Stock Market Glossary ( शेयर बाजार की पारिभाषिक शब्दावली )

1.आउटलुक ( Outlook ) :

रेटिग के साथ जुड़ा हुआ यह शब्द भी भावी संभावनाओं को दर्शाता है। कंपनी/संस्था या देश का भविष्य क्या है अथवा इसकी क्या संभावना है। जैसे सवाल पूछते समय आउटलुक शब्द का उपयोग किया जाता है। आउटलुक के आधार पर ही निवेश करने का निर्णय कम्पनी को लिया जाता है क्योंकि आउटलुक पॉजिटिव, निगेटिव या फिर स्टेबल (स्थिर) हो सकता है।

2. ऑर्डर बुक( Order book) :

कंपनी की ऑर्डर बुक में कितने ऑर्डर बकाया पड़े हैं। इसकी जानकारी के आधार पर कंपनी के कार्य परिणाम, भविष्य एवं स्थिरता का अनुमान लगाया जा सकता है।

3. आर्बिट्रेज (Arbitrage ):

एक शेयर बाजार से निर्धारित शेयरों की कम भाव पर खरीदारी करके उसे दूसरे बाजार में ऊंचे भाव पर बेच देने की प्रवृत्ति को आर्बिट्रेज कहा जाता है।
उदाहरण स्वरूप बीएसई पर एबीसी कंपनी के शेयर 145.20 रू. के भाव पर खरीद कर उसी समय एनएसई पर 145.30 रू. पर बेच देने की प्रक्रिया को आर्बिट्रेज कहते हैं।
इस प्रकार आपको 10 पैसे का अंतर मिलता है। ये सौदे एक ही समय किये जाते हैं तथा इसमें बड़ी संख्या में सौदे किये जाते हैं। ….पुराने समय में एक ही समय पर एक ही स्क्रिप के अलग-अलग भाव हुआ करते थे परंतु अब ऑन लाइन ट्रेडिंग सुविधा होने से इसकी मात्रा काफी घट गयी है। …अब इस प्रकार के सौदों में भाव का अंतर काफी कम होता है, परंतु भारी मात्रा में सौदे होने से इनमें भरपूर लाभ अर्जित होता है। इस प्रकार का कारोबार करने वालों को आर्बिट्रेजर कहा जाता है।
कई बार एक ही कमोडिटी, करेंसी या सिक्युरिटीज के तीन चार एक्सचेंज पर अलग-अलग भाव अंतर पर सौदे होते हैं, जिसमें एक बाजार से नीचे भाव में खरीद कर दूसरे बाजार में ऊंचे भाव पर बेचा जाता है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि ये सौदे दोनों एक्सचेंजों पर एक ही समय पर किये जाते हैं। ब्रोकर इस काम के लिए विशेष स्टॉफ रखते हैं, जो बीएसई और एनएसई दोनों पर भरपूर मात्रा में सौदे करते रहते हैं।

4.आर्बिट्रेशन (Arbitration ):

इस शब्द का अर्थ आर्बिट्रेज से काफी अलग है। आर्बिट्रेशन का अर्थ है विवादों का निपटान। जब ब्रोकर और ब्रोकर के बीच या ब्रोकर और ग्राहक के बीच कोई विवाद हो जाता है तो इस प्रकार के विवाद को निपटाने के लिए मध्यस्थ की नियुक्ति की जाती है, जिसे आर्बिट्रेटर कहा जाता है और उसके निपटान की प्रक्रिया को आर्बिट्रेशन प्रोसेस कहा जाता है। शेयर बाजार में ऐसे विवादों के निपटान के लिए एक खास विभाग एक्सचेंज के नियमों एवं उपनियमों के तहत कार्य करता है।

इस प्रकार के मामलों में आर्बिट्रेटर की नियुक्ति एक्सचेंज के नियमों के अनुसार होती है और उसके द्वारा दिये गये निर्णय ब्रोकर और ग्राहकों पर लागू होते हैं। इस प्रक्रिया में आर्बिट्रेटर दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना निर्णय देता है।

5. नीलाम ( Auction ) :

शेयर बाजार में जब कोई निवेशक शेयर बेच देता है, परंतु समय पर उसकी डिलिवरी देने में विफल हो जाता है तो एक्सचेंज की कार्य पद्धति के तहत निवेशक के शेयर डिलिवरी दायित्व को उतारने के लिए उतने ही शेयरों का आवश्यक रूप से ऑक्शन (नीलाम) किया जाता है। इस प्रक्रिया में ऑक्शन के जरिए उतनी संख्या के शेयर बाजार के वर्तमान भाव पर ब्रोकर के द्वारा खरीदे जाते हैं और इसके भाव अंतर का बोझा निवेशक से वसूला जाता है।

इसका कारण यह है कि निवेशक ने अपने पास शेयर हुए बिना भी उनको बेच दिया था। हमने इसके पहले शार्ट सेल्स (खोटी बिक्री) की चर्चा की थी। उसमें भी शार्ट सेल्स करने वाले निवेशक को बाजार भाव पर शेयर खरीद कर डिलिवरी देनी होती है, परंतु जब कोई निवेशक स्वेच्छा से ऐसा नहीं करता है तो बाजार के नियमों के तहत स्टॉक एक्सचेंज द्वारा आवश्यक रूप से नीलामी के मार्फत उस सौदे का निपटान किया जाता है।

6. आवंटन (Allotment ) :

कंपनियों के सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के दौरान निवेशकों द्वारा किये गये आवेदन पर मिले हुए शेयरों को शेयर एलॉटमेंट कहा जाता है।

7. एसटीटी ( STT ) :

सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टेक्स को सारांश में एसटीटी कहते हैं। सरकार के `कर नियम` के अनुसार शेयर सिक्युरिटीज के प्रत्येक सौदे पर एसटीटी लागू होता है। सरकार को इस मार्ग से प्रतिदिन भारी राजस्व मिलता है। यह `कर` ब्रोकरों को भरना होता है हालांकि ब्रोकर इसे अपने ग्राहकों से वसूल लेते हैं। प्रत्येक कांट्रेक्ट नोट या बिल में ब्रोकरेज के साथ-साथ एसटीटी भी वसूला जाता है।

8. एफआईआई (FII ):

शेयर बाजार को नचाने वाला, बाजार की चाल निर्धारित करने वाला यह शब्द बाजार से संबंधित समाचारों में बार-बार सुनने को मिलता है। प्रायः इस बात पर आप अपना ध्यान देते हैं कि एफआईआई की लिवाली या बिकवाली के कारण बाजार का यह हाल हुआ। एफआईआई, यानि की फॉरेन इंस्टिट्युशनल इन्वेस्टर अर्थात विदेशी संस्थागत निवेशक। ये संस्थागत निवेशक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होते हैं। ये अपने स्वयं के देश के लोगों से बड़ी मात्रा में निवेश के लिए धन एकत्रित करते हैं और उनका अनेक देशों के शेयर बाजार में निवेश करते हैं। इन संस्थागत निवेशकों के ग्राहकों की सूची में सामान्य निवेश से लेकर बड़े निवेशक – पेंशन फंड आदि होते हैं, जिसका एकत्रित धन एफआईआई अपनी व्यूहरचना के अनुसार विविध शेयर बाजारों की प्रतिभूतियों में निवेश करके उस पर लाभ कमाते हैं और उसका हिस्सा अपने ग्राहकों को पहुंचाते हैं।

9. अनावरण ( Exposure):

साधारण शब्दों में इसे जोखिम कहा जा सकता है। जब कोई निवेशक किसी कंपनी में निवेश करता है तो यह कहा जाता है कि उक्त निवेशक ने कंपनी में एक्सपोजर लिया है। एक्सपोजर मात्र कंपनी में ही नहीं बल्कि संपूर्ण उद्योग या अर्थतंत्र में भी लिया जाता है। जब कोई निवेशक अन्य देश में निवेश करता है तो कहा जाता है कि उसने उस देश के अर्थ तंत्र में या उस देश की कंपनियों, उद्योगों में एक्सपोजर अर्थात जोखिम ली है। वायदे के सौदों में यह शब्द काफी उपयोग में लाया जाता है क्योंकि जब कोई ट्रेडर प्युचर कांट्रेक्ट करता है तब वह भविष्य की जोखिम लेता है। व्यक्ति जब भी कोई निवेश करता है तब उसके मूल्य में घट-बढ़ की संभावना होने से उस निवेश का एक्सपोजर कहा जाता है।

10. बेस्ट बाई ( Best bai ):

जो शेयर खरीदने के लिए उत्तम माने जाते हैं या जिन शेयरों का खरीदारी के लिए उत्तम भाव माना जाता है उन्हें “बेस्ट बाई“ कहा जाता है। ये कंपनियां श्रेष्ठ हैं अथवा भविष्य में उनका भाव अपने वर्तमान भाव से बढ़ने की संभावना होती है ऐसी स्क्रिप या शेयर को बेस्ट बाई के रूप में गिना जाता है। अनेक बार एनालिस्ट विद्यमान स्थित के आधार पर किसी शेयर को बेस्ट बाई कहते हैं, उस समय उन कंपनियों का शेयर भाव बढ़ने की प्रबल संभावनाएं रहती हैं।

11 ब्लू चिप ( Blue chip ):

शेयर बाजार की श्रेष्ठ – मजबूत कंपनियों के लिए यह शब्द उपयोग में लाया जाता है। किसी कंपनी का ब्लू चिप होने का अभिप्राय यह है कि उसके शेयर निवेशकों के लिए पसंदीदा शेयर हैं। इस प्रकार की कंपनियों में सौदे भी काफी होते हैं, उतार-चढ़ाव भी काफी होता है और उनमें निवेशकों का आकर्षण भी खूब बना रहता है।

12. व्यापार ( Trading ) :

बोल्ट अर्थात प्रतिभूतियों की ऑनलाइन स्क्रीन आधारित ट्रेडिंग सुविधा उपलब्ध कराने वाला टर्मिनल। बीएसई के सदस्यों को एक्सचेंज की तरफ से इस टर्मिनल की सुविधा उपलब्ध करायी जाती है।

13. बबल (Bubble) :

पिछले कुछ वर्षों से यह शब्द भी संपूर्ण विश्व में चर्चित है। विशेषकर बाजार में जब कोई भी प्रकरण खुलता है तो उसे “बबल बस्र्ट“ हुआ है ऐसा कहा जाता है। बबल अर्थात बुलबुला और बस्र्ट अर्थात फटना। जब किसी शेयर का भाव बुलबुले की तरह फूलता रहे और एक सीमा पर आने के बाद धड़ाम से गिर जाये तो इसे बुलबुला फूटना कहा जाता है।

14.सक्रिय शेयर ( Active share)

बाजार के वो शेयर जिनका क्रय-विक्रय ( Buy-Sell ) नियमित रूप से प्रतिदिन शेयर बाजार ( Share Market ) में होता हैं, उसे एक्टिव शेयर कहते हैं

15 राईट शेयर

किसी कम्पनी द्वारा जारी नये शेयरों को क्रय करने का पहला अधिकार वर्तमान शेयर होल्डर ( Current Shareholder ) का होता हैं. वर्तमान शेयर होल्डर के इस अधिकार को पूर्ण क्रय का अधिकार कहा जाता हैं और इस के कारण उनको जो शेयर प्राप्त होते हैं. उसे राईट शेयर कहा जाता हैं

16. बोनस शेयर

जब किसी कम्पनी द्वारा अपने अर्जित लाभों में से रखे नये रिजर्व को शेयर के रूप में वर्तमान शेयर होल्डरों के मध्य आनुपातिक रूप से बाँट दिया जाता हैं तो उसे बोनस शेयर कहते हैं

17. पूर्वाधिकार शेयर

वैसे शेयरों को पूर्वाधिकार शेयर कहा जाता हैं जिनको सामान्यतः दो पूर्वाधिकार प्राप्त होते है. कंपनी द्वारा सर्वप्रथम इनको लाभांश का भुगतान किया जाता हैं तथा लाभांश की दर निश्चित होती हैं. यदि भविष्य में कम्पनी का समापन होता हैं तो लेनदारों का भुगतान करने के बाद कम्पनी की संपत्तियों से वसूल की गयी राशि में से इस श्रेणी की शेयर होल्डर को अपनी पूँजी एनी शेयर होल्डर की तुलना में पहले प्राप्त करने का अधिकार होता हैं

18. कंट्रेरियन शेयर

इस श्रेणी में उन शेयरों को सम्मिलित किया जाता हैं जो बाजार के रूख से अलग दिशा में चलते हैं अर्थात बाज़ार में शेयरों के भाव में वृद्धि हो रही हैं तो इन शेयरों के भाव कम हो जाते हैं और यदि बाजार का रूख गिरावट का हैं तो इन शेयरों का मूल्य बढ़ जाता हैं

19. डिफेंसिव शेयर

जिन शेयरों के मूल्यों में भारी उतार चढ़ाव नहीं होते हैं उनको डिफेंसिव शेयर कहा जाता हैं. इन शेयरों पर वर्तमान लाभ तथा पूँजीगत लाभ सामान्य दर से बढ़ता हैं

20.  ए. डी. इंडेक्स

इन सूचकांक का प्रयोग शेयर बाजार की तेजी या मंदी के रूख का पता लगाने के लिए किया जाता हैं. इसकी गणना के लिए एक दिन में जिन शेयरों के मूल्य बढ़ते हैं, उनकी संख्या में उन शेयरों को भाग दिया जाता हैं जिनके मूल्य उस दिन गिरे होते हैं. यदि इंडेक्स 1 से अधिक होता हैं तो बाज़ार में तेजी का रुख़ होता हैं और इंडेक्स 1 से कम होता हैं तो बाज़ार में मंदी का रूख होता हैं

21. ब्लो आउट

जब कोई कम्पनी अपना नया इश्यू जारी करती हैं और उसका सब्सक्रिप्शन पहले ही दिन पूरा होकर बंद हो जाता हैं तो उसे ब्लो आउट ( Blow Out ) या आउट ऑफ़ विंडो ( Out of Window ) कहा जाता हैं

22. इनसाइडर ट्रेडिंग

यह एक अवैध कार्य हैं. जब उन व्यक्तियों द्वारा भारी मात्रा में शेयरों का क्रय-विक्रय करके लाभ कमाया जाता हैं, जिनके पास कम्पनी की गुप्त सूचनाएँ रहती हैं तो इस प्रकार के शेयरों के क्रय-विक्रय को इनसाइडर ट्रेडिंग कहा जाता हैं

23. कैश ट्रेडिंग

कैश ट्रेडिंग के अंतर्गत शेयर सर्टिफिकेट ( Share Certificate ) तथा नकद धन राशि ( Cash Money ) का लेन-देन अगली समायोजन तिथि से पहले ही हो जाना चाहिए. अब दलालों के सभी कैश ट्रेडिंग के लेन-देनों का समायोजन हो जाता हैं तो इसको समायोजन तिथि ( Adjustment Date ) कहा जाता है पर यह 14 दिन से अधिक नही हो सकती हैं

24. कर्ब ट्रेडिंग

जब शेयर बाजार के निर्धारित ट्रेडिंग समय के बाद अलग से सौदे किये जाते हैं तो इसको कर्ब ट्रेडिंग कहा जाता हैं. यद्यपि सौदे दलालों के द्वारा किये जाते हैं, परन्तु इनको वैधानिक नही माना जाता हैं. इस प्रकार किये गए सौदों का विवरण शेयर बाजार में उपलब्ध नही रहता हैं. वर्तमान में यह सेबी द्वारा प्रतिबंधित हैं

25. स्टैग

स्टैग उन व्यक्तियों को कहते है जो नई कम्पनियों के इश्युओ में भारी मात्रा में शेयरों के आवेदन पत्र प्रेरित करते हैं. इनको यह आशा रहती हैं कि जब कुछ व्यक्तियों को शेयर नही मिलेंगे तो वे इन शेयरों को बढ़े मूल्य पर ख़रीदने को तैयार हो जायेंगे. यह व्यक्ति केवल आवेदन पत्र की राशि प्रेषित करते हैं तथा शेयर आवंटित होते ही बेच देते हैं

26. वोलेटाइल शेयर

जिन शेयरों की कीमतों में बहुत अधिक परिवर्तन होते है, उन्हें वोलेटाइल शेयर कहा जाता हैं

27. फ्लोटिंग स्टॉक

किसी कंपनी की चुकता पूँजी का वह भाग फ्लोटिंग स्टॉक कहलाता हैं जो शेयर बाजार में क्रय-विक्रय के लिए उपलब्ध रहता हैं

28. शेयर सर्टिफिकेट

यह एक ऐसा प्रमाण पत्र है जो कम्पनी के मोहर के अधीन शेयर धारक के नाम जारी किया जाता हैं तथा इसमें उन शेयरों इसमें उन शेयरों के नंबर दिए रहते हैं, जिनके लिए यह जारी किया जाता हैं. उसमे शेयर भुगतान की गयी धनराशि का विवरण होता हैं

29. बेयरर डिबेंचर

ऐसा डिबेंचर जिसका हस्तांतरण केवल सुपुर्दगी के द्वारा हो जाता हैं, उनको डिबेंचर कहा जाता है. डिबेंचर के साथ लगे कूपन को प्रस्तुत करने पर ब्याज तथा डिबेंचर को प्रस्तुत करने पर मूलधन का भुगतान प्रस्तुतकर्त्ता को प्राप्त हो जाता हैं. खो जाने तथा चोरी हो जाने पर इस प्रकार के डिबेंचर के पूर्ण जोख़िम होते हैं

30. बंधक डिबेंचर

इस प्रकार के डिबेंचर कम्पनी के सम्पत्ति पर प्रभार रखते हैं. अतः इनका भुगतान सुरक्षित होता हैं. बंधक दो प्रकार के होते हैं – एक चल प्रभाव और दूसरा निश्चित प्रभाव. चल प्रभाव की स्थिति में किसी निश्चित सम्पत्ति पर प्रभाव नही होता हैं. केवल कम्पनी के समापन की स्थिति में इन डिबेंचरों को भुगतान में प्राथमिकता मिल जाती हैं. निश्चित प्रभाव की स्थिति में डिबेंचरों का कम्पनी की किसी निश्चित सम्पत्ति में प्रभाव होता हैं. ऐसी सम्पत्ति को कम्पनी न तो बेच सकती हैं और न ही हस्तांतरित कर सकती हैं

31. परिवर्तनशील डिबेंचर

ये ऐसे ऋण पत्र होते हैं जिनके धारको को कम्पनी यह विकल्प देती हैं कि वे किसी निश्चित अवधि के अंदर अपने ऋण पत्र को कम्पनी के शेयर में बदलवा सकते हैं. परिवर्तन की शर्ते सामान्यतः निर्गमन के समय ही तय कर दी जाती हैं, परन्तु ये शर्ते कम्पनी में अलग-अलग हो सकती हैं

32. हंग अप

जब किसी शेयर का भाव किसी निवेशक द्वारा क्रय किये गये भाव से काफी नीचे चला जाता हैं तथा ऐसी स्थिति में अधिक घाटा उठाकर शेयर बेचने के बदले वह निवेशक भविष्य में उसके भाव बढ़ने की आशा में अपने शेयरों को रखे रहे तो ऐसी स्थिति को हंग अप कहा जाता हैं

33. स्नोबालिंग

जब किसी शेयर के मूल्य एक निश्चित सीमा में पहुँच जाते हैं, तब क्रय-विक्रय के अनेक स्टॉप आर्डर होने लगते हैं. इन आर्डर के कारण पुनः बाजार में दबाव बनता हैं तथा पुनः आर्डर मिलने लगते हैं तो उस स्थिति को स्नोबालिग़ कहा जाता हैं

34. ग्रे मार्किट

यह अनाधिकृत बाजार होता हैं जहाँ नयी तथा अभी शेयर बाजार में सूचीबद्ध न हुई प्रतिभूतियों का प्रीमियम पर लेन-देन होता हैं. ये सौदे भी अनाधिकृत होते हैं. इन सौदों को शेयर बाजार का संरक्षण नही होते हैं

35. ट्रेडिंग लॉट

शेयरों की वह न्यूनतम संख्या या गुणांक को ट्रेडिंग लॉट कहा जाता हैं, जिसे शेयर बाजार में एक बार में बेचा या क्रय किया जा सकता हैं. सामान्यतः 10 रूपये मूल्य वाले शेयरों की न्यूनतम संख्या 50 या 100 निर्धारित की जाती हैं जबकि 100 रूपये मूल्य वाले शेयरों की संख्या 5 या 10निर्धारित की जाती हैं

36. शार्ट सेलिंग

जब किसी दलाल द्वारा इतने शेयरों की बिक्री की जाती हैं, जितने उसके पास शेयर नही होते हैं तो इसे शार्ट सेलिंग कहा जाता हैं. अनुबंध पूरा करने के लिए दलाल द्वारा नीलामी में शेयर क्रय किये जाते हैं

37. 24- पी. ई. अनुपात

किसी कम्पनी के प्रति शेयर के बाजार भाव में प्रति शेयर आय से भाग देकर पी. ई. अनुपात ज्ञात किया जाता हैं

PE Ratio = price per share / earnings per share (EPS)

 

Specially thanks to Post and Quiz makers ( With Regards )

ज्योति प्रजापति , P K Nagauri, चित्रकूट त्रिपाठी

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