जीवधारियों का वर्गीकरण | Science : Classification of Organisms

जीवधारियों का वर्गीकरण | Science : Classification of Organisms

जीव विज्ञान विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अंतर्गत समस्त जीवधारियों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। इसके अंतर्गत, पेड़-पौधों, वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं के उद्भव एवं विकास, भौतिक गुण, जैविक प्रक्रम, कोशिका संरचना, व्यवहार आदि का अध्ययन किया जाता है। वर्गीकरण के ये प्रयास वैज्ञानिक मानदंडों की जगह सहज बुद्धि पर आधारित हमारे भोजन, वस्त्र एवं आवास जैसी सामान्य उपयोगिता के वस्तुओं के उपयोग की आवश्यकताओं पर आधारित थे । जीव विज्ञान शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम लैमार्क (Lamarck) तथा जर्मन वैज्ञानिक ट्रेविरेनस (Treviranus) ने 1802 ई में किया था। जीव विज्ञान शब्द दो ग्रीक शब्दों जीवन तथा अध्ययन से मिलकर बना है।

जीव विज्ञान की शाखाएं (Branches of Biology)

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से जीव विज्ञान को दो प्रमुख शाखाओं में विभक्त किया गया है।

  1. वनस्पति विज्ञान (Botany)
  2. जन्तु विज्ञान (Zoology)

Botany (बॉटनी) शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के ΒΟΤΑΝΙΚΗ (बास्कीन) शब्द से हुई है जिसका अर्थ है चरना, थियोफ्रेस्टस ने इस प्रकार के 500 पौधों का वर्णन अपनी पुस्तक Historia plantarum’ में किया है। इसी कारण इन्हें वनस्पति विज्ञान का जनक कहा जाता है। अरस्तू ने अपनी पुस्तक जन्तु इतिहास में 500 जन्तुओं रचना स्वभाव, वर्गीकरण, जनन आदि का वर्णन किया है। इसी कारण इन्हें जन्तु विज्ञान का जनक माना है। इसके अतिरिक्त अरस्तू को विज्ञान का जनक एवं जीव विज्ञान का जनक भी कहते है।  

जीवधारियों के वर्गीकरण को वैज्ञानिक आधार John Ray नामक वैज्ञानिक ने प्रदान किया, लेकिन जीवधारियों के आधुनिक वर्गीकरण में सबसे प्रमुख योगदान स्वीडिश वैज्ञानिक कैरोलस लीनियस (Carolus Linnaeus) का है। लीनियस ने अपनी पुस्तकों – जेनेरा प्लाण्टेरम, सिस्टेमा नेचुरी, क्लासेस प्लाण्टेरन एवं फिलासोफिया बॉटेनिका में जीवधारियों के वर्गीकरण पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। इन्होने अपनी पुस्तक System of Nature में सम्पूर्ण जीवधारियों को दो जगतों पादप जगत व जन्तु जगत में विभाजित किया। इससे जो वर्गीकरण की प्रणाली शुरू हुई उसी से आधुनिक वर्गीकरण प्रणाली की नीव पड़ी, इसलिए कैरोलस लीनियस को वर्गीकरण का पिता कहा जाता है। लीनियस को आधुनिक वनस्पति विज्ञान का पिता भी कहते है।

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जीवधारियों का विभाजन ( Classification of Organisms )

परम्परागत द्वि-जगत वर्गीकरण का स्थान अन्ततः आर. एच. व्हिटेकर द्वारा 1969 ई. में प्रस्तावित 5 प्राणी जगत ने ले लिया। उन्होंने समस्त जीव जगत को पांच जगहों में विभाजित कर दिया कोशिका संरचना, शारीरिक संरचना, पोषण की प्रक्रिया, प्रजनन एवं जातिवृत्तीय संबंध उनके वर्गीकरण की पद्धति के प्रमुख मानदंड थे –

1. मोनेरा (Monera) –

यह हमारी पृथ्वी के सबसे पुराने जीव हैं माना जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ और जीवन की उत्पत्ति हुई तो सबसे पहले यही जीव बने थे, इनकी कोशिका पूर्ण विकसित नहीं होती है इसलिए सभी प्रोकैरियोटिक जीवो को भले ही वह पौधा हो या पादप इसके जीवो में केंद्रक स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता है, कोशिकांग भी अल्पविकसित प्रकार के होते हैं 3 विशेष जीव इसी कैटेगरी में रखे गए हैं Bacteria (जीवाणु) , Blue-Green Algae (नीलहरित शैवाल) और Mycoplasma (माइकोप्लाज्मा)    

Bacteria (जीवाणु) – मॉनेरा जगत के अंतर्गत आते हैं। ये सूक्ष्मजीवियों में सर्वाधिक संख्या में होते हैं, सभी स्थानों पर पाए जाते हैं। मुट्ठी भर मिट्टी में सैकड़ों प्रकार के बैक्टीरिया देखे गए हैं। ये गर्म जल के झरनों, मरूस्थल बर्फ एवं गहरे समुद्र जैसे विषम एवं प्रतिकूल वास स्थानों, जहाँ दूसरे जीव मुश्किल से ही जीवित रह पाते हैं, में भी पाए जाते हैं। कई बैक्टीरिया तो अन्य जीवों पर या उनके भीतर परजीवी के रूप में रहते हैं। बैक्टीरिया को उनके आकार के आधार पर चार समूहों में बाँटा गया है

  1. गोलाकार कोकस 
  2. छड़ाकार बैसिलस 
  3. कॉमा-आकार के विनियम 
  4. सर्पिलाकार स्पाइरिलम 

संरचना में बैक्टीरिया अत्यंत सरल प्रतीत होते हैं; परंतु इनका व्यवहार अत्यंत जटिल होता है। भोजन के लिए अन्य जीवधारियों अथवा मृत कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं

2. प्रोटिस्टा (Protista) –

इसमें एक कोशिकीय यूकैरियोटिक जंतु तथा पादप रखे गए हैं, जिसमें विकसित केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिका होती है, परंतु इस जगत की सीमाएं ठीक तरह से निर्धारित नहीं हो पाई हैं, प्राथमिक रूप से प्रोटिस्टा के सदस्य जलीय होते हैं। यूकैरियोटिक होने के कारण इनकी कोशिका में एक सुसंगठित केंद्रक एवं अन्य झिल्लीबद्ध कोशिकांग पाए जाते हैं। कुछ प्रोटिस्टा में कशाभ एवं पक्ष्माभ भी पाए जाते हैं। ये अलैंगिक, तथा कोशिका संलयन एवं युग्मनज ( जाइगोट) बनने की विधि द्वारा लैंगिक प्रजनन करते हैं। उदाहरण के लिए सभी प्रोटोजोआ जंतु, हरे शैवाल, अवपंक, फफूंद, अमीबा, युग्लीना, पैरामीशियम, प्लाज्मोडियम आदि

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3. पादप (Plantae ) –

सभी प्रकार के हरे पौधे इसी में रखे गए हैं, यह बहुकोशिकीय पौधे होते है। इनमें प्रकाश संश्लेषण होता है। इनकी कोशिकाओं में रिक्तिका पायी जाती है जैसे सभी प्रकार की वनस्पतियाँ । इसे आगे निम्न भागों में विभाजित किया गया है थैलोफाइटा (Thallophyta), ब्रायोफाइटा (Bryophyta), टेरिडोफाइटा (Pteridophyta), जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms) and एंजियोस्पर्म (Angiosperms)

4. कवक (Fungi) –

इसके गुण जंतुओं तथा पादप से जरूर मिलते हैं परंतु अधिकतर गुण पादप से मिलने के कारण इसे वनस्पति विज्ञान के अंतर्गत अध्ययन करते हैं इसका अध्ययन माइकोलॉजी कहलाता है, इस जगत में वे यूकैरियोटिक तथा परपोषित जीवधारी सम्मिलित किए जाते है, जिनमें अवशोषण द्वारा पोषण होता है। इनकी काया प्रायः शाखित एवं धागेनुमा संरचनाओं कवक-जन्तुओं की बनी होती है जो कि परस्पर एक जाल सदृश्य संरचना, कवक जाल बनाते है। ये सभी इतरपोषी या परजीवी अथवा मृतोपजीवी होते है।

5. जन्तु (Animalia) –

इस जगत में सभी बहुकोशिकीय तथा यूकैरियोटिक जीव सम्मिलित किए जाते है। जिनमें प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है और कोशिका भित्ति नहीं पाई जाती है, अर्थात जंतु इसी श्रेणी में आते हैं इन्हें मेटाजोआ भी कहते है। विविध प्रकार के जन्तु जैसे स्पंज, हाइड्रा, जेलीफिश, कृमि, घोंघे कीट, स्टार फिश, उभयचरी (मेंढक इत्यादि), सरीसृप, पक्षी तथा स्तनधारी जीव इसी जगत के अंग है।

पादप जगत का वर्गीकरण (Classification Of Plants)

थैलोफाइटा (Thelophyta) – यह बड़े ही सरल प्रकार के जंतु होते हैं पादप शरीर जड़ तना पत्ती में विभक्त नहीं होता है इनमें शैवाल और कवक आते हैं

ब्रायोफाइटा (Bryophyta) – यह थैलोफाइटा से कुछ विकसित होते हैं इनका पादप शरीर थोड़ा बहुत तना और पत्तियों में विभेदित होता है उदाहरण के तौर पर रिक्शिया और मार्केन्शिया

टेरीडोफाइटा (Pteridophyta) – में संवहन पूल भी आ जाता है पादप शरीर ब्रायोफाइटा से अधिक विकसित होता है उदाहरण हॉस्टेल अर्थात इक्विसिटम, इन्हें हम संवहनी क्रिप्टोगेम्स भी कहते हैं,

  • जिम्नोस्पर्म – यह नग्न बीजी पौधे होते हैं अर्थात इनके बीच नंगे होते हैं इस पर फल नहीं पाया जाता है उदाहरण के रूप में साबूदाना का पेड़ साइकस गिरारडराना, यह बहुत प्राचीन पौधे हैं, अब तक इनका अस्तित्व खत्म हो जाना चाहिए था, परंतु यह अभी भी जीवित है, इसलिए इन पौधों को जीवित जीवाश्म कहा जाता है
  •  एंजियोस्पर्म – आधुनिक पौधों को कहते हैं यह संपूर्ण विकसित होते हैं तथा दो प्रकार के होते हैं एक बीजपत्री तथा द्विबीजपत्री एक बीजपत्री पौधे द्विबीजपत्री पौधों से एडवांस है

जीव विज्ञान की प्रमुख शाखाएँ

                शाखाएँ    –  सम्बन्धित अध्ययन

  1. एनाटॉमी  –  आंतरिक संरचना का अध्ययन
  2. एम्ब्रियोलॉजी – युग्मकों के निर्माण, निषेचन एवं भ्रूण के परिवर्धन का अध्ययन
  3. जेनेटिक इन्जीनियरिंग – कृत्रिम जीन के निर्माण एवं स्थानांतरण का अध्ययन
  4. जेनेटिक्स – वंशागति एवं विभिन्नताओं का अध्ययन

हमारे द्वारा जीवधारियों का वर्गीकरण के अलावा उपलब्ध कराए गए Notes and Test –

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