राजस्थानी संस्कृति परंपरा विरासत में साहित्य का भी अपना एक अलग महत्व था राजस्थान में कई ऐसे वीर पुरुष और इतिहासकार थे जिन्होंने ऐसी घटनाओं का वर्णन किया जो राजस्थान के इतिहास की गाथाएं गाते हैं राजस्थान में होने वाली घटनाओं जैसे चित्तौड़ पर आक्रमण जोहर मुगलों का आक्रमण 18 57 की क्रांति प्रेम कथाएं आदि के बारे में कहीं इतिहासकारों ने अपना विस्तृत वर्णन किया है

रविंद्र नाथ टैगोर के जेष्ठ भ्राता ज्योती रविंद्र नाथ ने चित्तौड़ पर आक्रमण जैसे नाटक लिखे गिरीश इंदू घोष का आनंद रहो नाटक में अकबर और मानसिक का चित्रण है ।बांग्ला साहित्य में राजस्थान के ऐतिहासिक संदर्भों को अनेक कवियों ने विविध रूपों में अपनाया इनमें रंगलाल का पद्मिनी का भी और सुरसुंदरी प्रसिद्ध है सुरसुंदरी में हल्दीघाटी के युद्ध और अकबर की कूटनीति का भी प्रसंग वंश वर्णन है

रविंद्र नाथ टैगोर ने –*18 फरवरी 1939 को एक सभा में कहा था राजस्थान ने अपने रुप में जो साहित्य निर्माण किया है उसकी + का साहित्य और कहीं नहीं पाया जाता है और इन कवियों ने युद्ध के बीच नगाड़ों की ध्वनि में अपनी कविताएं रची थी

गुरुदेव ने स्वयं राजपुताना कविता लिखी थी राजस्थान लोकगीतों के लिए भी प्रसिद्ध रहा है राजस्थान के प्रसिद्ध लोकगीत हैं घूमर बंजारी गोहाडी़ धूमल आदि ।यहां लोकगीत लोगों के मनोरंजन का लोकप्रिय और स्वभाविक साधन है विषय वस्तु की विविधता इन की विशेषता है

राजस्थान के लोक संगीत का महत्वपूर्ण पहलू जैसलमेर के लंगा लोगों के अध्ययन से उपस्थित होता है वह एक विशेष शैली में गाते हैं उनकी सारंगी भी विशिष्ट होती है इसके अतिरिक्त गायन मांड लोक शैली की सर्वोत्तम परंपरा है मिरासी मुसलमान इस परंपरा के उत्तराधिकारी हैं यह शैली करीब-करीब शास्त्रीय है शहरीकरण के प्रभाव से लोक संगीत को संरक्षण की जरूरत है

ख्याल लोक मनोरंजन का महत्वपूर्ण साधन है जिसमें हजारों ग्रामीण लोगों को मुफ्त उत्सव मनाने का मौका मिलता है इसमें संगीत में लोक नाटिकाएं और नृत्य नाटिका दोनों ही शामिल है इन नृत्य नाटिका और लोक नाटकों में 400 वर्षों से भी पुरानी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं सुरक्षित है

देवीलाल समर ने 200 ख्यालों का वर्णन किया है यह ख्याल लोक मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक सांस्कृतिक शिक्षा के भी साधन है भारत के किसी भी क्षेत्र में लोक नाटकों या ख्याल के इतने प्रकार प्रचलित नहीं है जितने की राजस्थान में

खयालों में मंच दर्शक और अभिनय शैली के अनुसार अपनी विशिष्ट परंपराएं विकसित हैं भवाई की नृत्य नाटिका प्रसिद्ध है काव्य नाटकों में तुर्रा कलंगी रम्मत गौरी आदि लोकप्रिय हैं नाटकों की कहानियां जैसे ढोला मारू सुल्तान निहालदे भरतहरि अमर सिंह राठौर आदि विख्यात और लोकप्रिय ।इन नाटकों का सबसे प्रधान तत्व लोक संगीत और नृत्य

?लोक नाटकों के विकास में कठपुतली कला का विशेष महत्व राजस्थान में शैली की गौरवशाली परंपरा रही है कटपुतली प्रदर्शन और अभिनय का समन्वित रूप है कठपुतली में एकाकी नाटक के सभी तत्व मौजूद है राजस्थानी कठपुतली नाटक मनोरंजन का साधन है इसका प्रदर्शन करने वाले कलाकार नागौर जिले के कुचामन परबतसर डीडवाना और स्थानों से आते हैं यह भाट कहलाते उदयपुर में कठपुतली का संग्रहालय दर्शनीय है

राजस्थान स्वतंत्रता से पूर्व कभी एक इकाई में नहीं रहा किंतु विविधता में एकता और समन्वय की भावना इस प्रदेश की विरासतें यहां का सांस्कृतिक वैभव अधिकतर संबंध में और भाईचारे का प्रतीक रहा है ओसिया के मंदिरों के सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि 8 वीं सदी से 10 वीं सदी तक गुर्जर प्रतिहारों के संरक्षण में शेर शैव वैष्णव और जैन धर्म किस प्रकार एकता के दौर में पिरोए गए थे हिंदू मुस्लिम परंपरा का एक्य स्थापित करने की कोशिश सूफी संतों ने की जैन धर्म और सूफी मत ने राजस्थान में मानवीय संवेदना को बनाए रखने में सहयोग दिया

मध्यकालीन राजस्थान के अनेक संतों के प्रयत्नों से रूढ़िवादिता और संकुचित विचारधारा से ऊपर उठकर चिंतन को नई दिशा प्रदान की गई गोगाजी पाबूजी तेजाजी रामदेव जी आदि अलौकिक महापुरुषों की वजह से पददलित जनमानस को सम्मलन मिला और उनमें धार्मिक विश्वास की भावना को बढ़ोतरी मिली

धन्ना पीपा जांभोजी दादू चरणदास रामचरण जी आदि संतों की प्रेरणा से मानव मूल्यों का महत्व बढ़ा मीरा की भक्ति से परोक्ष रूप से नारी का सशक्तिकरण हुआ राम स्नेही संप्रदाय और दादू पंथ में रूढ़िवादिता को हतोत्साहित किया संतों की पुनीत वाणी ने सदियों तक जिज्ञासुओं को प्रेरणा प्रदान की और पथ प्रदर्शन का कार्य किया

संतों की विचारधारा ने भावनात्मक एकता स्थापित करने में मदद की राजस्थान में प्रत्येक राजवंश की स्थापना के साथ देवी शक्ति का सूत्र जुड़ा हुआ है कुलदेवी के आशीर्वाद को यहां के शासक अपने साम्राज्य की स्थापना युद्ध अभिनव में विजय होने और राज्य की चहुमुखी प्रगति में प्रमुख मानते हैं यही कारण है कि यहां के नरेशों ने अपनी कुलदेवी के नाम से भव्य मंदिर बनवाया और उनके प्रति आस्था का अलख जगाया

फलत: यह देवीयो ने किसी राजवंश विशेष की कुल देवियों का स्वरूप ले लिया इतना ही नहीं आगे चलकर देवी शक्ति की परंपरागत मान्यताओं ने यहां की संस्कृति को सही बनाने के साथ ही समाज को एक सूत्र में पिरोने का उल्लेखनीय कार्य भी किया इन कुल देवियों के उद्भव पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि इन देशों ने चारण कुल में जन्म लिया इस प्रकार की वीडियो में आवड़ माता स्वांगिया माता करणी माता केला देवी जीण माता शीला देवी आई माता सच्चे माता रानी सती संतोषी माता चामुंडा माता सुगाली माता पथवारी माता त्रिपुरा सुंदरी माता आदि प्रमुख है

 

राजस्थान की संस्कृति परंपरा विरासत में राजस्थान के लोगों का रहन सहन पहनावा आदिवासी क्षेत्रों की बसावट भौगोलिक स्थिति उनके रीति रिवाज व्रत-त्योहार परिवेश लोक गीत लोक संगीत लोक कथाएं आदि का समावेश है

राजस्थान वासियों का जीवन तपती दुपहरी में भी क्रियाशील रहा है मध्यकालीन राजस्थान की प्रसिद्ध ऐतिहासिक गाता राव जैतसी रो छंद के रचियता बीठू सूजा ने सोलहवीं शताब्दी के बीकानेर संभाग का विवरण देते हुए उचित ही लिखा है कि रेतीले समुंदर से गिरे हुए इस स्थल का जीवन नीरस और सूखा नहीं है बल्कि यह विभाग कला और कलाकारों साहित्य और साहित्यकारों और विद्वानों द्वारा तथा वीर पुरुषों की चमत्कारी गतिविधियों से सदैव सजीव रहा है

सूजा का यह कथन उसके पश्चात आने वाली शताब्दी के लिए भी लागू होता है जिसकी पुष्टि परवर्ती काल के लेखकों की रचनाओं से की जा सकती है राजस्थानी संस्कृति में आज भी वेशभूषा और खानपान की विशिष्ट पहचान है परंपरागत वेशभूषा मानव मन के भीतर छिपी कलात्मक और सौंदर्यबोध को अभिव्यक्त करती है

राजस्थान के विभिन्न अंचलों में पहनी जाने वाली पाग पागड़ियां विश्व भर में लोकप्रिय है स्त्रियों की वेशभूषा में लहरिया पहुंचा चुनरी तारा भात की ओढनी आदि कि भारत भर में अलग पहचान है इसी प्रकार राजस्थान के परंपरागत आहार और व्यंजन अपने प्रमुखता और अलग पहचान बनाए हुए हैं सोगरा टिक्कड़ राबड़ी खींच दाल ढोकली बिकानेरी भुजिया दाल बाटी मालपुए बीकानेरी रसगुल्ला ब्यावर की तिलपट्टी जोधपुर के मिर्ची बड़े आधी लोकप्रिय आहार और व्यंजन सब्जियों में केर सांगरी काचरा गट्टे कड़ी अधिक पसंद की जाती है

राजस्थान की लोक संगीत मे यहां के परिवेश स्थिति और भावों के अनुरूप लोक वाद्यों का पूर्ण विकास हुआ है लोक वाद्य लोक संगीत के महत्वपूर्ण अंग होते हैं इनके प्रयोग से गीत और नृत्य में माधुर्य मे वृद्धि के साथ ही वातावरण निर्माण और भावाभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाने का कार्य होता है

राजस्थान के कई वाद्य तो शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त वाद्यो के समान विकसित हैं यहां के प्रसिद्ध लोक वाद्यों में जंतर पुंगी मशक मोरचंग मंजीरा कमायचा इकतारा रावणहत्था अलगोजा भपंग सतारा ढोल ढोलक खंजरी खड़ताल आदि हैं

राजस्थान की विविधता विविध है यह विविधता भाषा और बोलियों के वितरण में भी देखी जा सकती है हाडोती मारवाड़ी ढूंढाड़ी बागड़ी तोरावाटी शेखावाटी ब्रिज मेवाती राठी आदि प्रमुख बोलियां हैं

राजस्थान के लगभग आधे हिस्से में मारवाड़ी या उससे संबंधित बोलियां बोली जाती हैं ग्रियर्सन ने राजस्थान को वह भाषा कहा जो राजपूताना में बोली जाती है राजस्थानी भाषा राजस्थानी संस्कृति का हिस्सा राजस्थान के प्रवासी संपूर्ण भारत एवं विश्व में बिखरे पड़े हैं राजस्थानी भाषा की संविधान द्वारा मान्यता देने का इंतजार है

अतः राजस्थान की संस्कृति परंपरा और विरासत राजस्थान की संपूर्ण जीवन चक्र का एक समावेश है जिसके तहत राजस्थान की जीवन शैली के बारे में हमें विस्तृत ज्ञात होता है

 

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No of Questions-40

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Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

चित्रकूट त्रिपाठी, नरेन्द्र जी, विकास जी कुमावत, निर्मला जी अजमेर, प्रभुदयाल मूण्ड

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