खां मांगणियार( कमायचा वादक)

3- लंगा ( Langa )- बीकानेर, बाड़मेर, जोधपुर और जैसलमेर जिले के पश्चिमी क्षेत्रों में मांगणियार की तरह मांगलिक अवसरों और उत्सव पर लंगा जाति के गायकों द्वारा गाए जाने वाली गायन शैली लंगा गायकी कहलाती है सारंगी और कमायचा इनके प्रमुख वाद्य हैं राजपूत इन के यजमान होते हैं प्रमुख लंगा कलाकार फूसे खॉ, महरदिन लंगा, अलाउद्दीन लंगा, करीम खान लंगा

4- तालबंदी ( talabandi ) – राजस्थान के पूर्वी अंचल भरतपुर ,धौलपुर, करौली और सवाई माधोपुर आदि में लोक गायन शैली की शास्त्रीय परंपरा है जिसमें राग रागनियों से निबद्ध प्राचीन कवियों की पदावलीया सामूहिक रूप से गायी जाती है इसे ही तालबंदी गायकी कहते हैं इसमें प्रमुख वाद्य सारंगी, हारमोनियम, ढोलक, तबला और झॉझ है और बीच बीच में नगाड़ा( बंब) भी बजाते हैं

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No of Questions- 45

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

प्रभुदयाल मूण्ड चूरु, 

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